B.Sc 2nd year chemistry 1st paper inorganic chemistry unit 3

 

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                   इस ब्लॉग में केवल अकार्बनिक रसायन विज्ञान की  तीसरा  इकाई के प्रश्न और उत्तर हैं तथा चौथा  से छठी इकाई के प्रश्न अगले 

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________________________________

बी.एस-सी. द्वितीय वर्ष – रसायन (प्रथम प्रश्न-पत्र)

प्रश्न-सूची (छत्तीसगढ़)

_________________इकाई 3________________



1

2

3

4

5



प्रश्न 1. द्विलवण एवं सम्मिश्रलवण को उदाहरण सहित समझाइए।

द्विलवण (Double salts): जब दो या अधिक साधारण लवण crystallization के समय एक निश्चित अनुपात में मिलते हैं और एक नया crystalline पदार्थ बनाते हैं, तो इसे द्विलवण कहते हैं। ये पानी में घुलने पर अपने-अपने आयनों में टूट जाते हैं।

उदाहरण:
Potash alum – kal(SO₄)₂·12H₂O
यह पानी में घुलने पर K⁺, Al³⁺ और SO₄²⁻ आयन में विभाजित हो जाता है।

सम्मिश्रलवण (Complex salts): ये ऐसे यौगिक होते हैं जिनमें एक केंद्रीय धातु आयन (central metal ion) के चारों ओर लिगैंड्स (ligands) द्वारा बने जटिल आयन होते हैं। यह पानी में घुलने पर भी अपने जटिल आयन को बनाए रखते हैं।

उदाहरण:
K₄[Fe(CN)₆] →
पानी में घुलने पर K⁺ + [Fe(CN)₆]⁴⁻


प्रश्न 2.  निम्नलिखित को समझाइए:

(i) जटिल या जटिल आयन (Complex Ion):
ऐसा आयन जिसमें एक केंद्रीय धातु आयन (metal ion) के चारों ओर लिगैंड्स लगे हों, जिससे एक coordination entity बनती है।
उदाहरण: [Cu(NH₃)₄]²⁺

(ii) लिगैंड (Ligand):
ऐसे आयन या अणु जो केंद्रीय धातु आयन से coordinate bond बनाकर जुड़ते हैं।
उदाहरण: H₂O, NH₃, Cl⁻, CN⁻

(iii) कीलेट (Chelate):
ऐसे complex जिसमें एक लिगैंड के एक से अधिक donor atoms एक ही central atom से जुड़ते हैं।
उदाहरण: [Cu(EDTA)]²⁻ (EDTA एक कीलेटिंग एजेंट है)

(iv) उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number):
किसी जटिल यौगिक में केंद्रीय धातु आयन से सीधे जुड़े हुए लिगैंड्स की कुल संख्या।
उदाहरण: [Cr(NH₃)₆]³⁺ में उपसहसंयोजन संख्या = 6

(v) उपसहसंयोजन क्षेत्र (Coordination Sphere):
जटिल यौगिक में वो भाग जो central metal और उससे जुड़े लिगैंड्स को दर्शाता है, उसे square brackets में लिखा जाता है।
उदाहरण: [Co(NH₃)₆]Cl₃ में [Co(NH₃)₆]³⁺ = उपसहसंयोजन क्षेत्र


प्रश्न 3. (अ)वर्नर के समन्वय सिद्धांत का वर्णन करें। यह कोबाल्ट अमीन पर कैसे लागू होता है?

Werner’s Coordination Theory (1893):
Alfred Werner
ने समन्वय यौगिकों के निर्माण के पीछे का सिद्धांत दिया:

धातु आयन में दो प्रकार की संयोजकता होती है:
(i)
प्राथमिक संयोजकता (Primary Valency) – आयनिक होती है (oxidation state)
(ii)
द्वितीयक संयोजकता (Secondary Valency) – यह उपसहसंयोजन संख्या के बराबर होती है (coordination number)

Co(NH₃)₆Cl₃ में:

Primary valency (oxidation state of Co) = +3 → Cl⁻ ions से पूरी होती है

Secondary valency = 6 → NH₃ लिगैंड्स से पूरी होती है

यह compound आयन में dissociate होता है:
Co(NH₃)₆Cl₃ → [Co(NH₃)₆]³⁺ + 3Cl⁻
इससे सिद्धांत की पुष्टि होती है।


(ब) उदाहरण सहित EAN नियम की व्याख्या कीजिए।

EAN Rule (Effective Atomic Number Rule):
Siddgwick
द्वारा दिया गया नियम। इसमें बताया गया कि complex बनाने के बाद central atom का कुल इलेक्ट्रॉन नंबर noble gas के atomic number के बराबर होता है।

EAN = Atomic number of metal – oxidation state + electrons donated by ligands

उदाहरण: [Fe(CN)₆]⁴⁻

Fe का atomic number = 26

Oxidation state = +2

6 CN⁻ ligands × 2e⁻ = 12 electrons
EAN = 26 – 2 + 12 = 36 (which is equal to Kr noble gas)


प्रश्न4  वर्नर के सिद्धांत के आधार पर cocl₃ के साथ NH₃ के कुछ समन्वय यौगिकों के निर्माण की     व्याख्या करें।

Werner ने cocl₃ और NH₃ के साथ बने विभिन्न complexes का अध्ययन किया:

Cocl₃·6NH₃ → [Co(NH₃)₆]Cl₃

Yellow, 3 ions, no Cl⁻ ppt with agno₃

Cocl₃·5NH₃ → [Co(NH₃)₅Cl]Cl₂

Purple, 2 ions, 1 Cl⁻ ppt with agno₃

Cocl₃·4NH₃ → [Co(NH₃)₄Cl₂]Cl

Green, 2 ions, 1 Cl⁻ ppt with agno₃

इससे सिद्ध होता है कि कुछ Cl⁻ ions complex के अंदर हैं और कुछ बाहर free होते हैं।


प्रश्न 5 (अ)    कीलेट क्या हैं? उदाहरणों और उपयोगों के साथ उनके वर्गीकरण पर चर्चा करें।

कीलेट (Chelates):
ऐसे complex compounds जिनमें लिगैंड के एक से अधिक donor atom होते हैं और वो central metal ion से ring बनाते हैं।

Types of Chelates:

Bidentate Ligands: जैसे – Ethylenediamine (en)
Complex: [Ni(en)₃]²⁺

Polydentate Ligands: जैसे – EDTA
Complex: [Cu(EDTA)]²⁻

Uses of Chelates:

Medicine: Chelation therapy (lead poisoning)

Agriculture: Micronutrient supply

Analytical chemistry: Metal ion detection


प्रश्न 5 (ब).    कीलेट क्या है? परिसर की स्थिरता को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन करें।

Chelate – ऊपर समझा चुका हूँ।

Complex की Stability को प्रभावित करने वाले कारक:

Chelate Effect – Chelating ligands ज्यादा stable complex बनाते हैं।

Ring Size – 5 या 6 membered rings ज्यादा stable होती हैं।

Number of Donor Atoms – ज्यादा donor atoms → ज्यादा stability

Nature of Metal Ion – Smaller size and higher charge वाला metal → ज्यादा stable complex बनाता है।


प्रश्न 5 (स).    कीलेट और आंतरिक संकुलों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखें।

Chelates – ऊपर समझाया।

आंतरिक संकुल (Inner Complexes):
ऐसे समन्वय यौगिक जिनमें लिगैंड acid और base दोनों की तरह काम करते हैं और salt-like behavior show नहीं करते।

Example:
[Co(en)₃]³⁺ → inner complex salt
इनमें complex ion और counter ion नहीं होते।

प्रश्न 7।        IUPAC पप्रणाली के अनुसार सूत्र लिखिए

               (i) पोटेशियम हेक्सासायनोफेरेट (II)
→ K₄[Fe(CN)₆]

(ii) हेक्सानाइट्रोकोबाल्टेट (III) आयन
→ [Co(NO₂)₆]³⁻

(iii) पोटेशियम ट्रायऑक्सालैटोएल्युमिनेट (III)
→ K₃[Al(C₂O₄)₃]
या
पोटेशियम ट्रायऑक्सालैटोफेरेट (III)
→ K₃[Fe(C₂O₄)₃]

(iv) सोडियम पेंटासायनोनाइट्रोसिलफेरेट (III)
→ Na₂[Fe(CN)₅(NO)]

(v) डाइक्लोरोबिस(एथिलीनडायमाइन)कोबाल्ट(III) क्लोराइड
→ [Co(en)₂Cl₂]Cl

(vi) हेक्साअमीनकोबाल्ट(III) हेक्सासायनोक्रोमेट(III)
→ [Co(NH₃)₆][Cr(CN)₆]

(vii) डाइअमीनसिल्वर(I) आयन
→ [Ag(NH₃)₂]⁺

(viii) ट्रिस(एथिलीनडायमाइन)कोबाल्ट(III) सल्फेट
→ [Co(en)₃]₂(SO₄)₃

(ix) डाइथियोसाइनेटो टेट्राअमीनप्लैटिनम(IV) क्लोराइड
→ [Pt(NH₃)₄(SCN)₂]Cl₂

(x) µ-एमीडो-µ-हाइड्रॉक्सो-ऑक्टाअमीन डाइकोबाल्ट(III) आयन
→ [{Co(NH₃)₄}₂(μ-NH₂)(μ-OH)]⁴⁺

(xi) टेट्रासायनोनिकलेट (II) आयन
→ [Ni(CN)₄]²⁻

(xii) क्लोरोपेंटाअमीनकोबाल्ट(III) आयन
→ [Co(NH₃)₅Cl]²⁺

(xiii) डाइक्लोरो टेट्राएक्वा क्रोमियम(III) आयन
→ [Cr(H₂O)₄Cl₂]⁺

(xiv) Cloro-nitrotetramine Platinum(IV) Sulfate
उत्तर:
[Pt(NH₃)₄(NO₂)Cl]SO₄
IUPAC
नाम: tetraamminechloronitroplatinum(IV) sulfate


(xv) Dichloro bis(ethylenediamine) Nickel(IV) ion
उत्तर:
[Ni(en)₂Cl₂]²⁺
IUPAC
नाम: dichlorobis(ethane-1,2-diamine)nickel(IV) ion


(xvi) Dichloro bis methylamine Copper(II)
उत्तर:
[Cu(CH₃NH₂)₂Cl₂]
IUPAC
नाम: dichlorobis(methylamine)copper(II)


(xvii) Tetrakis(pyridine)platinum(2+) tetrachloroplatinate(2−)
उत्तर:
[Pt(py)₄][ptcl₄]
IUPAC
नाम: tetrakis(pyridine)platinum(II) tetrachloroplatinate(II)


(xviii) μ-Hydroxy, bis(pentaammine chromium III) bromide
उत्तर:
[(NH₃)₅Cr(μ-OH)Cr(NH₃)₅]Br₅
IUPAC
नाम: μ-hydroxo-bis(pentaamminechromium(III)) bromide


(xix) Trinitro, triamine cobalt (III)
उत्तर:
[Co(NO₂)₃(NH₃)₃]
IUPAC
नाम: trinitrotriamminecobalt(III)


(xx) Dicyano tetrachloroplatinum (IV)
उत्तर:
[Pt(CN)₂Cl₄]²⁻
IUPAC
नाम: dicyanotetrachloroplatinate(IV) ion


(xxi) Isothiocyanatopentammine cobalt (III) chloride
उत्तर:
[Co(NH₃)₅(NCS)]Cl₂
IUPAC
नाम: isothiocyanatopentaamminecobalt(III) chloride


(xxii) Hydrogen tetrachloroaurate (III)
उत्तर:
H[aucl₄]
IUPAC
नाम: hydrogentetrachloroaurate(III)

प्रश्न 8. IUPAC का नाम लिखिए     

              (i) NH₄[Cr(SCN)₄(NH₃)₂]
Ammonium tetra(thiocyanato)diamminechromate(III)

(ii) [Pt(NH₃)₆]Cl₄
Hexaammineplatinum(IV) chloride

(iii) [Pt(NH₃)₆]Cl₄
(Same as above) Hexaammineplatinum(IV) chloride

(iv) [Co(NH₃)₅Cl]SO₄
Pentaamminechloridocobalt(III) sulfate

(v) K₄[Ni(CN)₄]
Potassium tetracyanonickelate(II)

(vi) [Cr(NH₃)₆]Cl₃
Hexaamminechromium(III) chloride

(vii) [crf₆]³⁻
Hexafluorochromate(III) ion

(viii) [Pt(en)₃]²⁺
Tris(ethylenediamine)platinum(II) ion

(ix) K₃[Fe(CN)₅CO]
Potassium pentacyanocarbonylferrate(II)

(x) K[Fe(H₂O)₂(SCN)₂(OH)₂]
Potassium diaquabis(thiocyanato)dihydroxyferrate(III)

(xi) Na₃[alf₆]
Sodium hexafluoroaluminate(III)

(xii) K₃[Fe(C₂O₄)₃]
Potassium tris(oxalato)ferrate(III)

(xiii) [Cr(H₂O)₄Cl₂]Cl
Tetraaquadichlorochromium(III) chloride

(xiv) [Ni(CO)₄]
Tetracarbonylnickel(0)

(xv) [Cr(en)I₄]⁻
Tetraiodo(ethylenediamine)chromate(III) ion

(xvi) [Cr(NH₃)₃Cl₃]
Triammine trichlorochromium(III)

(xvii) [Pd(H₂O)₂(ONO)₂I₂]
Diaquabis(nitrito-κo)diiodopalladium(IV)

(xviii) [Co(NH₃)₆][cof₆]
Hexaamminecobalt(III) hexafluorocobaltate(III)

(xix) [Pt(NH₃)₂Cl₂]
Diamminedichloroplatinum(II)

(xx) [Co(NCS)(NH₃)₅]Cl₂
Pentaammine(isothiocyanato)cobalt(III) chloride

(xxi) [Ni(en)₂Cl₂]²⁺
Dichlorobis(ethylenediamine)nickel(II) ion

(xxii) [Co(NO₂)₃(NH₃)₃]
Triamminetrinitritocobalt(III)

(xxiii) K₂[ptcl₆]
Potassium hexachloroplatinate(IV)

(xxiv) Na₃[Fe(C₂O₄)₃]
Sodium tris(oxalato)ferrate(III)

(xxv) K₃[Fe(CN)₆]
Potassium hexacyanoferrate(III)

(xxvi) [Co(en)₃]₂SO₄
Tris(ethylenediamine)cobalt(III) sulfate

(xxvii) [Cr(NH₃)₆][cof₆]
Hexaamminechromium(III) hexafluorocobaltate(III)

(xxviii) [Cr(SCN)₄(NH₃)₂]⁻
Tetrathiocyanatodiamminechromate(III) ion

[Ni(CN)₂Cl₂]²⁻
Dicyanodichloronickelate(II) ion

[Co(NH₃)₆][Cr(CN)₆]
Hexaamminecobalt(III) hexacyanochromate(III)

प्रश्न 10       (a) उपसहसंयोजन संख्या 6 वाले संकुलों में स्टीरियोआइसोमेरिज्म का विस्तार से वर्णन

             कीजिए।

(a) Explain the stereoisomerism in coordination complexes with coordination number 6.

उत्तर:
जब किसी संयोजन यौगिक में उपसहसंयोजन संख्या (Coordination Number) 6 होती है, तो वह अधिकतर ऑक्टाहेड्रल (Octahedral geometry) को दर्शाता है। ऐसे यौगिकों में stereoisomerism (स्थानिक समावयवता) के दो प्रमुख प्रकार देखे जाते हैं:


1. ज्यामितीय समावयवता (Geometrical Isomerism):

Octahedral संयोजकों में यह तब उत्पन्न होती है जब एक जैसे या भिन्न प्रकार के लिगैंड अलग-अलग पोजिशन में उपस्थित होते हैं।

उदाहरण 1:
[Co(NH3)4Cl2]+[Co(NH₃)₄Cl₂]^+[Co(NH3​)4​Cl2​]+
यह दो समावयवी बनाता है:

Cis-isomer: दोनों Cl पास-पास (adjacent)

Trans-isomer: दोनों Cl विपरीत दिशा में (opposite)

उदाहरण 2:
[Pt(NH3)2Cl2][Pt(NH₃)₂Cl₂][Pt(NH3​)2​Cl2​]
यह भी cis और trans isomers देता है।


2. प्रकाशीय समावयवता (Optical Isomerism):

यह तब दिखाई देती है जब यौगिक का कोई समावयवी दर्पण-प्रतिबिंब की तरह हो लेकिन अधिरूपण न कर सके (non-superimposable mirror image)। इसे enantioisomerism भी कहते हैं।

उदाहरण 1:
[Co(en)3]3+[Co(en)₃]^{3+}[Co(en)3​]3+
यह दो प्रकाशीय समावयवी बनाता है – dextro (d) और levo (l)

उदाहरण 2:
[Cr(ox)3]3−[Cr(ox)₃]^{3-}[Cr(ox)3​]3−
(ox =
ऑक्सालेट = bidentate ligand), यह भी d और l समावयवी बनाता है।


🔹 नोट: यदि संयोजन में दो या दो से अधिक bidentate ligand होते हैं तो उनमें प्रकाशीय समावयवता की संभावना अधिक होती है।


(b) आंतरिक एवं बाह्य कक्षीय संकुलों से क्या तात्पर्य है? प्रत्येक के दो उदाहरण देकर समझाइए।

(b) What is meant by inner and outer orbital complexes? Explain with two examples each.

उत्तर:
Coordination compounds
में, जब कोई धातु आयन अपने d-orbitals को उपयोग में लाकर लिगैंड के साथ बंध बनाता है, तो उसके दो प्रकार हो सकते हैं:


1. आंतरिक कक्षीय संकुल (Inner Orbital Complexes):

जब केंद्रीय धातु आयन अपने (n-1)d-orbitals (यानी inner d-orbitals) को उपसहसंयोजन के लिए उपयोग करता है, तो उसे आंतरिक कक्षीय संकुल कहते हैं।

🔹 ये complexes सामान्यतः low spin या inner orbital complexes होते हैं।
🔹 इनमें pairing होती है और d-orbitals अंदर से काम में ली जाती हैं।

उदाहरण:

[Fe(CN)6]3−[Fe(CN)₆]^{3-}[Fe(CN)6​]3− → low spin, inner d-orbitals used

[Co(NH3)6]3+[Co(NH₃)₆]^{3+}[Co(NH3​)6​]3+ → inner orbital d⁶ low spin complex


2. बाह्य कक्षीय संकुल (Outer Orbital Complexes):

जब केंद्रीय धातु आयन अपने nd-orbitals (outer d-orbitals) को उपसहसंयोजन के लिए उपयोग करता है, तो वह बाह्य कक्षीय संकुल कहलाता है।

🔹 ये complexes सामान्यतः high spin या outer orbital complexes होते हैं।
🔹 इनमें pairing नहीं होती और electron outer orbitals में रहते हैं।

उदाहरण:

[fef6]3−[fef₆]^{3-}[fef6​]3− → high spin, outer d-orbitals used

[cof6]3−[cof₆]^{3-}[cof6​]3− → high spin outer orbital complex


🔸 मुख्य अंतर:

आंतरिक कक्षीय संकुल: low spin, inner orbitals (d-orbitals)

बाह्य कक्षीय संकुल: high spin, outer orbitals (d-orbitals)

प्रश्न 11.       (i) समावयवता के प्रकार:

(ए) [Co(NH₃)₄(NO₂)Cl] और [Co(NH₃)₄Cl]NO₂
👉 आयन समावयवता (Ionization Isomerism)
➡️ पहले यौगिक में NO₂ आयन लिगैंड के रूप में जुड़ा है और Cl आयन के रूप में बाहर है, जबकि दूसरे में उल्टा है।
उदाहरण:

[Co(NH₃)₄(NO₂)Cl] Co(NH₃)₄Cl

एक NO₂⁻ और एक Cl⁻ का स्थान-परिवर्तन हुआ है।

(बी) [Pt(NH₃)₄][ptcl₆] और [Pt(NH₃)₄Cl₂][ptcl₄]
👉 संयोजन समावयवता (Coordination Isomerism)
➡️ दोनों यौगिकों में दो विभिन्न धातु केंद्र हैं (Pt⁴⁺ और Pt²⁺) जिनके लिगैंड आपस में अदल-बदल हुए हैं।

(सी) [Cr(H₂O)₅(SCN)]²⁺ और [Cr(H₂O)₅(NCS)]²⁺
👉 लिंकज समावयवता (Linkage Isomerism)
➡️ SCN⁻ द्विदंशी लिगैंड है जो N या S दोनों के द्वारा जुड़ सकता है।

पहले में SCN नाइट्रोजन द्वारा जुड़ा है।

दूसरे में NCS सल्फर द्वारा जुड़ा है।

(घ) [Cr(NH₃)₅Br]SO₄ और [Cr(NH₃)₅SO₄]Br
👉 आयन समावयवता (Ionization Isomerism)
➡️ एक में Br⁻ मुक्त आयन है और दूसरे में SO₄²⁻


(ii) जल में घोलने पर मिलने वाले आयनों की संख्या:

(ए) [Co(NH₃)₄Cl₂]Cl
➡️ यह यौगिक आयनित होगा:
[Co(NH3)4Cl2]++Cl−[Co(NH₃)₄Cl₂]^+ + Cl^-[Co(NH3​)4​Cl2​]++Cl−
कुल आयन = 2

(बी) K₄[Fe(CN)₆]
➡️ यह आयनित होगा:
4K++[Fe(CN)6]4−4K^+ + [Fe(CN)₆]^{4-}4K++[Fe(CN)6​]4−
कुल आयन = 5

(सी) Na₂[Fe(CN)₅NO]
➡️ यह आयनित होगा:
2Na++[Fe(CN)5NO]2−2Na^+ + [Fe(CN)₅NO]^{2-}2Na++[Fe(CN)5​NO]2−
कुल आयन = 3

(घ) fecl₃
➡️ यह आयनित होगा:
Fe3++3Cl−Fe^{3+} + 3Cl^-Fe3++3Cl−
कुल आयन = 4


(iii) यौगिकों की पहचान कैसे करें:

(ए) [Co(NH₃)₆]Cl₃ और [Co(NH₃)₄Cl₂]Cl
➡️ सिल्वर नाइट्रेट (agno₃) के साथ प्रतिक्रिया:

[Co(NH₃)₆]Cl₃ देगा 3 मोल agcl,

[Co(NH₃)₄Cl₂]Cl देगा 1 मोल agcl
इससे Cl⁻ की संख्या से पहचान संभव है।

(बी) [Co(NH₃)₃Cl₃] और [Co(NH₃)₅Cl]Cl₂
➡️ agno₃ के साथ:

पहला यौगिक कोई Cl⁻ मुक्त नहीं करेगा (सभी लिगैंड से जुड़े हैं)।

दूसरा देगा 2 मोल agcl
इससे पहचान हो सकती है।

(सी) K₄[Fe(CN)₆] और K₃[Fe(CN)₆]
➡️ ऑक्सीकरण अवस्था और आयनिकता अलग है:

K₄ वाला यौगिक Fe²⁺ का है,

K₃ वाला Fe³⁺ का।
पहचान रासायनिक ऑक्सीकरण या लाल-भूरे प्रूशियन ब्लू परीक्षण से की जाती है।


प्रश्न 12.  बहुनाभिकीय यौगिकों पर टिप्पणी:

बहुनाभिकीय यौगिक (Polynuclear or Multinuclear Complexes):
वे यौगिक जिनमें एक से अधिक धातु केंद्र उपस्थित होते हैं और ये धातुएँ आपस में ब्रिजिंग लिगैंड द्वारा जुड़ी होती हैं।

उदाहरण:

[μ−OH(Co(NH3)5)]2[μ-OH(Co(NH₃)₅)]₂[μ−OH(Co(NH3​)5​)]2​³⁺

[μ−NH2(Co(NH3)5)]2[μ-NH₂(Co(NH₃)₅)]₂[μ−NH2​(Co(NH3​)5​)]2​³⁺
ये यौगिक जटिल, स्थिर और विशिष्ट भौतिक-रासायनिक गुण रखते हैं।


प्रश्न 13.   संभावित ज्यामितियाँ:

(i) [Pt(NH₃)₂(Cl)(Br)]⁰
➡️ यह Pt(II) संकुल है (d⁸ configuration) → Square planar geometry
समतलीय, जिसमें NH₃, Cl, Br चारों एक ही तल में।

(ii) [Pt(NH₃)₂(NO₂)₂]⁰
➡️ Square planar geometry (Pt²⁺)
यह यौगिक cis और trans आइसोमर दिखा सकता है।

(iii) [Co(en)₂Cl₂]⁺
➡️ Co³⁺ (d⁶) संकुल Octahedral geometry
दो en लिगैंड और दो Cl⁻ → cis-trans isomerism संभव।

प्रश्न 14:       निम्नलिखित युग्मों में किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित होती है?

(i) [Co(NH₃)₄(NO₂)]Cl और [Co(NH₃)₄Cl]NO₂

➡️ आयनन समावयवता (Ionization isomerism)

पहले यौगिक में NO₂⁻ धातु से जुड़ा है और Cl⁻ आयन के रूप में है।

दूसरे में Cl⁻ धातु से जुड़ा है और NO₂⁻ आयन के रूप में है।

जल में घुलने पर दोनों से अलग-अलग आयन बनते हैं।


(ii) [Pt(NH₃)₄][ptcl₆] और [Pt(NH₃)₄Cl₂][ptcl₄]

➡️ संयोजन समावयवता (Coordination isomerism)

इन यौगिकों में दो धात्विक केंद्र हैं और लिगैंड्स का आदान-प्रदान हुआ है।

एक ही प्रकार के लिगैंड दो अलग-अलग धातुओं से जुड़े हैं।


(iii) [Cr(H₂O)₅(SCN)]²⁺ और [Cr(H₂O)₅(NCS)]²⁺

➡️ संयोजक समावयवता (Linkage isomerism)

SCN⁻ लिगैंड ambidentate होता है – यह धातु से या तो सल्फर (SCN) या नाइट्रोजन (NCS) के माध्यम से जुड़ सकता है।


प्रश्न 15 :      निम्नलिखित परिसर किस प्रकार की समावयवता प्रदर्शित करेगा? समावयवों के सूत्र

             लिखिए:

(i) [Co(NH₃)₅Br]SO₄

➡️ आयनन समावयवता (Ionization isomerism)

समावयव:

[Co(NH₃)₅Br]SO₄

[Co(NH₃)₅SO₄]Br


(ii) [Co(NH₃)₄Cl₂]

➡️ ज्यामितीय समावयवता (Geometrical isomerism)

Octahedral कोआर्डिनेशन में यह cis और trans दो रूपों में हो सकता है।

समावयव:

Cis–[Co(NH₃)₄Cl₂] (Cl दोनों पास में)

Trans–[Co(NH₃)₄Cl₂] (Cl आमने-सामने)


प्रश्न 16: निम्नलिखित की संरचना लिखिए:

(i) [Au(CN)₂]⁺

➡️ Linear geometry (Au⁺ → d¹⁰ configuration)
संरचना:

Copyedit

  CN–Au–CN

(ii) [hgi₃]⁻

➡️ Linear या Trigonal Planar संरचना
संरचना (संभवतः त्रिकोणीय समतलीय):

      I

      |

I — Hg — I


प्रश्न 17: निम्नलिखित का रासायनिक सूत्र लिखिए:

(i) आइसोथियोसाइनाटो पेंटामाइन कोबाल्ट (III) क्लोराइड

➡️ [Co(NH₃)₅(NCS)]Cl₂
(NCS⁻
से नाइट्रोजन के माध्यम से जुड़ा हुआ – आइसोथियोसाइनाटो)

(ii) हाइड्रोजन टेट्राक्लोरोऑरेट (III)

➡️ H[aucl₄]
(Au³⁺
के चार क्लोराइड लिगैंड और एक H⁺)

 प्रश्न 18:       IUPAC नाम लिखिए

(i) [(C₅H₅)(CO)Fe(CO)(C₅H₅)]
IUPAC नाम: Bis(cyclopentadienyl)iron dicarbonyl
यह एक सैंडविच यौगिक है, जिसमें Fe के दोनों ओर cyclopentadienyl (C₅H₅) रिंग लगी है और साथ में दो carbonyl (CO) समूह जुड़े हैं।


(ii) [cri₄(en)]⁻
IUPAC नाम: Tetraiodido(ethane-1,2-diamine)chromate(III)
यहाँ, 'en' का मतलब है ethylenediamine और क्रोमियम की ऑक्सीकरण अवस्था +3 है।


(iii)

[Co(NH₃)₄(NO₂)]Cl
Tetrammine nitrito-N cobalt(III) chloride
यहाँ NO₂⁻ ligand नाइट्रोजन से जुड़ा है, इसलिए nitrito-N लिखा गया है।

[Co(NH₃)₄Cl]NO₂
Tetrammine chlorido cobalt(III) nitrite
यहाँ NO₂⁻ एक आयन के रूप में बाहर है।


 प्रश्न 19:      ऑक्सीकरण संरचना की गणना कीजिए

(a) H₂S₂O₂
संरचना: H–S–S–OH (थियोहाइड्रॉक्सिलिक एसिड)
→ Oxidation state:

दोनों S की oxidation state = –1 (average)

(b) H₂S₂O₄
संरचना: HO–S(=O)–S(=O)–OH (थियोसल्फ्यूरस एसिड)
→ S–S bridge
एक S = +5, दूसरा S = +1
औसत oxidation state = +3

(c) S₂O₈²⁻ (Peroxodisulfate ion)
संरचना: O₃S–O–O–SO₃²⁻
हर S = +6 oxidation state
औसत S = +6

(d) H₂SO₅ (Peroxymonosulfuric acid / Caro’s acid)
संरचना: HO–O–S(=O)₂–OH
→ S = +6 oxidation state


 प्रश्न 20:      प्लैटिनम (IV) के संकुलों के दो उदाहरण

[ptcl₆]²⁻ → Hexachloroplatinate(IV) ion

[Pt(NH₃)₄Cl₂]²⁺ → Tetraammine dichloroplatinum(IV) ion

(ध्यान दें कि Pt(IV) की संयोजन संख्या आमत: 6 होती है)


प्रश्न 21:       निम्न की संरचनाएँ बताइए

(i) [Ag(CN)₂]⁻
Linear structure (सीधा रेखीय)
CN ligands के दो छोर, Ag केंद्र में
NC–Ag–CN⁻ (Bond angle = 180°)

(ii) [Rh(CO)₄]⁻
Square planar structure
Rhodium center के चारों ओर चार carbonyl ligands (CO)
Geometry: Square planar, typical for d⁸ configuration metal complexes


इकाई 3 (ख)


प्रश्न 1: संयोजकता बंध सिद्धांत के आधार पर धातु लिगैंड बंध को समझाइए।

उत्तर:
संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory – VBT) के अनुसार, किसी भी धातु आयन और लिगैंड के बीच बनने वाला बंध समन्वय (coordinate) प्रकार का होता है, जिसमें लिगैंड अपने lone pair को धातु के खाली कक्षों में donate करता है। धातु आयन के उपयुक्त ऑर्बिटल्स (s, p, d) हाइब्रिडाइज होकर नया ऑर्बिटल बनाते हैं जिसमें लिगैंड इलेक्ट्रॉन जोड़े प्रदान करते हैं।

उदाहरण:
[Co(NH3)6]3+[Co(NH_3)_6]^{3+}[Co(NH3​)6​]3+
यहाँ Co³⁺ आयन की d2sp3d^2sp^3d2sp3 हाइब्रिडाइजेशन होती है जिससे ऑक्टाहेड्रल आकृति बनती है।


प्रश्न 2: VBT के आधार पर उप-संयोजन संख्या 6 वाले संकुलों के निर्माण को समझाइए।

उत्तर:
जब संयोजन संख्या 6 होती है, तो धातु के छह कक्षा (orbital) हाइब्रिडाइज होकर d2sp3d^2sp^3d2sp3 या sp3d2sp^3d^2sp3d2 हाइब्रिड ऑर्बिटल्स बनाते हैं।

आंतरिक कक्षा संकुल: यदि 3d ऑर्बिटल्स प्रयोग में आते हैं d2sp3d^2sp^3d2sp3

बाह्य कक्षा संकुल: यदि 4d ऑर्बिटल्स प्रयोग में आते हैं sp3d2sp^3d^2sp3d2

उदाहरण:

[Cr(NH3)6]3+[Cr(NH_3)_6]^{3+} [Cr(NH3​)6​]3+ → d2sp3d^2sp^3d2sp3 (आंतरिक कक्षा संकुल)


प्रश्न 3: VBT के आधार पर उप-संयोजन संख्या 4 वाले संकुलों की आकृति समझाइए।

उत्तर:
संयोजन संख्या 4 वाले संकुल दो प्रकार की आकृतियाँ दर्शाते हैं:

टेट्राहेड्रल (sp³ हाइब्रिडाइजेशन)

वर्ग चतुर्भुजाकार (Square Planar) — dsp² हाइब्रिडाइजेशन

उदाहरण:

[Ni(CO)4][Ni(CO)_4][Ni(CO)4​] → sp³ → टेट्राहेड्रल

[ptcl4]2−[ptcl_4]^{2-}[ptcl4​]2− → dsp² → वर्ग चतुर्भुजाकार


प्रश्न 4: निम्नलिखित यौगिकों की संरचना VBT से समझाइए –

(i) [cof6]3−[cof_6]^{3-}[cof6​]3−:
F⁻
कमजोर लिगैंड है sp3d2sp^3d^2sp3d2 हाइब्रिडाइजेशन बाह्य कक्षा संकुल, paramagnetic
(ii) [mncl4]2−[mncl_4]^{2-}[mncl4​]2−:
Cl⁻
कमजोर लिगैंड sp³ हाइब्रिडाइजेशन टेट्राहेड्रल
(iii) [Co(NH3)6]3+[Co(NH_3)_6]^{3+}[Co(NH3​)6​]3+:
NH₃
मजबूत लिगैंड d2sp3d^2sp^3d2sp3 → ऑक्टाहेड्रल, diamagnetic
(iv) [Ni(CO)4][Ni(CO)_4][Ni(CO)4​]:
CO
मजबूत लिगैंड sp³ हाइब्रिडाइजेशन टेट्राहेड्रल, diamagnetic
(v) [Cu(CN)4]2−[Cu(CN)_4]^{2-}[Cu(CN)4​]2−:
CN⁻
मजबूत लिगैंड dsp² हाइब्रिडाइजेशन वर्ग चतुर्भुजाकार


प्रश्न 5: Square Planar Complexes प्रकाशीय समावयवता क्यों नहीं दर्शाते?

उत्तर:
Square planar complexes
जैसे [ptcl4]2−[ptcl_4]^{2-}[ptcl4​]2− में चारों लिगैंड एक ही समतल (plane) में होते हैं और लिगैंड्स की स्थिति एक जैसी होने के कारण कोई चiral center नहीं बनता। अतः ये प्रकाशीय समावयवता नहीं दर्शाते।

भौगोलिक समावयवता न होने का कारण:
चतुर्भुजाकार आकृति में लिगैंड्स की स्थिति rigid होती है और rearrangement से कोई नया समावयव नहीं बनता, अतः समावयवता नहीं होती।


प्रश्न 6: केंद्रीय धातु परमाणु पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:
केंद्रीय धातु परमाणु वह होता है जो जटिल यौगिक में लिगैंड्स के साथ समन्वय बंध बनाता है। यह आमतौर पर एक धातु आयन होता है जिसकी कुछ खाली ऑर्बिटल्स होती हैं जहाँ लिगैंड्स अपने lone pair donate करते हैं। यह यौगिक की संरचना, संयोजन संख्या और चुम्बकीय गुण तय करता है।


प्रश्न 7 (क): संयोजकता बंध सिद्धांत की सीमाएँ क्या हैं?

उत्तर:

यह संकुल की रंग और स्पेक्ट्रा को नहीं समझा पाता।

केवल हाइब्रिडाइजेशन पर आधारित है, इलेक्ट्रॉन रिपल्शन की अनदेखी करता है।

Crystal Field Splitting की व्याख्या नहीं कर पाता।

Π-bonding की कोई चर्चा नहीं करता।


प्रश्न 7 (ख): आंतरिक ऑर्बिटल संकुल एवं बाह्य ऑर्बिटल संकुल के उदाहरण दीजिए।

उत्तर:

आंतरिक ऑर्बिटल संकुल (Inner Orbital Complex):
[Co(NH3)6]3+[Co(NH_3)_6]^{3+}[Co(NH3​)6​]3+, [Fe(CN)6]4−[Fe(CN)_6]^{4-}[Fe(CN)6​]4−
→ d2sp3d^2sp^3d2sp3
हाइब्रिडाइजेशन (3d ऑर्बिटल उपयोग)

बाह्य ऑर्बिटल संकुल (Outer Orbital Complex):
[cof6]3−[cof_6]^{3-}[cof6​]3−, [Cr(H2O)6]3+[Cr(H_2O)_6]^{3+}[Cr(H2​O)6​]3+
→ sp3d2sp^3d^2sp3d2
हाइब्रिडाइजेशन (4d ऑर्बिटल उपयोग)

प्रश्न 8:        क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत की व्याख्या कीजिए। यह संयोजकता बंध सिद्धांत से किस प्रकार भिन्न है?

उत्तर: क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (Crystal Field Theory - CFT) एक इलेक्ट्रोस्टैटिक सिद्धांत है जो यह बताता है कि जब एक धातु आयन के चारों ओर लिगैंड्स आते हैं तो वे d-कक्षा की ऊर्जा को विभाजित कर देते हैं। यह सिद्धांत केवल आयन-आयन आकर्षण पर आधारित है और इसमें धातु-लिगैंड बॉन्ड को शुद्ध रूप से इलेक्ट्रोस्टैटिक माना जाता है।

मुख्य अंतर संयोजकता बंध सिद्धांत से:

CFT में धातु और लिगैंड्स के बीच covalent interaction नहीं माने जाते, जबकि संयोजकता बंध सिद्धांत (Valence Bond Theory) में covalent bond formation को महत्व दिया जाता है।

VBT केवल जियोमेट्री बताता है लेकिन CFT ऊर्जा विभाजन, रंग और चुम्बकीय गुण भी समझाता है।


प्रश्न 9:        क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के आधार पर अष्टफलकीय संकुल तथा चतुर्फलकीय संकुलों में d-कक्षाओं के विभाजन या विखंडन को समझाइए।

उत्तर: जब कोई लिगैंड धातु आयन के चारों ओर आता है, तो उसके कारण d-कक्षाओं की ऊर्जा समान नहीं रहती, वे विभाजित हो जाती हैं।

(i) अष्टफलकीय संकुल (Octahedral Complex):
यहाँ d-कक्षाएँ दो समूहों में विभाजित होती हैं:

T₂g (dxy, dxz, dyz) – कम ऊर्जा

Eg (dx²–y², dz²) – अधिक ऊर्जा

विभाजन ऊर्जा को Δ₀ (10Dq) कहते हैं।

(ii) चतुर्फलकीय संकुल (Tetrahedral Complex):

D-कक्षाएँ t₂ (dxy, dxz, dyz) और e (dx²–y², dz²) में विभाजित होती हैं।

यहाँ उल्टा विभाजन होता है (t₂ की ऊर्जा अधिक होती है)।

विभाजन ऊर्जा Δt ≈ (4/9)Δ₀ होती है।


प्रश्न 10: क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन या विखंडन ऊर्जा क्या है? इसे प्रभावित करने वाले कारकों को संक्षेप में लिखिए।

उत्तर: जब d-ऑर्बिटल्स की ऊर्जा लिगैंड के प्रभाव से विभाजित हो जाती है, तो उनके बीच जो ऊर्जा अंतर होता है, उसे क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Crystal Field Splitting Energy) कहते हैं। इसे अष्टफलकीय संकुल में Δ₀ और चतुर्फलकीय में Δt से दर्शाते हैं।

प्रभावित करने वाले कारक:

लिगैंड की प्रकृति (strong/weak field ligands)

धातु आयन का ऑक्सीकरण अवस्था

धातु आयन का आकार

लिगैंड की दूरी


प्रश्न 11: सामान्य अष्टफलकीय संकुलों में d-कक्षाओं के विखंडन को समझाइए।

उत्तर: Octahedral complexes में d-कक्षाओं का विखंडन इस प्रकार होता है:

लिगैंड्स dx²–y² और dz² के साथ अधिक प्रतिकर्षण करते हैं क्योंकि ये कक्षाएँ अक्षों के साथ होती हैं।

इसलिए eg कक्षा की ऊर्जा बढ़ती है।

Dxy, dyz, और dxz कक्षाओं की ऊर्जा कम रहती है (t₂g)

विभाजन का मान = Δ₀


प्रश्न 12: उष्मवर्गीय समतलीय या समतलीय समरूपी संकुलों में d-कक्षाओं के विखंडन के आधार पर d-इलेक्ट्रॉनों के वितरण को समझाइए।

उत्तर: Octahedral complexes में इलेक्ट्रॉनों का वितरण दो तरीकों से होता है:

High Spin Complex: जब लिगैंड weak field हो और Δ₀ < pairing energy, तो इलेक्ट्रॉन t₂g और eg दोनों में singly भरते हैं।

Low Spin Complex: जब लिगैंड strong field हो और Δ₀ > pairing energy, तो इलेक्ट्रॉन पहले t₂g में pairing करते हैं।

इससे complex की चुम्बकीयता और रंग प्रभावित होता

प्रश्न 13. केन्द्रीय धातु आयन के संकुलों की विभिन्न ज्यामितीयताओं में क्रिस्टल क्षेत्र विखंडन का रेखाचित्र बनाइए।

उत्तर:
(i) Octahedral geometry:
Splitting into t2gt_{2g}t2g​ (lower) & ege_geg​ (higher)

Nginx

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E_g  ↑ ↑

T_2g ↑ ↑ ↑

(ii) Tetrahedral geometry:
Splitting opposite to octahedral (e < t₂)

Nginx

Copyedit

T_2 ↑ ↑ ↑ 

E    ↑ ↑ 

(iii) Square planar geometry:
Highly asymmetric:

Scss

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D(x²–y²) ↑ 

D(xy)      

D(z²)      

D(xz, yz) ↑ ↑ 


प्रश्न 14. (अ) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा की गणना d⁴ विन्यास हेतु उच्च चक्रीय अष्टफलकीय संकुल में कीजिए।

उत्तर:
High-spin Octahedral complex, d⁴ configuration:
Electronic configuration: t2g3eg1t_{2g}^3 e_g^1t2g3​eg1​

CFSE = (–0.4 × 3 + 0.6 × 1) Δ₀ = –1.2 + 0.6 = –0.6 Δ₀


प्रश्न 14. (ब) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा की गणना d⁴ विन्यास हेतु दुर्बल क्षेत्र अष्टफलकीय संकुल में कीजिए।

उत्तर:
Low-spin Octahedral complex, d⁴ configuration:
Electronic configuration: t2g4eg0t_{2g}^4 e_g^0t2g4​eg0​

CFSE = –0.4 × 4 = –1.6 Δ₀

प्रश्न 15. (क) समझाइए, अमोनियम श्रोतास से संकुल निर्माण होता है, परन्तु NH₄⁺ नहीं।

उत्तर:
Ammonia (NH₃)
एक neutral ligand है, जिसके पास एक lone pair होता है जो metal ion से coordinate bond बना सकता है।
इस कारण [Co(NH₃)₆]³⁺ जैसे complex बनते हैं।

लेकिन NH₄⁺ आयन में nitrogen का lone pair proton से जुड़कर ammonium बना चुका होता है।
अब coordinate bond बनाने के लिए कोई lone pair available नहीं होता।

इसलिए NH₄⁺ complex नहीं बनाता।


प्रश्न 15. (ख) निम्नलिखित के लिये 10 Dq मान की गणना कीजिए –

(i) अष्टफलकीय संकुल के लिये नियत क्षेत्र d⁶:
Low-spin octahedral complex (d⁶):
Electronic config: t₂g⁶ e_g⁰

CFSE = –0.4 × 6 = –2.4 Δ₀

10 Dq = Δ₀ तो CFSE = –2.4 Dq

(ii) अष्टफलकीय संकुल के लिये उच्च क्षेत्र d⁶:
High-spin octahedral (d⁶): t₂g⁴ e_g²

CFSE = –0.4 × 4 + 0.6 × 2 = –1.6 + 1.2 = –0.4 Δ₀ = –0.4 Dq


प्रश्न 15. (ग) CFSE क्या है? D⁶ आयन के उच्च स्पिन संकुल में इसका मान ज्ञात कीजिए।

उत्तर:
CFSE = Crystal Field Stabilization Energy
यह energy है जो complex बनने पर d-orbital splitting से स्थायित्व में मिलती है।

High spin d⁶ (octahedral):
t₂g⁴ e_g²
CFSE = –1.6 + 1.2 = –0.4 Δ₀


प्रश्न 15. (घ) धातु आयन की प्रकृति CFSE को कैसे प्रभावित करती है? उदाहरण सहित विवेचन कीजिए।

उत्तर:
धातु आयन की प्रकृति (oxidation state और size) CFSE को प्रभावित करती है।

उदाहरण:

Fe²⁺ vs Fe³⁺
Fe³⁺
का charge अधिक है, इसलिए ligands के साथ stronger interaction करेगा अधिक splitting अधिक CFSE

उदाहरण:
[Fe(H₂O)₆]²⁺ (low CFSE)
[Fe(CN)₆]³⁻ (high CFSE due to strong field ligand & Fe³⁺)


प्रश्न 16. (क) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा से आप क्या समझते हैं? D⁶ विन्यास (आयन) हेतु दुर्बल क्षेत्र व प्रबल क्षेत्र लिगैण्ड की उपस्थिति में क्रिस्टल क्षेत्र की स्थायीकरण ऊर्जा ज्ञात कीजिए।

उत्तर:
जैसा कि ऊपर बताया गया,

दुर्बल क्षेत्र (weak field ligand): High spin d⁶ CFSE = –0.4 Δ₀

प्रबल क्षेत्र (strong field ligand): Low spin d⁶ CFSE = –2.4 Δ₀

अतः प्रबल ligand स्थायित्व अधिक देता है।


प्रश्न 16. (ख) निम्नलिखित संकुल हेतु Δ₀ की गणना कीजिए –

(i) [Ti(H2O)6]3+[Ti(H₂O)_6]^{3+}[Ti(H2​O)6​]3+
(ii) K3[Fe(CN)6]K_3[Fe(CN)_6]K3​[Fe(CN)6​]

उत्तर:
Δ₀
की experimentally values spectroscopic data से आती हैं।

Approximate values:
(i) [Ti(H₂O)₆]³⁺ → weak field ligand → Δ₀ ≈ 20,000 cm⁻¹
(ii) [Fe(CN)₆]³⁻ → strong field ligand → Δ₀ ≈ 35,000 cm⁻¹


प्रश्न 17. चतुर्भुजाकार संकुलों में d-कक्षाओं के इलेक्ट्रॉनों के वितरण, आभ्यंतरिक इलेक्ट्रॉनों की स्थिति तथा स्थायीकरण ऊर्जा का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
Square planar complexes dsp² hybrid orbitals
बनाते हैं।
d⁸ configuration (
जैसे Ni²⁺) में:

Electronic config:

D(x²–y²): Highest energy → empty

D(z²), d(xy), d(xz), d(yz): Filled
→ Pairing
होती है Low spin complex बनता है।
CFSE
अधिक होती है क्योंकि electron pairing t₂g orbitals में ही हो जाती है।


प्रश्न 18. क्रिस्टल क्षेत्र मापकों को प्रभावित करने वाले कारकों का वर्णन कीजिए।

उत्तर:
क्रिस्टल क्षेत्र splitting (Δ) निम्न कारकों से प्रभावित होती है:

Ligand का प्रकार – Strong field (CN⁻, CO) > Weak field (H₂O, Cl⁻)

Metal ion की oxidation state – अधिक charge अधिक splitting

Metal का size एवं period – 3d < 4d < 5d

Geometry of complex – Octahedral > Tetrahedral

D-electron count – Odd-even effect on CFSE


प्रश्न 19. (अ) अष्टफलकीय संकुलों में विघटन की व्याख्या कीजिए।

उत्तर:
Octahedral complex
में 6 ligands चारों ओर घिरे होते हैं।
→ d-orbitals
में splitting होती है:

T2gt_{2g}t2g​ (lower): dxy, dyz, dzx

Ege_geg​ (higher): dx²–y², dz²

Energy gap = Δ₀ = 10Dq
Electronic distribution
इस gap पर निर्भर करता है।


प्रश्न 19. (ब) समझाइए किस चतुर्भुजाकार संकुल में d-कक्षाओं का विखंडन अष्टफलकीय क्षेत्र से उत्तम क्यों होता है?

उत्तर:
Square planar complexes
में dx²–y² orbital सबसे अधिक energy पर होता है क्योंकि ligands उसी plane में होते हैं।

→ Splitting बहुत अधिक होती है Electron pairing की strong tendency होती है
इसलिए ये complex अधिक stable होते हैं और विखंडन अष्टफलकीय की तुलना में अधिक स्पष्ट होता है।


प्रश्न 20. (अ) सिद्ध कीजिए – Δₜ = (4/9) Δ₀ = 0.45 Δ₀

उत्तर:
Tetrahedral complex
में चार ligands होते हैं।
Splitting
कम होती है क्योंकि ligands सीधे orbitals के सामने नहीं होते।

Theoretical relation:

Δt=49Δ0≈0.45Δ0Δ_t = \frac{4}{9} Δ_0 ≈ 0.45 Δ_0Δt​=94​Δ0​≈0.45Δ0​


प्रश्न 20. (ब) सिद्ध कीजिए – Δₚ = 1.3 Δ₀

उत्तर:
Square planar complex
में dx²–y² orbital अत्यधिक energy पर होता है।

Theoretical studies के अनुसार:

Δp=1.3Δ0Δ_p = 1.3 Δ_0Δp​=1.3Δ0​

क्योंकि splitting octahedral की तुलना में ज्यादा व्यापक होती है।


प्रश्न 21. (क) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर संकुल यौगिकों में चुंबकीय गुण समझाइए।

उत्तर:
CFT
यह बताता है कि electrons ligand strength के अनुसार d-orbitals में fill होते हैं:

Weak ligand → High spin complex → अधिक unpaired electrons → Paramagnetic

Strong ligand → Low spin complex → कम या no unpaired e⁻ → Diamagnetic

उदाहरण:

[Fe(CN)₆]³⁻ → strong ligand → Low spin → Diamagnetic

[fef₆]³⁻ → weak ligand → High spin → Paramagnetic


प्रश्न 21. (ख) K₄[fef₆] में d-कक्षाओं का विखंडन समझाइए।

उत्तर:
[fef₆]⁴⁻ → Octahedral complex
Fe²⁺ → d⁶ configuration
F⁻ = weak field ligand → High spin complex
Electronic config: t₂g⁴ e_g²
4 unpaired electrons Paramagnetic
CFSE = –0.4 × 4 + 0.6 × 2 = –0.4 Δ₀


प्रश्न 22. [Ni(NH₃)₆]²⁺ तथा K₄[Fe(CN)₆] के चुंबकीय गुणों की व्याख्या क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर कीजिए।

उत्तर:

[Ni(NH₃)₆]²⁺: Ni²⁺ = d⁸, NH₃ = borderline ligand → generally high spin
t₂g⁶ e_g² → 2 unpaired electrons
Paramagnetic

[Fe(CN)₆]⁴⁻: Fe²⁺ = d⁶, CN⁻ = strong field → low spin
t₂g⁶ e_g⁰
No unpaired e⁻ Diamagnetic


प्रश्न 23. निम्नलिखित संकुल आयन के लिए Δ₀ के मान निकालिए –

(i) [Fe(CN)₆]⁴⁻
(ii) [Fe(CN)₆]³⁻
(iii) [Co(CN)₆]³⁻
(iv) [Ru(NH₃)₆]³⁺

उत्तर (approx. Spectroscopic values):

Complex

Δ₀ (cm⁻¹)

[Fe(CN)₆]⁴⁻

~33,000

[Fe(CN)₆]³⁻

~35,000

[Co(CN)₆]³⁻

~38,000

[Ru(NH₃)₆]³⁺

~42,000

Trend: Higher oxidation state & stronger ligands → higher Δ₀

प्रश्न 24. धातु आयन g-कारक क्या है?
उत्तर:
g-
कारक या g-factor एक मैग्नेटिक गुण है जो किसी पदार्थ की चुंबकीय प्रवृत्ति को दर्शाता है। यह परमाण्विक या अण्विक इलेक्ट्रॉनों के स्पिन और ऑर्बिटल मूवमेंट से संबंधित होता है।

धातु आयनों में g-कारक से यह जाना जाता है कि इलेक्ट्रॉन की गति केवल स्पिन आधारित है या ऑर्बिटल योगदान भी है।

गणितीय रूप से –
g=2.0023g = 2.0023g=2.0023 (Free Electron
के लिए)
यदि किसी आयन का g-factor इससे बहुत अलग हो तो इसका अर्थ है कि ऑर्बिटल योगदान भी है।
उदाहरण: कुछ ट्रांज़िशन मेटल आयन जैसे Cu²⁺, Ni²⁺ आदि में g ≠ 2 होता है।


प्रश्न 25. क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा एवं क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकরণ ऊर्जा में अंतर बताइए।
उत्तर:
(i)
क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ):
यह वह ऊर्जा है जो d-orbitals के degeneracy के टूटने (splitting) में लगती है जब किसी धातु आयन के चारों ओर लिगैंड आते हैं।
यह सिर्फ splitting को दर्शाती है।

(ii) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE):
यह वह कुल ऊर्जा है जो किसी complex में इलेक्ट्रॉनों के पुनर्वितरण से system की स्थायिता बढ़ाने में प्राप्त होती है।
इसमें pairing energy भी consider की जाती है।

बिंदु

Δ (Splitting Energy)

CFSE

उद्देश्य

D-orbital splitting मापना

Complex की स्थायिता मापना

इकाई

Kj/mol या cm⁻¹

Kj/mol

क्या दर्शाता है?

Orbitals के energy level में अंतर

Complex बनने से system की gain हुई energy


प्रश्न 26. अंतर स्पष्ट कीजिए या तुलना करें –
(i)
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत एवं संयोजकता बंध सिद्धांत,
(ii)
चतु:कोणीय संकुल एवं अष्टफलकीय संकुल,
(iii)
उच्च स्पिन एवं निम्न स्पिन।

उत्तर:
(i) CFT vs VBT:

CFT में केवल इलेक्ट्रोस्टैटिक दृष्टिकोण होता है, जबकि VBT में covalent nature भी माना जाता है।

CFT orbitals के splitting पर ध्यान देता है, VBT में hybridization होता है।

(ii) Tetrahedral vs Octahedral Complexes:

Tetrahedral: 4 ligands, कोई axis पर ligand नहीं होता कम splitting

Octahedral: 6 ligands → ज्यादा splitting (Δ₀ > Δt)

(iii) High Spin vs Low Spin:

Weak field ligands (जैसे Cl⁻) → High spin (electrons unpaired)

Strong field ligands (जैसे CN⁻) → Low spin (electrons paired)


प्रश्न 27. [mnbr4]2−[mnbr_4]^{2-}[mnbr4​]2− संकुल का चुंबकीय आघूर्ण 5.9 BM है। इस संकुल आयन की ज्यामिति क्या होगी?
उत्तर:
μ=n(n+2)\mu = \sqrt{n(n+2)}μ=n(n+2)​
जहाँ n = unpaired electrons
यदि μ=5.9 BM\mu = 5.9\ bmμ=5.9 BM, तो n = 5
Mn²⁺ → 3d⁵ → 5 unpaired electrons
Br⁻
एक weak field ligand है, इसलिए pairing नहीं होगी।

इस प्रकार [mnbr4]2−[mnbr_4]^{2-}[mnbr4​]2− एक tetrahedral geometry रखेगा क्योंकि tetrahedral complexes में generally pairing नहीं होती और high spin complex बनता है।


प्रश्न 28. संयोजकता बंध सिद्धांत से स्पष्ट कीजिए कि [Ag(CN)2]−[Ag(CN)_2]^-[Ag(CN)2​]− प्रतिचुंबकीय है, जबकि [Ag(CN)4]3−[Ag(CN)_4]^{3-}[Ag(CN)4​]3− अनुचुंबकीय है।
उत्तर:
Ag⁺
का configuration: [Kr] 4d¹⁰ → no unpaired electrons

[Ag(CN)₂]⁻:

Linear geometry, d¹⁰ configuration → no unpaired electrons → diamagnetic (प्रतिचुंबकीय)

[Ag(CN)₄]³⁻:

Square planar structure

यदि oxidation state +1 ही है तो फिर भी d¹⁰ रहेगा, तब यह भी diamagnetic होना चाहिए।
लेकिन यदि complex में oxidation state +3 है, तो configuration d⁸ होगा, और unpaired electrons हो सकते हैं paramagnetic (अनुचुंबकीय)।

इसका अर्थ है कि [Ag(CN)4]3−[Ag(CN)_4]^{3-}[Ag(CN)4​]3− में शायद Ag की oxidation state +3 है, इसलिए यह अनुचुंबकीय है।


प्रश्न 29. निम्न युग्म में किस जटिल आयन के लिए Δ₀ का मान अधिक है और क्यों? [Co(CN)6]3−[Co(CN)_6]^{3-}[Co(CN)6​]3− और [Ru(NH3)6]3+[Ru(NH_3)_6]^{3+}[Ru(NH3​)6​]3+
उत्तर:

Co³⁺ और Ru³⁺ दोनों d⁶ configuration के होते हैं।

CN⁻ एक strong field ligand है ज्यादा Δ₀

NH₃ moderate ligand है लेकिन Ru³⁺ 4d-series में आता है 4d-orbitals फैलावदार होती हैं better overlap → ज्यादा Δ₀

इसलिए [Ru(NH₃)₆]³⁺ का Δ₀ > [Co(CN)₆]³⁻


प्रश्न 30. उपयुक्त उदाहरण से समझाइए कि विद्युतऋणीयता दाता समूह पर अन्य प्रभावों मिलाकर उच्चतम धातु पारगम्यता कब बनती है? इस सिद्धांत को क्या कहते हैं?
उत्तर:
जब लिगैंड का इलेक्ट्रॉन देने का सामर्थ्य अधिक होता है, और धातु आयन का accept करने का सामर्थ्य भी अधिक हो, तो strong coordination bond बनते हैं।

इस सिद्धांत को HSAB (Hard and Soft Acids and Bases) सिद्धांत कहा जाता है।

उदाहरण:

Hard acid (Fe³⁺) prefers hard base (F⁻) → Stable complex

Soft acid (Ag⁺) prefers soft base (I⁻) → Stable complex

इस सिद्धांत से यह समझ आता है कि सही प्रकार के acid-base मिलान से maximum धातु लिगैंड बंध strength मिलती है।


प्रश्न 31. विद्युत उदासीनी सिद्धांत तथा पक्षर बंधन से आप क्या समझते हैं?
उत्तर:
विद्युत उदासीनी सिद्धांत (Electroneutrality Principle):
Coordination compounds
में केंद्र धातु आयन और उसके लिगैंड मिलकर एक overall neutral या अपेक्षित charge वाला complex बनाते हैं। इसका मतलब complex की total charge बराबर होनी चाहिए।

पक्षर बंधन (Back bonding):

कुछ लिगैंड जैसे CO या CN⁻ अपने lone pair से धातु को donate करते हैं (σ-bond),

फिर धातु d-orbitals से π-back bonding करते हैं electron density वापस लिगैंड की खाली π* orbitals में जाती है।

इससे बंध अधिक स्थायी होते हैं।


प्रश्न 32. CFT के आधार पर [cof6]3−[cof_6]^{3-}[cof6​]3− और [Co(NH3)6]3+[Co(NH_3)_6]^{3+}[Co(NH3​)6​]3+ के चुंबकीय गुणों को समझाइए।
उत्तर:
Co³⁺ → d⁶ configuration

[cof₆]³⁻:

F⁻ = weak field ligand

High spin complex

D-orbitals में electrons pairing नहीं करते

Unpaired electrons = 4
→ Paramagnetic

[Co(NH₃)₆]³⁺:

NH₃ = strong field ligand

Low spin complex

Electrons pair हो जाते हैं

Unpaired electrons = 0
→ Diamagnetic


प्रश्न 33. संयोजकता बंध सिद्धांत के आधार पर निम्नलिखित यौगिकों में संकरण, संरचना तथा चुंबकीय गुणों को समझाइए –
उत्तर (i) [cof₆]³⁻

Oxidation state of Co = +3 → d⁶

F⁻ = weak field ligand

High spin → No pairing

Hybridization: sp³d² (outer orbital)

Geometry: Octahedral

Unpaired e⁻ = 4 → Paramagnetic

उत्तर (ii) [Co(NH₃)₆]³⁺

Co³⁺ = d⁶

NH₃ = strong field

Low spin → pairing होगी

Hybridization: d²sp³ (inner orbital)

Geometry: Octahedral

Unpaired e⁻ = 0 → Diamagnetic

 

 

 

 

 

 

 

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