B.Sc. 2nd year botany 2nd paper syllabus question&answer


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इकाई 1

लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

1.       ऊतक क्या है? विभज्योतक ऊतक को परिभाषित करते हुए इसकी विशेषताएँ एवं वर्गीकरण का विस्तारपूर्वक वर्णन कीजिए।
(5
अंक)

ऊतक (Tissue) कोशिकाओं का एक समूह है, जो समान कार्य को पूरा करने के लिए एक साथ मिलकर काम करते हैं। ऊतक पौधों और जानवरों दोनों में पाए जाते हैं और विभिन्न प्रकार के होते हैं।

विभज्योतक ऊतक (Meristematic Tissue) उन ऊतकों को कहा जाता है जो निरंतर विभाजन करते हैं और नए ऊतकों का निर्माण करते हैं।
इसकी विशेषताएँ:

  • यह हमेशा सक्रिय रहते हैं।
  • कोशिकाएँ छोटी, पतली दीवारों वाली और बिना कोशिकीय अंतराल (intercellular space) के होती हैं।
  • कोशिकाओं का आकार समान होता है और इनमें कोई विशिष्ट कार्य विभाजन या वृद्धि का होता है।

वर्गीकरण:

  • शीर्षीय विभज्योतक (Apical Meristem): पौधे के सिरों में पाया जाता है, जो वृद्धि को लंबाई में बढ़ाता है।
  • संयोजी विभज्योतक (Lateral Meristem): पौधों की मोटाई को बढ़ाने में मदद करता है।
  • इंटर्नोडल विभज्योतक (Intercalary Meristem): पौधों के बीच स्थित होता है और इनकी वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है।
  1. स्थायी ऊतक को परिभाषित करते हुए सरल स्थायी ऊतक के प्रकार लिखिए।
    (5
    अंक)

स्थायी ऊतक (Permanent Tissue) उन ऊतकों को कहा जाता है जिनमें विभाजन की क्रिया रुक जाती है और ये अपनी संरचना और कार्य में स्थिर हो जाते हैं। ये ऊतक विशेष प्रकार के कार्यों के लिए विशेष रूप से विकसित होते हैं।

सरल स्थायी ऊतक उन ऊतकों को कहा जाता है जो केवल एक प्रकार की कोशिकाओं से बने होते हैं। इसके प्रकार हैं:

    • Parenchyma: यह ऊतक सामान्य संरचना वाला और पौधों के विभिन्न भागों में पाया जाता है, जैसे कि पत्तियां, तने और मूल। यह ऊतक भोजन, जल और गैसों का संचय करता है।
    • Collenchyma: यह ऊतक कोशिकाओं की दीवारों में थिकनेस पाई जाती है और पौधों की संरचनाओं को मजबूती प्रदान करता है, खासकर युवा भागों में।
    • Sclerenchyma: इसमें कोशिकाएं कठोर और मजबूत होती हैं, और यह पौधों को यांत्रिक समर्थन प्रदान करता है।

  1. प्ररोहाग्र के संरचनात्मक संगठन एवं उसके विभेदन से संबंधित विभिन्न सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
    (5
    अंक)

प्ररोहाग्र (Meristematic Tissue) के संरचनात्मक संगठन में कोशिकाओं का समूह होता है जो विभाजन की क्रिया करते हैं। इसके विभेदन (Differentiation) के विभिन्न सिद्धांत हैं:

    • Apical Theory: यह सिद्धांत बताता है कि प्ररोहाग्र ऊतक पौधों के शीर्ष भाग में होते हैं और ये लंबे समय तक विभाजन करते रहते हैं।
    • Histogen Theory: इस सिद्धांत के अनुसार, प्ररोहाग्र ऊतक के विभाजन से अलग-अलग ऊतक प्रकारों का निर्माण होता है। इसमें तीन प्रकार होते हैं:
      • Dermatogen: यह ऊतक एपिडर्मिस (epidermis) का निर्माण करता है।
      • Periblem: यह ऊतक परिवर्तित होकर आधारभूत ऊतक (ground tissue) बनाता है।
      • Plerome: यह संवहन ऊतक (vascular tissue) का निर्माण करता है।
    • Tunica-Corpus Theory: इस सिद्धांत के अनुसार, प्ररोहाग्र ऊतक का संगठन दो भागों में होता है: ट्यूनिका (Tunica), जो ऊतक के बाहरी भाग में स्थित होती है और कॉर्पस (Corpus), जो अंदर के भाग में स्थित होता है।

  1. मूल अग्रक की संरचना तथा उसके संगठन के विभिन्न सिद्धान्तों का वर्णन कीजिए।
    (5
    अंक)

मूल अग्रक (Root Apex) का संगठन और संरचना बहुत जटिल होती है, जिसमें विभाजन से लेकर विविध प्रकार की कोशिकाएँ बनती हैं। इसकी संरचना में प्रमुख भाग होते हैं:

    • मूल मेरिस्टेम (Root Meristem): यह विभाजन द्वारा नए कोशिकाओं का निर्माण करता है।
    • क्यूटिकल (Cortex): इसमें कोशिकाओं का समूह होता है जो जल और पोषक तत्वों का संचय करते हैं।
    • एंडोडर्मिस (Endodermis): यह बाहरी आवरण है जो पानी और पोषक तत्वों के पारगमन को नियंत्रित करता है।
    • वेस्कुलर बंडल (Vascular Bundle): इसमें संवहन ऊतक होते हैं जो जल और पोषक तत्वों का संचरण करते हैं।

विभाजन सिद्धांत:

    • Apical Dominance Theory: इस सिद्धांत के अनुसार, मूल अग्रक का ऊतक ऊर्ध्वाधर वृद्धि के लिए जिम्मेदार होता है।
    • Quiescent Centre Theory: यह सिद्धांत बताता है कि कुछ कोशिकाएँ प्रायः निष्क्रिय रहती हैं, जिससे विभाजन की प्रक्रिया की दिशा निर्धारित होती है।

  1. पत्तियों की उत्पत्ति एवं विकास को समझाइए।
    (5
    अंक)

पत्तियाँ पौधों के महत्वपूर्ण अंग हैं, जिनका प्रमुख कार्य प्रकाश संश्लेषण (photosynthesis) करना होता है। पत्तियों की उत्पत्ति और विकास निम्नलिखित तरीके से होता है:

    • उत्पत्ति: पत्तियाँ प्रायः संयोजी ऊतक (apical meristem) से उत्पन्न होती हैं, जो शीर्ष भाग पर होते हैं।
    • विकास: प्रारंभ में पत्तियाँ छोटी, बेजान और केवल विभाजन के स्तर पर होती हैं। जैसे-जैसे वे विकसित होती हैं, उनका आकार बढ़ता है और वे हरे रंग की होती हैं।
    • विकासात्मक अवस्थाएँ: पत्तियाँ सामान्यतः तीन अवस्थाओं से गुजरती हैं:
      1. आधार अवस्था: प्रारंभिक अवस्था जब पत्तियाँ छोटी और विभाजन कर रही होती हैं।
      2. वृद्धि अवस्था: पत्तियाँ बड़ी होती जाती हैं और आकार में विस्तार होता है।
      3. परिपक्व अवस्था: पत्तियाँ पूरी तरह से विकसित हो जाती हैं और उनका कार्य प्रकाश संश्लेषण होता है।

6. संवहन ऊतक तंत्र (Vascular Tissue System) पर टिप्पणी:

संवहन ऊतक तंत्र पौधों के महत्वपूर्ण ऊतक तंत्रों में से एक है, जो पौधे के विभिन्न भागों में जल, खनिज, और पोषक तत्वों की आपूर्ति करता है। यह तंत्र मुख्य रूप से दो प्रमुख ऊतकों से बना होता है:

  1. एक्साइलम (Xylem)यह ऊतक जल और खनिजों को जड़ों से पत्तों तक पहुँचाने का कार्य करता है। एक्साइलम में मुख्य रूप से चार प्रकार की कोशिकाएँ होती हैंट्रैचिड्स, ट्रैचिया, पैपर और एक्साइलम फाइबर।
  2. फ्लोएम (Phloem)यह ऊतक पत्तियों से बने भोजन (ग्लूकोज) को पौधे के अन्य हिस्सों में भेजने का कार्य करता है। फ्लोेम में मुख्य रूप से पाँच प्रकार की कोशिकाएँ होती हैंस्लीव, स्लीव ट्यूब, सहायक कोशिकाएँ, कंप्रेस्ड सेल्स और फ्लोेम फाइबर।

संवहन ऊतक तंत्र पौधे के अंगों के बीच पोषक तत्वों और जल का आदान-प्रदान सुनिश्चित करता है, जिससे पौधे की जीवित रहने की प्रक्रिया बनाए रखी जाती है।

7. एपिडर्मल ऊतक तंत्र (Epidermal Tissue System) पर टिप्पणी:

एपिडर्मल ऊतक तंत्र पौधों के बाहरी सतह पर स्थित होता है और यह पौधे के अंगों की रक्षा करने का कार्य करता है। यह ऊतक तंत्र मुख्य रूप से एकल परत कोशिकाओं से बना होता है, जिनका कार्य बाहरी वातावरण से पौधे के भीतर के ऊतकों की रक्षा करना है। एपिडर्मल ऊतक के मुख्य घटक निम्नलिखित हैं:

  1. एपिडर्मल कोशिकाएँ (Epidermal Cells)ये कोशिकाएँ पौधे के बाहर की सतह पर स्थित होती हैं और एक लचीली परत बनाती हैं। इनकी दीवारों में सेल्यूलोज़ और लिग्निन का मिश्रण होता है।
  2. क्यूटिकल (Cuticle)यह एक पतली मोम जैसी परत होती है जो पौधे के ऊपर की सतह पर होती है और जल वाष्प के नुकसान को रोकने में मदद करती है।
  3. स्टोमेटा (Stomata)ये छोटे छिद्र होते हैं जो मुख्य रूप से पत्तियों और तनों पर होते हैं। इनका कार्य गैसों (ऑक्सीजन और कार्बन डाइऑक्साइड) के आदान-प्रदान में मदद करना और जल वाष्प का नियंत्रण करना होता है।
  4. ट्राइकोम्स (Trichomes)ये बाल या अन्य संरचनाएँ होती हैं जो एपिडर्मल कोशिकाओं से निकलती हैं। इनका कार्य पौधों को सुरक्षा प्रदान करना और जल की कमी को कम करना होता है।

एपिडर्मल ऊतक तंत्र पौधों के लिए बाहरी वातावरण से सुरक्षा प्रदान करता है, जल के नुकसान को नियंत्रित करता है और पौधे के विकास में मदद करता है।

 


इकाई 2

लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

 

  1. एकबीजपत्री जड़ की आंतरिक संरचना पर टिप्पणी लिखिये।
    (5
    अंक)

एकबीजपत्री जड़ों की आंतरिक संरचना में निम्नलिखित मुख्य भाग होते हैं:

    • एंडोडर्मिस (Endodermis): जड़ के बाहरी हिस्से में स्थित एक परत, जो जल और खनिजों के पारगमन को नियंत्रित करती है।
    • वेस्कुलर बंडल (Vascular Bundle): इसमें केवल एक ज़ाइलम और फ्लोएम का समूह होता है।
    • कोर्टेक्स (Cortex): यह जड़ की बाहरी परत है, जिसमें कोशिकाएं पानी और खनिजों को संग्रहित करती हैं।
    • पेरिसाइक्ल (Pericycle): यह जड़ के भीतर स्थित कोशिकाओं की परत है, जो शाखाओं का निर्माण करती है।

  1. द्विबीजपत्री जड़ पर टिप्पणी लिखिये।
    (5
    अंक)

द्विबीजपत्री जड़ की संरचना में निम्नलिखित प्रमुख घटक होते हैं:

    • वेस्कुलर बंडल (Vascular Bundle): इसमें ज़ाइलम और फ्लोएम की परतें होती हैं।
    • कोर्टेक्स (Cortex): यह जड़ का बाहरी भाग होता है, जिसमें जल और पोषक तत्वों का संचय होता है।
    • एंडोडर्मिस (Endodermis): यह परत जल और पोषक तत्वों के प्रवाह को नियंत्रित करती है।
    • पेरिसाइक्ल (Pericycle): यह जड़ के बीच में होता है और नई जड़ों का निर्माण करता है।
      द्विबीजपत्री जड़ों में ज़ाइलम और फ्लोएम का बंधन परिधि के बाहर स्थित होता है, जबकि एकबीजपत्री में यह केंद्र में स्थित होता है।

  1. एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तने की आंतरिक संरचना का नामांकित चित्र बनाइये।
    (5
    अंक)

(I will generate the labeled diagram for the internal structure of monocot and dicot stems. Please give me a moment.)


  1. एकबीजपत्री तथा द्विबीजपत्री तना (आन्तरिक संरचना) में अंतर बताइए।
    (5
    अंक)
    • एकबीजपत्री तना:
      • वेस्कुलर बंडल (vascular bundles) पंखा आकार में होते हैं और बिखरे हुए होते हैं।
      • ज़ाइलम और फ्लोएम के बीच में अंतराल होते हैं।
      • कोई संकेंद्रित परिधि (concentrically) नहीं होती।
    • द्विबीजपत्री तना:
      • वेस्कुलर बंडल एक परिधि (circular) में व्यवस्थित होते हैं।
      • ज़ाइलम और फ्लोएम परिधि में एक दूसरे के पास होते हैं।
      • अंदर एक काल्पनिक केंद्रीय बल्क (pith) होती है।

  1. एकबीजपत्री एवं द्विबीजपत्री के पत्तियों की आंतरिक संरचना का वर्णन कीजिए।
    (5
    अंक)
    • एकबीजपत्री पत्तियाँ:
      • इनकी संरचना सरल होती है।
      • पत्तियों के मेसोफिल में केवल एक प्रकार के कोशिकाएँ होती हैं, जिनमें पैरलल वेन (parallel venation) होती है।
    • द्विबीजपत्री पत्तियाँ:
      • इनकी संरचना में दो प्रकार के कोशिकाएँ होती हैं, एक ऊपरी और एक निचला मेसोफिल।
      • पत्तियों में जालाकार वेन (reticulate venation) होती है।
      • इनमें पत्तियों के भीतर अधिक जटिल कोशिकाएँ और वेस्कुलर बंडल्स होते हैं।

  1. द्वितीयक वृद्धि से आप क्या समझते हैं?
    (5
    अंक)

द्वितीयक वृद्धि (Secondary Growth) पौधों में तने और जड़ों की मोटाई बढ़ाने वाली प्रक्रिया होती है। यह वृद्धि मुख्य रूप से वेस्कुलर कैम्बियम और कॉर्क कैम्बियम के माध्यम से होती है।

    • वेस्कुलर कैम्बियम: यह जाइलम और फ्लोएम के बीच होता है और दोनों का निर्माण करता है।
    • कॉर्क कैम्बियम: यह परिधि पर कॉर्क ऊतक का निर्माण करता है, जो पौधों को बाहरी नुकसान से बचाता है।

  1. द्विबीजपत्री पौधों में द्वितीयक जायलम एवं द्वितीयक फ्लोएम के निर्माण की प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।
    (5
    अंक)

द्वितीयक जाइलम और फ्लोएम के निर्माण की प्रक्रिया में वेस्कुलर कैम्बियम प्रमुख भूमिका निभाता है। यह प्रक्रिया कुछ इस प्रकार होती है:

    • वेस्कुलर कैम्बियम के विभाजन से नए जाइलम और फ्लोएम का निर्माण होता है।
    • द्वितीयक जाइलम (Secondary Xylem): यह तने के अंदर की ओर बनता है और जल और पोषक तत्वों के संचरण में सहायक होता है।
    • द्वितीयक फ्लोएम (Secondary Phloem): यह तने के बाहरी भाग की ओर बनता है और पोषक तत्वों के परिवहन में मदद करता है।

8. परिचर्म (Intercalary Meristem) क्या हैं?

परिचर्म (Intercalary Meristem) एक प्रकार का मेरिस्टेम है जो पौधों के विभिन्न हिस्सों में विकास के लिए जिम्मेदार होता है, खासकर उन स्थानों पर जहाँ वृद्धि की क्षमता सीमित होती है। यह मुख्य रूप से पौधों के तनों के निचले हिस्सों, जैसे पत्तियों के आधार या शाखाओं के नीचे, में पाया जाता है। जब पौधा बढ़ता है, तो यह मेरिस्टेम टिशू पत्तियों और तनों के बीच में कोशिकाओं का विभाजन और वृद्धि करता है, जिससे पौधा लंबा और अधिक शाखित होता है। यह मुख्य रूप से घासों और कुछ अन्य पौधों में पाया जाता है और पौधे के लगातार बढ़ने में मदद करता है।


9. पेरिडर्म के निर्माण तथा उसके महत्व पर प्रकाश डालिए।

पेरिडर्म वह ऊतक है जो पौधे के तने या जड़ों में प्राथमिक ऊतकों की सुरक्षा के रूप में विकसित होता है। पेरिडर्म मुख्य रूप से तीन प्रमुख परतों से बना होता है:

  1. पेरिडर्म की बाहरी परत (Phellem)यह ऊतक की बाहरी परत होती है जो कठोर और जलरोधक होती है।
  2. पेरिडर्म की मध्य परत (Phellogen)यह परत एक प्रकार का मेरिस्टेम होती है जो नये ऊतकों को उत्पन्न करती है।
  3. पेरिडर्म की भीतरी परत (Phelloderm)यह परत कोमल और कोशिकाओं से बनी होती है, जो कुछ भाग में भोजन का संचय करती है।

पेरिडर्म की मुख्य भूमिका पौधों की बाहरी परत को सुरक्षित करना और जल वाष्प के नुकसान से बचाना है। इसके अलावा, यह पौधे के भीतर के हिस्सों को बाहरी पर्यावरण से बचाता है और अतिरिक्त पोषक तत्वों का भंडारण भी करता है।


10. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी:

a. छाल (Bark)
छाल पौधे के तने या शाखाओं की बाहरी परत है जो सुरक्षा का काम करती है। यह पेरिडर्म और वक्षीय परतों से बनी होती है। छाल का मुख्य कार्य तने को बाहरी नुकसान, सूखा और रोगों से बचाना है। इसमें कोशिकाएँ जलरोधक होती हैं, जिससे पानी और पोषक तत्वों का संरक्षण होता है।

b. प्राथमिक एवं द्वितीयक जाइलम में अन्तर (Difference between Primary and Secondary Xylem)

  • प्राथमिक जाइलम (Primary Xylem): यह जाइलम उस समय उत्पन्न होता है जब पौधा बढ़ रहा होता है और यह पहले विकास में होता है। यह तने के भीतर कोशिकाओं द्वारा विकसित होता है और जल का परिवहन करता है।
  • द्वितीयक जाइलम (Secondary Xylem): यह जाइलम तब उत्पन्न होता है जब पौधा द्वितीयक वृद्धि शुरू करता है। यह जाइलम वक्षीय मेरिस्टेम (कैम्बियम) द्वारा उत्पन्न होता है और यह तने को मोटा करने में मदद करता है।

11. किसी एकबीजपत्री तने में द्वितीयक वृद्धि का वर्णन कीजिए।

एकबीजपत्री पौधों (Monocots) में द्वितीयक वृद्धि की कमी होती है, क्योंकि इन पौधों में वक्षीय मेरिस्टेम (वृत्तीय कैम्बियम) नहीं होता। इसलिए, ये पौधे तने की मोटाई में वृद्धि नहीं करते हैं। हालांकि, कुछ एकबीजपत्री पौधों में सीमित रूप से द्वितीयक वृद्धि हो सकती है, जैसे कि कुछ प्रकार की घास में।


12. असंगत या अपसामान्य संरचना से आप क्या समझते हैं?

असंगत या अपसामान्य संरचना से तात्पर्य उन संरचनाओं से है जो सामान्य या सामान्य विकास की प्रक्रिया से भिन्न होती हैं। जब पौधों में किसी विशिष्ट संरचना या विकास में असामान्यता होती है, तो इसे असंगत संरचना कहते हैं। यह कुछ आनुवांशिक या पर्यावरणीय कारणों से हो सकता है और पौधों के सामान्य विकास के रास्ते से भटक सकता है।


13. द्विबीजपत्री तने में पाई जाने वाली प्रमुख अपसामान्य संरचनाओं का वर्णन कीजिए।

द्विबीजपत्री तने में कुछ सामान्य अपसामान्य संरचनाएँ निम्नलिखित हैं:

  1. अपसामान्य जाइलम और फ्लोएम का वितरण: इन पौधों में जाइलम और फ्लोएम का सामान्य वितरण नहीं होता। कभी-कभी ये ऊतक असामान्य रूप से वितरित होते हैं।
  2. सामान्य कैम्बियम की अनुपस्थिति: द्विबीजपत्री पौधों में कभी-कभी वक्षीय कैम्बियम की कमी हो सकती है, जो द्वितीयक वृद्धि में विघटन कर सकता है।
  3. वृद्धि में असमानता: तने के भीतर कोशिकाओं का असामान्य विभाजन या वृद्धि के कारण असमान आकार और रूप उत्पन्न हो सकते हैं।

14. बोरहाविया के तने में पायी जाने वाली अपसामान्य संरचना तथा अपसामान्य द्वितीयक वृद्धि का वर्णन कीजिए।

बोरहाविया के तने में प्रमुख रूप से असामान्य द्वितीयक वृद्धि पाई जाती है, जिसमें जाइलम और फ्लोएम के असामान्य वितरण होते हैं। तने के भीतर कैम्बियम की अनुपस्थिति होती है और जाइलम और फ्लोएम का वितरण असमान रहता है। इसके कारण तने की वृद्धि असामान्य होती है और यह सामान्य द्वितीयक वृद्धि की तरह मोटा नहीं होता है।


15. बिग्नोनिया के तने की अपसामान्य संरचना तथा अपसामान्य द्वितीयक वृद्धि का सचित्र वर्णन कीजिए।

बिग्नोनिया पौधे में तने की अपसामान्य संरचना में फ्लोएम और जाइलम का असामान्य वितरण होता है। इसके तने में द्वितीयक वृद्धि के दौरान एक परत के बजाय विभिन्न प्रकार की कोशिकाएँ उत्पन्न होती हैं। इसमें एक बाहरी परत होती है जो जल और पोषक तत्वों का संरक्षण करती है, लेकिन इसके भीतर जाइलम और फ्लोएम का वितरण असामान्य रूप से होता है।


16. नक्टेन्थस के तने पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।

नक्टेन्थस एक द्विबीजपत्री पौधा है जिसमें तने पर द्वितीयक वृद्धि होती है, और यह वक्षीय कैम्बियम द्वारा नियंत्रित होती है। नक्टेन्थस के तने में जाइलम और फ्लोएम का वितरण सामान्य होता है, और इसका तना बढ़ता है, जिससे यह अधिक मोटा होता है। इसका मुख्य उद्देश्य तने की सुरक्षा करना और अधिक पोषक तत्वों का भंडारण करना है।

 

 

इकाई 3

लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. पुष्प क्या है?
पुष्प एक पौधे का प्रजनन अंग है, जो प्रजनन प्रक्रिया के लिए महत्वपूर्ण होता है। यह एक विशेष संरचना है, जिसमें नर और मादा युग्मज (गैमेट्स) होते हैं, जिनके मिलने से नए बीज का निर्माण होता है। पुष्प में आमतौर पर चार प्रमुख भाग होते हैं: कली, फूलदल (पंखुड़ी), अवयव, और स्थूलकलिका।


2. पुष्प की संरचना का सचित्र वर्णन कीजिए।
पुष्प की संरचना में निम्नलिखित मुख्य अंग होते हैं:

  • कली (Receptacle): यह पुष्प का आधार होता है, जिस पर अन्य भाग स्थित होते हैं।
  • पंखुड़ी (Petals): यह पुष्प का आकर्षक हिस्सा होता है, जो अन्य कीटों को आकर्षित करता है।
  • पुरुष अंग (Stamen): इसमें दो प्रमुख भाग होते हैं:
    • अन्थर (Anther): परागकण का उत्पादन होता है।
    • दंड (Filament): यह अन्थर को पुष्प के अन्य हिस्सों से जोड़ता है।
  • स्त्री अंग (Pistil): इसमें तीन प्रमुख भाग होते हैं:
    • वर्तिका (Ovary): अंडाणु का स्थान होता है।
    • स्त्रीकेसर (Style): वर्तिका और ऊपरी भाग को जोड़ने वाली संरचना।
    • कील (Stigma): परागकण को प्राप्त करने वाली संरचना।

3. पुष्पदल विन्यास पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
पुष्पदल विन्यास पुष्प के पंखुड़ियों के व्यवस्थित होने के तरीके को दर्शाता है। इसमें मुख्यतः तीन प्रकार होते हैं:

  • क्रोकोविन्यास (Spiral arrangement): पंखुड़ियाँ एक स्पाइरल तरीके से होती हैं।
  • वर्तुल विन्यास (Whorled arrangement): पंखुड़ियाँ एक वृत्त के रूप में होती हैं।
  • पंक्ति विन्यास (Linear arrangement): पंखुड़ियाँ एक पंक्ति में होती हैं।

यह विन्यास पुष्प के आकार, संरचना और जैविक कार्यों के लिए महत्वपूर्ण होता है।


4. लघुबीजाणुधानी की संरचना तथा नर युग्मकोद्भिद के विकास की प्रक्रिया का सचित्र वर्णन कीजिए।
लघुबीजाणुधानी (Microsporangium) में नर युग्मकोद्भिद का विकास होता है, जो परागकण बनाता है। इसका संरचनात्मक रूप निम्नलिखित है:

  • नर युग्मकोद्भिद का विकास: लघुबीजाणुधानी में स्थित कोशिकाएँ विभाजित होकर परागजनक कोशिकाओं का निर्माण करती हैं। ये कोशिकाएँ परागकण के रूप में विकसित होती हैं, जिनमें एक कोशिका नर युग्मज (Sperm) बनाती है और दूसरी कोशिका पराग नलिका (Pollen tube) उत्पन्न करती है।

5. परिपक्व परागकण की संरचना पर टिप्पणी लिखिए।
परिपक्व परागकण में दो मुख्य भाग होते हैं:

  1. एक्सिन (Exine): यह बाहरी कठोर परत होती है, जो परागकण की सुरक्षा करती है।
  2. इनटिन (Intine): यह अंदरूनी कोशिका परत होती है, जो नर युग्मज को संरक्षित करती है।

परागकण के अंदर नर युग्मज होते हैं, जो निषेचन के दौरान अंडाणु से मिलते हैं।


6. बीजाणु की संरचना पर टिप्पणी लिखिए।
बीजाणु (Ovule) में मुख्य रूप से निम्नलिखित संरचनाएँ होती हैं:

  • इं tegument: यह बाहरी सुरक्षात्मक परत होती है।
  • न्यूक्लियस: यह गर्भज (Embryo Sac) होता है, जिसमें अंडाणु स्थित होता है।
  • सोरस: यह भाग गर्भज से जुड़ा होता है, और बीजाणु के विकास में सहायक होता है।

7. परागण से आप क्या समझते हैं?
परागण वह प्रक्रिया है जिसके द्वारा परागकण, स्त्रीकेसर (Stigma) तक पहुँचते हैं। यह फूलों के प्रजनन के लिए आवश्यक होता है, और यह प्रायः कीटों, हवाओं या जल द्वारा होता है। परागण के द्वारा नर युग्मज (Sperm) अंडाणु तक पहुँचते हैं, जिससे निषेचन की प्रक्रिया आरंभ होती है।


8. परागण के प्रकार तथा महत्व का वर्णन कीजिए।

परागण के प्रकार:

  1. कीट द्वारा परागण (Entomophily): इसमें कीटों द्वारा परागकण एक फूल से दूसरे फूल में स्थानांतरित होते हैं।
  2. हवा द्वारा परागण (Anemophily): इसमें परागकण हवा के माध्यम से फैलते हैं।
  3. जल द्वारा परागण (Hydrophily): इसमें परागकण पानी के माध्यम से स्थानांतरित होते हैं।

महत्व:
परागण पौधों के प्रजनन के लिए आवश्यक प्रक्रिया है, जिससे नए बीज उत्पन्न होते हैं और जैव विविधता बनाए रखी जाती है। यह पौधों के जीवन चक्र का महत्वपूर्ण हिस्सा है।


9. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:

a. द्विक् निषेचन (Double Fertilization):
यह प्रक्रिया फूलों में होती है, जिसमें एक नर युग्मज अंडाणु को निषेचित करता है और दूसरा नर युग्मज पोलर न्यूक्लियस से जुड़ता है, जिससे भ्रूणपोष का निर्माण होता है।

b. टैपीटम (Tapetum):
यह परागकण के विकास में सहायक कोशिकाओं की परत होती है, जो परागकण को पोषण प्रदान करती है और इसे सहायक पदार्थों से भरती है।

c. भ्रूणपोष चूषकांग (Endosperm Haustorium):
यह भ्रूणपोष के कोशिकाओं द्वारा विकसित अंग है, जो भ्रूण को पोषक तत्वों का अवशोषण करता है।

d. निषेचन (Fertilization):
यह प्रक्रिया तब होती है जब नर और मादा युग्मज मिलते हैं और नया जीवविज्ञान उत्पन्न होता है।


10. स्व-अनिषेकजन्यता क्या है?

स्व-अनिषेकजन्यता (Self-Incompatibility) वह प्रक्रिया है जिसमें एक ही पौधे के फूलों के परागकण अपने ही स्त्री अंग के साथ निषेचन नहीं कर पाते। यह प्रकृति द्वारा एक सुरक्षा तंत्र के रूप में कार्य करता है, ताकि आनुवंशिक विविधता बनी रहे।


11. इसके प्रकार तथा महत्व का वर्णन कीजिए।

स्व-अनिषेकजन्यता के प्रकार:

  1. साधारण स्व-अनिषेकजन्यता: परागकण अपने ही स्त्री अंग से निषेचन नहीं करता।
  2. जीन द्वारा नियंत्रित स्व-अनिषेकजन्यता: यह जीन के द्वारा नियंत्रित होती है, जो पराग और स्त्री अंग के बीच असंगति उत्पन्न करती है।

महत्व:
यह पौधों में आनुवंशिक विविधता बनाए रखने में सहायक होता है और परागण के द्वारा स्वस्थ पौधों की उत्पत्ति होती है।


12. भ्रूणपोष क्या है?

भ्रूणपोष (Endosperm) एक पोषक ऊतक है, जो बीज के भीतर भ्रूण के विकास के लिए आवश्यक पोषक तत्वों को प्रदान करता है। यह निषेचन के बाद भ्रूणकोष में विकसित होता है।


13. पौधों में पाये जाने वाले विभिन्न प्रकार के भ्रूणपोषों का वर्णन कीजिए।

  1. श्वेत भ्रूणपोष (Nuclear Endosperm): इसमें कोशिकाएँ बिना विभाजन के एक साथ मिलकर पोषक तत्वों को संचित करती हैं।
  2. सेल्यूलोज़ भ्रूणपोष (Cellular Endosperm): इसमें भ्रूणपोष के कोशिकाएँ विभाजन के द्वारा एक संरचना बनाती हैं।
  3. लिग्निन भ्रूणपोष (Helobial Endosperm): इसमें भ्रूणपोष दो प्रकार की कोशिकाओं से बना होता है, जो विकास के दौरान विभाजन करती हैं।

14. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए:

a. भ्रूणकोष की संरचना एवं कार्य:
भ्रूणकोष में अंडाणु और पोलर न्यूक्लियस होते हैं, जो निषेचन के दौरान युग्मज से मिलकर भ्रूण का विकास करते हैं।

b. मोनोस्पोरिक (पॉलीगोनम टाइप) भ्रूणकोष:
यह भ्रूणकोष केवल एक अंडाणु से उत्पन्न होता है और इसमें एक ही भ्रूण का विकास होता है।

c. बाईस्पोरिक भ्रूणकोष:
इस प्रकार के भ्रूणकोष में दो अंडाणु होते हैं, और यह ज्यादातर द्विबीजपत्री पौधों में पाया जाता है।

d. टेट्रास्पोरिक भ्रूणकोष:
यह भ्रूणकोष एक चतुर्भुज आकार का होता है और इसमें चार अंडाणु होते हैं।


15. आवृत्तबीजियों में पाये जाने वाले द्विबीजपत्री भ्रूण के विकास का सचित्र वर्णन कीजिए।
इसमें भ्रूण के चार प्रमुख चरण होते हैं:

  1. क्लेप्रल भ्रूण: प्रारंभिक अवस्था में विभाजन।
  2. कॉम्पैक्ट भ्रूण: कोशिकाओं का घनत्व बढ़ता है।
  3. विस्तृत भ्रूण: भ्रूण के अंगों का विकास।

16. अपसंयोजन क्या है?
अपसंयोजन (Cross-pollination) वह प्रक्रिया है जिसमें परागकण एक पौधे से दूसरे पौधे में स्थानांतरित होता है, जिससे आनुवंशिक विविधता उत्पन्न होती है।


17. अपसंयोजन के विभिन्न प्रकारों का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

  1. कीटों द्वारा: जैसे- फूलों में मधुमक्खियाँ।
  2. हवा द्वारा: जैसे- पाइन वृक्ष।
  3. जल द्वारा: जैसे- जलपादप पौधे।

18. अनिषेकफलन क्या है?
यह प्रक्रिया तब होती है जब बीज उत्पन्न होने से पहले निषेचन नहीं होता, अर्थात् बीजाणु बिना निषेचन के विकसित होते हैं।


19. यह कितने प्रकार का होता है? अनिषेकफलन के महत्व तथा हानियाँ लिखिए।
यह दो प्रकार का होता है:

  1. स्व-अनिषेकफलन: खुद से उत्पन्न होने वाले बीज।
  2. आंशिक अनिषेकफलन: कुछ गुणसूत्र उत्पन्न होते हैं, लेकिन निषेचन नहीं होता।

महत्व: यह समय-समय पर नए पौधों की उत्पत्ति में सहायक हो सकता है।
हानियाँ: इससे पौधों की विविधता नहीं बढ़ पाती।


20. ऐन्थर की आंतरिक संरचना एवं परागकण के विकास का वर्णन कीजिए।
ऐन्थर में चार पंक्तियाँ होती हैं, जहां परागकण विकसित होते हैं। इन पंक्तियों में कई कोशिकाएँ होती हैं जो विभाजन के द्वारा परागकण उत्पन्न करती हैं।


21. बहुभ्रूणता पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
यह एक दुर्लभ स्थिति है, जिसमें एक बीज में कई भ्रूण विकसित होते हैं।


22. जन्तु परागण पर टिप्पणी लिखिए।
जन्तु परागण वह प्रक्रिया है, जिसमें कीट या अन्य जन्तु परागकण एक फूल से दूसरे फूल में स्थानांतरित करते हैं। यह प्रक्रिया फूलों के प्रजनन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण है।


23. दीर्घबीजाणु जनन क्या है?
यह वह प्रक्रिया है जिसमें दीर्घकालिक बीजाणु का उत्पादन होता है और कई वर्षों तक सक्रिय रहता है।


1.         परागकण-स्त्रीकेसर अन्तर्क्रिया पर टिप्पणी लिखिए।
यह वह प्रक्रिया है, जिसमें परागकण स्त्रीकेसर के साथ मिलकर निषेचन की प्रक्रिया आरंभ करता है, और नया जीवन प्रारंभ होता है।

 

 

 

इकाई 4
लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. पादप अभिजनन (Plant Breeding) क्या है? इसके उद्देश्य, विधियाँ एवं लाभ-हानि का वर्णन कीजिए।

पादप अभिजनन (Plant Breeding) वह प्रक्रिया है, जिसमें मानव अपने आवश्यकताओं के अनुसार पौधों के गुणसूत्रों (genes) में सुधार करता है। इसका उद्देश्य उच्च उपज, रोग प्रतिरोधक क्षमता, जलवायु अनुकूलता, और पौधों की अन्य उपयोगिता बढ़ाना है।

उद्देश्य:

  • उच्च उत्पादन क्षमता वाले पौधों का विकास
  • रोग प्रतिरोधक किस्मों का निर्माण
  • पौधों की गुणवत्ता में सुधार
  • परिवर्तित जलवायु में भी उपयुक्त किस्मों का विकास

विधियाँ:

  1. संकरन विधि (Hybridization): दो विभिन्न किस्मों को मिलाकर बेहतर किस्म विकसित करना।
  2. म्यूटेशन विधि (Mutation Breeding): उत्परिवर्तन द्वारा नई किस्मों का निर्माण।
  3. नियंत्रित परागण (Controlled Pollination): विशेष प्रकार के परागण से बेहतर किस्में तैयार करना।
  4. एलीट चयन (Elite Selection): अच्छे लक्षण वाले पौधों का चयन करना।

लाभ:

  • उत्पादन में वृद्धि
  • पौधों के प्रतिरोधी गुणों का विकास
  • विविधता का संवर्धन

हानि:

  • जीन के असंतुलन का खतरा
  • कीटों और रोगों के प्रति नई किस्मों की संवेदनशीलता

2. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए:

a. भारतवर्ष की पुर:स्थापन करने वाली एजेंसियाँ:
भारत में पादप अभिजनन और पुर:स्थापन के लिए कई प्रमुख एजेंसियाँ हैं, जैसे:

  • भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR): यह संगठन कृषि विज्ञान और अनुसंधान में अग्रणी है।
  • राष्ट्रीय कृषि और खाद्य अनुसंधान संस्थान (NAARM): यह संस्था कृषि अनुसंधान और तकनीकी विकास पर काम करती है।
  • राष्ट्रीय बीज निगम (NSC): यह बीज के उत्पादन, प्रसंस्करण और वितरण के लिए जिम्मेदार है।

b. दशानुकूलन (Acclimatization):
दशानुकूलन वह प्रक्रिया है जिसमें एक पौधा या जीव नए वातावरण या जलवायु में अपनी अनुकूलता प्राप्त करता है। यह पादपों को विभिन्न जलवायु स्थितियों और पर्यावरणीय बदलावों के अनुसार विकसित करने में मदद करता है। उदाहरण के लिए, उष्णकटिबंधीय पौधों का शीतोष्ण क्षेत्र में उगाना।


3. पादप निवेशन या पुर:स्थापन (Plant Introduction) को परिभाषित करते हुए इनके उद्देश्यों, क्रियाविधि एवं गुण-दोषों की व्याख्या कीजिए।

पादप निवेशन (Plant Introduction) का अर्थ है किसी क्षेत्र या देश से अन्य क्षेत्र में पौधों का स्थानांतरण। इसका उद्देश्य नए पौधों की किस्मों को विभिन्न स्थानों पर लाकर उन क्षेत्रों की कृषि में सुधार करना है।

उद्देश्य:

  • उच्च उपज वाली किस्मों का स्थानांतरण
  • पौधों के प्रतिरोधक गुणों को बढ़ाना
  • नई किस्मों का विकास

क्रियाविधि:

  1. पौधों का चयन और परीक्षण
  2. पौधों को नए क्षेत्र में लाकर उगाना
  3. उन पौधों की वृद्धि और उत्पादन की निगरानी

गुण-दोष: गुण:

  • कृषि उत्पादकता में वृद्धि
  • नई किस्मों का विकास

दोष:

  • नए पर्यावरण में अनुकूलन का समस्या
  • आनुवंशिक हानि का खतरा

4. हरित क्रांति का गेहूँ के उत्पादन में योगदान का संक्षिप्त वर्णन करते हुए गेहूँ के पाँच उन्नतशील किस्मों के मुख्य लक्षण लिखिए।

हरित क्रांति ने गेहूँ के उत्पादन में महत्वपूर्ण योगदान दिया, खासकर उच्च उपज देने वाली किस्मों का विकास हुआ। हरित क्रांति में सिंचाई, रासायनिक उर्वरक, और उच्च यील्डिंग किस्मों का उपयोग हुआ। इससे गेहूँ के उत्पादन में वृद्धि हुई और खाद्य सुरक्षा सुनिश्चित हुई।

गेहूँ की पाँच उन्नतशील किस्में और उनके मुख्य लक्षण:

  1. PBW 343: उच्च उत्पादन क्षमता, प्रतिरोधक क्षमता।
  2. UP 262: शुष्क परिस्थितियों में अच्छी वृद्धि।
  3. HD 2967: उच्च उपज क्षमता, रोग प्रतिरोधी।
  4. HI 1544: अच्छी गुणवत्ता, सिंचाई में वृद्धि।
  5. K 9006: कम तापमान में अच्छा विकास।

5. पादप निवेशन या पुर:स्थापन (Plant Introduction) के उद्देश्यों, क्रियाविधि एवं गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।

यह प्रश्न पहले ही ऊपर उत्तरित किया गया है। कृपया अन्य प्रश्न पूछें।


6. हरित क्रांति का गेहूँ के उत्पादन में योगदान का संक्षिप्त वर्णन करते हुए गेहूँ के पाँच उन्नतशील किस्मों के मुख्य लक्षण लिखिए।

यह प्रश्न पहले ही उत्तरित किया गया है।


7. भारत में चावल उत्पादन में पादप अभिजनन का संक्षिप्त वर्णन करते हुए चावल की कुछ उन्नत किस्मों का उल्लेख कीजिए।

पादप अभिजनन ने भारत में चावल उत्पादन को अत्यधिक बढ़ाया। विभिन्न किस्मों का चयन और सुधार करके उच्च उपज, रोग प्रतिरोधी और जलवायु अनुकूल किस्मों का निर्माण हुआ।

चावल की कुछ उन्नत किस्में:

  1. IR 8: उच्च उपज क्षमता, रोग प्रतिरोधी।
  2. Pusa Basmati 1: उत्तम गुणवत्ता और स्वाद।
  3. Swarna: जलवायु में विविधता के अनुकूल।
  4. MTU 1010: उच्च उपज, सिंचाई में वृद्धि।
  5. Pusa 44: मौसम की विविधता के साथ अनुकूलता।

8. भारत में गन्ना उत्पादन एवं शर्करा उद्योग की संक्षिप्त व्याख्या कर गन्ना अभिजनन की उन्नत किस्मों तथा इसकी नवीन उपलब्धियों का विस्तृत व्याख्या कीजिए।

गन्ना उत्पादन और शर्करा उद्योग भारत की प्रमुख कृषि और औद्योगिक गतिविधियों में से एक है। गन्ने से चीनी, एथेनॉल, और अन्य सहायक उत्पाद बनाए जाते हैं। पादप अभिजनन ने गन्ने की उच्च उपज और रोग प्रतिरोधक किस्मों को विकसित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है।

गन्ना अभिजनन की उन्नत किस्में:

  1. Co 86032: उच्च शर्करा की मात्रा, रोग प्रतिरोधी।
  2. Co 0215: बढ़ी हुई उपज, जलवायु के प्रति अनुकूलता।
  3. Co 740: उच्च चीनी उत्पादन क्षमता।
  4. Co 0998: गुणवत्ता में वृद्धि, अधिक शर्करा प्रतिशत।
  5. Co 997: गन्ने की सिंचाई क्षमता में वृद्धि।

नवीन उपलब्धियाँ:

  • उच्च शर्करा उत्पादन और शुद्धता
  • जलवायु परिवर्तन के अनुकूल नई किस्मों का विकास

9. भारत में कपास उद्योग पर टिप्पणी करते हुए कपास अभिजनन (Cotton breeding), इनकी उपलब्धियों तथा कुछ उन्नतशील किस्मों की सविस्तार व्याख्या कीजिए।

कपास उद्योग भारत की सबसे पुरानी और प्रमुख कृषि उद्योगों में से एक है। कपास के उत्पादन में पादप अभिजनन ने उच्च गुणवत्ता, उच्च उपज और कीट प्रतिरोधी किस्मों का विकास किया है।

कपास अभिजनन की उन्नत किस्में:

  1. DCH 32: उच्च गुणवत्ता और उत्पादन क्षमता।
  2. H 4: जलवायु के अनुसार अनुकूलता।
  3. MCU 5: रोग प्रतिरोधी और बेहतर गुणवत्ता।
  4. Suvernajyothi: उच्च उत्पादकता और कीट प्रतिरोध।
  5. BT Cotton: कीट प्रतिरोधी (बोलवर्म)

10. पादप चयन क्या है? समूह चयन की प्रक्रिया एवं इनके गुण-दोषों का वर्णन कीजिए।

पादप चयन (Plant Selection) वह प्रक्रिया है जिसमें अच्छे लक्षण वाले पौधों को चुना जाता है। समूह चयन (Mass Selection) में एक समूह से पौधों का चयन किया जाता है जिनमें अच्छे लक्षण होते हैं।

प्रक्रिया:

  1. खेत में विविधता को देखते हुए चयन करना।
  2. प्रत्येक पौधे का उत्पादन और गुणों का मूल्यांकन।
  3. उच्च गुणवत्ता वाले पौधों का चयन।

गुण:

  • सरल विधि, कम लागत दोष:
  • जीन पूल का सीमित विस्तार

11. शुद्ध वंशक्रम चयन क्या है? इसके लक्षण, प्रक्रिया, उपयोग एवं गुण दोषों का वर्णन कीजिए।

शुद्ध वंशक्रम चयन (Pure Line Selection) वह प्रक्रिया है जिसमें एक ही गुणसूत्र से उत्पन्न पौधों का चयन किया जाता है।

लक्षण:

  • उच्च गुणवत्ता और स्थिरता

प्रक्रिया:

  1. एक पौधा चुना जाता है।
  2. उसके वंश से अन्य पौधे उत्पन्न होते हैं।
  3. इन पौधों का चयन और सुधार किया जाता है।

उपयोग:

  • उच्च गुणवत्ता वाले पौधों के निर्माण

गुण:

  • स्थिरता और उच्च गुणवत्ता

दोष:

  • विविधता की कमी

12. क्लोनल चयन (Clonal Selection) क्या है? इसकी प्रक्रिया एक गुण दोषों की व्याख्या कीजिए।

क्लोनल चयन में अच्छे लक्षण वाले पौधों से क्लोन तैयार किया जाता है। इसमें एक ही पौधे की कई प्रतियाँ बनाई जाती हैं।

प्रक्रिया:

  1. अच्छे लक्षण वाले पौधों का चयन
  2. उन पौधों के क्लोन तैयार करना

गुण:

  • उच्च गुणवत्ता और समानता

दोष:

  • आनुवंशिक विविधता की कमी

13. आनुवंशिक आधार पर क्लोनल चयन विधियों पर टिप्पणी लिखिए।

आनुवंशिक आधार पर क्लोनल चयन में उन पौधों का चयन किया जाता है जिनमें विशेष गुणसूत्र होते हैं। यह विधि उच्च गुणवत्ता और समानता प्रदान करती है।

 

 

इकाई 5
लघु एवं दीर्घ उत्तरीय प्रश्न

1. प्रसंकरण (Hybridization) क्या है? इसके उद्देश्य तथा तकनीक का वर्णन कीजिए।

प्रसंकरण (Hybridization) वह प्रक्रिया है जिसमें दो विभिन्न पौधों की किस्मों या प्रजातियों के बीच क्रॉस परागण करके नई किस्म या संकर पौधा तैयार किया जाता है। इसका मुख्य उद्देश्य पौधों के गुणसूत्रों का मिश्रण करके उन में नए गुण उत्पन्न करना है।

उद्देश्य:

  • उच्च उपज और बेहतर गुणवत्ता वाली किस्मों का विकास।
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता में वृद्धि।
  • पर्यावरणीय परिस्थितियों के प्रति अनुकूलता का विकास।

तकनीक:

  • संकरन विधि: दो पौधों के बीच संकरण (cross-pollination) किया जाता है।
  • लिंग आधारित संकरण: नर और मादा पौधों के चयन से संकरण किया जाता है।
  • फूलों का चयन: संकरण के लिए केवल अच्छे लक्षण वाले फूलों का चयन किया जाता है।
  • ऑटोमैटिक और नियंत्रित परागण: प्राकृतिक या कृत्रिम तरीके से परागण किया जाता है।

2. स्वपरागित पौधों में उन्नत संकर किस्मों के विकास से संबंधित विधियों का वर्णन कीजिए।

स्वपरागित पौधों में संकर किस्मों के विकास के लिए मुख्य रूप से ऑटो-पोलिनेशन (self-pollination) का उपयोग किया जाता है, जो इस प्रकार है:

  1. स्वपरागित किस्मों की पहचान: स्वपरागित पौधों में उत्कृष्ट और उपज देने वाली किस्मों की पहचान की जाती है।
  2. स्व-परागण द्वारा उन्नत चयन: अच्छे लक्षण वाले पौधों का चयन किया जाता है और उनके स्व-परागण से अगली पीढ़ी तैयार की जाती है।
  3. संकर किस्मों का विकास: स्व-परागित पौधों में जीन विविधता को बढ़ाने के लिए, लंबे समय तक पीढ़ियों का चयन किया जाता है।
  4. संकर बीज उत्पादन: स्वपरागित पौधों से संकर बीज तैयार किया जाता है, ताकि उच्च गुणवत्ता वाली किस्में उत्पन्न की जा सकें।

3. पर-परागित फसलों में संकरण विधियों का वर्णन कीजिए।

पर-परागित फसलों में संकरण विधि का उपयोग प्रमुख रूप से दो पौधों के बीच परागण द्वारा संकर किस्मों का उत्पादन करने के लिए किया जाता है। इसमें विभिन्न प्रकार की विधियाँ शामिल हैं:

  1. ऑल-नैटिव संकरण (Allogenic hybridization): इस विधि में विभिन्न किस्मों के बीच परागण होता है। इसमें दोनों पौधों के लक्षणों का मिश्रण होता है, जो नई किस्म के रूप में प्रदर्शित होता है।
  2. क्रॉस-पोलिनेशन (Cross-pollination): पर-परागित पौधों में पराग का आदान-प्रदान विभिन्न पौधों के बीच होता है। यह प्रक्रिया प्राकृतिक रूप से भी हो सकती है या कृत्रिम रूप से परागण को नियंत्रित किया जाता है।
  3. बीज संकरण (Seed hybridization): पर-परागित पौधों से संकर बीज तैयार किए जाते हैं, जो नई किस्मों को उत्पन्न करने में मदद करते हैं।
  4. नियंत्रित परागण (Controlled Pollination): इसमें स्व-परागण और बाहरी परागण को नियंत्रित किया जाता है ताकि संकर बीज और किस्मों का उत्पादन हो सके।

4. नयी किस्मों के प्रसारण एवं वितरण के चरणों को रेखाचित्र द्वारा समझाइए।

नई किस्मों के प्रसारण और वितरण की प्रक्रिया में निम्नलिखित चरण होते हैं:

  1. नवीन किस्मों का विकास: उच्च गुणवत्ता और उपज वाले पौधों का चयन किया जाता है।
  2. उन्नत किस्मों का परीक्षण: नई किस्मों का खेतों में परीक्षण और मूल्यांकन किया जाता है।
  3. मूल्यांकन और वितरण: उत्पादकता, गुणवत्ता, और रोग प्रतिरोध क्षमता का मूल्यांकन किया जाता है।
  4. वाणिज्यिक उत्पादन और वितरण: नई किस्मों का उत्पादन बढ़ाकर किसानों को वितरित किया जाता है।

5. संकर किस्मों के गुण-दोष एवं कृषि, हार्टीकल्चर एवं वानिकी में प्रसंकरण की भूमिका को बताइए।

गुण:

  • उच्च उपज और गुणवत्ता
  • रोग प्रतिरोधी किस्मों का विकास
  • अनुकूल जलवायु और वातावरण के अनुसार विकास

दोष:

  • संकर बीज की उच्च लागत
  • हर साल नई किस्मों के उत्पादन की आवश्यकता
  • जीन पूल की सीमित विविधता

प्रसंकरण की भूमिका:

  • कृषि: कृषि में उच्च उपज और रोग प्रतिरोधक किस्मों का विकास।
  • हार्टीकल्चर: सुंदर फूलों और फलों के लिए नई किस्मों का विकास।
  • वानिकी: उच्च गुणवत्ता वाली लकड़ी और औषधीय पौधों की किस्मों का विकास।

6. दूरस्थ प्रसंकरण (Distant Hybridization) अथवा दूरस्थ अथवा विस्तृत क्रॉस को परिभाषित कर इसके प्रकारों को बताइए तथा अंतर्जातीय प्रसंकरण एवं इनके प्रकारों का सविस्तार उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।

दूरस्थ प्रसंकरण (Distant Hybridization): यह वह प्रक्रिया है जिसमें दो अलग-अलग प्रजातियों या जातियों के बीच संकरण किया जाता है। इसका उद्देश्य नई किस्मों में नई विशेषताएँ लाना है।

प्रकार:

  1. अंतर्जातीय संकरण (Interspecific hybridization): यह एक प्रजाति की दो विभिन्न जातियों के बीच संकरण है। उदाहरण: गेहूं और Rye का संकरण
  2. अंतर-वंशीय संकरण (Inter-varietal hybridization): यह एक ही जाति के विभिन्न वंशों के बीच संकरण है। उदाहरण: भारत में स्वर्ण और जी.एम. गेहूं का संकरण

अंतर्जातीय प्रसंकरण के प्रकार:

  1. स्वाभाविक संकरण: यह स्वाभाविक रूप से होता है, जैसे प्राकृतिक परागण।
  2. नियंत्रित संकरण: इसमें परागण प्रक्रिया को नियंत्रित किया जाता है, ताकि विशेष गुण वाले पौधे उत्पन्न हो सकें।

7. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-

(i) अंतर्जातीय संकरण एवं अंतर्वंशीय संकरण में अंतर:

  • अंतर्जातीय संकरण में दो अलग-अलग जातियों के बीच संकरण होता है, जबकि अंतर्वंशीय संकरण में एक ही जाति के विभिन्न वंशों के बीच संकरण होता है।

(ii) विस्तृत संकरण तकनीक एवं इसकी असफलता के कारण:

  • विस्तृत संकरण तकनीक में विभिन्न जातियों और प्रजातियों के बीच क्रॉस-ब्रीडिंग की जाती है। यह तकनीक समय-संवेदनशील और कठिन होती है। असफलता के कारण: आनुवंशिक असमानता और उत्परिवर्तन, पौधों की अस्वीकृति।

8. ओज भिन्नता क्या है? संकर ओज भिन्नता के प्रकार, विशेषताएं तथा इनके विभिन्न मतों अथवा सिद्धांतों का वर्णन कीजिए।

ओज भिन्नता (Heterosis) वह स्थिति है जिसमें संकर पौधे अपनी जनक किस्मों की तुलना में अधिक उत्पादक होते हैं।

प्रकार:

  1. वर्गीय ओज (Genotypic Heterosis)
  2. फेनोटाइपिक ओज (Phenotypic Heterosis)

विशेषताएँ:

  • उच्च उत्पादन
  • बेहतर शारीरिक गुण
  • रोग प्रतिरोधक क्षमता

विभिन्न सिद्धांत:

  • डोमिनेंस सिद्धांत: संकर पौधों में दो पैतृक किस्मों के गुणसूत्रों का मिश्रण होता है।
  • जीन पूल सिद्धांत: ओज भिन्नता जीन पूल की व्यापकता से उत्पन्न होती है।

9. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-

(i) संकर ओज का आकलन: संकर ओज को बीजों के उत्पादन, गुणवत्ता, और पौधों की वृद्धि के आधार पर मापा जाता है।

(ii) संकर ओज को प्रभावित करने वाले कारक: आनुवंशिक विविधता, परागण प्रक्रिया, और पर्यावरणीय परिस्थितियाँ संकर ओज को प्रभावित करती हैं।

(iii) संकर ओज का महत्व: संकर ओज से प्राप्त पौधे उच्च उपज, बेहतर रोग प्रतिरोधक क्षमता और अधिक समृद्ध गुण प्रदान करते हैं।


10. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-

(i) मिश्रित पादप किस्म: मिश्रित पादप किस्में वे होती हैं जिनमें विभिन्न किस्मों के गुण होते हैं, जो उच्च उत्पादन और विविधता प्रदान करती हैं।

(ii) संश्लिष्ट पादप किस्म: संश्लिष्ट पादप किस्में मिश्रण से उत्पन्न होती हैं, जो विशेष लक्षणों के मिश्रण के कारण एक नई किस्म बनती है।


11. उत्परिवर्तन (Mutation) को परिभाषित करते हुए उनके प्रकारों एवं प्रक्रिया का वर्णन कीजिए।

उत्परिवर्तन वह प्रक्रिया है जिसमें किसी जीव के गुणसूत्रों में अचानक बदलाव होते हैं, जिसके परिणामस्वरूप नए गुण उत्पन्न होते हैं।

प्रकार:

  1. जैविक उत्परिवर्तन (Biological Mutation)
  2. भौतिक उत्परिवर्तन (Physical Mutation)

प्रक्रिया:

  • उत्परिवर्तन मुख्य रूप से रेडिएशन, रासायनिक तत्वों या उच्च तापमान के कारण उत्पन्न होते हैं।

12. निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिए-

  1. ओलिगोजेनिक लक्षणों के लिए उत्परिवर्तन अभिजनन: इसमें कुछ प्रमुख लक्षणों को नियंत्रित किया जाता है।
  2. पॉलीजेनिक गुणों के लिए उत्परिवर्तन अभिजनन: इसमें गुणसूत्रों की बड़ी संख्या में उत्परिवर्तन होते हैं, जो पौधों के गुणसूत्रों में अधिक विविधता उत्पन्न करते हैं।

13. आण्विक अभिजनन क्या है? पादप अभिजनन में आण्विक अभिजनन की भूमिका तथा आण्विक मार्कर्स (Molecular markers) का वर्णन कीजिए।

आण्विक अभिजनन (Molecular Breeding) वह प्रक्रिया है जिसमें DNA मार्कर्स का उपयोग करके पौधों के गुणसूत्रों का चयन किया जाता है। इस प्रक्रिया से बेहतर गुणों वाली किस्में बनाई जाती हैं।

भूमिका:

  • आनुवंशिक चयन में सुधार
  • जल्दी परिणाम प्राप्त करना
  • बीमारियों और पौधों की समस्याओं का पहचानना

आण्विक मार्कर्स: ये विशेष DNA अनुक्रम होते हैं जो पौधों के जीन की पहचान करते हैं, जिससे विशिष्ट गुणों को ट्रैक करना आसान होता है।

 

 


 

 

 

 

 

 

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