FOUNDATION HINDI LANGUAGE -PART III
भाग-तीन (तृतीय वर्ष)
हिंदी भाषा
इकाई 1
भाग (क)
भारत माता (सुमित्रानंदन पंत)
भारतमाता
ग्रामवासिनी।
खेतों में फैला है श्यामल
धूल भरा मैला सा आँचल,
गंगा यमुना में आँसू जल,
मिट्टी की प्रतिमा
उदासिनी।
दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन,
अधरों में चिर नीरव रोदन,
युग युग के तम से विषण्णा मन,
वह अपने घर में
प्रवासिनी।
तीस कोटि संतान नग्न तन,
अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्र जन,
मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन,
वह झुकी मस्तक
तरुतल निवासिनी।
स्वर्ण शस्य पर पद-तल लुंठित,
धरा सहिष्णु गतिहीन मनवती,
रुदन-कम्पित मौन मुसकानाधर,
राहु ग्रसित शरदेन्दु
हासिनी!
चिंतित भृकुटि क्षितिज आकुल,
अंधकाराच्छादित गगन आँखें,
विमान वाष्प से कलंकित
ओठ रेखा,
कलंक चन्द्रमुख
वदन प्रकाशिनी।
सफल आज उसका तप व्रत निष्ठा,
अहिंसा दुग्ध पान करा
स्तन धारिणी,
भय हरिणी तम भ्रम हरिणी,
जग-जननी जीवन-विकासिनी।
बोध प्रश्न-उत्तर
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारत माता का कैसा चित्र प्रस्तुत करता है?
कविता के प्रथम अनुच्छेद में कवि भारत माता को ग्रामवासिनी रूप में चित्रित करता है। खेतों में श्यामल आँचल धूल भरा मैला सा फैला है, गंगा-यमुना आँसू जल हैं और मिट्टी की प्रतिमा उदासिनी दिखती है।भारत माता अपने ही घर में प्रवासिनी क्यों बनी हुई है?
परतंत्रता के कारण भारत माता अपने ही घर में प्रवासिनी बनी हुई है। दैन्य जड़ित अपलक नत चितवन, चिर नीरव रोदन और युगों के तम से विषण्ण मन वाली वह विदेशी जैसी लगती है।कविता में कवि भारतवासियों का कैसा चित्र खींचता है?
कवि भारतवासियों को तीस कोटि संतान नग्न तन, अर्ध क्षुधित, शोषित, निरस्त्र, मूढ़, असभ्य, अशिक्षित, निर्धन और तरुतल निवासिनी के रूप में चित्रित करता है।भारत माता का हास भी राहुग्रसित क्यों दिखाई पड़ता है?
स्वर्ण शस्य पर पद-तल लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित और क्रंदन-कम्पित मौन स्मिताधर होने से भारत माता का हास राहु ग्रसित शरदेन्दु जैसा दिखता है।कवि भारत माता को गीता प्रकाशिनी मानकर भी ज्ञानमूढ़ क्यों कहता है?
चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित और आननश्री शशि उपमित होने से गीता प्रकाशिनी भारत माता ज्ञानमूढ़ लगती है।कवि की दृष्टि में आज भारत माता का तप-संयम क्यों सफल है?
अहिंसा दुग्ध पान कराकर स्तन धारिणी भारत माता जन-मन-भय हरिणी, तम-भ्रम हरिणी बन गई है, इसलिए उसका तप सफल है।
व्याख्या प्रश्न-उत्तर
‘स्वर्ण शस्य पर-पद-तल लुंठित, धरती-सा सहिष्णु मन कुंठित’ की व्याख्या करें।
इस पंक्ति में परतंत्र भारत का चित्र है जहाँ स्वर्णिम फसल विदेशियों के पैरों तले रौंदी जा रही है, फिर भी भारत माता धरती-सी सहनशील बनी मन कुंठित हो रही है।‘चिंतित भृकुटि क्षितिज तिमिरांकित, नमित नयन नभ वाष्पाच्छादित’ की व्याख्या करें।
पराधीनता से भारत माता की भृकुटि चिंतित, क्षितिज अंधकारमय, नयन झुके और नभ वाष्प से ढका है, जो दासता की दयनीय स्थिति दर्शाता है।भारतमाता कहाँ निवास करती है?
कविता में भारतमाता को ग्रामवासिनी बताया गया है, जहाँ खेत श्यामल शरीर, धूल भरा आँचल और गंगा-यमुना आँसू हैं।भारतमाता शीर्षक कविता का सारांश लिखें।
कविता में पराधीन भारत को ग्रामवासिनी माता के रूप में चित्रित किया गया है जो शोषित संतानों को अहिंसा का दूध पिला भय-तम-भ्रम हर रही है।
इकाई 1
भाग (क)
शहर से सोचता हूँ / विनोद कुमार शुक्ल
जीवन परिचय
जन्म: 1 जनवरी 1937, राजनांदगाँव (छत्तीसगढ़)।
निधन: 23 दिसंबर 2025, रायपुर।
जबलपुर कृषि विश्वविद्यालय से शिक्षा, रायपुर के इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय में प्राध्यापक रहे।
प्रमुख रचनाएँ
कविता संग्रह: 'लगभग जयहिन्द' (1971), 'सब कुछ होना बचा रहेगा'
उपन्यास: 'दीवार में एक खिड़की रहती थी' (साहित्य अकादमी), 'नौकर की कमीज' (ज्ञानपीठ पुरस्कार)
सम्मान
ज्ञानपीठ, साहित्य अकादमी, पेन/नाबोकोव (अंतरराष्ट्रीय), हिंदी गौरव सम्मान।
लेखन शैली
सादगीपूर्ण भाषा में दार्शनिक गहराई। आम आदमी, प्रकृति, प्रेम पर कविताएँ। "शहर से सोचता हूँ" उनकी पर्यावरण-चेतना वाली कविता है।
उनका साहित्य मानवीय संवेदनाओं को जीवंत करता है।
शहर से सोचता हूँ
लघु उत्तरीय प्रश्न (2-3 अंक)
प्रश्न 1: कविता का शीर्षक अर्थ सहित लिखिए।
उत्तर: शहर से चिंतन को दर्शाता है। कवि शहर में रहकर जंगलों के विनाश पर सोचते हैं।
प्रश्न 2: "सल्फी का पेड़" क्या प्रतीक है?
उत्तर: साल वृक्ष—आदिवासी संस्कृति और जंगल जीवन का प्रतीक।
प्रश्न 3: बस्तर की मैना का महत्व बताइए।
उत्तर: प्रकृति की मधुरता और आदिवासी स्वतंत्रता का प्रतीक।
प्रश्न 4: बूढ़े की आँख फूटने का अर्थ?
उत्तर: आशा का सूखना, आने वाली पीढ़ियों का अंधा होना।
प्रश्न 5: कविता का केंद्रीय भाव?
उत्तर: शहरीकरण से जंगल और आदिवासी संस्कृति का विनाश।
दीर्घ उत्तरीय प्रश्न (5-8 अंक)
प्रश्न 1: "जंगल में जंगल नहीं होंगे तो कहाँ होंगे?" पंक्ति की व्याख्या कीजिए।
उत्तर: कवि व्यंग्य से कहते हैं कि विकास के नाम पर जंगल कटकर सड़क किनारे सजावटी पेड़ बन जाएँगे। यह प्रकृति के अपमान और सीमित होने की विडंबना है। आदिवासी जीवन जंगल पर निर्भर है, उसका नाश संस्कृति का अंत है।
प्रश्न 2: आदिवासी परिवार के सपनों का वर्णन करते हुए कविता की पीड़ा स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: सपनों में सल्फी का पेड़ और बस्तर की मैना आती है, पर नींद में आँखें फूट जाती हैं। यह विस्थापन की शारीरिक-मानसिक पीड़ा है। बूढ़ा अभी देख-सुन लेता है, किंतु स्वप्न की सूखी टहनी भविष्य की निराशा दिखाती है।
प्रश्न 3: कविता में पर्यावरण चेतना का विश्लेषण कीजिए।
उत्तर: शहरवासी सोच से जंगल कटान, आदिवासी विस्थापन—ये पर्यावरण विनाश के प्रतीक हैं। कविता शहरी प्रगति पर व्यंग्य करती है। संदेश है—जंगल न बचे तो मानवता के सपने भी सूख जाएँगे।
प्रश्न 4: कविता के प्रतीकात्मक तत्वों की चर्चा कीजिए।
उत्तर: सल्फी का पेड़ (संस्कृति), मैना (स्वतंत्रता), सूखी टहनी (निराशा), फूटी आँखें (भविष्यहीनता)। ये आदिवासी जीवन की आह को जीवंत करते हैं।
इकाई 1
भाग (ख) - भाषा/व्याकरण
कथन की शैलियाँ (विवरणात्मक, मूल्यांकनपरक, व्याख्यात्मक, विचारात्मक)
- विवरणात्मक शैली
किसी वस्तु, घटना या दृश्य का तथ्यात्मक, चित्रात्मक वर्णन।
हिंदी उदाहरण: प्रेमचंद की कहानी "कफन" में गरीबों के जीवन का यथार्थवादी चित्रण। घाटी, झोपड़ी का वर्णन।
- मूल्यांकनपरक शैली
विषय की अच्छाई-बुराई का आलोचनात्मक विश्लेषण।
हिंदी उदाहरण: रामचंद्र शुक्ल का निबंध "चिंतामणि" में हिंदी साहित्य की आलोचना। रीतिकाल की कमजोरियों का मूल्यांकन।
- व्याख्यात्मक शैली
किसी विचार, सूत्र या प्रतीक की स्पष्ट व्याख्या।
हिंदी उदाहरण: हजारी प्रसाद द्विवेदी का "अशोक के फूल" में कबीर के दोहों की व्याख्या। भक्ति भाव का कारण-प्रभाव संबंध।
- विचारात्मक शैली
दार्शनिक चिंतन, गहन विश्लेषण।
हिंदी उदाहरण: विनोद कुमार शुक्ल की "शहर से सोचता हूँ" में जंगल विनाश पर चिंतन। शहरीकरण की विडंबना पर विचार।

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