B.Sc 2nd year chemistry 1st paper inorganic chemistry unit 1

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NOTE:-     In this blog there are only questions and answers of 1st unit of inorganic chemistry and 2nd 

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                    a lot.

                   --इस ब्लॉग में केवल अकार्बनिक रसायन विज्ञान की पहली इकाई के प्रश्न और उत्तर हैं तथा दूसरी से छठी इकाई के प्रश्न अगले 

                        ब्लॉग में उपलब्ध होंगे क्योंकि इससे ब्लॉग पृष्ठ का आकार बहुत बढ़ जाता है।



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बी.एस-सी. द्वितीय वर्ष – रसायन (प्रथम प्रश्न-पत्र)

प्रश्न-सूची (छत्तीसगढ़)

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इकाई 1 अ 

इकाई 1 अ 

इकाई 1 अ 

इकाई 1 ब 

इकाई 1 ब 


इकाई – 1 (अ)


दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न:-  (total 50 question) 


Q1. (अ) d-ब्लॉक के तत्वों के लक्ष्णात्मक गुणों की व्याख्या कीजिए।

Ans:

d-ब्लॉक तत्वों को संक्रमण तत्व (transition elements) कहते हैं। इनके d-orbitals आंशिक रूप से भरे होते हैं। ये तत्व निम्नलिखित लक्ष्णात्मक गुण दर्शाते हैं:

1. Variable oxidation states (विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएं)

2. Coloured compounds बनाते हैं

3. Complex formation की प्रवृत्ति

4. अच्छे Catalyst होते हैं

5. Hard and dense होते हैं

6. Magnetic properties दिखाते हैं (कुछ paramagnetic होते हैं)

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Q1. (ब) संक्रमण तत्वों से आप क्या समझते हैं? 3d-संक्रमण तत्वों के नाम, संकेत तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

Ans:

संक्रमण तत्व वे होते हैं जिनके d-orbitals आंशिक रूप से भरे होते हैं।

3d-Transition elements: Sc (21) to Zn (30)

तत्व संकेत इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

Sc 21 [Ar] 3d¹ 4s²

Ti 22 [Ar] 3d² 4s²

V 23 [Ar] 3d³ 4s²

Cr 24 [Ar] 3d⁵ 4s¹

Mn 25 [Ar] 3d⁵ 4s²

Fe 26 [Ar] 3d⁶ 4s²

Co 27 [Ar] 3d⁷ 4s²

Ni 28 [Ar] 3d⁸ 4s²

Cu 29 [Ar] 3d¹⁰ 4s¹

Zn 30 [Ar] 3d¹⁰ 4s²

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Q1. (स) क्यों निष्क्रियता 4p-श्रृंखला आयनों की चुंबकीय गुणधर्मों 3d-ब्लॉक तत्वों से भिन्न है?

Ans:

4p-श्रृंखला (4d और 5d transition elements) के आयनों में इलेक्ट्रॉन एक-दूसरे को अधिक शील्ड करते हैं और pairing की संभावना अधिक होती है। इसके कारण unpaired electrons कम होते हैं, जिससे इनकी चुंबकीयता (magnetism) कम होती है। जबकि 3d-ब्लॉक में unpaired electrons अधिक होते हैं इसलिए वे ज्यादा magnetic होते हैं।

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Q2. (अ) d-d संक्रमण क्या होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।

Ans:

जब किसी transition metal complex में d-orbital में electron एक lower energy orbital से higher energy orbital में jump करता है तो उसे d-d transition कहते हैं।

उदाहरण: [Ti(H₂O)₆]³⁺ जलीय complex बैंगनी रंग दिखाता है क्योंकि इसमें d-d transition होता है। ये electron excitation की वजह से होता है और इसी कारण से रंगीन यौगिक बनते हैं।

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Q2. (ब) सभी संक्रमण धातुएँ विविध ऑक्सीकरण अवस्थाएं क्यों दर्शाती हैं?

Ans:

Transition metals में (n-1)d और ns electrons लगभग same energy के होते हैं। इसलिए ये धातुएं विभिन्न number of electrons lose करके कई oxidation states दिखा सकती हैं। जैसे Mn – +2 से लेकर +7 तक oxidation states में पाया जाता है।

Q2. (स) क्षार धातुएं एवं क्षारीय मृदा धातुओं की अपेक्षा संक्रमण धातुएं कम क्रियाशील क्यों होती हैं?

Ans:

क्षार (alkali) और क्षारीय मृदा (alkaline earth) धातुएं s-block की होती हैं जिनकी outermost orbitals में केवल 1 या 2 electrons होते हैं, इसलिए ये आसानी से electrons खोकर reactions करती हैं।

वहीं, transition metals में d-orbitals शामिल होते हैं और उनके electrons ज्यादा tightly bound होते हैं। साथ ही, इनके atomic और ionic sizes छोटे होते हैं। इसलिए ये कम reactive होते हैं।

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Q3. (i) संक्रमण तत्व अन्य तत्वों के साथ मिश्रधातु बनाते हैं।

Ans:

Transition elements की atomic size में ज़्यादा अंतर नहीं होता और उनके crystal structures compatible होते हैं। इसलिए ये एक-दूसरे के atoms को आसानी से replace करके alloy बना सकते हैं।

उदाहरण: Steel (Fe + C), Brass (Cu + Zn)

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Q3. (ii) Zn, Cd तथा Hg को संक्रमण तत्वों में शामिल किया जाता है, क्यों? Zn, Cd, Hg के लौह चुम्बकीय क्यों नहीं होते हैं?

Ans:

हालांकि Zn, Cd, Hg के सभी d-orbitals पूरी तरह भरे होते हैं (d¹⁰ configuration), फिर भी ये d-block में आते हैं इसलिए इन्हें transition elements माना जाता है।

परंतु इनमें unpaired electrons नहीं होते, इसलिए ये paramagnetic या ferromagnetic नहीं होते। मतलब ये magnetic नहीं होते।

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Q3. (iii) संक्रमण धातुएं अच्छी उत्प्रेरक होती हैं।

Ans:

Transition elements के पास variable oxidation states होती हैं और ये surface पर reactants को adsorb कर सकते हैं। इससे reactions की rate बढ़ती है।

उदाहरण: V₂O₅ का उपयोग Contact process में और Fe का उपयोग Haber process में होता है।

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Q3. (iv) कुछ संक्रमण धातुएं एवं उनके आयन हाइड्रोजन से उच्चतर होते हैं, किन्तु ये आयन हाइड्रोजन विस्थापित नहीं करते हैं।

Ans:

कुछ transition metal ions की standard reduction potential (E°) हाइड्रोजन से कम होती है, लेकिन इनकी hydration energy बहुत ज़्यादा होती है जिससे ये stable हो जाते हैं और H⁺ को डिस्प्लेस नहीं कर पाते।

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Q3. (v) Cr और Cu तक के तत्वों के आयनिक त्रिज्याओं के मान बहुत करीब क्यों होते हैं?

Ans:

Sc से Cr और Cu तक जाते हुए d-electrons बढ़ते हैं, जिससे effective nuclear charge भी बढ़ता है। इससे electrons nucleus की ओर attract होते हैं और size में बहुत ज़्यादा अंतर नहीं आता। इसलिए उनकी ionic radii लगभग समान रहती हैं।

Q3. (vi) Fe²⁺ तथा Fe³⁺ में से कौन-सी ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी है, क्यों?

Ans:

Fe³⁺ (ferric ion) की ऑक्सीकरण अवस्था अधिक स्थायी होती है क्योंकि इसमें electronic configuration [Ar] 3d⁵ होता है, जो आधा भरा हुआ (half-filled) d-orbital है और यह ज्यादा stable होता है।

Fe²⁺ में [Ar] 3d⁶ होता है जो उतना stable नहीं होता।

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Q3. (vii) Cu²⁺ रंगीन है जबकि Cu⁺ रंगहीन है – समझाइए।

Ans:

Cu²⁺ का configuration [Ar] 3d⁹ होता है, जिसमें एक unpaired electron होता है जो d–d transition करता है, जिससे यह रंगीन दिखाई देता है।

वहीं Cu⁺ में configuration [Ar] 3d¹⁰ होता है जो पूरी तरह भरा होता है और कोई d–d transition संभव नहीं होता, इसलिए यह रंगहीन होता है।

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Q3. (viii) Zn²⁺ आयन रंगहीन एवं स्थायी है।

Ans:

Zn²⁺ का electronic configuration 3d¹⁰ होता है, जो पूरी तरह भरा हुआ d-orbital है। इसमें कोई unpaired electron नहीं होता, इसलिए यह रंगहीन होता है।

साथ ही, इसकी hydration energy भी बहुत अधिक होती है, जिससे यह आयन बहुत stable हो जाता है।

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Q3. (ix) चुंबकीय आघूर्ण के आणविक चक्रण घूर्ण को उदाहरण सहित समझाइए।

Ans:

Magnetic moment (μ) = √[n(n+2)] BM होता है, जहाँ 'n' unpaired electrons की संख्या है।

उदाहरण: Mn²⁺ में 3d⁵ configuration होता है यानी 5 unpaired electrons → μ = √[5(5+2)] = √35 ≈ 5.92 BM

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Q3. (x) Co की +1 एवं +2 ऑक्सीकरण अवस्थाओं का स्थायित्व।

Ans:

Cobalt की +2 oxidation state (Co²⁺) अधिक stable होती है क्योंकि इसका configuration [Ar] 3d⁷ होता है।

Co⁺ (3d⁸) oxidation state बहुत ही कम पाई जाती है क्योंकि यह पानी में stable नहीं होती और आसानी से oxidize होकर Co²⁺ बन जाती है।

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Q4. (i) Cu²⁺ आयन रंगीन, किन्तु Zn²⁺ आयन रंगहीन होता है।

Ans:

Cu²⁺ में 3d⁹ configuration होता है जिसमें d-d electronic transition संभव है, जिससे यह रंगीन होता है।

जबकि Zn²⁺ का 3d¹⁰ configuration पूरी तरह भरा होता है, d–d transition नहीं हो सकता, इसलिए यह रंगहीन होता है।

Q4. (ii) Ti⁴⁺ (जलीय) रंगहीन, किन्तु Ti³⁺ (जलीय) पर्पल रंग का होता है – क्यों?

Ans:

Ti⁴⁺ का configuration 3d⁰ होता है यानी इसमें कोई d-electron नहीं होता, इसलिए d–d transition संभव नहीं और यह रंगहीन होता है।

Ti³⁺ में 3d¹ configuration होता है, जिससे d–d transition संभव होता है और इसका रंग पर्पल दिखाई देता है।

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Q4. (iii) Co³⁺ की अपेक्षा Fe³⁺ अधिक स्थायी होता है – क्यों?

Ans:

Fe³⁺ में 3d⁵ configuration होता है जो आधा भरा हुआ है और अधिक स्थायित्व प्रदान करता है।

Co³⁺ में 3d⁶ configuration होता है जो उतना stable नहीं होता। इसलिए Fe³⁺, Co³⁺ की तुलना में अधिक स्थायी होता है।

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Q4. (iv) Zn²⁺ रंगहीन, किन्तु Ni²⁺ रंगीन होता है – क्यों?

Ans:

Zn²⁺ में 3d¹⁰ configuration होता है यानी सभी d-orbitals भरे हुए होते हैं, जिससे d-d transition संभव नहीं होता और यह रंगहीन होता है।

Ni²⁺ में 3d⁸ configuration होता है, जिसमें unpaired electrons होते हैं और d-d transition संभव होता है, इसलिए यह रंगीन होता है।

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Q4. (v) [Cu(H₂O)₄]²⁺ नीला, [Cu(NH₃)₄]²⁺ गहरा नीला एवं [Cu(en)₂]²⁺ गाढ़ा लाल रंग का होता है – क्यों?

Ans:

यह रंग परिवर्तन लिगैंड के प्रभाव के कारण होता है।

विभिन्न लिगैंड्स का crystal field splitting energy (Δ) पर अलग-अलग प्रभाव होता है:

H₂O एक weak field ligand है, जिससे हल्का नीला रंग

NH₃ एक stronger ligand है, जिससे गहरा नीला रंग

en (ethylenediamine) एक और भी strong bidentate ligand है, जिससे splitting अधिक होती है और गाढ़ा लाल रंग आता है।

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Q4. (vi) कौन-सा आयन ज्यादा स्थायी है — Ti⁴⁺ या Ti³⁺?

Ans:

Ti⁴⁺ आयन अधिक स्थायी है क्योंकि इसका configuration 3d⁰ है जो inert होता है और इसमें कोई d-electron नहीं होता जो अनावश्यक क्रिया करे।

Ti³⁺ में 3d¹ होता है जो reactive होता है, इसलिए यह कम stable होता है।

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Q4. (vii) Cr, Mo एवं W हेप्टॉक्साइड बनाते हैं पर Cr⁶⁺ स्थायी नहीं होता – क्यों?

Ans:

Cr⁶⁺ में 3d⁰ configuration होता है और इसका size छोटा होता है, जिससे यह highly oxidizing हो जाता है और जल में आसानी से reduce हो जाता है।

Mo⁶⁺ और W⁶⁺ में size बड़ा होता है और इनका d-orbital अधिक diffuse होता है जिससे ये ज्यादा stable होते हैं। इसलिए Cr⁶⁺ की तुलना में Mo और W के hexavalent यौगिक अधिक स्थायी होते हैं।

Q4. (viii) Zn²⁺ प्रतिपरावर्ती है लेकिन Cu²⁺ अनुनादकारी होता है – क्यों?

Ans:

Zn²⁺ में 3d¹⁰ पूर्णतः भरा हुआ d-orbital होता है, जिससे यह electronic delocalization नहीं दिखाता और यह प्रतिपरावर्ती (non-resonating) होता है।

Cu²⁺ में 3d⁹ configuration होता है, जो एक electron की कमी से unstable होता है और resonance द्वारा अपने structure को stabilize करता है। इसलिए Cu²⁺ अनुनादकारी होता है।

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Q4. (ix) Mn²⁺ प्रतिपरावर्ती होता है, जबकि Fe²⁺ अनुनादकारी होता है – क्यों?

Ans:

Mn²⁺ का 3d⁵ configuration आधा भरा होता है, जो electronic दृष्टि से बहुत स्थिर होता है। इसलिए यह अनावश्यक resonance नहीं करता।

Fe²⁺ में 3d⁶ configuration होता है, जो resonance के माध्यम से अधिक स्थायित्व प्राप्त कर सकता है। इसलिए Fe²⁺ resonance करने में सक्षम होता है।

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Q4. (x) हिस्टिडीन पर Ti⁴⁺ आयन अनुयोजक बंध बनाता है – क्यों?

Ans:

Ti⁴⁺ एक high charge density वाला छोटा cation होता है।

हिस्टिडीन में amine और imidazole group जैसे donor atoms होते हैं जो lone pair प्रदान करते हैं।

Ti⁴⁺ इन donor atoms के साथ coordinate bond बनाकर अनुयोजक बंध (coordinate linkage) बनाता है।

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Q5. (i) स्कैण्डियम की केवल +3 ऑक्सीकरण अवस्था होती है – क्यों?

Ans:

Scandium (Sc) का atomic number 21 है और इसका electronic configuration [Ar] 3d¹ 4s² होता है।

यह तीन electrons (एक 3d और दो 4s) आसानी से खोकर Sc³⁺ बनाता है, जो noble gas configuration देता है।

इससे अधिक या कम electrons खोना energetically unfavorable होता है, इसलिए केवल +3 अवस्था ही स्थिर होती है।

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Q5. (ii) स्कैण्डियम के यौगिक रंगहीन तथा प्रतिचुंबकीय होते हैं – क्यों?

Ans:

Sc³⁺ में 3d⁰ configuration होता है, यानी कोई unpaired electron नहीं होता।

इस कारण d–d transition नहीं होता, इसलिए ये रंगहीन होते हैं।

चूंकि unpaired electrons नहीं हैं, इसलिए ये paramagnetic नहीं बल्कि diamagnetic (प्रतिचुंबकीय) होते हैं।

Q6. (a) क्रोमियम संयुगों की ऑक्सीकरण अवस्था, उप-सहसंयोजन संख्या तथा ज्यामिति की विवेचना कीजिए।

Ans:

क्रोमियम (Cr) विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएं दर्शाता है, जैसे +2, +3 और +6।

+2 अवस्था में Cr²⁺ labile और reducing nature दिखाता है।

+3 अवस्था Cr³⁺ की सबसे stable अवस्था है, जैसे Cr₂(SO₄)₃।

+6 अवस्था में क्रोमेट (CrO₄²⁻) और डाइक्रोमेट (Cr₂O₇²⁻) पाए जाते हैं।

उप-सहसंयोजन संख्या:

Cr³⁺ complexes की coordination number प्रायः 6 होती है (octahedral geometry)।

CrO₄²⁻ और Cr₂O₇²⁻ में coordination number 4 होती है (tetrahedral geometry)।

ज्यामिति:

Cr³⁺ के संयुगों में octahedral geometry होती है।

CrO₄²⁻ में tetrahedral structure होता है।

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Q6. (b) क्रोमियम की +3 एवं +6 ऑक्सीकरण अवस्था को समझाइए।

Ans:

Cr³⁺ (+3 Oxidation State):

यह सबसे stable oxidation state है। इसमें d³ configuration होता है। ये संयुग रंगीन, paramagnetic होते हैं।

जैसे: [Cr(H₂O)₆]³⁺

Cr⁶⁺ (+6 Oxidation State):

यह एक strong oxidizing state है, जिसमें d⁰ configuration होता है।

CrO₄²⁻ (Chromate) और Cr₂O₇²⁻ (Dichromate) इसके common examples हैं।

ये compounds yellow to orange color के होते हैं और acidic medium में powerful oxidizers होते हैं।

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Q6. मैंगनीज की विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आर्थनिक स्थायित्व की व्याख्या कीजिए।

Ans:

मैंगनीज (Mn) की oxidation states +2 से लेकर +7 तक होती हैं।

+2 (Mn²⁺): सबसे stable और common state है।

+3 (Mn³⁺): less stable, acidic condition में पाया जाता है।

+4 (MnO₂): moderate oxidizing agent होता है।

+6 (MnO₄²⁻) और +7 (MnO₄⁻): strong oxidizers होते हैं, पर unstable हैं।

Stability sequence: +2 > +4 > +7 > +3 > +6

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Q7. मैंगनीज के विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के संयुगों की उप-सहसंयोजन संख्या तथा ज्यामिति का उदाहरण सहित विवरण दीजिए।

Ans:

Mn²⁺: Coordination number 6, octahedral geometry (e.g., [Mn(H₂O)₆]²⁺)

Mn³⁺: Coordination number 6, distorted octahedral due to Jahn-Teller distortion (e.g., [MnF₆]³⁻)

Mn⁴⁺: Mostly occurs as MnO₂ (polymeric structure)

Mn⁶⁺: Tetrahedral geometry in MnO₄²⁻

Mn⁷⁺: MnO₄⁻ (Permanganate ion), tetrahedral geometry, purple color

हर oxidation state के साथ geometry और bonding nature भी change होता है।

Q8. आयरन की महत्वपूर्ण ऑक्सीकरण अवस्थाओं का वर्णन कीजिए।

Ans:

आयरन (Fe) मुख्य रूप से दो ऑक्सीकरण अवस्थाओं में पाया जाता है — +2 और +3:

Fe²⁺ (Ferrous):

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁶

o यह स्थिति moderately stable होती है, especially in acidic solution.

o Common compounds: FeSO₄, FeCl₂

o Color: Pale green

o Paramagnetic nature (4 unpaired electrons)

Fe³⁺ (Ferric):

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁵

o More stable than Fe²⁺ due to half-filled d-subshell (extra stability)

o Common compounds: FeCl₃, Fe(NO₃)₃

o Color: Yellowish brown

o Stronger oxidizing agent than Fe²⁺

Fe²⁺ and Fe³⁺ दोनों ही पानी में soluble होते हैं, पर Fe³⁺ ज्यादा reactive होता है।

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Q9. (a) Fe²⁺ अस्थायी है, जबकि Fe³⁺ स्थायी।

Ans:

Fe²⁺ के पास 3d⁶ configuration होता है, जबकि Fe³⁺ में 3d⁵ होता है, जो कि half-filled और अधिक stable होता है।

इसके कारण Fe²⁺ हवा में धीरे-धीरे oxidize होकर Fe³⁺ में बदल जाता है।

Fe²⁺ → Fe³⁺ + e⁻ (Oxidation)

इसलिए Fe²⁺ को oxidizing environment से बचाकर रखना पड़ता है।

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Q9. (b) Fe(CO)₅ की उप-सहसंयोजन संख्या क्या होगी?

Ans:

Fe(CO)₅ एक neutral complex है जिसमें 5 carbonyl (CO) ligands होते हैं।

CO एक monodentate ligand होता है और हर ligand एक Fe atom से एक coordinate bond बनाता है।

इसलिए, Fe(CO)₅ की coordination number = 5

Geometry: Trigonal bipyramidal

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Q10. कोबाल्ट के विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के आर्थनिक स्थायित्व की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Cobalt (Co) मुख्यतः +2 और +3 oxidation states में पाया जाता है:

Co²⁺ (Cobaltous):

o More stable in aqueous medium

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁷

o Forms pink colored solutions (e.g., [Co(H₂O)₆]²⁺)

Co³⁺ (Cobaltic):

o Strong oxidizing agent

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁶

o Stabilized by ligands like NH₃, CN⁻ (e.g., [Co(NH₃)₆]³⁺)

o Thermodynamically less stable, but kinetically inert

Thermodynamic stability: Co²⁺ > Co³⁺

Kinetic stability: Co³⁺ > Co²⁺

Q11. निकल (Ni) संयुगों के ऑक्सीकरण अवस्था, उप-सहसंयोजन संख्या तथा ज्यामिति को स्पष्ट कीजिए।

Ans:

निकल के मुख्यतः दो ऑक्सीकरण अवस्थाएं होती हैं: +2 और +3, परंतु +2 सबसे common है।

Ni²⁺ (Most common):

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁸

o Forms compounds like NiCl₂, [Ni(H₂O)₆]²⁺

o Coordination number: 4 या 6

o Geometry:

For CN = 6 → Octahedral (e.g., [Ni(H₂O)₆]²⁺)

For CN = 4 → Tetrahedral or Square planar (e.g., [NiCl₄]²⁻ = tetrahedral, [Ni(CN)₄]²⁻ = square planar)

Ni³⁺ (Rare):

o Strong oxidizing agent

o Seen in complex salts

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Q12. कॉपर के विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के संयुगों की उप-सहसंयोजन संख्या तथा ज्यामिति को स्पष्ट कीजिए।

Ans:

Copper मुख्यतः दो ऑक्सीकरण अवस्थाओं में होता है — +1 (Cu⁺) और +2 (Cu²⁺)

Cu⁺ (Cuprous):

o Electronic configuration: [Ar] 3d¹⁰

o Unstable in aqueous solution (gets oxidized to Cu²⁺)

o Coordination number: 2 or 4

o Geometry:

CN = 2 → Linear

CN = 4 → Tetrahedral

Cu²⁺ (Cupric):

o Electronic configuration: [Ar] 3d⁹

o More stable than Cu⁺

o Forms blue colored aqueous solutions

o Coordination number: Usually 6

o Geometry: Octahedral (with distortion due to Jahn-Teller effect)

Example: [Cu(H₂O)₆]²⁺

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Q13. जिंक संयुगों की उप-सहसंयोजन संख्या तथा ज्यामिति की व्याख्या कीजिए।

Ans:

जिंक (Zn) की केवल एक ऑक्सीकरण अवस्था होती है — +2 (Zn²⁺)

Electronic configuration of Zn²⁺: [Ar] 3d¹⁰

Coordination number:

o Usually 4 or 6

Geometry:

o CN = 4 → Tetrahedral (e.g., [ZnCl₄]²⁻)

o CN = 6 → Octahedral (e.g., [Zn(H₂O)₆]²⁺)

Zn²⁺ complexes are colorless, because there are no unpaired d-electrons → no d-d transitions.

Q14. निम्नलिखित आयनों में अनुमानित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात कीजिए –

(i) Mn²⁺, (ii) Fe³⁺, (iii) Cr³⁺, (iv) V²⁺, V⁴⁺, (v) Co²⁺, (vi) Zn²⁺

Ans:

आयन Atomic Number इलेक्ट्रॉन हटे इलेक्ट्रॉनों की कुल संख्या

Mn²⁺ 25 2 25 - 2 = 23

Fe³⁺ 26 3 26 - 3 = 23

Cr³⁺ 24 3 24 - 3 = 21

V²⁺ 23 2 23 - 2 = 21

V⁴⁺ 23 4 23 - 4 = 19

Co²⁺ 27 2 27 - 2 = 25

Zn²⁺ 30 2 30 - 2 = 28

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Q14 (अ). 3d⁴ इलेक्ट्रॉनिक विन्यास वाले आयन के लिए चुंबकीय आघूर्ण (μₑ) का गणना कीजिए।

Ans:

3d⁴ configuration में = 4 unpaired electrons

Magnetic moment (μ) = √[n(n + 2)]

= √[4(4 + 2)] = √24 = 4.90 B.M. (approx)

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Q14 (क). हिस्टिडीन–Ti⁴⁺ आयन अनुयोजक बंध बनाता है। क्यों?

Ans:

Histidine में lone pair होता है (N या O पर), और Ti⁴⁺ एक Lewis acid है जो lone pair को accept कर सकता है। इसलिए दोनों में coordinate (अनुयोजक) bond बनता है।

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Q14 (ख). निम्नलिखित संक्रमण तत्वों के आयनों के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए — Ni²⁺

Ans:

Ni: Atomic number = 28

Ni²⁺ = 28 - 2 = 26 electrons

Electronic configuration of Ni²⁺ = [Ar] 3d⁸

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Q15. (Q नहीं लिखा था, लेकिन Q14 से ही जुड़ा है, इसलिए इसे Q15 मानते हैं)

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Q16. निम्नलिखित के उत्तर दीजिए:

(i) पोटैशियम फेरोसाइनाइड का सूत्र क्या है?

Ans: K₄[Fe(CN)₆]

(ii) उस यौगिक का नाम लिखिए जिसमें मैंगनीज की +7 ऑक्सीकरण अवस्था है।

Ans: Potassium permanganate (KMnO₄)

(iii) Zn का चुंबकीय आघूर्ण शून्य है।

Ans: Zn²⁺ में सभी d-orbitals full होते हैं (3d¹⁰), कोई भी unpaired electron नहीं होता → इसलिए magnetic moment = 0

(iv) V³⁺ आयन का spin magnetic moment की गणना कीजिए।

V³⁺ → 3d² → 2 unpaired electrons

μ = √[2(2 + 2)] = √8 ≈ 2.83 B.M.

(v) निम्नलिखित परमाणुओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास दीजिए —

(a) Mn (Z = 25) = [Ar] 4s² 3d⁵

(b) Mo (Z = 42) = [Kr] 5s¹ 4d⁵

(vi) Mn²⁺ का चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।

Mn²⁺ = 3d⁵ → 5 unpaired electrons

μ = √[5(5 + 2)] = √35 ≈ 5.92 B.M.

(vii) Fe³⁺ आयन का आर्बिटल चुंबकीय आघूर्ण की गणना कीजिए।

Fe³⁺ = 3d⁵ → 5 unpaired electrons

अगर सिर्फ spin-only moment लिया जाए:

μ = √[5(5 + 2)] = √35 ≈ 5.92 B.M.

Orbital contribution negligible in Fe³⁺ due to quenching in octahedral field.

Q17. प्रथम संक्रमण श्रेणी के तत्वों के नाम, संख्याएं तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

Ans:

Pratham (First) transition series में Sc (21) से Zn (30) तक के तत्व आते हैं। ये 3d-series कहलाते हैं।

इनके नाम, परमाणु संख्या और electronic configuration नीचे दिए गए हैं:

तत्व परमाणु संख्या इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

Sc 21 [Ar] 4s² 3d¹

Ti 22 [Ar] 4s² 3d²

V 23 [Ar] 4s² 3d³

Cr 24 [Ar] 4s¹ 3d⁵

Mn 25 [Ar] 4s² 3d⁵

Fe 26 [Ar] 4s² 3d⁶

Co 27 [Ar] 4s² 3d⁷

Ni 28 [Ar] 4s² 3d⁸

Cu 29 [Ar] 4s¹ 3d¹⁰

Zn 30 [Ar] 4s² 3d¹⁰

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Q18. द्वितीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों के नाम एवं उनके संख्याओं का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

Ans:

Second transition series = 4d-series (Y से Cd तक)

तत्व Atomic No. Electronic Configuration

Y 39 [Kr] 5s² 4d¹

Zr 40 [Kr] 5s² 4d²

Nb 41 [Kr] 5s¹ 4d⁴

Mo 42 [Kr] 5s¹ 4d⁵

Tc 43 [Kr] 5s² 4d⁵

Ru 44 [Kr] 5s¹ 4d⁷

Rh 45 [Kr] 5s¹ 4d⁸

Pd 46 [Kr] 4d¹⁰

Ag 47 [Kr] 5s¹ 4d¹⁰

Cd 48 [Kr] 5s² 4d¹⁰

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Q19. द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों की तुलना करें – रासायनिक एवं भौतिक गुणों के अनुसार।

Ans:

गुण द्वितीय संक्रमण श्रेणी (4d) तृतीय संक्रमण श्रेणी (5d)

Atomic और ionic size थोड़ा बड़ा लैन्थेनाइड संकुचन के कारण लगभग समान

घनत्व (Density) कम अधिक

बंध शक्ति (Bond strength) कम अधिक, मजबूत धात्विक बंध

ऑक्सीकरण अवस्था सीमित अधिक विविध

संयोजक यौगिक अपेक्षाकृत कम स्थायी अधिक स्थायी

Complex formation Moderate ज्यादा (due to higher charge and larger size)

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Q20. (क) निम्नलिखित गुणों के आधार पर द्वितीय श्रेणी के संक्रमण तत्वों की प्रथम श्रेणी के संक्रमण तत्वों के साथ तुलना कीजिए—

(i) ऑक्सीकरण अवस्था (Oxidation State):

→ 2nd transition series में उच्च oxidation states अधिक स्थिर होती हैं (जैसे Mo(VI), Ru(VIII))

→ 1st series में lower oxidation states अधिक स्थिर होती हैं (जैसे Fe²⁺, Cr³⁺)

(ii) उत्तरधात्विक गुण (Non-metallic character):

→ 1st series के तत्व अधिक metallic होते हैं

→ 2nd series में कुछ तत्वों में अधिक covalent character दिखता है

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(ख) Ti, Zr एवं Hf की निम्नलिखित बिंदुओं पर तुलना कीजिए—

(i) ऑक्सीकरण अवस्था:

तीनों के लिए सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था +4 होती है, लेकिन Ti +3 भी दिखाता है।

(ii) आयनिक त्रिज्या (Ionic radius):

Zr और Hf की ionic radius लगभग समान होती है (due to lanthanide contraction), जबकि Ti की radius थोड़ी कम होती है।

(iii) त्रिविमीय रसायन (Coordination chemistry):

→ Ti के complexes सामान्यतः छोटे होते हैं।

→ Zr और Hf ज्यादा coordination number (7 या 8) वाले stable complex बनाते हैं।

Q21. ट्रांजिशन मेटल्स के रंगीन यौगिकों के कारणों की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Transition elements ke compounds rangin (colored) होते हैं क्योंकि:

इनके पास partially filled d-orbitals होते हैं।

जब ये complex बनाते हैं, तो d-orbitals की energy split हो जाती है → इसे crystal field splitting कहते हैं।

जब light पड़ती है, तो electron lower energy d-orbital से higher energy d-orbital में jump करता है → इस दौरान energy absorb होती है और जो बची हुई light reflect होती है, वही रंग के रूप में हमें दिखती है।

Example:

Cu²⁺ (blue), Fe³⁺ (yellow-brown), Cr³⁺ (green) – ये सब अलग-अलग रंग दिखाते हैं।

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Q22. ट्रांजिशन तत्वों के जटिल यौगिक (complex compounds) बनाने की प्रवृत्ति की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Transition elements complex compounds आसानी से बनाते हैं क्योंकि:

1. Small size और high positive charge होती है → जिससे ligands आसानी से जुड़ सकते हैं।

2. इनमें vacant d-orbitals होते हैं → जो ligand के electron को accept कर सकते हैं।

3. High polarizing power होने के कारण ये अच्छे Lewis acids होते हैं।

Example:

[Fe(CN)₆]³⁻, [Cu(NH₃)₄]²⁺, [Co(NH₃)₆]³⁺ आदि।

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Q23. ट्रांजिशन तत्वों की उत्प्रेरक (Catalytic) गुणों की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Transition metals अच्छे catalyst होते हैं क्योंकि:

1. Variable oxidation states के कारण ये reactants के साथ reversible complex बना सकते हैं।

2. इनकी surface पर reactants adsorb होकर reaction को तेज़ करते हैं।

3. d-orbitals की presence से electron का transfer आसान हो जाता है।

Examples:

Fe – Haber process में (N₂ + 3H₂ → NH₃)

V₂O₅ – Contact process में (SO₂ → SO₃)

Ni – Hydrogenation reactions में

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Q24. ट्रांजिशन तत्वों की चुम्बकीय गुणों की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Transition metals magnetic होते हैं क्योंकि:

इनके पास unpaired electrons होते हैं।

Electron के spin से magnetic moment generate होता है।

Magnetic moment का अनुमान formula से लगाया जाता है:

μ=n(n+2) B.M.\mu = \sqrt{n(n + 2)} \text{ B.M.}μ=n(n+2) B.M. 

जहाँ n = unpaired electrons की संख्या

Types:

अगर सारे electrons paired हों → Diamagnetic

अगर unpaired electrons हों → Paramagnetic

Example:

Zn²⁺ – diamagnetic (no unpaired electrons)

Fe²⁺ – paramagnetic (4 unpaired electrons)

Q25. Mn के विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं की द्वितीय तथा तृतीय संक्रमण श्रेणी के समकक्ष तत्वों की अवस्थाओं से तुलना कीजिए।

Ans:

Manganese (Mn) में +2 से +7 तक की oxidation states मिलती हैं:

Element Common Oxidation States

Mn (3d) +2, +3, +4, +6, +7

Tc (4d) +4, +5, +7

Re (5d) +4, +6, +7

तुलना:

Mn, Tc और Re सभी group 7 के हैं और d-block के homologues हैं।

जैसे-जैसे series बढ़ती है (3d → 4d → 5d), higher oxidation states अधिक स्थायी हो जाती हैं।

Re का +7 state ज्यादा stable होता है (जैसे Re₂O₇), जबकि Mn में +2 सबसे stable है।

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Q26.

(अ) वैनाडियम, नियोबियम तथा टैंटेलम की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की तुलना कीजिए।

Ans:

तत्व ऑक्सीकरण अवस्थाएं

V (3d) +2, +3, +4, +5

Nb (4d) +3, +5

Ta (5d) +3, +5

जैसे-जैसे हम नीचे जाते हैं (V → Nb → Ta), higher oxidation state (+5) ज्यादा स्थायी हो जाती है।

V में lower oxidation states (जैसे +3, +4) ज्यादा stable हैं।

Ta में +5 state सबसे ज्यादा स्थायी है, कारण: d-orbital diffusion और inert pair effect।

(ब) (i) V³⁺ आयन के लिए सम्भावित ‘J’ के मानों की गणना कीजिए।

Ans:

V³⁺ में electronic configuration होता है: [Ar] 3d²

Total spin quantum number (S) = 1

Orbital angular momentum (L) = 3 (d²)

अब, J = L + S से लेकर |L – S| तक possible values होती हैं

⇒ J = 4, 3, 2

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(ii) उच्च अवस्था में Mn²⁺ के लिए J के मान की गणना कीजिए।

Ans:

Mn²⁺ → [Ar] 3d⁵

S = 5 × ½ = 2.5

L = 0 (Half-filled d-orbitals का resultant L = 0 होता है)

⇒ J = L + S = 2.5

⇒ J = 2.5

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Q27. Cr, Mo तथा W की ऑक्सीकरण अवस्थाओं की तुलनात्मक व्याख्या कीजिए।

Ans:

Element Common Oxidation States

Cr (3d) +2, +3, +6

Mo (4d) +4, +5, +6

W (5d) +4, +5, +6

Cr में +3 state सबसे स्थायी है।

Mo और W में higher oxidation states (+6) ज्यादा स्थायी होती हैं।

W में +6 oxidation state बहुत ही stable है – जैसे WO₃।

कारण:

d-orbital फैलाव (diffused) अधिक होता है heavy elements में → electron delocalization आसान होता है → high oxidation states stabilise होती हैं।

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Q28. Mn, Tc तथा Re की विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं के स्थायित्व की तुलना कीजिए।

Ans:

तत्व Oxidation States सबसे स्थायी

Mn +2, +4, +7 +2

Tc +4, +5, +7 +7

Re +4, +6, +7 +7

Mn का +2 oxidation state सबसे stable होता है – क्योंकि 3d⁵ (half-filled stable configuration)।

Tc और Re का +7 ज्यादा stable है – जैसे TcO₄⁻ और ReO₄⁻।

Trend:

Period बढ़ने पर higher oxidation states ज्यादा stable होती हैं।

Q29. आयरन, रूथेनियम तथा ऑस्मियम की विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाओं की व्याख्या कीजिए।

Ans:

Element Oxidation States Common Stable State

Fe (3d) +2, +3, +6 +2, +3

Ru (4d) +2, +3, +4, +6, +8 +3, +4, +6

Os (5d) +2 to +8 +4, +6, +8

Fe में +2 (Fe²⁺) और +3 (Fe³⁺) ज्यादा common होते हैं।

Ru और Os में high oxidation states (जैसे +6, +8) ज्यादा stable होती हैं – OsO₄ एक प्रसिद्ध +8 oxidation state वाला compound है।

Higher d-series में d-orbital का फैलाव ज्यादा होता है → high valency stable होती है।

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Q30. द्वितीय एवं तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों के चुंबकीय व्यवहार को स्पष्ट कीजिए। इनके चुंबकीय गुण 3d-तत्वों से किस प्रकार भिन्नता प्रदर्शित करते हैं?

Ans:

4d और 5d तत्वों में चुंबकीय गुण कम होते हैं क्योंकि इनके electrons pair हो जाते हैं – d-orbitals बड़े और फैलाव वाले होते हैं।

दूसरी ओर, 3d में electrons unpaired रहते हैं → paramagnetism ज्यादा होता है।

Difference:

3d → Strong paramagnetism (Fe, Co, Ni)

4d & 5d → कम paramagnetism या diamagnetism

5d elements में spin-orbit coupling ज्यादा होता है।

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Q31. द्वितीय एवं तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्वों के तत्व अधिक पाए जाते हैं, समझाइए।

Ans:

4d और 5d transition metals, जैसे Ru, Rh, Pd, Os, Ir, Pt आदि, प्राकृतिक रूप से अधिक stable compounds बनाते हैं।

उनके यौगिक thermal और chemical रूप से अधिक स्थायी होते हैं।

5d elements में high density और inert pair effect के कारण वे noble metals जैसे behave करते हैं → इसलिए naturally ज्यादा मिलते हैं।

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Q32. रंगीन यौगिक, स्थायित्व और 5d-तत्वों की यौगिक अधिक स्थायी क्यों होती हैं? कारण लिखिए, समझाइए।

Ans:

5d-elements के complex रंगीन होते हैं क्योंकि इनमें d-d transition और ligand field splitting energy (Δ₀) ज्यादा होता है।

5d-orbitals ज्यादा फैलाव वाले होते हैं → better overlap with ligands → strong bonding → compound ज्यादा stable।

उनके complexes inert भी होते हैं → hydrolysis या redox reactions कम करते हैं।

Example:

PtCl₆²⁻ और AuCl₄⁻ जैसे complexes बहुत ही stable और रंगीन होते हैं।

Q33. उत्तर दीजिए –

(i) Zn, Cd एवं Hg के लवण उजले होते हैं।

Ans: ये तीनों धातुएं पूरी तरह से भरे हुए d-orbitals रखते हैं (d¹⁰ configuration)।

→ इनके यौगिकों में d-d electronic transitions नहीं हो पाते → कोई रंग नहीं absorb होता → लवण उजले (white) होते हैं।

(ii) Hg का प्रथम आयनीकरण ऊर्जा का मान Cd से अधिक होता है।

Ans: Hg में relativistic effect और electron-nucleus attraction अधिक होता है → electrons nucleus के करीब खिंचते हैं।

→ इसलिए Hg का पहला electron निकालना कठिन होता है → first ionization energy ज्यादा।

(iii) द्वितीय एवं तृतीय संक्रमण श्रेणी के तत्व उत्तरोत्तर गुण दिखाते हैं।

Ans: ये elements higher d-orbitals (4d, 5d) में electrons भरते हैं → orbital size और shielding बढ़ती है।

→ इसलिए इनमें gradual variation नहीं होता बल्कि कई properties repeat होती हैं → lanthanide contraction के कारण भी।

(iv) धातु बंध अधिक मजबूत क्यों बनते हैं?

Ans: Transition elements में अधिक संख्या में unpaired d-electrons होते हैं → overlapping ज्यादा → delocalized electrons →

metallic bonding मजबूत बनता है → high melting point & strength।

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Q34. कुर्पनीयम (Curium) का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

Ans:

Curium का atomic number = 96

Electronic configuration:

[Rn] 5f⁷ 6d¹ 7s²

→ यह एक actinide element है और इसमें 5f-orbitals भरते हैं।

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Q35. अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्था प्रदर्शित करने वाले संक्रमण तत्व का नाम व संकेत लिखिए।

Ans:

Element: Osmium (Os) और Ruthenium (Ru)

Oxidation State: +8

Example: OsO₄ (Osmium tetroxide)

→ Os इसमें +8 oxidation state में होता है, जो कि transition metals में highest है।

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Q36. नटरेल अभिक्रियक (Natrell Reagent) क्या है? उसकी उपयोगिता को लिखिए।

Ans:

Natrell Reagent एक analytical reagent है जो विशेष रूप से nitrate ions को detect करने के लिए प्रयोग होता है।

इसमें मुख्य रूप से diphenylamine होता है जो acidic medium में nitrate की मौजूदगी में blue-violet रंग देता है।

Use:

→ Qualitative analysis में nitrate ion की पहचान करने के लिए।

→ Water testing labs में भी इसका उपयोग होता है।

Q37. मर्क्यूरस आयन को Hg⁺¹ न लिखकर Hg₂²⁺ क्यों लिखा जाता है?

उत्तर:

मर्क्यूरस आयन वास्तव में दो Hg⁺ आयनों से मिलकर बना होता है जो आपस में एक Hg–Hg मेटलिक बॉन्ड से जुड़े होते हैं।

इसलिए इसे Hg₂²⁺ के रूप में लिखा जाता है, न कि सिर्फ Hg⁺¹।

→ इसका कारण यह है कि isolated Hg⁺ आयन अस्थिर होता है, लेकिन Hg₂²⁺ dimeric form में स्थिर रहता है।

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Q38. विल्किंसन उत्प्रेरक (Wilkinson’s Catalyst) क्या है? उसका सूत्र लिखिए।

उत्तर:

Wilkinson Catalyst एक homogeneous catalyst है जिसका प्रयोग alkene के hydrogenation में होता है।

इसका रासायनिक सूत्र है:

[RhCl(PPh₃)₃]

→ यहाँ PPh₃ = Triphenylphosphine

Use:

→ इसे low temperature और pressure पर hydrogenation reactions में use किया जाता है।

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Q39. सैबी-विब नियम (Säbye-Wiberg Rule) को समझाइए।

उत्तर:

यह नियम बताता है कि transition elements के d-orbitals की occupancy के आधार पर उनके complexes के रंग, चुंबकीय गुण और स्टैबिलिटी कैसे होंगे।

Rule यह कहता है:

→ यदि d-orbital में exactly half-filled (d⁵) या completely filled (d¹⁰) स्थिति हो, तो वह अधिक स्थायी होता है।

Example:

d⁵: Mn²⁺ (Stable due to half-filled)

d¹⁰: Zn²⁺ (Stable due to fully-filled)

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Q40. L–S युग्मन क्या है? समझाइए।

उत्तर:

L–S युग्मन को Russell–Saunders coupling भी कहते हैं।

इसमें दो प्रकार के angular momentum जोड़े जाते हैं:

o L = orbital angular momentum

o S = spin angular momentum

→ दोनों के युग्मन से total angular momentum (J) प्राप्त होता है।

यह Quantum mechanical concept है जो atoms के spectral properties और magnetic behavior को explain करता है।

→ यह मुख्यतः light atoms के लिए उपयुक्त होता है।

Q41. उच्च ऑक्सीकरण अवस्था दर्शाने वाले संयुगों का निर्माण कठिन क्यों होता है?

उत्तर:

जब कोई धातु उच्च ऑक्सीकरण अवस्था में होती है, तो उसमें electrons कम होते हैं, जिससे वह highly oxidized और कम स्थायी बन जाती है।

ऐसे संयुग आसानी से reduction की ओर प्रवृत्त होते हैं और जल्दी ही lower oxidation state में आ जाते हैं।

उदाहरण:

Mn⁷⁺ (Permanganate) बहुत powerful oxidizing agent होता है और जल्दी reduced हो जाता है।

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Q42. क्या संभव है कि MnO₄⁻ में Mn⁷⁺ अवस्था में होते हुए भी एक भी अनुयोजक इलेक्ट्रॉन न हो? स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

हाँ, संभव है। MnO₄⁻ में Mn की ऑक्सीकरण अवस्था +7 होती है, यानी उसके d-orbital में कोई भी d-electron नहीं होता।

इसका मतलब है कि Mn⁷⁺ में कोई unpaired d-electron नहीं है, इसलिए कोई अनुयोजक (bonding) electron नहीं होता।

→ फिर भी यह संयुग अत्यधिक oxidizing nature का होता है।

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Q43. Mn⁷⁺ में तीन पर्पल रंग के यौगिक होते हैं। ऐसा क्यों होता है?

उत्तर:

Mn⁷⁺ के पर्पल रंग के यौगिकों में जैसे कि KMnO₄, रंग का कारण होता है:

→ Charge Transfer Transitions

इनमें Mn और O के बीच electronic transfer से visible range में absorbance होता है, जिससे purple color दिखता है।

ये transitions d–d न होकर ligand to metal charge transfer होते हैं।

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Q44. कॉपर की प्रथम आयनीकरण ऊर्जा, क्षारीय तत्वों से अधिक होती है, जबकि द्वितीय व तृतीय आयनीकरण ऊर्जा कम होती है, क्यों?

उत्तर:

पहली आयनीकरण ऊर्जा (IE₁):

→ Cu में [Ar] 3d¹⁰ 4s¹ विन्यास होता है। 4s इलेक्ट्रॉन को हटाने में ज्यादा energy लगती है क्योंकि 3d शेल भर चुका है।

→ इसलिए IE₁ ज्यादा होती है।

दूसरी और तीसरी आयनीकरण ऊर्जा (IE₂ और IE₃):

→ Cu⁺ में इलेक्ट्रॉन हटाने पर हम stable d⁹ या d⁸ स्थिति में पहुँचते हैं।

→ इस वजह से IE₂ और IE₃ अपेक्षाकृत कम होती हैं क्योंकि system फिर भी थोड़ा स्थिर बना रहता है।

Q45. 3d, 4d तथा 5d संक्रमण तत्वों की तुलना उनके निम्नलिखित गुणों के आधार पर कीजिए—

(1) इलेक्ट्रॉनिक विन्यास, (2) ऑक्सीकरण संख्या, (3) चुंबकीय गुण, (4) आयनिक त्रिज्या, (5) स्पेक्ट्रोस्कोपीक गुण

उत्तर:

गुण 3d श्रेणी 4d श्रेणी 5d श्रेणी

1. इलेक्ट्रॉनिक विन्यास 3d orbital में भराव 4d orbital में भराव 5d orbital में भराव

2. ऑक्सीकरण संख्या कम ऑक्सीकरण अवस्थाएं अधिक और स्थिर अवस्थाएं अधिकतम ऑक्सीकरण अवस्थाएं दिखाते हैं

3. चुंबकीय गुण अधिक चुंबकीय (unpaired electrons अधिक) कम चुंबकीय बहुत कम चुंबकीय

4. आयनिक त्रिज्या सबसे छोटी बड़ी सबसे बड़ी, पर lanthanide contraction के कारण 4d से बहुत अधिक नहीं

5. स्पेक्ट्रोस्कोपीक गुण d–d transition से रंगीन यौगिक अधिक स्थिर रंग सबसे स्थिर रंग और complex spectrum

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Q46. [Ti(H₂O)₆]³⁺ आयन में d-d इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

[Ti(H₂O)₆]³⁺ एक octahedral complex है जिसमें Ti³⁺ का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास है 3d¹।

इसमें d-orbitals का crystal field splitting होता है – दो भागों में: t₂g और eₙ।

एक d-electron t₂g में रहता है और जब light absorb करता है, तो वह eₙ orbital में promote हो जाता है।

→ यही d–d transition responsible होता है इसके purple रंग के लिए।

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Q47. संक्रमण तत्वों की त्रिज्याएं दाएं ओर जाने पर क्यों घटती हैं? कारण स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

जैसे-जैसे हम पीरियॉड में बाएँ से दाएँ बढ़ते हैं, परमाणु संख्या बढ़ती है और nuclear charge भी बढ़ता है।

साथ ही electrons d-orbitals में जुड़ते हैं, जो shielding बहुत कम करते हैं।

इस वजह से nucleus का pull electrons पर बढ़ जाता है और atomic/ionic size घटता है।

→ इसे ही कहा जाता है: effective nuclear charge का प्रभाव।

Q48. Cu, Ag एवं Au के चुंबकीय व्यवहार की तुलना कीजिए।

उत्तर:

Cu (Copper), Ag (Silver) और Au (Gold) सभी के पास पूर्ण भरी हुई d-orbitals होती हैं (d¹⁰ configuration)।

तीनों तत्व diamagnetic होते हैं क्योंकि इनके पास कोई unpaired electron नहीं होता।

लेकिन,

o Cu²⁺ में unpaired electrons होते हैं, इसलिए यह paramagnetic होता है।

o Ag⁺ और Au⁺ में भी सभी electrons paired होते हैं, इसलिए ये diamagnetic होते हैं।

→ इनका चुंबकीय व्यवहार उनके ऑक्सीकरण अवस्था पर निर्भर करता है।

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**Q49. Fe, Ru तथा Os के विभिन्न आयनिक त्रिज्याओं के मान बताइए।

Ru तथा Os की त्रिज्याओं पर लैन्थेनाइड संकुचन का प्रभाव भी स्पष्ट कीजिए।**

उत्तर:

Fe (Z = 26), Ru (Z = 44), Os (Z = 76) — ये सभी एक ही समूह में आते हैं।

इनकी आयनिक त्रिज्याएं इस क्रम में घटती हैं:

Fe²⁺ > Ru²⁺ ≈ Os²⁺

Lanthanide contraction की वजह से 5d तत्वों (जैसे Os) का आकार उतना बड़ा नहीं होता जितना होना चाहिए था।

इसलिए, Ru (4d) और Os (5d) की ionic radius लगभग बराबर होती है, जबकि Fe (3d) का आकार अधिक होता है।

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Q50. द्वितीय संक्रमण श्रेणी (4d) के तत्वों की उत्तरधात्विक गुण एवं जटिल यौगिकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

द्वितीय संक्रमण श्रेणी में Y से लेकर Cd तक के तत्व आते हैं।

इनमें उत्तरधात्विक गुण अधिक होते हैं, जैसे:

o उच्च गलनांक

o अच्छी विद्युत चालकता

o कठोरता

ये तत्व अधिक जटिल यौगिक बनाते हैं, जो thermally और chemically स्थिर होते हैं।

इनका coordination number भी अधिक होता है (जैसे 6, 7, 8 तक)।

→ 4d series के complex compounds में रंग, चुंबकीय गुण और उच्च स्थायित्व देखने को मिलता है।



---------------------------------------------इकाई 2-------------------------------------------

(total 39 question)


प्रश्न 1: लैन्थेनाइड तत्वों के नाम, रासायनिक संकेत एवं इलेक्ट्रॉनिक संरचना को सही क्रम में लिखिए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड तत्वों में 14 तत्व होते हैं, जो La (Z=57) के बाद आते हैं और 4f-orbitals को भरते हैं। इनके नाम, संकेत और electronic configuration निम्नलिखित हैं:

क्रमांक नाम संकेत इलेक्ट्रॉनिक संरचना (संक्षिप्त रूप)

58 Cerium Ce [Xe] 4f¹ 5d¹ 6s²

59 Praseodymium Pr [Xe] 4f³ 6s²

60 Neodymium Nd [Xe] 4f⁴ 6s²

61 Promethium Pm [Xe] 4f⁵ 6s²

62 Samarium Sm [Xe] 4f⁶ 6s²

63 Europium Eu [Xe] 4f⁷ 6s²

64 Gadolinium Gd [Xe] 4f⁷ 5d¹ 6s²

65 Terbium Tb [Xe] 4f⁹ 6s²

66 Dysprosium Dy [Xe] 4f¹⁰ 6s²

67 Holmium Ho [Xe] 4f¹¹ 6s²

68 Erbium Er [Xe] 4f¹² 6s²

69 Thulium Tm [Xe] 4f¹³ 6s²

70 Ytterbium Yb [Xe] 4f¹⁴ 6s²

71 Lutetium Lu [Xe] 4f¹⁴ 5d¹ 6s²

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प्रश्न 2: लैन्थेनाइड तथा ऐक्टिनाइड तत्वों की इलेक्ट्रॉनिक संरचनाओं में अंतर समझाइए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स में 4f-orbitals भरते हैं, जबकि ऐक्टिनाइड्स में 5f-orbitals का भराव होता है। मुख्य अंतर:

लैन्थेनाइड्स (Z=58–71): 4f orbital में इलेक्ट्रॉनों का भराव, सभी तत्व अपेक्षाकृत स्थिर।

ऐक्टिनाइड्स (Z=90–103): 5f orbital में इलेक्ट्रॉनों का भराव, अधिक रेडियोधर्मी व ऑक्सीकरण अवस्थाएँ अधिक।

इसलिए, ऐक्टिनाइड्स की रासायनिक क्रियाएँ और संकुल जटिल होते हैं।

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प्रश्न 3: लैन्थेनाइड की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ उनकी इलेक्ट्रॉनिक संरचना से किस तरह संबंधित हैं?

उत्तर:

लैन्थेनाइड तत्वों की सामान्य ऑक्सीकरण अवस्था +3 होती है, क्योंकि 4f, 5d और 6s इलेक्ट्रॉनों में से तीन इलेक्ट्रॉन आसानी से हट जाते हैं। कभी-कभी +2 या +4 अवस्था भी देखी जाती है, जो विशेष electronic configuration के कारण होती है:

+2 अवस्था: जब f-orbital आधी या पूरी तरह भरी होती है (जैसे Eu²⁺, Yb²⁺)।

+4 अवस्था: जब इलेक्ट्रॉन निकालने से स्थिर electronic configuration मिलती है (जैसे Ce⁴⁺)।

इस प्रकार electronic configuration directly oxidation state को प्रभावित करता है।

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प्रश्न 4: लैन्थेनाइड श्रेणी में आयनिक त्रिज्या एवं आयनिक त्रिज्या की आवर्तिता को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड श्रेणी में जैसे-जैसे atomic number बढ़ता है, 4f-orbitals भरते हैं। 4f electrons poor shielding देते हैं जिससे effective nuclear charge बढ़ता है और परिणामस्वरूप आयनिक त्रिज्या धीरे-धीरे घटती है।

इसे लैन्थेनाइड संकुचन (Lanthanide Contraction) कहते हैं।

आवर्तिता:

लैन्थेनाइड्स में आयनिक त्रिज्या का नियमित रूप से घटता जाना periodic trend को दर्शाता है।

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प्रश्न 5: लैन्थेनाइड संकुचन क्या है? लैन्थेनाइड एवं अन्य तत्वों पर इसका प्रभाव समझाइए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड संकुचन वह घटना है जिसमें लैन्थेनाइड श्रेणी में atomic number बढ़ने पर आयनिक त्रिज्या धीरे-धीरे घटती है।

कारण: 4f इलेक्ट्रॉन poor shielding करते हैं → nucleus का आकर्षण बढ़ता है → आयन सिकुड़ते हैं।

प्रभाव:

1. d-block elements के बीच size समान हो जाता है (Zr ~ Hf)।

2. रासायनिक गुणों में समानता (due to similar ionic radius)।

3. संकुलों की स्थिरता और घुलनशीलता प्रभावित होती है।

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प्रश्न 6: लैन्थेनाइड्स द्वारा संकुल निर्माण पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड आयन (Ln³⁺) hard acid nature के होते हैं, इसलिए ये hard base ligands (जैसे H₂O, F⁻, EDTA) के साथ संकुल बनाते हैं। इनके संकुल:

High coordination number (8 या 9) दिखाते हैं।

अधिकतर संकुल जल में घुलनशील होते हैं।

संकुल की रचना स्थायित्व और ligand की प्रकृति पर निर्भर करती है।

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प्रश्न 7 (अ): लैन्थेनाइड्स से स्थायी संकुल नहीं बनने के कारण को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड आयनों की outer orbital (4f) अच्छी तरह ligand से overlap नहीं करती, जिससे strong covalent bonding नहीं बनती। अतः संकुल स्थायी नहीं होते।

(ब): पृथक लैन्थेनाइड तत्वों को प्राप्त करने की विधि बताइए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स के similar chemical properties के कारण उन्हें अलग करना कठिन होता है।

प्रमुख विधियाँ:

आयन-विनिमय विधि

विलायक निष्कर्षण

क्रोमैटोग्राफी

ऑक्सीकरण अवस्था में परिवर्तन द्वारा

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प्रश्न 8: मोनाजाइट खनिज से लैन्थेनाइड के निष्कर्षण का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

मोनाजाइट (Ce, La, Th)PO₄ एक प्रमुख लैन्थेनाइड अयस्क है।

निष्कर्षण प्रक्रिया:

1. खनिज को NaOH के साथ गर्म किया जाता है → rare earth hydroxides बनते हैं।

2. इन्हें HCl या H₂SO₄ में घोलने से LnCl₃ / Ln₂(SO₄)₃ प्राप्त होते हैं।

3. इन्हें अलग-अलग विधियों से पृथक किया जाता है।

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प्रश्न 9 (अ): लैन्थेनाइड के प्रमुख अयस्कों के नाम लिखिए एवं निष्कर्षण की किसी एक विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

प्रमुख अयस्क:

मोनाजाइट (Ce,La,Th)PO₄

बास्तनासाइट (Ce,La)CO₃F

सराइट (CeO₂)

निष्कर्षण विधि (बास्तनासाइट से):

1. अयस्क को HCl या HNO₃ में गर्म किया जाता है।

2. Insoluble भाग हटाया जाता है।

3. विलायक निष्कर्षण या आयन-विनिमय विधि से शुद्ध तत्व प्राप्त होते हैं।

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प्रश्न 10 (अ): लैन्थेनाइड्स के पृथक्करण कठिन क्यों हैं? पृथक्करण के लिए कौन-सी विधियाँ उपयोग में ली जाती हैं?

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स की समान ionic size और समान रासायनिक गुण होने के कारण उनका पृथक्करण कठिन होता है।

प्रमुख पृथक्करण विधियाँ:

आयन-विनिमय विधि

विलायक निष्कर्षण विधि

क्रोमैटोग्राफी

ऑक्सीकरण अवस्था परिवर्तन

(ब): क्यों Y, Ho तथा Dy एक-से गुणधर्म रखते हैं?

उत्तर:

Y³⁺, Ho³⁺ और Dy³⁺ की ionic radius लगभग समान होती है।

⇒ समान आकार होने से coordination और reactivity में समानता दिखाते हैं।

प्रश्न 11:

(अ) लैन्थेनाइड्स को दुर्लभ पृथ्वी तत्व तथा अंतः संक्रमण तत्व क्यों कहा जाता है?

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स को दुर्लभ पृथ्वी तत्व (Rare Earth Elements) कहा जाता है क्योंकि:

1. ये पृथ्वी पर कम मात्रा में मिलते हैं।

2. ये हमेशा अयस्कों में मिश्रित रूप में पाए जाते हैं, शुद्ध रूप में नहीं।

3. इनका पृथक्करण कठिन होता है।

इन्हें अंतः संक्रमण तत्व (Inner Transition Elements) इसलिए कहा जाता है क्योंकि इनमें 4f-orbitals भरते हैं जो कि d-block के अंदर छुपे रहते हैं।

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(ब) लैन्थेनाइड ऑक्साइड (M₂O₃) की घुलनशीलता परमाणु संख्या के बढ़ने से क्यों घटती है?

उत्तर:

जैसे-जैसे atomic number बढ़ता है, लैन्थेनाइड आयन की आयनिक त्रिज्या घटती है (लैन्थेनाइड संकुचन के कारण)।

इससे Ln³⁺ और O²⁻ के बीच ionic attraction बढ़ता है ⇒ lattice energy बढ़ती है ⇒ घुलनशीलता घटती है।

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(स) लैन्थेनाइड्स के पृथक्करण को प्रभावित करने वाली क्रिस्टलीकरण विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

क्रिस्टलीकरण विधि में लैन्थेनाइड लवणों को धीरे-धीरे ठंडा करके अलग-अलग घुलनशीलता के आधार पर क्रिस्टल बनाया जाता है।

जो लवण कम घुलनशील होता है वह पहले क्रिस्टलीकृत होता है।

इस process को कई बार दोहराकर अलग-अलग लैन्थेनाइड्स को प्राप्त किया जा सकता है।

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प्रश्न 12: ऑक्सीकरण अवस्था में परिवर्तन द्वारा लैन्थेनाइड्स का पृथक्करण कैसे किया जाता है?

उत्तर:

कुछ लैन्थेनाइड्स जैसे Ce और Eu विभिन्न oxidation states (+3 के अलावा) को exhibit करते हैं।

उदाहरण: Ce⁴⁺, Eu²⁺

इनका उपयोग करके selective precipitation या extraction किया जा सकता है, क्योंकि +2 और +4 oxidation states के compounds की properties +3 से अलग होती हैं।

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प्रश्न 13: लैन्थेनाइड्स के पृथक्करण की आयन-विनिमय विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

इस विधि में एक ion-exchange resin (कृत्रिम polymeric material) का उपयोग होता है।

Resin पर H⁺ या Na⁺ ions होते हैं।

जब Ln³⁺ solution पास किया जाता है, तो Ln³⁺ resin से bind हो जाता है और H⁺ बाहर आ जाते हैं।

बाद में eluent (जैसे EDTA) से धीरे-धीरे अलग-अलग Ln³⁺ ions बाहर निकाले जाते हैं।

→ यह विधि high purity separation के लिए बहुत उपयोगी है।

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प्रश्न 14: लैन्थेनाइड्स के पृथक्करण की विलायक-निष्कर्षण विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

इस विधि में लैन्थेनाइड्स को एक organic solvent (जैसे kerosene या TBP) में निकाला जाता है।

लैन्थेनाइड nitrates या chlorides form में होते हैं।

उनके solubility और distribution coefficient के अनुसार separation किया जाता है।

→ बार-बार extraction करके उन्हें अलग-अलग प्राप्त किया जाता है।

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प्रश्न 15: लैन्थेनाइड्स के पृथक्करण की क्रोमैटोग्राफी विधि को लिखिए।

उत्तर:

इस विधि में लैन्थेनाइड आयनों को किसी stationary phase (जैसे silica gel) पर adsorb किया जाता है।

Mobile phase (जैसे suitable eluent) द्वारा आयनों को धीरे-धीरे बहाया जाता है।

अलग-अलग लैन्थेनाइड्स की mobility अलग होती है।

→ इसी के आधार पर separation किया जाता है।

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प्रश्न 16:

(अ) क्यों 4f, 5d तत्वों की आयनिक त्रिज्या में अंतर 3d तथा 4d तत्वों से अधिक है?

उत्तर:

4f electrons के poor shielding के कारण effective nuclear charge बढ़ जाता है, जिससे 4f व 5d तत्वों में size में बड़ा अंतर आता है।

→ जबकि 3d और 4d में ऐसा strong contraction नहीं होता।

(ब) लैन्थेनाइड धातु कहाँ से प्राप्त की जाती है?

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स को मुख्यतः इन खनिजों से प्राप्त किया जाता है:

मोनाजाइट (Ce, La, Th)PO₄

बास्तनासाइट (Ce, La)CO₃F

इनसे विभिन्न रासायनिक विधियों द्वारा लैन्थेनाइड तत्वों को निकाला जाता है।

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प्रश्न 17: लैन्थेनाइड्स के +3 योगिकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

+3 oxidation state लैन्थेनाइड्स की सबसे स्थायी अवस्था होती है।

इनमें 4f-orbital में electron configuration स्थिर होती है।

उदाहरण:

o LaCl₃, Nd₂O₃, Eu(NO₃)₃

ये योगिक ionic होते हैं, अधिकतर रंगहीन और जल में घुलनशील होते हैं।

Coordination number अधिक होता है (8 या 9)।

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प्रश्न 18:

(अ) लैन्थेनाइड्स के +2 तथा +4 योगिकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

कुछ लैन्थेनाइड्स +2 या +4 अवस्था exhibit करते हैं।

+2: Eu²⁺, Yb²⁺ (complete/half-filled stability)

+4: Ce⁴⁺, Tb⁴⁺ (oxidation के कारण)

→ ये अवस्थाएँ कम स्थिर होती हैं पर specific conditions में बनती हैं।

(ब) मिक्स मेटल क्या है?

उत्तर:

मिक्स मेटल वो मिश्र धातुएँ होती हैं जिनमें एक से अधिक लैन्थेनाइड तत्व होते हैं।

→ ये rare earth alloys हैं, जैसे mischmetal (La, Ce, Nd, Pr mixture)।

(स) लैन्थेनाइड्स के फ्लुएराइड लवण का सूत्र लिखिए।

उत्तर:

सामान्य लैन्थेनाइड fluoride का सूत्र होता है: LnF₃

(द) Th⁴⁺ में अनुनाभिक इलेक्ट्रॉनों की संख्या लिखिए।

उत्तर:

Thorium (Z = 90)

→ Th⁴⁺ का electron configuration = [Rn]

⇒ केवल 90 – 4 = 86 electrons, जो पूरी तरह inner shell में होते हैं।

⇒ इसलिए Th⁴⁺ में 86 अनुनाभिक (core) इलेक्ट्रॉन होते हैं।

(इ) Zr–Hf, Nb–Ta तथा Mo–W में समानता का मुख्य कारण बताइए।

उत्तर:

इन pairs में एक तत्व d-block का होता है और दूसरा f-block के बाद आता है।

→ लैन्थेनाइड संकुचन के कारण इनके आयनिक आकार लगभग समान हो जाते हैं, इसलिए इनकी रासायनिक और भौतिक गुणधर्म भी मिलते-जुलते हैं।

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प्रश्न 19:

(अ) ऐक्टिनाइड्स का परमाणु क्रमांक, नाम तथा इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स = Z = 89 (Ac) से 103 (Lr) तक

4 प्रमुख उदाहरण:

तत्व Z नाम इलेक्ट्रॉनिक विन्यास

Th 90 Thorium [Rn] 6d² 7s²

U 92 Uranium [Rn] 5f³ 6d¹ 7s²

Np 93 Neptunium [Rn] 5f⁴ 6d¹ 7s²

Pu 94 Plutonium [Rn] 5f⁶ 7s²

(ब) ऐक्टिनाइड्स का इलेक्ट्रॉनिक विन्यास एवं उनकी विभिन्न ऑक्सीकरण अवस्थाएँ लिखिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स में 5f, 6d और 7s orbitals भरते हैं।

→ ऑक्सीकरण अवस्थाएँ: +3, +4, +5, +6, +7

U: +3 to +6

Np: +3 to +7

Pu: +3 to +6

इनकी oxidation states लैन्थेनाइड्स की तुलना में ज्यादा होती हैं।

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प्रश्न 20: ऐक्टिनाइड्स की इलेक्ट्रॉनिक संरचनाओं की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स में धीरे-धीरे 5f-orbitals में electron भरते हैं।

शुरुआत के ऐक्टिनाइड्स में 6d-orbitals भी filled होते हैं।

5f orbitals अधिक diffuse होते हैं → strong bonding possible

Variable oxidation states इसलिए possible हैं क्योंकि 5f, 6d और 7s orbitals की energy करीब-करीब समान होती है।

प्रश्न 21: ऐक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाओं का विवेचन कीजिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाएँ लैन्थेनाइड्स से कहीं ज्यादा विविध होती हैं।

इनके पास +3 से लेकर +7 तक की अवस्थाएँ पाई जाती हैं।

प्रमुख अवस्थाएँ:

o Ac, Am, Cm: +3

o Th, Ce, Pu: +4

o Np, Pu, Am: +5, +6

o Np: +7 (maximum observed)

→ Higher oxidation states पानी में कम स्थिर होते हैं।

→ यह diversity 5f, 6d और 7s orbitals की energy समान होने के कारण होती है।

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प्रश्न 22: ऐक्टिनाइड संकुल की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड संकुल (complexes) वे compounds होते हैं जिनमें ऐक्टिनाइड आयन एक या अधिक ligands से जुड़े होते हैं।

ये ligands O²⁻, F⁻, Cl⁻, NO₃⁻, EDTA, आदि हो सकते हैं।

Actinides जैसे U, Th, Np आदि कई coordination numbers (6–10) में complex बनाते हैं।

उदाहरण:

o [UO₂(NO₃)₂(H₂O)₂]

o [PuF₆]²⁻

→ 5f-orbitals diffuse होते हैं, इसलिए coordination ज्यादा strong होता है।

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प्रश्न 23:

(अ) पारा यूरेनियम तत्व क्या होते हैं? ऐक्टिनाइड्स तथा पारा यूरेनियम तत्वों में क्या अंतर है?

उत्तर:

पारा यूरेनियम तत्व (Transuranic Elements) वे तत्व होते हैं जिनका परमाणु क्रमांक 92 (Uranium) से अधिक होता है।

जैसे: Np (93), Pu (94), Am (95), Cm (96) आदि।

अंतर:

Uranium तक के ऐक्टिनाइड्स naturally पाए जाते हैं।

Transuranic elements अधिकतर कृत्रिम (man-made) होते हैं और radioactive होते हैं।

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(ब) ट्रान्स यूरेनिक तत्व क्या हैं? उनके नाम, परमाणु संख्या एवं इलेक्ट्रॉनिक विन्यास लिखिए।

उत्तर:

Transuranic elements = Z > 92

कुछ प्रमुख तत्व:

नाम Z इलेक्ट्रॉनिक विन्यास (संक्षेप में)

Np 93 [Rn] 5f⁴ 6d¹ 7s²

Pu 94 [Rn] 5f⁶ 7s²

Am 95 [Rn] 5f⁷ 7s²

Cm 96 [Rn] 5f⁷ 6d¹ 7s²

ये सब artificial तरीके से बनाए जाते हैं।

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प्रश्न 24: लैन्थेनाइड्स एवं ऐक्टिनाइड्स के आयनों के चुंबकीय गुणों की तुलना कीजिए।

उत्तर:

लैन्थेनाइड्स: 4f electrons shielded होते हैं → उनके magnetic moment theoretical values (Russell-Saunders coupling) से मिलते-जुलते हैं।

→ परंतु, observed values slightly कम होती हैं।

ऐक्टिनाइड्स: 5f electrons diffuse होते हैं → magnetic behavior more complex होता है।

→ Spin-Orbit coupling और crystal field का असर ज़्यादा होता है।

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प्रश्न: लैन्थेनाइड आयन के चुंबकीय गुणों के प्रायोगिक मान रसेल-सॉन्डर्स युग्म स्कीम से प्राप्त मान से कम क्यों होते हैं?

उत्तर:

क्योंकि लैन्थेनाइड्स में 4f-orbitals अधिक shielded होते हैं, फिर भी crystal field interaction और electron correlation effects की वजह से actual (observed) magnetic moment theoretical values से थोड़ा कम आता है।

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प्रश्न 25: ऐक्टिनाइड्स के संकुल लैन्थेनाइड्स से किस प्रकार भिन्नता रखते हैं? समझाइए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स के 5f-orbitals ज्यादा diffuse होते हैं, इसलिए ligand के साथ overlap अच्छा होता है → Strong bonding।

लैन्थेनाइड्स के 4f-orbitals अंदर होते हैं → weak bonding।

→ इसलिए actinides ज़्यादा variety वाले complexes बनाते हैं और ज्यादा oxidation states दिखाते हैं।

→ Coordination number भी ज्यादा होता है।

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प्रश्न 26: यूरेनियम से नेप्टुनियम, प्लूटोनियम तथा अमेरिशियम का पृथक्करण क्यों आवश्यक होता है?

उत्तर:

ये सभी रेडियोधर्मी तत्व हैं और nuclear fuel cycle का हिस्सा हैं।

Np, Pu, Am का उपयोग nuclear reactors व weapons में होता है।

→ इसलिए उनका separation जरूरी है:

o उपयोग के लिए

o सुरक्षा के लिए

o प्रदूषण रोकने के लिए

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प्रश्न 27: यूरेनियम से नेप्टुनियम, प्लूटोनियम तथा अमेरिशियम के पृथक्करण की विधियाँ किन सिद्धांतों पर आधारित हैं?

उत्तर:

इनका पृथक्करण इन सिद्धांतों पर आधारित होता है:

1. Redox Behavior:

o विभिन्न oxidation states होने पर अलग-अलग solubility होती है।

2. Solvent Extraction:

o Organic और aqueous phases में अलग-अलग solubility के आधार पर separation होता है।

3. Ion Exchange:

o विभिन्न ions की resin के साथ binding affinity के आधार पर separation किया जाता है।

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प्रश्न 28: यूरेनियम से Np, Pu तथा Am के पृथक्करण की विलायक निष्कर्षण विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

Solvent Extraction में organic solvent (जैसे TBP - tributyl phosphate) का प्रयोग होता है।

यूरेनियम और प्लूटोनियम nitric acid medium में TBP के साथ complex बनाते हैं।

Np और Am अलग रहते हैं।

फिर controlled oxidation-reduction करके उनको अलग phases में transfer किया जाता है।

→ यह विधि PUREX process का हिस्सा होती है।

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प्रश्न 29: पर्य–ऐक्टिनाइड एवं पर्य–लैन्थेनाइड के मध्य समानताएँ लिखिए।

उत्तर:

1. दोनों में 4f या 5f orbitals का filling होता है।

2. High coordination number वाले complexes बनाते हैं।

3. Mostly +3 oxidation state दिखाते हैं।

4. Ionic size में लगातार कमी (contraction) होती है।

5. Similar magnetic and spectral properties होती हैं।

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प्रश्न 30: ऐक्टिनाइड्स द्वारा संकुल निर्माण पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:

ऐक्टिनाइड्स के 5f-orbitals diffuse और reactive होते हैं।

इसलिए ये आसानी से oxygen, nitrogen, halogen जैसे ligands के साथ complex बना लेते हैं।

Coordination number high (6–10 तक) होता है।

उदाहरण:

o [UO₂(NO₃)₂]

o [PuCl₆]²⁻

→ Actinide complexes अधिक reactive और रंगीन होते हैं, और कई बार radioactive भी।

प्रश्न 31: ऐक्टिनाइड्स के पृथक्करण में हेडनस की महत्वपूर्ण भूमिका होती है। समझाइए।

उत्तर:

हेडनस (hydroxyethylidene diphosphonic acid – HEDPA) एक selective ligand होता है जो ऐक्टिनाइड्स के साथ complex बनाकर उन्हें अलग करता है।

यह actinides को aqueous solution में complex बनाकर stable करता है।

इससे separation आसान हो जाता है, खासकर जब अन्य lanthanides भी मौजूद हों।

→ यह plutonium और americium जैसे तत्वों के separation में use होता है।

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प्रश्न 32: आयन-विनिमय विधि द्वारा ऐक्टिनाइड्स का पृथक्करण कैसे किया जाता है?

उत्तर:

इस विधि में actinides के ions को एक resin से bind कराया जाता है और फिर अलग-अलग eluents से wash करके अलग किया जाता है।

अलग-अलग ions की resin affinity अलग होती है।

separation की कुंजी:

o oxidation states

o ionic radius

o charge density

→ Actinides जैसे Am³⁺, Pu⁴⁺ को आसानी से अलग किया जा सकता है।

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प्रश्न 33: ऐक्टिनाइड्स की आयनिक त्रिज्या का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

जैसे-जैसे atomic number बढ़ता है, 5f electrons जुड़ते हैं → nuclear charge बढ़ता है → electrons nucleus के पास खिंचते हैं।

→ इससे आयनिक त्रिज्या (ionic radius) धीरे-धीरे घटती है।

इसे actinide contraction कहते हैं।

उदाहरण:

Ac³⁺: ~1.12 Å

Am³⁺: ~0.98 Å

→ यह contraction properties में परिवर्तन लाता है।

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प्रश्न 34: ऐक्टिनाइड्स के नाम एवं उनके प्रमुख खनिजों के नाम एवं संरचना लिखिए।

उत्तर:

तत्व खनिज का नाम संरचना

Th Monazite (Ce, La, Th)PO₄

U Pitchblende U₃O₈

Pu कृत्रिम

Np कृत्रिम

→ Th और U naturally मिलते हैं, बाक़ी artificial हैं।

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प्रश्न 35: ऐक्टिनाइड्स की ऑक्सीकरण अवस्थाओं के रंगों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:

Actinides के oxidation states अलग-अलग colors देते हैं:

U³⁺ → Red-violet

U⁴⁺ → Green

Pu³⁺ → Violet

Pu⁴⁺ → Yellow-brown

Am³⁺ → Pink

→ ये colors d–f transitions के कारण होते हैं।

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प्रश्न 36: UO₂SO₄ में यूरेनियम की ऑक्सीकरण अवस्था लिखिए।

उत्तर:

UO₂SO₄ = Uranium oxysulfate

O₂ = -4

SO₄²⁻ = -2

→ कुल charge = -6

→ पूरी compound neutral है → Uranium का oxidation state +6 होगा।

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प्रश्न 37:

(अ) सेरियम (Ce²⁺) से यूरोपियम (Eu²⁺) अधिक स्थायी है, क्यों?

उत्तर:

Eu²⁺ में electronic configuration [Xe]4f⁷ होता है → half-filled f-subshell → extra stability

जबकि Ce²⁺ में [Xe]4f² होता है → कोई special stability नहीं।

→ इसलिए Eu²⁺ ज्यादा stable है।

(ब) ऐक्टिनाइड्स के अनुनाभिकीय गुण की व्याख्या कठिन है, क्यों?

उत्तर:

क्योंकि actinides में 5f electrons diffuse होते हैं और spin-orbit coupling अधिक होती है।

→ Electron-electron interactions complex हो जाते हैं → इसलिए उनके spectral और magnetic properties की व्याख्या करना मुश्किल होता है।

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प्रश्न 38: लैन्थेनाइड्स के अनुनाभिकीय गुण लिखिए।

उत्तर:

4f electrons अंदर होते हैं → crystal field का असर कम

Sharp और well-defined absorption bands

Weak f–f transitions

उनके complexes colored होते हैं

Magnetic moment Russell-Saunders coupling से निर्धारित होता है

→ इनके spectra atomic-like होते हैं।

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प्रश्न 39: क्या La (लैन्थेनम) आयन Z = 57; +4 ऑक्सीकरण संख्या में उपस्थित रह सकता है? पुष्टि कीजिए।

उत्तर:

La का electronic configuration: [Xe] 5d¹ 6s²

+3 oxidation state में सबसे stable रहता है

+4 oxidation state में electron removal energetically unfavorable होता है

→ इसलिए La⁴⁺ stable नहीं होता

→ सिर्फ theoretical रूप से संभव है, practically नहीं।


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