B.Sc. 2nd Year Zoology - Unit 1 Questions and Answers
1. अमीनो अम्ल तथा पेप्टाइड्स क्या होते हैं? इनकी संरचना तथा कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमीनो अम्ल (Amino Acids) जैविक यौगिक होते हैं, जिनमें एक अमीनो समूह (-NH2) और एक
कार्बोक्सिल समूह (-COOH) होता है। ये प्रोटीन के निर्माण खंड होते हैं। जब बहुत से
अमीनो अम्ल आपस में जुड़ते हैं, तो पेप्टाइड्स (Peptides) बनते हैं। यदि पेप्टाइड लंबा
हो, तो उसे प्रोटीन कहा जाता है।
संरचना: अमीनो अम्ल की मूल संरचना में कार्बन, हाइड्रोजन, ऑक्सीजन और नाइट्रोजन होते
हैं। इनमें R ग्रुप अलग-अलग होने से विभिन्न प्रकार के अमीनो अम्ल बनते हैं। पेप्टाइड्स
अमीनो अम्लों के पेप्टाइड बॉन्ड द्वारा जुड़ने से बनते हैं।
कार्य:
1. प्रोटीन संश्लेषण के मूल घटक।
2. हार्मोन, एंजाइम, और एंटीबॉडी निर्माण।
3. ऊर्जा स्रोत के रूप में कार्य।
2. प्रोटीन क्या है? इनके लक्षण, महत्व तथा वर्गीकरण पर विस्तृत टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
प्रोटीन (Proteins) बड़े जैविक अणु होते हैं, जो अमीनो अम्लों की श्रृंखला से बने होते
हैं। ये जीवन के लिए अत्यंत आवश्यक हैं।
लक्षण:
- प्रोटीन बहुलक होते हैं।
- जल में घुलनशील (कुछ अपवाद)।
- तापमान एवं pH के प्रति संवेदनशील।
महत्व:
- शरीर की संरचना बनाते हैं।
- एंजाइम्स, हार्मोन्स, एंटीबॉडीज़ प्रोटीन से बने होते हैं।
- ऊर्जा स्रोत।
वर्गीकरण:
1. सरल प्रोटीन (Simple Proteins): जैसे एल्ब्यूमिन।
2. संयुक्त प्रोटीन (Conjugated Proteins): जैसे हीमोग्लोबिन।
3. व्युत्पन्न प्रोटीन (Derived Proteins): अपघटित रूप।
3. अमीनो अम्ल के जैविक कार्यों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
अमीनो अम्ल शरीर के लिए आवश्यक कार्बनिक यौगिक हैं।
मुख्य कार्य:
1. प्रोटीन निर्माण।
2. हार्मोन निर्माण (जैसे टायरोसिन से थायरॉक्सिन)।
3. ऊर्जा स्रोत।
4. एंजाइम निर्माण।
5. एंटीबॉडी निर्माण।
6. कोशिका वृद्धि और मरम्मत में योगदान।
4. कार्बोहाइड्रेट्स क्या हैं? रासायनिक प्रकृति के आधार पर कार्बोहाइड्रेट को वर्णित कीजिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट्स (Carbohydrates) जैविक यौगिक हैं जिनका सामान्य सूत्र Cn(H2O)n होता
है।
वर्गीकरण:
1. मोनोसैकराइड्स: सरल, जैसे ग्लूकोज।
2. डाइसेकराइड्स: दो मोनोसैकराइड्स, जैसे सुक्रोज।
3. पॉलीसेकराइड्स: जैसे स्टार्च।
कार्य:
- ऊर्जा स्रोत।
- ऊर्जा संचयन।
- संरचनात्मक घटक (सेल्युलोज)।
5. लिपिड्स क्या है? लिपिड्स का वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
लिपिड्स (Lipids) जल में अघुलनशील परंतु कार्बनिक सॉल्वेंट्स में घुलनशील यौगिक हैं।
वर्गीकरण:
1. सरल लिपिड्स: ट्राइग्लिसराइड्स।
2. संयुक्त लिपिड्स: फॉस्फोलिपिड्स।
3. व्युत्पन्न लिपिड्स: स्टेरॉइड्स।
कार्य:
- ऊर्जा भंडारण।
- ऊष्मा संरक्षण।
- कोशिका झिल्ली का निर्माण।
6. न्यूक्लिक अम्ल के प्रकारों के बारे में लिखिए।
उत्तर:
न्यूक्लिक अम्ल DNA और RNA होते हैं।
1. DNA: आनुवंशिक जानकारी संग्रह। डबल हेलिक्स।
2. RNA: प्रोटीन संश्लेषण में सहायक। प्रकार: mRNA, tRNA, rRNA।
7. DNA की संरचना का वर्णन कीजिए और DNA तथा RNA में अंतर बताइए।
उत्तर:
DNA डबल हेलिक्स संरचना वाला अणु है। इसमें डिऑक्सीराइबोज शर्करा, फॉस्फेट समूह और
चार बेस (A, T, G, C) होते हैं।
DNA तथा RNA में अंतर:
|
विशेषता |
DNA |
RNA |
|
पूरा नाम |
Deoxyribonucleic
Acid |
Ribonucleic
Acid |
|
शर्करा (Sugar) |
Deoxyribose |
Ribose |
|
नाइट्रोजन बेस |
A, T, G, C |
A, U, G, C
(Thymine के स्थान पर Uracil) |
|
संरचना |
Double
Stranded (दो श्रृंखलाएं) |
Single
Stranded (एक श्रृंखला) |
|
कार्य |
आनुवंशिक
सूचना का भंडारण |
प्रोटीन
संश्लेषण में सहायक (mRNA, tRNA) |
|
स्थायित्व (Stability) |
अधिक स्थायी |
कम स्थायी |
|
स्थान |
मुख्यतः
न्यूक्लियस |
न्यूक्लियस
एवं साइटोप्लाज्म |
|
प्रकार |
एक ही प्रकार |
mRNA,
tRNA, rRNA |
Unit 2 - Enzymes and Metabolic Pathways
question1. एन्जाइम पर निबंध लिखिए।
एन्जाइम्स (Enzymes) जैविक उत्प्रेरक (Biological Catalysts) होते हैं जो
जैव रासायनिक अभिक्रियाओं (Biochemical Reactions) की गति को
तीव्र करते हैं। ये
प्रोटीन से बने होते
हैं और प्रत्येक एन्जाइम
एक विशेष प्रकार
की अभिक्रिया को
ही उत्प्रेरित करता
है। एन्जाइम की खोज
'बुचनेर' ने 1897 में की
थी। एन्जाइम्स का कार्य शरीर
में होने वाली रासायनिक
क्रियाओं को नियंत्रित करना
और उन्हें सही
दिशा देना है। उदाहरण
के लिए, पाचन
तंत्र में भोजन को
पचाने वाले एन्जाइम्स जैसे
पेप्सिन, ट्रिप्सिन आदि महत्वपूर्ण भूमिका
निभाते हैं।
एन्जाइम की क्रियाशीलता को
प्रभावित करने वाले कारकों
में तापमान, pH, एन्जाइम की सांद्रता,
और सब्सट्रेट की
उपस्थिति मुख्य हैं। एन्जाइम्स
की विशिष्टता (Specificity) का अर्थ
है कि एक
एन्जाइम केवल एक विशेष
सब्सट्रेट पर ही कार्य
करता है।
संक्षेप में, एन्जाइम्स जीवों
के जीवन के
लिए अत्यंत आवश्यक हैं
क्योंकि इनकी अनुपस्थिति में
जैविक क्रियाएँ या तो
बहुत धीमी हो जाती
हैं या होती ही
नहीं। इसलिए एन्जाइम्स को
जीवन की गति देने
वाला अणु कहा जाता
है।
Question 2. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए:
1. मिकेलिस-मेंटन समीकरण
मिकेलिस-मेंटन समीकरण (Michaelis-Menten Equation) एन्जाइम गतिशीलता (Enzyme Kinetics) को समझाने
वाला महत्वपूर्ण समीकरण है। इस
समीकरण के अनुसार एन्जाइम
की क्रियाशीलता सब्सट्रेट
की सांद्रता पर
निर्भर करती है। यह
समीकरण निम्न प्रकार है:
V = (Vmax [S]) / (Km + [S])
जहाँ V = अभिक्रिया की गति, Vmax = अधिकतम
गति, [S] = सब्सट्रेट की सांद्रता, Km = मिकेलिस
स्थिरांक।
यह समीकरण दर्शाता
है कि जैसे-जैसे सब्सट्रेट की
मात्रा बढ़ती है, अभिक्रिया
की गति भी
बढ़ती है, परंतु एक
सीमा के बाद गति
स्थिर हो जाती है।
2. एन्जाइम क्रियाशीलता को प्रभावित करने वाले कारक
एन्जाइम की क्रियाशीलता कई
बाहरी और आंतरिक कारकों
से प्रभावित होती
है। इनमें मुख्य कारक
हैं:
1. तापमान – अत्यधिक उच्च या
निम्न तापमान एन्जाइम की
क्रियाशीलता को कम कर
सकता है।
2. pH – प्रत्येक एन्जाइम एक विशिष्ट
pH पर अधिकतम क्रियाशील होता
है।
3. सब्सट्रेट की सांद्रता – अधिक
सांद्रता से क्रिया की
गति बढ़ती है लेकिन
एक स्तर के
बाद स्थिर हो जाती
है।
4. एन्जाइम की सांद्रता – अधिक
एन्जाइम से गति बढ़ती
है।
5. अवरोधक (Inhibitors) – कुछ रसायन एन्जाइम
की क्रिया को
रोक सकते हैं।
प्रश्न 3: प्रोटीन उपपचय/अपपचय का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
Protein catabolism (प्रोटीन
उपपचय) वह प्रक्रिया है
जिसमें प्रोटीन को छोटे
घटकों में तोड़ दिया
जाता है, ताकि शरीर
इनसे ऊर्जा प्राप्त कर
सके या इन्हें पुनर्निर्माण
में उपयोग कर सके।
जब शरीर को
ऊर्जा की आवश्यकता होती
है या जब
प्रोटीन की मात्रा आवश्यकता
से अधिक हो
जाती है, तो यह
प्रक्रिया शुरू होती है।
प्रोटीन उपपचय की प्रक्रिया
मुख्यतः दो चरणों में
होती है:
1. **प्रोटीन का अमीनो अम्ल
में विघटन**: सबसे पहले,
प्रोटीन को पेप्टाइड्स और
फिर अमीनो अम्लों में
तोड़ा जाता है। यह
कार्य एंजाइम्स जैसे पेप्सिन,
ट्रिप्सिन आदि करते हैं।
2. **अमीनो अम्लों का further टूटना**:
अमीनो अम्लों से अमीनो
समूह को हटाकर शेष
भाग को ऊर्जा के
लिए उपयोग किया जाता
है। अमीनो समूह को
हटाने की प्रक्रिया को
डी-एमिनेशन कहते
हैं। इससे अमोनिया बनता
है जिसे शरीर
यूरिया के रूप में
बाहर निकालता है।
इसका महत्व यह है
कि प्रोटीन उपपचय
से शरीर को
आवश्यक ऊर्जा मिलती है,
विशेषकर तब जब कार्बोहाइड्रेट्स
और वसा पर्याप्त
मात्रा में उपलब्ध नहीं
होते।
उदाहरण: जब कोई उपवास
करता है, तो शरीर
सबसे पहले वसा और
फिर प्रोटीन का उपयोग
ऊर्जा के लिए करता
है। इसे survival strategy भी कहा जा
सकता है।
प्रश्न 4: कार्बोहाइड्रेट उपपचय (Metabolism) पर एक निबंध लिखिए।
उत्तर:
कार्बोहाइड्रेट उपपचय (Carbohydrate Metabolism) वह जैव रासायनिक
प्रक्रिया है जिसमें शरीर
कार्बोहाइड्रेट्स को ऊर्जा में
परिवर्तित करता है। यह
जीवन के लिए आवश्यक
ऊर्जा प्रदान करता है।
मुख्य कार्बोहाइड्रेट्स में ग्लूकोज, फ्रक्टोज,
सुक्रोज आदि शामिल हैं।
मुख्य प्रक्रियाएं:
1. **ग्लाइकोलाइसिस**: यह प्रक्रिया कोशिका
द्रव्य (cytoplasm) में होती है,
जहाँ ग्लूकोज को टूटकर
पाइरूवेट में बदला जाता
है। इसमें थोड़ी मात्रा
में ATP (ऊर्जा) बनती है।
2. **क्रेब्स चक्र (Krebs Cycle)**: पाइरूवेट माइटोकॉन्ड्रिया में
जाकर और अधिक ऊर्जा
(ATP) उत्पन्न करता है।
3. **Electron Transport Chain (ETC)**: इसमें
सबसे अधिक ऊर्जा बनती
है।
कार्बोहाइड्रेट उपपचय का महत्व
यह है कि
यह मस्तिष्क और
मांसपेशियों को तत्काल ऊर्जा
देता है। उदाहरण के
लिए, जब हम दौड़ते
हैं, तो शरीर तुरंत
ग्लूकोज से ऊर्जा प्राप्त
करता है।
यदि कार्बोहाइड्रेट अधिक मात्रा में
हों, तो शरीर इन्हें
वसा में बदल कर
जमा कर लेता है।
वहीं, यदि कम हों,
तो शरीर वसा
और प्रोटीन से
ऊर्जा प्राप्त करता है।
प्रश्न 5: क्रेब्स चक्र पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
क्रेब्स चक्र को साइट्रिक एसिड
चक्र या TCA चक्र (Tricarboxylic
Acid Cycle) भी कहा जाता है। यह हमारे शरीर में ऊर्जा बनाने की एक मुख्य प्रक्रिया है और
यह माइटोकॉन्ड्रिया (Mitochondria) के अंदर होता है। जब हम भोजन करते हैं, तो उससे
ग्लूकोज मिलता है। इस ग्लूकोज से पहले Pyruvate बनता है और फिर Acetyl-CoA,
जो क्रेब्स
चक्र में प्रवेश करता है।
क्रेब्स चक्र की प्रमुख विशेषताएं:
- यह एक चक्राकार
प्रक्रिया है जो बार-बार दोहराई जाती है।
- इसमें Acetyl-CoA को Oxaloacetate
से जोड़कर Citrate बनता है।
- इस चक्र में कई Intermediate compounds बनते हैं
जैसे Succinate, Fumarate, Malate आदि।
- इस चक्र के दौरान NADH,
FADH2 और थोड़ा ATP बनता है।
- NADH और FADH2 बाद में Electron Transport Chain में जाकर
ढेर सारा ATP बनाते हैं।
महत्व: यह चक्र जीवन
के लिए जरूरी है क्योंकि इससे शरीर को ऊर्जा (ATP) मिलती है। बिना इस चक्र के,
कोई भी जीव
जिंदा नहीं रह सकता। जैसे मोबाइल को चार्ज चाहिए, वैसे ही शरीर को ATP
चाहिए, जो क्रेब्स
चक्र से मिलता है।
प्रश्न 6: वसा उपपचय पर निबंध लिखिए।
उत्तर:
वसा उपपचय (Fat Metabolism) वह प्रक्रिया
है जिसमें वसा (Fat) को तोड़कर ऊर्जा बनाई जाती है। जब हम खाना खाते हैं,
तो उसमें वसा
भी होती है। यह वसा शरीर में Triglycerides के रूप में जमा
होती है। जब शरीर को ऊर्जा की जरूरत होती है, तब ये Triglycerides
टूटते हैं।
मुख्य प्रक्रिया:
- सबसे पहले, Triglycerides को Fatty Acids और Glycerol में तोड़ा
जाता है।
- Glycerol को Glucose में बदला जा सकता है।
- Fatty Acids undergo करते हैं β-Oxidation,
जिससे Acetyl-CoA बनता है।
- ये Acetyl-CoA फिर क्रेब्स
चक्र में जाकर ऊर्जा बनाता है।
विशेषता: वसा से बहुत
ज्यादा ऊर्जा मिलती है, कार्बोहाइड्रेट से भी ज्यादा। इसलिए शरीर वसा को ‘Energy
Bank’ की तरह जमा करके रखता है।
उदाहरण: जब कोई व्यक्ति
लम्बे समय तक भूखा रहता है या exercise करता है, तब शरीर Fat को तोड़कर
ऊर्जा बनाता है। इसी वजह से Fat कम होती है और वजन घटता है।
प्रश्न 7: कीटोनेसिस (Ketogenesis)
पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
कीटोनेसिस (Ketogenesis) वह प्रक्रिया है जिसमें
शरीर फैटी एसिड्स को Ketone Bodies में बदलता है।
यह लिवर (Liver) में होता है और तब शुरू होता है जब शरीर में ग्लूकोज की कमी हो जाती है। जैसे कि जब कोई
भूखा रहता है, Low-carb diet करता है या Diabetes में शरीर ग्लूकोज उपयोग
नहीं कर पाता।
Ketone Bodies तीन प्रकार के
होते हैं:
- Acetoacetate
- Beta-hydroxybutyrate
- Acetone
ये केटोन बॉडीज खून में जाती हैं और मस्तिष्क,
हृदय और
मांसपेशियों को ऊर्जा देती हैं।
महत्व: कीटोनेसिस जीवन
रक्षक प्रक्रिया है क्योंकि यह शरीर को ग्लूकोज के बिना भी ऊर्जा देती है।
उदाहरण: बहुत समय तक
उपवास करने पर शरीर कीटोनेसिस शुरू करता है ताकि मस्तिष्क को ऊर्जा मिलती रहे।
B.Sc. 2nd
Year Zoology - Unit 3
Questions and
Answers
1.
DNA की संरचना एवं प्रकार का वर्णन कीजिए।
DNA (Deoxyribonucleic Acid) एक बहु-अण्वीय
जैविक अणु है, जिसमें जीवों की आनुवंशिक सूचना निहित होती है। इसकी संरचना
द्वि-हेलिक्स (Double Helix) होती है, जिसे वाटसन और क्रिक ने 1953 में प्रतिपादित किया था। DNA
दो लंबी
शृंखलाओं (Strands) से बना होता है, जो एक-दूसरे के चारों ओर सर्पिल रूप में लिपटी
होती हैं। प्रत्येक शृंखला में न्यूक्लियोटाइड्स होते हैं, जिसमें तीन भाग होते हैं –
डिऑक्सीराइबोज शर्करा, फॉस्फेट समूह और नाइट्रोजनयुक्त क्षार (A, T, G, C)।
DNA में A (Adenine) हमेशा T
(Thymine) से और G (Guanine) हमेशा C (Cytosine) से जुड़ता है। DNA की लंबाई, अनुक्रम (Sequence)
और संरचना हर
जीव में अलग होती है।
DNA के प्रकार:
- जीनोमिक DNA – जो
केंद्रक में उपस्थित रहता है और पूर्ण आनुवंशिक जानकारी को समाहित करता है।
- माइटोकॉन्ड्रियल DNA – माइटोकॉन्ड्रिया
में पाया जाता है, केवल मातृ पक्ष से प्राप्त होता है।
- प्लास्मिड DNA – जीवाणुओं
में पाया जाता है, छोटा, वलयाकार होता है।
DNA की संरचना में किसी भी
प्रकार का परिवर्तन (Mutation) जीव के लक्षणों को प्रभावित कर सकता है।
2.
DNA में सुपर क्वॉइलिंग (Super
Coiling) प्रक्रिया को समझाइये।
DNA सुपर क्वॉइलिंग एक विशेष
जैविक प्रक्रिया है जिसमें DNA का डबल हेलिक्स स्वयं पर अधिक कुंडलित हो जाता है। यह
प्रक्रिया DNA को कोशिका में कम स्थान में समाहित करने में सहायता करती
है। DNA सामान्यतः 2 मीटर लंबा होता है, लेकिन वह कोशिका के छोटे केंद्रक में समा जाता
है, इसका कारण ही सुपर क्वॉइलिंग है।
सुपर क्वॉइलिंग के प्रकार:
- नेगेटिव सुपर क्वॉइलिंग – DNA का अधिक
खुला होना, जिससे यह प्रतिकृति एवं लिप्यंतरण के लिए तैयार रहता
है।
- पॉजिटिव सुपर क्वॉइलिंग – DNA का अधिक
कसना, जिससे वह स्थिर हो जाता है।
नियंत्रण करने वाले एंजाइम:
- टोपोइसोमेरेज़ I और II
– यह तनाव कम करते हैं और DNA के टूटे
हुए सिरों को जोड़ते हैं।
सुपर क्वॉइलिंग से DNA की जैविक प्रक्रिया
कुशलतापूर्वक होती है, जैसे – जीन अभिव्यक्ति, प्रतिकृति और RNA संश्लेषण।
3.
न्यूक्लियोसोम के सॉलिनॉयड मॉडल का सचित्र वर्णन कीजिए।
DNA को कोशिका के केंद्रक में
सुव्यवस्थित करने के लिए न्यूक्लियोसोम की व्यवस्था होती है। न्यूक्लियोसोम DNA
और हायस्टोन
प्रोटीन का संघटन है। सॉलिनॉयड मॉडल के अनुसार, न्यूक्लियोसोम एक
सर्पिलाकार कुंडली बनाते हैं जो DNA की कॉम्पैक्टिंग को बढ़ाते हैं।
सॉलिनॉयड संरचना:
- प्रत्येक सॉलिनॉयड में लगभग 6 न्यूक्लियोसोम
होते हैं।
- DNA, हायस्टोन ऑक्टामर (H2A, H2B, H3, H4) के चारों
ओर लिपटा होता है।
- हायस्टोन H1 DNA को स्थिर
रखता है।
महत्त्व:
- DNA की लंबाई कम होती है।
- जीन की अभिव्यक्ति और नियंत्रण में सहायता मिलती है।
यह मॉडल DNA पैकिंग की उच्च स्तर की
संरचना को दर्शाता है।
4.
क्रोमोसोम पर टिप्पणी लिखिए।
क्रोमोसोम केंद्रक में स्थित DNA का एक सघन रूप
है, जो जीवों की आनुवंशिक विशेषताओं को निर्धारित करता है। यह क्रोमेटिन से बना
होता है, जो DNA और हायस्टोन प्रोटीन का संयोजन है।
संरचना:
- क्रोमोसोम दो क्रोमाटिड्स और एक सेंट्रोमेर से बना
होता है।
- प्रत्येक क्रोमाटिड में एक DNA शृंखला
होती है।
मानव में 46 क्रोमोसोम (23
जोड़े) होते हैं। इनमें 22 जोड़े ऑटोसोम और 1 जोड़ा सेक्स
क्रोमोसोम होता है (XX या XY)।
महत्त्व:
- जीनों का वहन करते हैं।
- वंशानुगत जानकारी का संचरण।
- कोशिका विभाजन में आवश्यक।
क्रोमोसोम ही जीवन की मूलभूत इकाई है, जो सभी जैविक
गुणों को नियंत्रित करता है।
5.
न्यूक्लियोसोम में DNA कैसे पैक किया जाता है।
DNA की कुशल पैकिंग के लिए
न्यूक्लियोसोम मुख्य इकाई है। एक न्यूक्लियोसोम में DNA की लगभग 147 बेस जोड़ी
हायस्टोन प्रोटीन के ऑक्टामर (2 H2A, 2 H2B, 2 H3, 2 H4) के चारों ओर लिपटी होती है।
H1 हायस्टोन DNA को
न्यूक्लियोसोम से जोड़ता है और संरचना को स्थायित्व प्रदान करता है।
पैकिंग का क्रम:
DNA → न्यूक्लियोसोम → सॉलिनॉयड → क्रोमेटिन → क्रोमोसोम
इस पैकिंग से DNA अधिक संगठित और सुरक्षित
रहता है, जिससे जीन की अभिव्यक्ति नियंत्रित होती है।
6.
RNA के संश्लेषण का वर्णन कीजिए। कोशिकाओं में पाए जाने वाले विभिन्न प्रकार के RNA का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
RNA संश्लेषण को लिप्यंतरण (Transcription) कहते हैं। इसमें DNA के एक स्ट्रैंड को टेम्पलेट
बनाकर RNA पॉलिमरेज़ एंजाइम RNA का निर्माण करता है। यह प्रक्रिया केंद्रक में होती है।
RNA के प्रकार:
- mRNA (Messenger RNA) – DNA की सूचना
राइबोसोम तक ले जाता है।
- tRNA (Transfer RNA) – अमीनो
एसिड को राइबोसोम तक लाता है।
- rRNA (Ribosomal RNA) – राइबोसोम
का निर्माण करता है।
- snRNA, miRNA – जीन
नियंत्रण में सहायक।
RNA जीन अभिव्यक्ति का प्रमुख
कारक है जो प्रोटीन संश्लेषण की दिशा तय करता है।
7.
DNA Replication पर एक निबंध लिखिए।
DNA Replication वह प्रक्रिया है जिससे DNA
की एक समान
प्रतिकृति तैयार होती है। यह प्रक्रिया अर्ध-रक्षात्मक (Semi-conservative)
होती है जिसमें
एक पुराना और एक नया स्ट्रैंड होता है।
चरण:
- DNA का खुलना – हेलिकेज़
एंजाइम DNA को खोलता है।
- नया DNA निर्माण
– DNA पॉलिमरेज़ न्यूक्लियोटाइड्स जोड़ता है।
- लीगेशन – लिगेज़ एंजाइम टूटे भागों को जोड़ता है।
DNA Replication कोशिका विभाजन के पूर्व
होता है और यह सटीकता के साथ होता है, जिससे वंशानुगत सूचना अगली पीढ़ी में
स्थानांतरित होती है।
8.
प्राकृतिक उत्पत्ति एवं कृत्रिम क्लोन पर संक्षिप्त टिप्पणी
लिखिए।
प्राकृतिक उत्पत्ति (Natural
Cloning) और कृत्रिम क्लोन (Artificial Cloning) दोनों ही जैविक
जगत में समान आनुवंशिक जानकारी वाली संतति या कोशिका उत्पन्न करने की प्रक्रिया
है।
प्राकृतिक उत्पत्ति:
प्राकृतिक रूप
से क्लोनिंग कई जीवों में देखी जाती है। यह प्रक्रिया प्रजनन के दौरान होती है,
जिसमें बिना
किसी बाहरी हस्तक्षेप के समान आनुवंशिक गुणों वाले जीव उत्पन्न होते हैं।
उदाहरण:
- एककोशकीय जीव जैसे अमीबा,
पैरामीशियम आदि।
- वनस्पतियों में कटिंग, कंद,
धावन जैसे तरीकों से क्लोन बनते हैं।
कृत्रिम क्लोनिंग:
यह जैव
प्रौद्योगिकी के माध्यम से की जाती है। इसमें वैज्ञानिक विधियों का प्रयोग करके
किसी जीव का प्रतिरूप तैयार किया जाता है।
मुख्य विधियाँ:
- Somatic Cell Nuclear Transfer (SCNT) – जैसे डॉली भेड़ का क्लोन।
- Reproductive Cloning – संतान
उत्पादन हेतु।
- Therapeutic Cloning – चिकित्सा
हेतु अंग/ऊतक निर्माण।
अंतर: प्राकृतिक
क्लोनिंग स्वतः होती है, जबकि कृत्रिम क्लोनिंग में मानव हस्तक्षेप होता है। कृत्रिम
क्लोनिंग में सटीक नियंत्रण होता है जबकि प्राकृतिक में नहीं।
9.
प्रोकैरियोटिक और यूकैरियोटिक प्रतिकृति में क्या अंतर है?
प्रोकैरियोटिक और
यूकैरियोटिक प्रतिकृति (Replication) में कई मूलभूत अंतर होते
हैं, जो उनके कोशिका संगठन पर आधारित होते हैं।
|
बिंदु |
प्रोकैरियोटिक प्रतिकृति |
यूकैरियोटिक प्रतिकृति |
|
DNA का प्रकार |
गोलाकार (Circular
DNA) |
रैखिक (Linear
DNA) |
|
शुरुआत बिंदु (Origin) |
एकल बिंदु (Single
origin of replication) |
अनेक बिंदु (Multiple
origins) |
|
गति |
तेज गति (~1000
nucleotides/sec) |
धीमी गति (~50
nucleotides/sec) |
|
DNA पॉलिमरेज़ |
मुख्यतः DNA
Pol III |
अनेक प्रकार
(DNA Pol α, δ, ε आदि) |
|
पैकेजिंग |
क्रोमेटिन
संरचना नहीं होती |
क्रोमेटिन
संरचना होती है |
|
प्रक्रिया का नियंत्रण |
सरल |
जटिल |
निष्कर्ष: यूकैरियोटिक
प्रतिकृति अधिक जटिल होती है, लेकिन प्रोकैरियोटिक में यह तेज और सरल होती है।
10.
डी.एन.ए. पॉलिमरेज़ की प्रूफरीडिंग क्षमता क्यों होती है?
DNA पॉलिमरेज़ की प्रूफरीडिंग
क्षमता उसकी त्रुटि सुधारने की विशेषता है, जिससे DNA प्रतिकृति अत्यंत शुद्ध और सटीक होती है।
प्रूफरीडिंग प्रक्रिया:
DNA पॉलिमरेज़ में 3'
→ 5' एक्सोन्यूक्लिएज गतिविधि होती है, जिससे यह गलत न्यूक्लियोटाइड को पहचानकर हटाता
है और सही न्यूक्लियोटाइड जोड़ता है।
महत्त्व:
- त्रुटियों को रोकता है।
- उत्परिवर्तन की संभावना घटाता है।
- आनुवंशिक स्थिरता बनाए रखता है।
DNA पॉलिमरेज़ की यह क्षमता
जीवन के अस्तित्व हेतु अनिवार्य है क्योंकि गलत प्रतिकृति से रोग उत्पन्न हो सकते
हैं।
11.
निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए—
(1) क्रोमैटिन की संरचना (Structure
of Chromatin):
क्रोमैटिन DNA और प्रोटीन (हायस्टोन) का
जटिल मिश्रण है। यह दो प्रकार का होता है:
- यूक्रोमैटिन – सक्रिय,
हल्के रंग का।
- हेट्रोक्रोमैटिन – निष्क्रिय,
गहरे रंग का।
क्रोमैटिन न्यूक्लियोसोम के रूप में व्यवस्थित
रहता है, जिससे DNA संगठित रहता है और जीन नियंत्रण संभव होता है।
(2) हिस्टोन (Histones):
हिस्टोन प्रोटीन DNA को संरचना देने में सहायक
होते हैं। 5 प्रकार: H1, H2A, H2B, H3, H4। DNA, हायस्टोन ऑक्टामर के चारों ओर लिपटता है, जिससे
न्यूक्लियोसोम बनता है।
हिस्टोन का कार्य:
- DNA पैकिंग।
- जीन नियंत्रण।
(3) नॉन कोडिंग RNA
(Non-coding RNA):
यह RNA ऐसा होता है जो प्रोटीन नहीं बनाता परंतु जीन
नियंत्रण में सहायक होता है।
प्रकार:
- miRNA, siRNA, snRNA कार्य:
- जीन साइलेंसिंग।
- ट्रांसलेशन का नियंत्रण।
(4) आनुवंशिक सूचनाओं का
स्थानांतरण (Flow of Genetic Information):
यह प्रक्रिया DNA
→ RNA → Protein के रूप में होती है, जिसे सेंट्रल डॉग्मा कहते हैं। इसमें DNA से RNA बनता है (Transcription)
और RNA से प्रोटीन (Translation)।
यह प्रक्रिया जीवन के लिए मूलभूत है।
12.
डी.एन.ए. की संश्लेषण प्रक्रिया किस एंजाइम द्वारा प्रारंभ
होती है?
DNA संश्लेषण की प्रक्रिया DNA पॉलिमरेज़ एंजाइम द्वारा होती है,
लेकिन प्रारंभ
में प्राइमेज एंजाइम RNA प्राइमर जोड़ता है। फिर DNA
पॉलिमरेज़ उस
पर DNA जोड़ना प्रारंभ करता है।
मुख्य एंजाइम:
- हेलिकेज़ – DNA को खोलता
है।
- प्राइमेज़ – RNA प्राइमर
जोड़ता है।
- DNA पॉलिमरेज़ – DNA का
संश्लेषण करता है।
- लिगेज़ – टूटे भाग जोड़ता है।
B.Sc. 2nd
Year Zoology - Unit 4
Questions and
Answers
1.
सेंट्रल डॉगमा को परिभाषित कीजिए।
उत्तर:
सेंट्रल डॉगमा
(Central Dogma) एक जैविक सिद्धांत है जिसे Francis Crick ने 1958
में प्रस्तावित
किया था। इसके अनुसार, जैविक सूचनाएं DNA → RNA → Protein के क्रम में
स्थानांतरित होती हैं। इसमें तीन मुख्य प्रक्रियाएं होती हैं:
- Transcription: DNA से RNA
का निर्माण।
- Translation: RNA से
प्रोटीन का निर्माण।
- Replication (वैकल्पिक): DNA से DNA
का निर्माण।
इस सिद्धांत के अनुसार, एक बार जब सूचना DNA
से RNA में
स्थानांतरित हो जाती है, तो वह वापस नहीं जाती। सेंट्रल डॉगमा जीवन की निरंतरता और
आनुवंशिक जानकारी के प्रवाह की मूलभूत प्रक्रिया है।
2.
ट्रांसक्रिप्शन प्रक्रिया की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
Transcription वह प्रक्रिया है जिसमें DNA के एक हिस्से से mRNA (messenger RNA) का निर्माण
होता है। यह प्रक्रिया तीन चरणों में होती है:
- Initiation (आरंभ)
– RNA polymerase एंजाइम DNA के promoter region से जुड़ता
है।
- Elongation (विस्तार)
– RNA polymerase DNA template के अनुसार RNA न्यूक्लियोटाइड्स जोड़ता है।
- Termination (समापन)
– RNA synthesis रुक जाता है और mRNA अलग हो
जाता है।
Transcription केवल एक DNA strand
(template strand) पर होता है। यह process कोशिका के नाभिक में होती है और यह प्रोटीन संश्लेषण के लिए
mRNA तैयार करती है।
3.
DNA निर्देश RNA प्रक्रिया क्या होती है?
उत्तर:
DNA निर्देश RNA
प्रक्रिया को Transcription कहा जाता है, जिसमें DNA के निर्देशों के आधार पर RNA
का निर्माण
होता है। DNA में genetic code होता है, जिसे RNA polymerase पढ़कर RNA में बदलता है।
इसमें तीन मुख्य प्रकार के RNA बनते हैं –
- mRNA (Messenger RNA): जो
प्रोटीन संश्लेषण के लिए कोड देता है।
- tRNA (Transfer RNA): जो अमीनो
अम्ल को लाता है।
- rRNA (Ribosomal RNA): जो
राइबोसोम बनाता है।
DNA निर्देश RNA प्रक्रिया जीवन
के सभी कार्यों की नींव है क्योंकि RNA के माध्यम से ही प्रोटीन का निर्माण होता है।
4.
सिग्मा फैक्टर फंक्शन क्या है?
उत्तर:
Sigma Factor एक protein है जो Prokaryotes (जैसे बैक्टीरिया) में Transcription की शुरुआत में
महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। यह RNA polymerase के साथ मिलकर RNA polymerase holoenzyme बनाता है।
मुख्य कार्य:
- यह promoter region
को पहचानता है और RNA polymerase को वहाँ bind
करने में मदद करता है।
- Initiation के बाद यह polymerase से अलग हो
जाता है।
बिना Sigma Factor के RNA polymerase
transcription आरंभ नहीं कर पाता। यह विशेष रूप से Gene regulation में मदद करता है।
5.
बैक्टीरियल प्रमोटर क्या होता है?
उत्तर:
बैक्टीरियल
प्रमोटर DNA का वह हिस्सा होता है जहाँ से Transcription शुरू होती है। इसमें दो
मुख्य क्षेत्र होते हैं –
- -10 region (Pribnow box): TATAAT sequence।
- -35 region: TTGACA sequence।
यह दोनों क्षेत्रों को Sigma Factor पहचानता है और RNA
polymerase को bind कराता है। प्रमोटर Gene expression को regulate करने का केंद्र बिंदु होता
है। मजबूत प्रमोटर transcription को तेजी से शुरू कराता है, जबकि कमजोर प्रमोटर धीमा।
6.
आर.एन.ए. प्रोसेसिंग के तीन चरण क्या है?
उत्तर:
Eukaryotes में RNA Processing RNA को functional mRNA में बदलती है। इसके तीन मुख्य चरण होते हैं:
- 5’ Capping: RNA के 5’
छोर पर modified GTP जोड़ना,
जिससे mRNA स्थिर होता है।
- Polyadenylation (Poly A tail): RNA के 3’
छोर पर Adenine न्यूक्लियोटाइड्स
जोड़ना।
- Splicing: RNA से Intron
हटाना और Exon को जोड़ना।
यह तीनों प्रक्रिया mRNA को mature बनाती हैं,
जिससे translation
में दक्षता
बढ़ती है।
7.
Rho निर्भर समाप्ति (Rho-dependent
termination) क्या होता है?
उत्तर:
Rho-dependent termination एक प्रकार का transcription termination है जो Rho protein की मदद से होता है।
मुख्य बातें:
- Rho एक helicase है, जो RNA
polymerase को mRNA से अलग करता है।
- यह RNA में एक विशेष site (Rho utilization site) को
पहचानता है।
- RNA polymerase जब termination site पर रुकता
है, तो Rho उसे dissociate कर देता
है।
यह प्रक्रिया Gene expression को regulate
करने में
उपयोगी है।
8.
Rho स्वतंत्र समाप्ति (Rho-independent
termination) क्या होता है?
उत्तर:
यह transcription
termination का एक तरीका है जिसमें किसी भी protein की मदद नहीं लगती। इसमें RNA
में self-complementary sequence होती है जो hairpin
loop बनाती है, और इसके बाद कई Uracil (U) आते हैं।
Hairpin loop RNA
polymerase को destabilize करता है और RNA अलग हो जाता है। यह process खुद RNA
की secondary
structure के कारण होती है।
9.
यूकैरियोटिक में ट्रांसक्रिप्शन प्रक्रिया समझाइये।
उत्तर:
Eukaryotic transcription जटिल होती है और नाभिक में होती है। इसमें RNA Polymerase I, II, III तीन प्रकार के enzymes
होते हैं।
- Initiation: Promoter पर transcription
factors bind होते हैं, फिर RNA polymerase जुड़ता
है।
- Elongation: RNA polymerase DNA से RNA
बनाता है।
- Termination: RNA synthesis पूरा होने
पर RNA polymerase अलग हो जाता है।
RNA processing के बाद mRNA
translation के लिए cytoplasm में जाता है।
10.
RNA Splicing की प्रक्रिया के दौरान क्या होता है?
उत्तर:
RNA Splicing में pre-mRNA से Intron हटाए जाते हैं
और Exon को जोड़ दिया जाता है। यह process spliceosome
complex द्वारा होती है।
- Spliceosome RNA को पहचानकर कट करता है।
- Exons जुड़कर mature mRNA बनाते
हैं।
Splicing genetic variability को बढ़ाता है और alternative splicing से एक gene से कई protein बन सकते हैं।
11.
पोस्ट ट्रांसक्रिप्शनल संशोधन में 5’ कैपिंग और 3’
पॉलिएडिनाइलेशन क्या है?
उत्तर:
5’ Capping में mRNA के 5’ छोर पर 7-methylguanosine जुड़ता है। यह mRNA को degradation से बचाता है और translation
में मदद करता
है।
3’ Polyadenylation में mRNA
के 3’ छोर पर लगभग 200
Adenine nucleotides जुड़ते हैं। यह mRNA की stability बढ़ाता है और translation efficiency को improve
करता है।
दोनों modifications mRNA को mature बनाकर translation
के लिए तैयार
करते हैं।
प्रश्न 12. डिफरेंशियल RNA प्रोसेसिंग
क्या होता है?
उत्तर:
डिफरेंशियल RNA प्रोसेसिंग (Differential RNA Processing) वह प्रक्रिया है जिसमें एक
ही pre-mRNA से अलग-अलग प्रकार के mRNA बनते हैं। इसे Alternative Splicing भी कहते हैं।
इस प्रक्रिया में RNA के intron और exon को अलग-अलग तरीकों से splice किया जाता है
जिससे अलग-अलग protein variants बनते हैं।
मुख्य विशेषताएं:
- एक ही gene
से कई प्रकार के proteins बन सकते हैं।
- यह शरीर के विभिन्न ऊतकों (tissues) में
अलग-अलग प्रकार के mRNA उत्पन्न
करता है।
- यह gene
expression को regulate
करता है।
उदाहरण: Tropomyosin protein का अलग-अलग tissues में अलग रूप बनना।
प्रश्न 13. rRNA और rRNA
modification और प्रोसेसिंग प्रक्रिया को समझाइये।
उत्तर:
rRNA (ribosomal RNA) राइबोसोम का मुख्य घटक है जो protein synthesis में मदद करता है। यह DNA से transcription
द्वारा बनता है, फिर modification और processing से mature होता है।
rRNA Processing के मुख्य चरण:
- Transcription – rRNA genes से एक
लंबा precursor RNA (45S) बनता है।
- Cleavage – यह 45S RNA छोटे भागों में कटता है जैसे 18S, 5.8S और 28S rRNA।
- Modification – कुछ rRNA nucleotides में methylation और pseudouridylation होता है।
- Assembly – Modified rRNA राइबोसोम
के प्रोटीन के साथ मिलकर ribosomal subunits बनाता है।
महत्व:
rRNA modifications राइबोसोम की stability
और function को बढ़ाते हैं जिससे translation efficient होता है।
B.Sc. 2nd
Year Zoology - Unit 5
Questions and
Answers
1. राइबोसोम के संरचना एवं उनके प्रकार लिखिए।
उत्तर:
राइबोसोम एक सूक्ष्म कणिकीय संरचना है जो प्रोटीन संश्लेषण का मुख्य स्थल है।
ये RNA और प्रोटीन से बने होते हैं। राइबोसोम दो सबयूनिट में होते हैं – बड़ी (Large) और छोटी (Small)।
संरचना:
- Eukaryotic राइबोसोम: 80S (60S + 40S)
- Prokaryotic राइबोसोम: 70S (50S + 30S)
- राइबोसोम में rRNA प्रमुख होता है जैसे 18S, 28S आदि।
प्रकार:
- फ्री राइबोसोम: साइटोप्लाज्म में स्वतंत्र रूप से।
- बाउंड राइबोसोम: ER से जुड़े होते हैं (Rough ER)।
इनकी मदद से कोशिका में सभी आवश्यक प्रोटीन
तैयार होते हैं।
2. जेनेटिक कोड के विशेष लक्षणों का वर्णन
कीजिए।
उत्तर:
जेनेटिक कोड वह नियम है जो DNA/RNA के nucleotide क्रम को amino acid के क्रम में बदलता है।
मुख्य लक्षण:
- त्रिक कोडन (Triplet code): 3 न्यूक्लियोटाइड
एक कोडन बनाते हैं।
- डिजेनेरेट (Degenerate): एक amino acid के लिए कई
कोडन हो सकते हैं।
- Non-overlapping: कोडन एक-दूसरे से अलग होते हैं।
- Universal: सभी जीवों में लगभग समान।
- Start Codon: AUG (Methionine)
- Stop Codon: UAA, UAG, UGA
ये कोड जीवन की भाषा के अक्षर हैं जो protein निर्माण के संकेत देते हैं।
3. वॉबल बेस सिद्धांत क्या है?
उत्तर:
वॉबल बेस सिद्धांत (Wobble base
theory) के अनुसार tRNA का तीसरा base कुछ हद तक
लचीला होता है और यह कई codons को पहचान सकता
है। इसे Francis Crick ने प्रस्तावित किया।
मुख्य बिंदु:
- एक tRNA कई codons से amino acid जोड़ सकता है।
- इससे genetic
code में flexibility
बढ़ती है।
- तृतीय base
(3rd base) की pairing
अधिक flexible
होती है।
उदाहरण: GGU, GGC, GGA सभी Glycine के लिए, एक tRNA इन्हें recognize कर सकता है।
4. पर्यायवाची कोडॉन क्या है?
उत्तर:
Synonymous codons वे codons हैं जो एक ही amino acid को code करते हैं। यह genetic
code की degeneracy को दर्शाता है।
उदाहरण: Leucine के लिए – UUA, UUG, CUU, CUC आदि।
इनका प्रयोग organism में codon usage bias के अनुसार होता है, जिससे translation
की गति और protein folding प्रभावित होती
है।
5. मिसेंस म्यूटेशन क्या होता है? एवं नॉनसेंस
म्यूटेशन में अंतर बताइए।
उत्तर:
Missense mutation: ऐसा परिवर्तन जिसमें codon बदलकर गलत amino acid जुड़ जाता है।
Nonsense mutation: ऐसा परिवर्तन जिसमें codon बदलकर stop codon बन जाता है और protein समय से पहले
समाप्त हो जाता है।
अंतर:
|
Missense |
Nonsense |
|
गलत amino acid जुड़ता है |
protein जल्दी समाप्त |
|
कार्यशील protein बन सकता है |
truncated protein बनता है |
6. मिसेंस उत्परिवर्तन और नॉनसेंस म्यूटेशन में
अंतर समझाइये।
उत्तर:
- Missense
mutation: नया amino acid, protein कार्यशील
या अकार्यशील हो सकता है।
- Nonsense
mutation: incomplete
protein, अधिकतर cases
में अकार्यशील।
- Nonsense
mutation रोगों का कारण बनता है जैसे Duchenne muscular dystrophy।
7. फ्रेमशिफ्ट म्यूटेशन क्या है? समझाइये।
उत्तर:
Frame shift mutation में न्यूक्लियोटाइड
का insertion या deletion होता है जिससे codon का reading frame बदल जाता है।
प्रभाव:
- पूरी protein
श्रृंखला बदल जाती है।
- premature stop
codon आ सकता है।
- अत्यधिक हानिकारक mutation है।
उदाहरण: Tay-Sachs disease।
8. ट्रांसलेशन प्रक्रिया क्या है?
उत्तर:
Translation वह प्रक्रिया है जिसमें mRNA की जानकारी के
अनुसार amino acids जोड़कर protein बनाया जाता है।
मुख्य चरण:
- Initiation – ribosome, mRNA, tRNA का
जुड़ना।
- Elongation – amino acid की
श्रृंखला बढ़ना।
- Termination – stop codon पर
प्रक्रिया का अंत।
यह प्रक्रिया ribosome के भीतर होती है और cell को कार्यशील protein प्रदान करती है।
9. अमीनो एसिल प्रक्रिया है।
उत्तर:
Aminoacylation वह प्रक्रिया है जिसमें tRNA
molecule से सही amino acid जुड़ता है।
Step:
- Amino acid + ATP
→ aminoacyl-AMP
- aminoacyl-AMP +
tRNA → aminoacyl-tRNA
यह step aminoacyl-tRNA synthetase enzyme द्वारा होता है।
महत्व:
गलत amino acid जुड़ने से गलत protein बन सकता है।
10. आरंभ (Initiation), बढ़ाव (Elongation), पेप्टाइड बंध का निर्माण, प्रलोलन एवं समाप्ति प्रक्रिया को समझाइये।
उत्तर:
- Initiation: mRNA, ribosome और tRNA का एकत्रित होना।
- Elongation: प्रत्येक codon पर amino
acid जुड़ना।
- Peptide Bond: amino acids के बीच
पक्का बंध बनना।
- Translocation: ribosome एक codon आगे बढ़ता है।
- Termination: stop codon पर release factor जुड़ता है
और protein समाप्त।
यह सभी चरण मिलकर functional protein का निर्माण करते हैं।
11. प्रोटीन संश्लेषण के नियमक और कोडिंग विषमता
का कोडोनप्रयुक्ति से समझाइये।
उत्तर:
Regulatory Mechanisms:
- Translation की गति को
tRNA की
उपलब्धता प्रभावित करती है।
- Codon usage bias
विभिन्न जीवों में अलग होता है।
- कुछ codons
अधिक बार उपयोग होते हैं (frequent codons)।
Effect:
- Translation
efficiency
- Protein folding
- Gene expression का regulation
12. प्रोटीन के पोस्ट ट्रांसलेशनल मॉडिफिकेशन (PTM) का क्या
महत्व है?
उत्तर:
PTM वह प्रक्रिया है जिसमें protein के संश्लेषण के
बाद उसमें chemical परिवर्तन किए
जाते हैं।
Types:
- Phosphorylation
- Glycosylation
- Acetylation
महत्व:
- Protein activity
regulate करना
- Stability बढ़ाना
- Signal
transduction में भाग लेना
उदाहरण: Insulin hormone।
13. प्रोटीन का प्रसंस्करण (Processing of protein) क्या है?
उत्तर:
Protein processing में protein का modification, folding, cleavage और transport शामिल है।
चरण:
- Folding
(Chaperone द्वारा)
- Cleavage
(pro-protein से active
protein)
- Localization (ER
से Golgi)
- PTMs
महत्व:
सही processing functional protein
का निर्माण सुनिश्चित करता है।

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