NOTE:- In this blog there are only questions and answers of 1st unit of inorganic chemistry and 2nd
to 6th unit will be available in the next blog because this increases the size of the blog page
a lot.
इस ब्लॉग में केवल अकार्बनिक रसायन विज्ञान की दूसरी इकाई के प्रश्न और उत्तर हैं तथा तीसरी से छठी इकाई के प्रश्न अगले
ब्लॉग में उपलब्ध होंगे क्योंकि इससे ब्लॉग पृष्ठ का आकार बहुत बढ़ जाता है।
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बी.एस-सी. द्वितीय वर्ष – रसायन (प्रथम प्रश्न-पत्र)
प्रश्न-सूची (छत्तीसगढ़)
_________________इकाई 2__________________
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इकाई 2 (अ)
प्रश्न 1: आर्टिनियस
धारणा का उदाहरण सहित वर्णन कीजिए।
(Q. Explain Arrhenius concept with examples.)
उत्तर:
Arrhenius धारणा को 1884 में Svante Arrhenius ने प्रस्तुत किया था। इसके अनुसार:
- Arrhenius Acid: ऐसा पदार्थ जो जल में घुलकर H⁺ (hydrogen ion) देता है।
- Arrhenius Base: ऐसा पदार्थ जो जल में घुलकर OH⁻ (hydroxide ion) देता है।
उदाहरण:
1.
HCl (Hydrochloric acid) → H⁺ + Cl⁻
(जल में HCl घुलने पर H⁺ आयन देता है, अतः यह Arrhenius acid है।)
2.
NaOH (Sodium hydroxide) → Na⁺ + OH⁻
(NaOH जल में OH⁻ आयन देता है, अतः यह Arrhenius base है।)
सीमाएँ (Limitations):
- यह अवधारणा केवल aqueous (जल) माध्यम में ही लागू होती है।
- यह केवल उन यौगिकों पर लागू होती है जो H⁺ या OH⁻ आयन सीधे रूप से उत्पन्न करें।
- Non-aqueous solvents या gaseous reactions के लिए उपयुक्त नहीं है।
प्रश्न 2 (a): ब्रोंस्टेड-लॉरी सिद्धांत की व्याख्या कीजिए। इसकी सीमाएँ भी लिखिए।
(Q. Explain Bronsted-Lowry theory. Mention its
limitations.)
उत्तर:
Bronsted-Lowry सिद्धांत 1923 में Johannes Bronsted और Thomas Lowry ने प्रस्तुत किया।
- Bronsted Acid: ऐसा पदार्थ जो H⁺ आयन donate करे (proton donor)।
- Bronsted Base: ऐसा पदार्थ जो H⁺ आयन accept करे (proton acceptor)।
उदाहरण:
HCl + H₂O → H₃O⁺ + Cl⁻
यहाँ HCl ने H⁺ donate किया (acid) और H₂O ने accept किया (base)।
सीमाएँ:
- यह सिद्धांत H⁺ के आदान-प्रदान तक सीमित है।
- Non-protonic acid-base reactions को explain नहीं कर सकता (जैसे Lewis theory करती है)।
- कुछ reactions में acid-base behavior H⁺
transfer से नहीं समझाया जा सकता।
प्रश्न 2 (b): लुईस अम्ल तथा ब्रोंस्टेड अम्ल में भिन्नता दर्शाइए।
(Q. Differentiate between Lewis acid and Bronsted acid.)
|
विशेषता |
Bronsted Acid |
Lewis Acid |
|
परिभाषा |
जो H⁺ आयन देता है |
जो इलेक्ट्रॉन पेयर accept करता है |
|
Nature |
Proton donor |
Electron pair acceptor |
|
उदाहरण |
HCl, HNO₃ |
BF₃, AlCl₃, Fe³⁺ |
|
Reaction Type |
Proton transfer reactions |
Electron pair donation reactions |
|
Solvent |
Mostly aqueous |
Non-aqueous में भी लागू |
|
Limitation |
केवल H⁺ transfer पर आधारित |
ज्यादा general theory है |
प्रश्न 3 (a): क्लोरीन के ऑक्सी-अम्लों की सामर्थ्य की व्याख्या कीजिए।
Explain the strength of oxyacids of chlorine.
उत्तर / Answer:
क्लोरीन के ऑक्सी-अम्ल (oxyacids) निम्न प्रकार
के होते हैं:
1.
Hypochlorous acid (HClO)
2.
Chlorous acid (HClO₂)
3.
Chloric acid (HClO₃)
4.
Perchloric acid (HClO₄)
इन अम्लों की सामर्थ्य (acidity strength) में वृद्धि इस क्रम में होती है:
HClO < HClO₂ < HClO₃ < HClO₄
कारण / Reason:
1.
Oxidation state:
जैसे-जैसे क्लोरीन का oxidation state बढ़ता है (+1 से +7), उसकी
इलेक्ट्रॉन खिंचने की क्षमता (electronegativity) भी बढ़ती है, जिससे O–H बंध अधिक ध्रुवीय हो जाता
है और H⁺ आयन आसानी से निकल जाता है।
2.
Electronegativity effect:
अधिक electronegative central atom (Cl) – O के जरिए O–H bond को कमजोर करता
है, जिससे प्रोटॉन आसानी से release होता है।
3.
Resonance stabilization:
उच्च ऑक्सीकरण अवस्था वाले अम्लों में अधिक resonance structures बनते हैं जो conjugate
base को स्थिर बनाते हैं। इससे acid की strength बढ़ जाती है।
प्रश्न 3 (b): निम्न प्रकरण में संयुग्मी अम्ल-क्षारक युग्म बताइए – जल में NH₄NO₃।
उत्तर / Answer:
NH₄NO₃ का जल में अपघटन (dissociation):
NH₄NO₃ → NH₄⁺ + NO₃⁻
अब NH₄⁺ acts as Bronsted acid,
क्योंकि यह H⁺ donate कर सकता है:
NH₄⁺ ⇌ NH₃ + H⁺
NO₃⁻ acts as conjugate base of a strong acid (HNO₃), और यह H⁺ accept नहीं करता।
Conjugate acid-base pair:
- NH₄⁺ / NH₃ → Acid/Base pair
प्रश्न 3 (c): (NH₄)₂SO₄ के जलीय विलयन की अम्लीयता CuSO₄ के योग से कैसे परिवर्तित
है?
उत्तर / Answer:
(NH₄)₂SO₄ जल में यह आयन देता है:
(NH₄)₂SO₄ → 2 NH₄⁺ + SO₄²⁻
NH₄⁺ एक weak acid है → यह जल में H⁺ छोड़ता है:
NH₄⁺ ⇌ NH₃ + H⁺
CuSO₄ भी जल में hydrolyze होता है और acidic nature दिखाता है:
Cu²⁺ + 6H₂O ⇌ [Cu(H₂O)₆]²⁺ → acidic complex
इस प्रकार CuSO₄ के addition से solution की acidity बढ़ जाती है, क्योंकि दोनों NH₄⁺ और Cu²⁺ mildly acidic behavior दिखाते हैं।
Final result:
Acidity increases due to combined effect of NH₄⁺ and [Cu(H₂O)₆]²⁺
complex formation.
प्रश्न 4. लक्स-फ्लड अम्ल
तथा क्षारक सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
Lux-Flood सिद्धांत मुख्यतः ऑक्साइड आयनों पर आधारित है और यह high temperature reactions (जैसे metallurgy में) के लिए उपयोगी है।
- Lux-Flood Acid: वह पदार्थ जो ऑक्साइड आयन (O²⁻) को स्वीकार करता है।
- Lux-Flood Base: वह पदार्थ जो ऑक्साइड आयन को दान करता है।
उदाहरण:
CaO (Base)+SiO2(Acid)→CaSiO3\text{CaO (Base)} + \text{SiO}_2 \text{(Acid)}
\rightarrow \text{CaSiO}_3CaO (Base)+SiO2(Acid)→CaSiO3
यह सिद्धांत acid-base reactions को molten salt या solid state में समझने में
मदद करता है।
प्रश्न 5 (a). लुईस की अम्ल-क्षारक धारणा क्या है? समझाइए।
उत्तर:
G.N. Lewis के अनुसार:
- Lewis Acid: वह species जो एक इलेक्ट्रॉन जोड़ी को स्वीकार करता है।
- Lewis Base: वह species जो एक इलेक्ट्रॉन जोड़ी को प्रदान करता है।
उदाहरण:
BF3+:NH3→F3B←NH3\text{BF}_3 + :\text{NH}_3 \rightarrow \text{F}_3\text{B}
\leftarrow \text{NH}_3BF3+:NH3→F3B←NH3
यह concept covalent bonding और coordination complexes को समझाने में उपयोगी है।
(b) ब्रोंस्टेड-लॉरी एवं लुईस
अवधारणाओं की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
- Brønsted-Lowry Acid: H⁺ देने वाला।
- Brønsted-Lowry Base: H⁺ ग्रहण करने वाला।
- Lewis Acid: इलेक्ट्रॉन जोड़ी स्वीकारक।
- Lewis Base: इलेक्ट्रॉन जोड़ी दाता।
मुख्य अंतर:
Brønsted theory H⁺ transfer पर आधारित है, जबकि Lewis theory इलेक्ट्रॉन
जोड़ी पर आधारित है।
प्रश्न 6. कारण सहित लुईस
अम्ल और क्षार छाँटिए:
Lewis Acids (e⁻ pair acceptor):
- AlCl₃, PCl₅, Cu²⁺, BF₃, Ag⁺, PtCl₄, Zn²⁺, NH₄⁺, SO₂, CO₂
Lewis Bases (e⁻ pair donor):
- (CH₃)₃N, H₂O, Cl⁻, NH₂-NH₂, NH₃, C₂H₅OH, I⁻, F⁻
कारण: Lewis acid में खाली orbital होता है या positive charge, जबकि Lewis base में lone pair होता है।
प्रश्न 7. विलायक तंत्र
आधारित अम्ल-क्षार अवधारणा और उदाहरण:
उत्तर:
Solvent system theory के अनुसार:
- Acid:
Solvent के कटी-आयन (cation) को बढ़ाता है।
- Base:
Solvent के एनी-आयन (anion) को बढ़ाता है।
उदाहरण:
(i) NH₃ में KNH₂: KNH₂ → K⁺ + NH₂⁻ → NH₂⁻ base है।
(ii) Liquid SO₂ में SOCl₂: SOCl₂ → SO²⁺ + 2Cl⁻ → acid है।
(iii) Liquid SO₂ में NaHSO₃: NaHSO₃ → Na⁺ + HSO₃⁻ → base की तरह कार्य करता है।
प्रश्न 8. SiCl₄ और SnCl₄ लुईस अम्ल हैं लेकिन CCl₄ क्यों नहीं है?
उत्तर:
- SiCl₄ और SnCl₄ में central atom के पास खाली d-orbitals होते हैं, जो e⁻ pair accept कर सकते हैं → Lewis acid।
- CCl₄ में carbon के पास 8 electrons पूरे हो चुके होते हैं
और कोई खाली orbital
नहीं होता → इसलिए यह Lewis acid की तरह react नहीं करता।
प्रश्न 9. NH₃ की तुलना में NF₃ दुर्बल क्षार क्यों है?
उत्तर:
- NH₃ में nitrogen पर lone pair आसानी से donate होता है → stronger base।
- NF₃ में fluorine high electronegative होता है, जिससे lone pair N पर tight hold में होता है → electron donation difficult → weaker base।
प्रश्न 10. ब्रोंस्टेड एवं
लुईस क्षारकों में अंतर:
|
विशेषता |
Brønsted Base |
Lewis Base |
|
परिभाषा |
H⁺ ग्रहण करता है |
e⁻ जोड़ी दान करता है |
|
उदाहरण |
OH⁻, NH₃ |
NH₃, H₂O, Cl⁻ |
|
आधार |
प्रोटोन ट्रांसफर |
इलेक्ट्रॉन ट्रांसफर |
निष्कर्ष: सभी Brønsted bases Lewis base होते हैं, पर सभी Lewis
bases Brønsted नहीं होते।
प्रश्न 11. सिद्ध कीजिए कि
द्रव N₂O₄ में NO₃⁻ आयन उपस्थित होता है।
उत्तर:
Liquid N₂O₄ में auto-ionization होता है:
2N2O4⇌NO++NO3−2N_2O_4 \rightleftharpoons NO^+ +
NO_3^-2N2O4⇌NO++NO3−
NO₃⁻ आयन का निर्माण इस equilibrium से होता है, इसलिए यह
द्रव्य में उपस्थित होता है।
प्रश्न 12. HNO₃, HNO₂ से अधिक प्रबल अम्ल क्यों है?
उत्तर:
- HNO₃ में NO₃⁻ ion resonance stabilized होता है → H⁺ आसानी से देता है → strong acid।
- HNO₂ में resonance कम होता है, इसलिए H⁺ release करना कठिन होता है → weak acid।
अतः HNO₃ > HNO₂ in acidity.
प्रश्न 13. निम्नलिखित के
संयुग्मी अम्ल लिखिए:
|
क्षारक (Base) |
संयुग्मी अम्ल (Conjugate Acid) |
|
NH₃ |
NH₄⁺ |
|
H₂O |
H₃O⁺ |
|
S²⁻ |
HS⁻ |
|
CN⁻ |
HCN |
|
CH₃COO⁻ |
CH₃COOH |
|
SO₄²⁻ |
HSO₄⁻ |
|
[Al(H₂O)₅OH]²⁻ |
[Al(H₂O)₆]³⁺ |
इकाई 2 (ब)
प्रश्न
1: कठोर एवं मृदु अम्ल-क्षारक धारणा से क्या समझते हो?
उत्तर:
HSAB सिद्धांत (Hard and Soft Acids and Bases
Theory) को Pearson ने 1963 में
प्रस्तावित किया था।
इस सिद्धांत के अनुसार अम्लों और
क्षारकों को उनके आकार, आवेश, ध्रुवणीयता (polarizability) के
आधार पर दो वर्गों में बाँटा जाता है:
- Hard acids/bases (कठोर अम्ल/क्षारक): छोटे आकार, अधिक आवेश, कम ध्रुवणीयता।
- Soft acids/bases (मृदु अम्ल/क्षारक): बड़े आकार, कम आवेश, अधिक ध्रुवणीयता।
उदाहरण:
- Hard acids: H⁺, Al³⁺, Fe³⁺
- Soft acids: Ag⁺, Hg⁺, Pt²⁺
- Hard bases: F⁻, OH⁻, NH₃
- Soft bases: I⁻, S²⁻, CN⁻
प्रश्न
2: कठोर-मृदु अम्ल एवं क्षारक सिद्धांत की उपयोगिता की
विवेचना कीजिए।
उत्तर:
HSAB सिद्धांत का उपयोग कई रासायनिक
प्रक्रियाओं को समझाने में होता है:
- संयोजन की प्रवृत्ति (Affinity):
- कठोर अम्ल → कठोर क्षारक से
- मृदु अम्ल → मृदु क्षारक से
इस प्रवृत्ति से यौगिकों की स्थायित्व को समझा जा सकता है। - धातुओं के अयस्क (Ore) के रूप:
- Hard metals → carbonate/sulfate ores (e.g., CaCO₃)
- Soft metals → sulfide ores (e.g., Ag₂S)
- जैव रसायन में उपयोग:
- विषाक्तता का कारण और उपचार
(क्यों कुछ धातुएं विषैली हैं)।
- धातु-लिगैंड बंधन की स्थिरता (Stability of metal-ligand
complexes):
Coordination chemistry में इसकी बड़ी भूमिका होती है।
प्रश्न
3: सहजीविता क्या है? अम्ल-क्षार के संदर्भ में सहजीविता को समझाइए।
उत्तर:
सहजीविता (Symbiosis): जब कोई धातु आयन एक ही प्रकार के लिगैंड को बार-बार पसंद करता है, तो इसे सहजीविता कहते हैं।
HSAB के
संदर्भ में:
- एक कठोर अम्ल अगर पहले से कठोर लिगैंड से जुड़ा है, तो वह अगले लिगैंड के रूप में
भी कठोर लिगैंड को ही चुनेगा।
- मृदु अम्ल भी मृदु लिगैंड को ही प्राथमिकता देगा।
उदाहरण:
- UO₂²⁺ पहले से दो कठोर O लिगैंड्स से जुड़ा होता है, इसलिए यह और O-donor लिगैंड्स को पसंद करता है।
प्रश्न
4: अम्ल-क्षार प्रबलता का कठोरता एवं मृदुता से संबंध की
व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
HSAB सिद्धांत के अनुसार:
- कठोर अम्ल व क्षारकों के बीच बंधन ionic होते हैं और ये बंधन मजबूत
होते हैं।
- मृदु अम्ल व क्षारकों के बीच बंधन covalent होते हैं, और यदि दोनों मृदु हैं, तो बहुत स्थिर यौगिक बनते
हैं।
इससे
क्या पता चलता है?
- प्रबल अम्ल और क्षारक वे होते हैं जो सही combination (hard-hard या soft-soft) बनाते हैं।
- अगर mismatch हुआ (hard-soft), तो यौगिक कमजोर होगा या अस्थायी।
प्रश्न
5: अम्ल क्षार प्रबलता तथा कठोरता एवं मृदुता से आप क्या
समझते हैं? कठोरता तथा मृदुता का सैद्धांतिक आधार क्या है? समझाइए।
उत्तर:
कठोरता एवं मृदुता का आधार:
- Hard species: छोटा आकार, high charge density, कम polarizability (ध्रुवणीयता)।
- Soft species: बड़ा आकार, low charge density, अधिक polarizability।
सैद्धांतिक
आधार:
- इलेक्ट्रॉनिक
कॉन्फिगरेशन और ऑर्बिटल overlap का महत्व।
- Hard species → electrostatic interaction → ionic bond
- Soft species → orbital overlap → covalent bond
प्रबलता:
- जब कोई अम्ल अपने
उपयुक्त क्षारक से प्रतिक्रिया करता है (hard-hard या soft-soft),
तो प्रतिक्रिया अधिक spontaneous और स्थायी होती है।
प्रश्न
6: कठोर-मृदु अम्ल-क्षारक धारणा (HSAB सिद्धांत) की सीमाएँ क्या हैं? स्पष्ट
कीजिए।
उत्तर:
HSAB सिद्धांत बहुत उपयोगी है, पर इसकी कुछ सीमाएँ भी हैं:
1.
सांख्यिकीय
माप नहीं देता: यह मात्र गुणात्मक (qualitative) सिद्धांत है, संख्यात्मक नहीं।
2.
कुछ
exceptions: कभी-कभी hard-soft
combination भी स्थायी होते हैं।
3.
Environment पर निर्भरता: विलायक, तापमान आदि कारकों का प्रभाव नहीं बताता।
4.
Complex nature को
ignore करता है: Coordination compounds में orbital
interaction को सरलता से नहीं समझा पाता।
प्रश्न
7: कठोर मृदु अम्ल क्षारक सिद्धांत के आधार पर समझाइए—
(i) कॉपर
अयस्कों में सल्फाइड पाया जाता है
उत्तर: Cu⁺ और Cu²⁺ मृदु अम्ल हैं। Sulfide (S²⁻) एक
मृदु क्षारक है।
→ मृदु-मृदु संगम होने से स्थायी
यौगिक Cu₂S बनता है। इसलिए कॉपर के अयस्क sulfide रूप में पाए जाते हैं।
(ii) कैल्शियम
अयस्कों में कार्बोनेट के रूप में पाया जाता है
उत्तर: Ca²⁺ एक
कठोर अम्ल है और CO₃²⁻
एक कठोर क्षारक।
→ कठोर-कठोर बंधन से CaCO₃ (chalk) स्थायी बनता है।
9. HSAB सिद्धांत
के अनुसार, समझाइए:
(i) HF एक दुर्बल अम्ल और HI एक प्रबल अम्ल क्यों है?
👉 HSAB सिद्धांत के अनुसार, HF में H⁺ (एक कठोर अम्ल) और F⁻ (एक कठोर क्षारक) होते हैं। इन
दोनों के बीच attraction
strong होता है, जिससे यह dissociate
नहीं करता और यह कमजोर अम्ल बनता
है।
जबकि HI में I⁻ (एक मृदु क्षारक) होता है, जो H⁺ (कठोर अम्ल) के साथ weak interaction करता है। इसलिए यह आसानी से dissociate हो जाता है और HI एक strong acid बनता है।
(ii) प्रकृति
में MgCO₃ तथा Al₂O₃ के
रूप में क्यों पाए जाते हैं?
👉 Mg²⁺ और Al³⁺ दोनों कठोर अम्ल हैं।
- CO₃²⁻ एक कठोर क्षारक है, इसलिए Mg²⁺ के साथ मिलकर MgCO₃ बनाता है।
- O²⁻ भी एक कठोर क्षारक है, जो Al³⁺ के साथ मिलकर Al₂O₃ बनाता है।
👉 कठोर-कठोर युग्म स्थायी यौगिक बनाते हैं, इसलिए ये यौगिक प्रकृति में स्थायी रूप में मिलते हैं।
10. HSAB सिद्धांत
के आधार पर सिल्वर हैलाइडों की घुलनशीलता क्रम की व्याख्या करें।
👉 सिल्वर (Ag⁺) एक मृदु अम्ल है और हैलाइड आयन (F⁻, Cl⁻, Br⁻, I⁻) में कठोरता क्रम होता है:
F⁻ > Cl⁻ > Br⁻ > I⁻
मृदु-मृदु युग्म (जैसे AgI) अधिक स्थिर होता है और पानी में कम soluble होता
है।
अतः घुलनशीलता क्रम होगा:
AgF > AgCl > AgBr > AgI
(AgF सबसे अधिक घुलनशील और AgI सबसे कम)
11. (क)
कठोर-मृदु अम्ल-क्षार सिद्धांत का उपयोग करते हुए लाभकारी और विषैले तत्वों की
व्याख्या कीजिए।
👉 लाभकारी तत्व (जैसे Mg²⁺, Ca²⁺) कठोर अम्ल होते हैं जो कठोर
क्षारकों (CO₃²⁻,
PO₄³⁻) के साथ स्थिर यौगिक बनाते हैं और
जैविक प्रक्रिया में भाग लेते हैं।
👉 विषैले तत्व (जैसे Hg²⁺, Pb²⁺) मृदु अम्ल होते हैं जो जैविक मृदु
क्षारकों (जैसे –SH समूह) से strongly bind करते
हैं और enzyme
function को रोकते हैं।
(ख)
कारण बताइए तथा निम्नलिखित अभिक्रियाओं की दिशा निर्धारित कीजिए:
(i) H⁺ + CH₃HgSH ⇌ CH₃Hg⁺ + H₂S
👉 CH₃Hg⁺ (मृदु अम्ल) और SH⁻
(मृदु क्षारक) की जोड़ी अधिक स्थिर
है। इसलिए अभिक्रिया बाएं से दाएं जाएगी।
(ii) LiI + CSF ⇌ CSI +
LiF
👉 Li⁺ (कठोर अम्ल), F⁻ (कठोर क्षारक) = स्थिर
👉 CS⁺ (मृदु अम्ल), I⁻ (मृदु क्षारक) = स्थिर
👉 बाएं से दाएं की ओर जाएगी क्योंकि कठोर-कठोर और मृदु-मृदु जोड़ी बन रही है।
(iii) BHF₃ + BF₃⁻ ⇌ HBF₃⁻ + BH₃
👉 BHF₃ (कठोर अम्ल) + BF₃⁻
(कठोर क्षारक)
👉 → HBF₃⁻ (कठोर-कठोर) + BH₃
(मृदु अम्ल)
👉 संतुलन बाएं की ओर झुका रहेगा क्योंकि BHF₃ + BF₃⁻ युग्म
अधिक स्थिर है।
12. मैग्नीशियम
और कैल्शियम अयस्क कार्बोनेट के रूप में क्यों पाए जाते हैं?
👉 Mg²⁺ और Ca²⁺ दोनों कठोर अम्ल हैं।
👉 CO₃²⁻ एक कठोर क्षारक है।
👉 HSAB सिद्धांत कहता है कि कठोर अम्ल + कठोर क्षारक → स्थिर यौगिक।
इसलिए MgCO₃ और CaCO₃ जैसे अयस्क स्थायी रूप से पाए जाते हैं।
13. कारण
बताइए तथा हैलाइड क्षारकों F⁻, Cl⁻, Br⁻, I⁻ को उनकी कठोरता के क्रम में व्यवस्थित कीजिए।
👉 कठोरता परमाणु आकार और ध्रुवणीयता पर निर्भर करती है।
👉 हल्के, छोटे और कम ध्रुवणीय आयन अधिक कठोर होते हैं।
👉 क्रम:
F⁻ > Cl⁻ > Br⁻ > I⁻
F⁻ सबसे कठोर और I⁻ सबसे मृदु।
14. निम्नलिखित
की व्याख्या करें:
(i) इलेक्ट्रॉनिक सिद्धांत
👉 यह सिद्धांत अम्ल-क्षार प्रतिक्रिया को इलेक्ट्रॉन के आदान-प्रदान के रूप में
देखता है।
- अम्ल: इलेक्ट्रॉन
ग्रहण करता है
- क्षारक:
इलेक्ट्रॉन दान करता है
(ii) ड्रेगो-वेलैंड
समीकरण
👉 यह समीकरण अम्ल-क्षार अभिक्रिया की ऊष्मा परिवर्तन को दर्शाता है:
ΔH = H(product) – H(reactant)
👉 यदि ΔH negative है → प्रतिक्रिया spontaneous है।
इस समीकरण से अम्ल-क्षार
प्रतिक्रिया की thermodynamic
feasibility समझी जाती है।
15. HSAB अवधारणा
के आधार पर लुईस अम्लों के वर्गीकरण को उदाहरण सहित समझाइए।
👉 लुईस अम्लों को कठोर और मृदु में बाँटा जाता है:
- कठोर लुईस अम्ल: छोटे, उच्च आवेश, non-polarizable → जैसे H⁺, Al³⁺, Fe³⁺
- मृदु लुईस अम्ल: बड़े, कम आवेश, polarizable → जैसे Ag⁺, Hg²⁺, Pd²⁺
👉 कठोर लुईस अम्ल → कठोर क्षारकों से strong bond बनाते हैं
👉 मृदु लुईस अम्ल → मृदु क्षारकों से stable complex बनाते हैं
16. अम्लों
और क्षारकों की कठोरता और मृदुता पर विद्युत ऋणात्मकता के प्रभाव की व्याख्या
कीजिए।
👉 ज्यादा विद्युत ऋणात्मक तत्व कठोर होते हैं क्योंकि:
- उनका आकार छोटा
होता है
- वे strongly attract करते हैं
उदाहरण: F⁻ > Cl⁻ > Br⁻ > I⁻ (F⁻ सबसे कठोर)
👉 कम ऋणात्मकता वाले और बड़े आयन मृदु होते हैं
अतः विद्युत ऋणात्मकता directly कठोरता को प्रभावित करती है।
इकाई 2 (स)
प्रश्न
1: विलायकों को उनके भौतिक और रासायनिक गुणों के आधार पर
कैसे वर्गीकृत किया जाता है?
उत्तर:
विलायकों (solvents) को उनके भौतिक (physical)
और रासायनिक (chemical) गुणों के आधार पर निम्नलिखित वर्गों में बाँटा जाता है:
1.
भौतिक गुणों के आधार पर
वर्गीकरण:
o अंध्रव विलायक (Non-polar solvents): इनमें डाइपोल मूमेंट नहीं होता, जैसे – बेंजीन (C₆H₆), कार्बन टेट्राक्लोराइड (CCl₄)।
o ध्रुवीय विलायक (Polar solvents): इनमें
डाइपोल मूमेंट होता है, जैसे – जल (H₂O), मेथनॉल (CH₃OH)।
2.
रासायनिक गुणों के आधार
पर वर्गीकरण:
o प्रोटोनिक विलायक (Protic solvents): ये ऐसे विलायक होते हैं जिनमें हाइड्रोजन आयन (H⁺) दान
करने की क्षमता होती है, जैसे – जल, एथेनॉल।
o एप्रोटोनिक विलायक (Aprotic solvents): ये H⁺ नहीं देते, जैसे – डाइमिथाइल
सल्फॉक्साइड (DMSO), एसिटोन।
o ऑक्सीडाइज़िंग और रिड्यूसिंग विलायक: कुछ विलायक ऑक्सीडाइज़िंग या रिड्यूसिंग प्रवृत्ति रखते हैं, जैसे – SO₂
(oxidizing), NH₃ (reducing)।
प्रश्न
2: आयनकारी विलायक से आप क्या समझते हैं? उनके मुख्य गुण लिखिए।
उत्तर:
आयनकारी विलायक (Ionizing solvents) वे विलायक होते हैं जो अपने अणुओं को आयनों में
विभाजित कर सकते हैं और घुले हुए पदार्थों को भी आयनित कर सकते हैं।
मुख्य
गुण:
1.
उच्च डाइलेक्ट्रिक
स्थिरांक (High
dielectric constant): इससे वे आयनों के बीच
आकर्षण को कम कर पाते हैं।
2.
स्वतः आयनन की क्षमता: जैसे – H₂O ⇌ H₃O⁺ + OH⁻, NH₃ ⇌ NH₄⁺ + NH₂⁻
3.
अच्छे विद्युत चालक: आयनों की उपस्थिति के कारण।
4.
ध्रुवीय प्रकृति: क्योंकि इनमें असमान आवेश वितरण होता है।
5.
अम्ल-क्षार अभिक्रियाओं
को सरल बनाते हैं।
उदाहरण:
जल, द्रव अमोनिया, द्रव हाइड्रोजन
फ्लोराइड आदि।
प्रश्न
3 (क): द्रव अमोनिया में होने वाली निम्नलिखित
अभिक्रियाओं की व्याख्या कीजिए:
(i) उदासीनीकरण अभिक्रिया (Neutralization Reaction):
यह अम्ल और क्षार के बीच होने वाली
अभिक्रिया होती है जिसमें लवण और अमोनिया का निर्माण होता है।
उदाहरण:
NH4Cl+NaNH2→NaCl+2NH3NH₄Cl + NaNH₂ \rightarrow NaCl + 2NH₃NH4Cl+NaNH2→NaCl+2NH3
(ii) अवक्षेपण अभिक्रिया (Precipitation Reaction):
ऐसी अभिक्रियाएँ जिनमें अघुलनशील
पदार्थ अवक्षेप के रूप में बाहर आता है।
उदाहरण:
(NH4)2S+2AgNO3→Ag2S↓+2NH4NO3(NH₄)₂S + 2AgNO₃ \rightarrow Ag₂S \downarrow +
2NH₄NO₃(NH4)2S+2AgNO3→Ag2S↓+2NH4NO3
(iii) जटिल गठन (Complex Formation):
धातु आयनों द्वारा अमोनिया के साथ
संकुल यौगिक का निर्माण।
उदाहरण:
Cu2++4NH3→[Cu(NH3)4]2+Cu^{2+} + 4NH₃ \rightarrow [Cu(NH₃)₄]^{2+}Cu2++4NH3→[Cu(NH3)4]2+
(iv) रेडॉक्स अभिक्रिया (Redox Reaction):
द्रव अमोनिया में कुछ तत्वों की
अपचयन/ऑक्सीकरण अभिक्रियाएँ होती हैं।
उदाहरण:
2Na+2NH3→2NaNH2+H2↑2Na + 2NH₃ \rightarrow 2NaNH₂ + H₂ \uparrow2Na+2NH3→2NaNH2+H2↑
(ब): द्रव धातु-अमोनिया विलयन और
उनकी अभिक्रियाओं पर संक्षिप्त टिप्पणी:
जब धातुएँ जैसे सोडियम, पोटैशियम द्रव अमोनिया में घुलती हैं, तो वे नीले रंग का
विलयन बनाती हैं जिसमें मुक्त इलेक्ट्रॉनों के कारण चालकता होती है।
उदाहरण:
Na+NH3→Na++e− (blue color)Na + NH₃ \rightarrow Na^+ + e^- \ (blue\
color)Na+NH3→Na++e− (blue color)
ये विलयन शक्तिशाली रिड्यूसिंग
एजेंट के रूप में कार्य करते हैं।
प्रश्न
4: कारण बताइये:
(a) सिल्वर एमाइड जल में दुर्बल क्षार
के रूप में कार्य करता है, लेकिन द्रव अमोनिया में अम्ल के
रूप में कार्य करता है।
उत्तर:
जल में AgNH₂ क्षारीय होता है क्योंकि जल अमोनिया से अधिक प्रोटोन दान करने की क्षमता रखता
है।
परंतु द्रव NH₃ में, NH₃ स्वयं एक बेस होता है, और
AgNH₂, NH₃ से प्रोटोन ग्रहण करता है इसलिए वह अम्ल जैसा व्यवहार
करता है।
(b) तरल अमोनिया कार्बनिक यौगिकों के
लिए जल से बेहतर विलायक है।
उत्तर:
NH₃ का डाइपोल मोमेंट जल से कम है और
यह गैर-ध्रुवीय या कम ध्रुवीय कार्बनिक यौगिकों को बेहतर घोल सकता है। इसके अलावा NH₃ हाइड्रोजन बॉन्डिंग कम करता है जिससे घुलनशीलता बढ़ती है।
(c) कार्बनिक यौगिकों की घुलनशीलता
द्रव अमोनिया की अपेक्षा द्रव सल्फर डाइऑक्साइड में अधिक होती है, कारण सहित समझाइए।
उत्तर:
द्रव SO₂ की ध्रुवता द्रव NH₃
से कम होती है, जो कि अधिकांश कार्बनिक यौगिकों के लिए अनुकूल है। इसके अलावा SO₂ लवणों की अपेक्षा कार्बनिक यौगिकों को अधिक घोलता है।
(d) सामान्य
आयनिक लवण द्रव SO₂ की अपेक्षा जल में अधिक घुलनशील क्यों होते हैं?
उत्तर:
जल का डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक (dielectric constant) बहुत अधिक है (~80), जबकि
SO₂ का बहुत कम (~17)।
इसलिए जल में आयनिक लवण आसानी से आयनित होकर घुल जाते हैं।
प्रश्न 5: द्रव अमोनिया
के भौतिक गुणों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
द्रव अमोनिया (Liquid Ammonia) एक महत्वपूर्ण ध्रुवीय, अपारंपरिक
विलायक है जिसके कई विशिष्ट भौतिक गुण होते हैं:
1.
स्थिति और रंग (State and Color):
द्रव अमोनिया रंगहीन, पारदर्शी द्रव होता है।
2.
गंध (Odour):
इसकी गंध तेज, तीव्र और चुभने वाली होती है।
3.
क्वथनांक (Boiling Point):
द्रव अमोनिया का क्वथनांक लगभग -33.34°C होता है, जिससे यह
सामान्य तापमान पर गैस के रूप में मौजूद होता है।
4.
गलनांक (Melting Point):
इसका गलनांक -77.7°C होता है।
5.
घनत्व (Density):
लगभग 0.682 g/cm³ होता है, जो जल से कम है।
6.
डाइपोल मूमेंट (Dipole Moment):
यह एक ध्रुवीय विलायक है और इसका डाइपोल मूमेंट लगभग 1.47 D होता है।
7.
डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक (Dielectric Constant):
यह लगभग 22 होता है, जो जल (≈80) से कम है, लेकिन फिर भी यह आयनों को स्थिर करने में सक्षम है।
8.
हाइड्रोजन बॉन्डिंग:
द्रव अमोनिया हाइड्रोजन बॉन्डिंग प्रदर्शित करता है, लेकिन जल की
तुलना में कम प्रभावी।
निष्कर्षतः, द्रव अमोनिया
के ये गुण इसे एक अच्छा आयनकारी, लेकिन जल से भिन्न व्यवहार करने वाला विलायक बनाते हैं।
प्रश्न 6: द्रव अमोनिया
का अणुगत स्वरूप (Molecular
structure) एवं स्वायनन (Auto-ionization) समझाइए।
उत्तर:
1.
अणुगत स्वरूप (Molecular Structure):
अमोनिया का अणु त्रिगुण समभुज पिरामिडल (Trigonal pyramidal) होता है। इसमें नाइट्रोजन केंद्र में होता है और तीन हाइड्रोजन उससे जुड़े होते
हैं। नाइट्रोजन पर एक lone pair होता है, जो इसे बेसिक बनाता है।
NH₃ में N–H बंध कोण लगभग 107.8° होता है, जो कि tetrahedral कोण (109.5°) से थोड़ा कम
है।
2.
स्वायनन (Auto-ionization):
द्रव अमोनिया, जल की तरह स्वयं के अणुओं के बीच आयनीकरण दिखाता
है, जिसे Auto-ionization कहते हैं:
2NH3⇌NH4++NH2−2NH₃ \rightleftharpoons NH₄^+ + NH₂^-2NH3⇌NH4++NH2−
यहाँ NH₃ एक अणु प्रोटोन देता है और दूसरा ग्रहण करता है, जिससे अमोनियम
आयन (NH₄⁺) और अमाइड आयन (NH₂⁻)
बनते हैं।
यह प्रक्रिया द्रव अमोनिया
को एक आयनकारी विलायक बनाती है, जिससे यह अम्ल-क्षार प्रतिक्रियाओं के लिए उपयुक्त बनता है।
प्रश्न 7: द्रव सल्फर
डाइऑक्साइड के भौतिक गुण लिखिए।
उत्तर:
द्रव SO₂ (Liquid Sulfur Dioxide) एक गैर-जलीय, ध्रुवीय, लेकिन
अपेक्षाकृत कम आयनकारी विलायक है। इसके प्रमुख भौतिक गुण निम्नलिखित हैं:
1.
स्थिति और रंग:
यह एक रंगहीन, पारदर्शी द्रव होता है।
2.
गंध:
इसमें तेज, तीव्र और तीखी गंध होती है (जैसे जलती माचिस की गंध)।
3.
क्वथनांक:
लगभग -10°C होता है, जिससे यह सामान्य तापमान पर गैस के रूप में रहता है।
4.
गलनांक:
लगभग -72.7°C।
5.
घनत्व:
लगभग 1.46 g/cm³ – जल और अमोनिया दोनों से अधिक।
6.
डाइपोल मूमेंट:
लगभग 1.63 D – यह इसे एक ध्रुवीय विलायक बनाता है।
7.
डाइलेक्ट्रिक स्थिरांक:
केवल ~17 होता है, जो आयनित यौगिकों के लिए उपयुक्त नहीं।
8.
स्वायनन:
द्रव SO₂ बहुत कमजोर रूप में auto-ionize करता है:
2SO2⇌SO2++SO32−2SO₂ ⇌ SO^{2+} + SO₃^{2-}2SO2⇌SO2++SO32−
परंतु यह जल और अमोनिया की तरह प्रभावी नहीं है।
निष्कर्ष: द्रव SO₂ एक ध्रुवीय, परंतु कम
आयनकारी विलायक है, जो कार्बनिक यौगिकों के लिए उपयोगी होता है।
प्रश्न 8: द्रव सल्फर
डाइऑक्साइड में होने वाली अम्ल-क्षार, अवक्षेपण तथा आक्सीकरण-अपचयन अभिक्रियाओं को
उदाहरण सहित समझाइए।
उत्तर:
द्रव SO₂ में कई प्रकार की रासायनिक अभिक्रियाएँ होती हैं, जैसे:
1.
(i) अम्ल-क्षार अभिक्रिया (Acid-base Reaction):
उदाहरण:
NH4++NO3−+K2SO3→2KNO3+NH4HSO3NH₄^+ + NO₃^- + K_2SO₃ \rightarrow 2KNO₃ + NH₄HSO₃NH4++NO3−+K2SO3→2KNO3+NH4HSO3
यहाँ अम्लीय और क्षारीय यौगिक मिलकर नमक का निर्माण करते
हैं।
2.
(ii) अवक्षेपण अभिक्रिया (Precipitation Reaction):
उदाहरण:
BaCl2+Na2SO3→BaSO3↓+2NaClBaCl₂ + Na₂SO₃ \rightarrow BaSO₃ \downarrow + 2NaClBaCl2+Na2SO3→BaSO3↓+2NaCl
BaSO₃ एक अघुलनशील अवक्षेप के रूप में बाहर आता है।
3.
(iii) ऑक्सीकरण-अपचयन
अभिक्रिया (Redox Reaction):
SO₂ स्वयं एक अच्छा रिड्यूसिंग एजेंट है।
उदाहरण:
2FeCl3+SO2+2H2O→2FeCl2+2HCl+H2SO42FeCl₃ + SO₂ + 2H₂O \rightarrow 2FeCl₂ + 2HCl
+ H₂SO₄2FeCl3+SO2+2H2O→2FeCl2+2HCl+H2SO4
यहाँ SO₂ ने Fe³⁺ को Fe²⁺ में reduce कर दिया।
निष्कर्ष:
द्रव SO₂ में acid-base, precipitation और redox reactions सभी संभव हैं, जो इसे एक बहुउपयोगी विलायक बनाती हैं।
प्रश्न 9: क्षारों की
आपेक्षिक प्रबलता निर्धारण की विधियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
Answer:
क्षारों की आपेक्षिक प्रबलता यह दर्शाती है कि कोई क्षार (base) किसी अन्य
क्षार की तुलना में कितना अधिक या कम शक्तिशाली है। इसे निम्नलिखित तरीकों से मापा
जा सकता है:
1.
pH मापन द्वारा (By pH measurement):
क्षारीय विलयन का pH जितना अधिक होता है, वह क्षार उतना
ही अधिक प्रबल होता है। pH मीटर से माप कर क्षारों की शक्ति की तुलना की जाती है।
2.
अनुमापन द्वारा (By Titration):
ज्ञात सांद्रता वाले अम्ल के साथ क्षार का अनुमापन कर के
उसकी क्षमता ज्ञात की जाती है।
3.
चालकता मापन द्वारा (By Conductivity Measurement):
क्षारों के आयनीकरण की क्षमता के अनुसार उनका विद्युत
चालकता अलग होती है। अधिक चालकता = अधिक आयनीकरण = अधिक प्रबल क्षार।
प्रश्न 10: (अ) CO₂ एवं Cu²⁺ लुईस अम्ल हैं
या क्षार? कारण सहित।
(ब) NH₃ लुईस क्षारक क्यों है?
(स) HSO₄⁻ का संयुग्मी अम्ल कौन-सा है?
Answer:
(अ) CO₂ एवं Cu²⁺ लुईस अम्ल हैं क्योंकि:
- CO₂ में कार्बन परमाणु पर इलेक्ट्रॉन की कमी होती है, यह इलेक्ट्रॉन युग्म को स्वीकार करता है।
- Cu²⁺ एक धनायन है, यह भी इलेक्ट्रॉन
युग्म स्वीकार करता है।
(ब) NH₃ लुईस क्षारक है क्योंकि इसमें नाइट्रोजन परमाणु पर एक lone pair (एकाकी युग्म)
होता है, जिसे वह दान कर सकता है।
(स) HSO₄⁻ का संयुग्मी अम्ल = H₂SO₄ (सल्फ्यूरिक अम्ल)
प्रश्न 11: निम्नलिखित पर
संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए –
(अ) ऑक्सी अम्लों की तुलनात्मक शक्ति
(ब) द्विध्रुव आघूर्ण और परावैद्युतांक
(स) स्वतः आयनन (Self-ionization)
Answer:
(अ) ऑक्सी अम्लों की प्रबलता केंद्रीय
परमाणु की ऑक्सीकरण अवस्था पर निर्भर करती है।
जैसे:
HClO < HClO₂ < HClO₃ < HClO₄
यहाँ HClO₄ सबसे प्रबल है क्योंकि Cl की ऑक्सीकरण अवस्था +7 है।
(ब)
- द्विध्रुव आघूर्ण (Dipole Moment): अणु की ध्रुवीयता का माप है।
- परावैद्युतांक (Dielectric Constant): यह मापता है कि कोई विलायक विद्युत बल को कितना कम कर
सकता है।
(स)
स्वतः आयनन वह प्रक्रिया है जिसमें दो एक जैसे अणु आपस में
क्रिया करके आयन बनाते हैं।
जैसे: 2H₂O ⇌ H₃O⁺ + OH⁻
प्रश्न 12: निम्न
अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –
(i) SiCl₄ + 8NH₃ → Si(NH₂)₄ + 4NH₄Cl
(ii) WCl₆ + SO₂ → WCl₄ + SOCl₂
(iii) 2AgCl + Ba(NO₃)₂ → BaCl₂ + 2AgNO₃
Answer:
(i) यह अभिक्रिया द्रव NH₃ में होती है, जहाँ SiCl₄ का अमोनोलीसिस
होता है।
(ii) यह रेडॉक्स अभिक्रिया है जिसमें SO₂ अपचायक की तरह
कार्य करता है।
(iii) यह double displacement reaction है जो अमोनिया में होती है।
प्रश्न 13: द्रव अमोनिया
में निम्नलिखित अभिक्रियाएँ पूर्ण करें और क्रिया का नाम लिखिए –
(i) NH₄NO₃ → N₂O + 2H₂O (अपघटन अभिक्रिया)
(ii) Zn(NH₂)₂ + 2KNH₂ → K₂[Zn(NH₂)₄] (संकुल निर्माण
अभिक्रिया)
(iii) (NH₄)₂S + 2AgNO₃ → Ag₂S + 2NH₄NO₃ (अवक्षेपण
अभिक्रिया)
(iv) [Cu(H₂O)₄]²⁺ + 4NH₃ → [Cu(NH₃)₄]²⁺ + 4H₂O (संकुल निर्माण
अभिक्रिया)
प्रश्न 14: द्रव हाइड्रोजन
फ्लोराइड को विलायक के रूप में लेते हुए होने वाली अभिक्रियाओं को समझाइए।
Answer:
द्रव HF एक प्रोटॉनिक, आयनकारी विलायक है और इसमें निम्नलिखित प्रकार
की अभिक्रियाएँ होती हैं:
1.
प्रोटॉन स्थानांतरण अभिक्रिया:
HF ⇌ H⁺ + F⁻
2.
संकुल निर्माण:
BF₃ + HF → H⁺ + [BF₄]⁻
3.
विलायक अपघटन (Autoionization):
2HF ⇌ H₂F⁺ + F⁻
HF के ये गुण इसे एक विशिष्ट अम्लीय विलायक बनाते हैं।
प्रश्न 15: सल्फ्यूरिक
अम्ल को विलायक के रूप में लेकर होने वाली मुख्य रासायनिक अभिक्रियाओं का वर्णन
कीजिए।
Answer:
सल्फ्यूरिक अम्ल एक अत्यंत प्रबल प्रोटॉनिक तथा अपोलर
विलायक है। इसमें निम्नलिखित अभिक्रियाएँ होती हैं:
1.
अम्ल-क्षार अभिक्रिया:
NaHSO₄ + H₂SO₄ → Na⁺ + HSO₄⁻
2.
निर्जलीकरण अभिक्रिया:
C₂H₅OH + H₂SO₄ → C₂H₄ + H₂O
3.
सल्फोनेशन:
C₆H₆ + H₂SO₄ → C₆H₅SO₃H
प्रश्न 16: निम्नलिखित
अभिक्रियाओं को पूर्ण कीजिए –
(i) PbI₂ + 2KNH₂ → Pb(NH₂)₂ + 2KI
(ii) SO₂Cl₂ + 4NH₃ → S + 4NH₄Cl
(iii) SnI₄ + 4KNH₂ → Sn(NH₂)₄ + 4KI
(iv) NH₂CONH₂ + NH₃ → कोई अभिक्रिया नहीं
प्रश्न 17. निम्न
अभिक्रिया को पूर्ण कीजिए:
(i) AlCl₃ + [(CH₃)₄N]₂SO₃ (liq. SO₂) →
उत्तर: कोई अभिक्रिया नहीं होती क्योंकि AlCl₃ व [(CH₃)₄N]₂SO₃ के बीच SO₂ विलायक में
उपयुक्त सहसंयोजन नहीं होता।
(ii) C₆H₆ + SO₃ (liq. SO₂) →
उत्तर: कोई अभिक्रिया नहीं होती क्योंकि इस परिस्थिति
में सल्फोनेशन प्रतिक्रिया नहीं होती।
(iii) NbCl₅ (liq. SO₂) → NbCl₅·SO₂
उत्तर: यह एक संकुल निर्माण अभिक्रिया है जहाँ NbCl₅, SO₂ अणु से जुड़कर NbCl₅·SO₂ बनाता है।
(iv) Ag(CH₃COO) + SO₂Cl₂ (liq. SO₂) → CH₃COCl + AgCl + SO₂
उत्तर: यह एक रेडॉक्स एवं अवक्षेपण अभिक्रिया है जिसमें
CH₃COCl (एसिटाइल क्लोराइड), AgCl (अवक्षेप) और SO₂ बनते हैं।
(v) AlCl₃ + [(CH₃)₄N]₂SO₃ (liq. SO₂) →
उत्तर: यह दोहराया गया है, उत्तर ऊपर (i) में दिया गया।
(vi) SnI₄ + KNH₂ (liq. SO₂) →
उत्तर: SnI₄ + 4KNH₂ → Sn(NH₂)₄ + 4KI
यह एक संकुल निर्माण अभिक्रिया है जिसमें Sn(NH₂)₄ बनता है।
(vii) SOBr₂ + [(CH₃)₄N]₂SO₃ (liq. SO₂) →
उत्तर: कोई अभिक्रिया नहीं होती क्योंकि इन दो रसायनों
में कोई प्रत्यक्ष रासायनिक क्रिया नहीं देखी जाती।
(viii) SOCl₂ + CS₂SO₃ (liq. SO₂) →
उत्तर: अभिक्रिया होती है जिसमें संकुल यौगिक या
उपोत्पाद बन सकते हैं,
परन्तु विशेष उत्पाद की पुष्टि आवश्यक है।
(ix) HgI₂ + 2KI (liq. SO₂) → K₂[HgI₄]
उत्तर: यह संकुल निर्माण अभिक्रिया है। यहाँ HgI₂ और KI मिलकर K₂[HgI₄] बनाते हैं।
(x) Cr₂(SO₃)₃ + SO₂Cl₂ (liq. SO₂) →
उत्तर: संभावित रेडॉक्स अभिक्रिया हो सकती है, परंतु विशेष
उत्पाद को निश्चित रूप से प्रयोग से ज्ञात करना होगा।
प्रश्न 18. निम्नलिखित में
से संयुग्मी अम्ल एवं क्षार चुनिए -
HClO₄, OH⁻, CN⁻, H₂O, CH₄, H₂SO₄
उत्तर:
- Conjugate Acids (संयुग्मी अम्ल): HClO₄, H₂O, H₂SO₄, CH₄
- Conjugate Bases (संयुग्मी क्षार): OH⁻, CN⁻
प्रश्न 19. किसी अम्ल की
शक्ति किन कारकों पर निर्भर करती है?
उत्तर:
1.
केंद्रीय परमाणु की इलेक्ट्रोनगेटिविटी: अधिक
इलेक्ट्रोनगेटिव केंद्रीय परमाणु अम्लीयता बढ़ाता है।
2.
ऑक्सीकरण अवस्था: उच्च ऑक्सीकरण
अवस्था वाले अम्ल अधिक प्रबल होते हैं।
3.
प्रेरणिक प्रभाव (Inductive Effect): विद्युत ऋणात्मक समूह H⁺ को छोड़ने की प्रवृत्ति बढ़ाते हैं।
4.
आकार एवं बंध्यता: बड़े आकार वाले
आयन H⁺ को अधिक आसानी से छोड़ते हैं।
प्रश्न 20. HCN या HOCN में कौन प्रबल
अम्ल है? क्यों?
उत्तर:
HOCN, HCN से अधिक प्रबल अम्ल है क्योंकि इसमें -OH समूह
इलेक्ट्रॉनों को H⁺ से दूर खींचता है,
जिससे H⁺ आसानी से निकलता है। जबकि HCN में triple bond के कारण बंधन
बहुत मजबूत होता है और H⁺ का उत्सर्जन कठिन होता है।
प्रश्न 21. लुईस अवधारणा
से CO₂ की अम्लीय प्रवृत्ति को समझाइए।
उत्तर:
लुईस अवधारणा के अनुसार, अम्ल वह है जो इलेक्ट्रॉन युग्म को स्वीकार करता
है। CO₂ में कार्बन इलेक्ट्रॉन युग्म को ग्रहण कर सकता है क्योंकि वह इलेक्ट्रॉन की
कमी रखता है। इस कारण CO₂ एक लुईस अम्ल है और क्षारकों के साथ अभिक्रिया कर सकता है।
प्रश्न 22. अजलिया
(गैर-जलीय) विलायकों में संकुल निर्माण अभिक्रियाओं पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
गैर-जलीय विलायकों जैसे द्रव NH₃, SO₂ आदि में संकुल निर्माण
(Complex formation) महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। ये विलायक विशेष प्रकार के आयनों या अणुओं को
स्थायित्व देने में सक्षम होते हैं।
उदाहरण:
- द्रव NH₃ में Cu²⁺ + 4NH₃ → [Cu(NH₃)₄]²⁺
- SO₂ में NbCl₅ + SO₂ → NbCl₅·SO₂
इन अभिक्रियाओं में विलायक सक्रिय रूप से जटिल यौगिकों को बनाने में भाग लेता है, जिससे विलयन की रासायनिक क्रियाएं नियंत्रित होती हैं।





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