B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 1 (अ)
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1}--"संयोजकता बंध सिद्धान्त (Valence Bond Theory - VBT) की सीमाएँ क्या हैं? वर्णन कीजिए।"संयोजकता बंध सिद्धान्त (VBT) की सीमाएँ
संयोजकता बंध सिद्धान्त ने उपसहसंयोजक यौगिकों (Coordination Compounds) की संरचना और चुंबकीय गुणों को समझाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, लेकिन इसकी कई कमियाँ थीं जिसके कारण क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) की आवश्यकता पड़ी। इसकी मुख्य सीमाएँ निम्नलिखित हैं:
VBT की मुख्य सीमाएँ
1️⃣ रंग की व्याख्या नहीं कर पाता
VBT यह नहीं बताता कि संकुल यौगिक रंगीन क्यों होते हैं।
2️⃣ स्पेक्ट्रा की व्याख्या नहीं
इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रा (absorption spectra) की जानकारी नहीं देता।
3️⃣ High spin और Low spin का कारण नहीं बताता
यह नहीं समझा पाता कि एक ही धातु आयन कभी high spin और कभी low spin क्यों बनाता है।
4️⃣ स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रेणी की व्याख्या नहीं
क्यों कुछ लिगैण्ड मजबूत और कुछ कमजोर होते हैं — इसका कारण VBT नहीं बताता।
5️⃣ चुंबकीय गुणों की अपूर्ण व्याख्या
कई संकुलों के वास्तविक चुंबकीय आघूर्ण VBT से मेल नहीं खाते।
6️⃣ π-बन्धन की व्याख्या नहीं
धातु–लिगैण्ड के बीच π-बैक बॉन्डिंग को नहीं समझाता।
7️⃣ स्थिरता (CFSE) की जानकारी नहीं देता
संकुल की स्थिरता और ऊर्जा की गणना नहीं कर पाता।
✨ निष्कर्ष
VBT संकुलों की ज्यामिति बताने में उपयोगी है, लेकिन रंग, स्पेक्ट्रा, चुंबकत्व और बन्ध की वास्तविक प्रकृति को समझाने में असमर्थ है।
2}--"क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) एवं संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT) में तुलना कीजिए।"
CFT एवं VBT में तुलना
| आधार | संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT) | क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत (CFT) |
|---|---|---|
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✨ निष्कर्ष
VBT संरचना बताने में उपयोगी है।
CFT रंग, चुंबकत्व और स्थिरता समझाने में अधिक सक्षम है।
3}--"क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धांत के आधार पर अष्टफलकीय संकुल तथा चतुष्फलकीय संकुलों में d-कक्षकों के विपाटन या विस्फुटन को समझाइये।"
यहाँ इसका विस्तृत उत्तर दिया गया है:
🔷 d-कक्षक (Degenerate Orbitals)
स्वतंत्र धातु आयन में पाँचों d-कक्षक समान ऊर्जा के होते हैं।
जब लिगैण्ड पास आते हैं तो प्रतिकर्षण के कारण ये समान ऊर्जा वाले नहीं रहते और विभाजित हो जाते हैं। इसे क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन कहते हैं।
1️⃣ अष्टफलकीय संकुल (Octahedral Complex)
छः लिगैण्ड x, y, z अक्षों पर स्थित होते हैं।
अक्षों की दिशा वाले कक्षक
-
dx²–y²
-
dz²
ये सीधे लिगैण्ड की दिशा में होते हैं → अधिक प्रतिकर्षण → ऊँची ऊर्जा
ये सीधे लिगैण्ड की दिशा में होते हैं → अधिक प्रतिकर्षण → ऊँची ऊर्जा
👉 इन्हें e_g कक्षक कहते हैं।
अक्षों के बीच वाले कक्षक
-
dxy, dxz, dyz
ये लिगैण्ड से दूर होते हैं → कम प्रतिकर्षण → निम्न ऊर्जा
ये लिगैण्ड से दूर होते हैं → कम प्रतिकर्षण → निम्न ऊर्जा
👉 इन्हें t₂g कक्षक कहते हैं।
ऊर्जा विभाजन
t2g(−0.4Δo)eg(+0.6Δo)
ऊर्जा अंतर = Δ₀
2️⃣ चतुष्फलकीय संकुल (Tetrahedral Complex)
चार लिगैण्ड अक्षों के बीच (diagonal) दिशा में होते हैं।
इसलिए स्थिति उलट जाती है।
अधिक प्रतिकर्षण वाले
-
dxy, dxz, dyz → लिगैण्ड के पास → उच्च ऊर्जा
👉 t₂ कक्षक
कम प्रतिकर्षण वाले
-
dz², dx²–y² → दूर → निम्न ऊर्जा
👉 e कक्षक
ऊर्जा विभाजन
e(−0.6Δt)t2(+0.4Δt)
और
Δt≈0.45Δo🔷 मुख्य अंतर
अष्टफलकीय चतुष्फलकीय e_g उच्च ऊर्जा t₂ उच्च ऊर्जा t₂g निम्न ऊर्जा e निम्न ऊर्जा Δ बड़ा Δ छोटा लिगैण्ड अक्षों पर अक्षों के बीच
| अष्टफलकीय | चतुष्फलकीय |
|---|---|
| e_g उच्च ऊर्जा | t₂ उच्च ऊर्जा |
| t₂g निम्न ऊर्जा | e निम्न ऊर्जा |
| Δ बड़ा | Δ छोटा |
| लिगैण्ड अक्षों पर | अक्षों के बीच |
✨ निष्कर्ष
-
लिगैण्ड की दिशा के कारण दोनों में विभाजन अलग होता है।
-
चतुष्फलकीय में विभाजन अष्टफलकीय का उल्टा और छोटा होता है।
4}--"क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन या विस्फुटन ऊर्जा क्या है? इसे प्रभावित करने वाले कारकों को संक्षेप में लिखिए।"
🔷 क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Crystal Field Splitting Energy – Δ)
जब लिगैण्ड धातु आयन के पास आते हैं, तो धातु के पाँचों d-कक्षक समान ऊर्जा वाले नहीं रहते और दो समूहों में विभाजित हो जाते हैं।
इन दोनों समूहों के बीच का ऊर्जा अंतर क्रिस्टल क्षेत्र विभाजन ऊर्जा (Δ) कहलाता है।
अष्टफलकीय संकुल → Δ₀
चतुष्फलकीय संकुल → Δt
🔷 Δ को प्रभावित करने वाले कारक
1️⃣ धातु आयन का आवेश (Oxidation state)
अधिक आवेश → लिगैण्ड आकर्षण अधिक → Δ बढ़ता है।
उदाहरण:
Fe³⁺ > Fe²⁺
2️⃣ धातु आयन का आकार
छोटा आयन → लिगैण्ड पास → प्रतिकर्षण अधिक → Δ बढ़ता है।
3️⃣ लिगैण्ड की शक्ति (Spectrochemical series)
मजबूत लिगैण्ड → Δ बड़ा
कमजोर लिगैण्ड → Δ छोटा
क्रम:
CN⁻ > NH₃ > H₂O > F⁻ > Cl⁻
4️⃣ संकुल की ज्यामिति
स्प्लिटिंग का क्रम:
Δsp>Δo>ΔtSquare planar > Octahedral > Tetrahedral
5️⃣ धातु की श्रेणी (3d, 4d, 5d)
4d और 5d धातु में Δ अधिक होता है।
क्रम:
5 (अ) समतल वर्गाकार संकुलों में d-कक्षकों के विपाटन को समझाइए।
5 (ब) समतल वर्गाकार संकुलों में d-कक्षकों के विपाटन के आधार पर d-इलेक्ट्रॉनों के वितरण को समझाइए।
प्रश्न 5 (अ): समतल वर्गाकार संकुलों में d-कक्षकों का विपाटन
Square planar संरचना अष्टफलकीय से दो axial लिगैण्ड हटाने पर बनती है।
इसमें सभी लिगैण्ड xy तल में होते हैं।
लिगैण्ड प्रतिकर्षण के अनुसार d-कक्षकों की ऊर्जा का क्रम:
dx2−y2>dxy>dz2>dxz,dyz✔ कारण
- dx2−y2 सीधे लिगैण्ड की दिशा में → अधिक प्रतिकर्षण → सबसे अधिक ऊर्जा
- dxy तल में → कम प्रतिकर्षण
- dz2 z-अक्ष पर → और कम
- dxz,dyz सबसे दूर → न्यूनतम ऊर्जा
प्रश्न 5 (ब): d-इलेक्ट्रॉनों का वितरण (Square planar)
Square planar संकुल प्रायः d⁸ होते हैं (Ni²⁺, Pd²⁺, Pt²⁺)।
ऊर्जा क्रम के अनुसार भराव:
(dxz)2(dyz)2(dz2)2(dxy)2(dx2−y2)0👉 सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित → Diamagnetic
6}--"क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन (CFSE) तथा क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) में अंतर स्पष्ट कीजिए।"
| अंतर का आधार | क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Δ या 10Dq) | क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) |
| परिभाषा | यह लिगैण्ड्स की उपस्थिति में d-कक्षकों के दो ऊर्जा स्तरों (t₂g और e g) के बीच का कुल ऊर्जा अंतर है। | यह वह शुद्ध ऊर्जा (Net energy) है जो इलेक्ट्रॉनों के निम्न ऊर्जा कक्षकों में भरने के कारण संकुल को स्थायित्व प्रदान करती है। |
| प्रतीक | अष्टफलकीय के लिए Δ₀ तथा चतुष्फलकीय के लिए Δₜ से दर्शाते हैं। | इसे गणना द्वारा निकाला जाता है, जैसे −0.4Δ₀, −1.2Δ₀ आदि। |
| निर्भरता | यह केवल लिगैण्ड की शक्ति और धातु की प्रकृति पर निर्भर करती है। | यह विपाटन के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनों की संख्या और युग्मन ऊर्जा (Pairing Energy) पर भी निर्भर करती है। |
| महत्व | यह बताती है कि कक्षक कितनी दूर तक विभाजित हुए हैं। | यह संकुल के वास्तविक ऊष्मागतिकीय स्थायित्व को दर्शाती है। |
7}--
(अ) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा की गणना 4 विन्यास के उच्च चक्रण अष्टफलकीय संकुल में कीजिये,
(ब) क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा की गणना ? विन्यास हेतु दुर्बल क्षेत्र अष्टफलकीय संकुल में कीजिये,
(स) अमोनिया शीघ्रता से संकुल निर्माण करता है, परन्तु NH नहीं। समझाइए ।
(द)निम्नलिखित के लिये 10 D, माने की गणना कीजिए-
(i) अष्टफलकीय संकुल के लिये निम्न क्षेत्र व (ii)अष्टफलकीय संकुल के लिये उच्च क्षेत्र ।
(इ) धातु आयन की प्रकृति CFSE कैसे प्रभावित करती है ? उदाहरण सहित विवेचना करें।
प्रश्न 7 (अ): d⁴ High spin Octahedral CFSE
High spin d⁴ → t2g3eg1
High spin d⁴ → t2g3eg1
प्रश्न 7 (ब): d⁵ (Weak field Octahedral)
High spin d⁵ → t2g3eg2
👉 CFSE = 0
High spin d⁵ → t2g3eg2
👉 CFSE = 0
प्रश्न 7 (स): NH₃ संकुल बनाता है, NH नहीं
NH₃ में:
-
N पर lone pair उपलब्ध → donor ligand → संकुल बनाता है
NH में:
-
lone pair नहीं → donor नहीं → संकुल नहीं बनाता
NH₃ में:
- N पर lone pair उपलब्ध → donor ligand → संकुल बनाता है
NH में:
- lone pair नहीं → donor नहीं → संकुल नहीं बनाता
प्रश्न 7 (द): 10Dq की गणना
Octahedral में:
Low energy (t₂g) = −0.4Δ₀
High energy (e_g) = +0.6Δ₀
Δo=10Dq
इसलिए:
-
t₂g = −4Dq
-
e_g = +6Dq
Octahedral में:
Low energy (t₂g) = −0.4Δ₀
High energy (e_g) = +0.6Δ₀
इसलिए:
- t₂g = −4Dq
- e_g = +6Dq
प्रश्न 7 (इ): धातु आयन की प्रकृति का प्रभाव
1️⃣ Oxidation state
2️⃣ धातु श्रेणी
उदाहरण
✨ निष्कर्ष
Square planar d⁸ संकुल अत्यधिक स्थिर होते हैं और CFSE धातु आयन, लिगैण्ड व ज्यामिति पर निर्भर करती है।
Square planar d⁸ संकुल अत्यधिक स्थिर होते हैं और CFSE धातु आयन, लिगैण्ड व ज्यामिति पर निर्भर करती है।
प्रश्न8: चतुष्फलकीय (Tetrahedral) संकुलों में d-कक्षकों के इलेक्ट्रॉनों का वितरण, अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या तथा स्थायीकरण ऊर्जा का वर्णन कीजिये।
1️⃣ चतुष्फलकीय संकुल में d-कक्षकों का विभाजन
जब कोई धातु आयन चार लिगैण्डों से घिरा होता है, तो चतुष्फलकीय (tetrahedral) क्रिस्टल फील्ड बनता है। इसमें d-कक्षकों का विभाजन इस प्रकार होता है:
ऊर्जा के आधार पर d-कक्षक दो भागों में बँटते हैं —
निम्न ऊर्जा कक्षक (e) → dz² , dx²–y²
उच्च ऊर्जा कक्षक (t₂) → dxy , dyz , dxz
👉 ध्यान दें: यह क्रम अष्टफलकीय संकुल के उल्टा होता है।
ऊर्जा विभाजन को Δt (tetrahedral splitting) कहते हैं।
2️⃣ इलेक्ट्रॉनों का वितरण
चतुष्फलकीय संकुलों में Δt बहुत छोटा होता है, इसलिए इलेक्ट्रॉन जोड़ी नहीं बनाते और हमेशा High Spin Complex बनते हैं।
अतः इलेक्ट्रॉन Hund के नियम के अनुसार पहले सभी कक्षकों में अकेले-अकेले भरते हैं।
भरने का क्रम:
e → t₂
3️⃣ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या
क्योंकि चतुष्फलकीय संकुल High Spin होते हैं, इसलिए इनमें अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या अधिक होती है।
| d विन्यास | इलेक्ट्रॉन वितरण (e, t₂) | अयुग्मित इलेक्ट्रॉन |
|---|---|---|
| d¹ | e¹ | 1 |
| d² | e² | 2 |
| d³ | e² t₂¹ | 3 |
| d⁴ | e² t₂² | 4 |
| d⁵ | e² t₂³ | 5 |
| d⁶ | e³ t₂³ | 4 |
| d⁷ | e⁴ t₂³ | 3 |
| d⁸ | e⁴ t₂⁴ | 2 |
| d⁹ | e⁴ t₂⁵ | 1 |
| d¹⁰ | e⁴ t₂⁶ | 0 |
4️⃣ चतुष्फलकीय स्थायीकरण ऊर्जा (CFSEₜ)
चतुष्फलकीय क्षेत्र में:
e कक्षक → −0.6 Δt (स्थिरीकरण)
t₂ कक्षक → +0.4 Δt (अस्थिरीकरण)
सूत्र:
CFSEₜ = (−0.6 × ne + 0.4 × nt₂) Δt
जहाँ
ne = e कक्षकों में इलेक्ट्रॉन
nt₂ = t₂ कक्षकों में इलेक्ट्रॉन
उदाहरण: d³ संकुल
वितरण → e² t₂¹
CFSEₜ = [2(−0.6) + 1(0.4)]Δt
= (−1.2 + 0.4)Δt
= −0.8 Δt
✨ निष्कर्ष
चतुष्फलकीय संकुलों में Δt छोटा होता है।
सभी संकुल High Spin होते हैं।
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं।
CFSE का मान e और t₂ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है।
चतुष्फलकीय संकुलों में Δt छोटा होता है।
सभी संकुल High Spin होते हैं।
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन अधिक होते हैं।
CFSE का मान e और t₂ कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों की संख्या पर निर्भर करता है।
प्रश्न 10}-- d⁴ से d⁷ निकायों के अष्टफलकीय संकुलों के चुम्बकीय गुण क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर समझाइये।
भूमिका
अष्टफलकीय (Octahedral) संकुलों में लिगैण्ड के प्रभाव से d-कक्षकों का विभाजन होता है:
निम्न ऊर्जा कक्षक → t₂g (dxy, dyz, dxz)
उच्च ऊर्जा कक्षक → e_g (dz², dx²–y²)
ऊर्जा अंतर = Δ₀ (octahedral splitting)
यदि
Δ₀ < Pairing Energy (P) → High spin complex
Δ₀ > Pairing Energy (P) → Low spin complex
चुम्बकीय गुण अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों पर निर्भर करते हैं।
1️⃣ d⁴ विन्यास
(A) High Spin (कमजोर लिगैण्ड)
वितरण → t₂g³ e_g¹
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 4
👉 बहुत अधिक Paramagnetic
(B) Low Spin (मजबूत लिगैण्ड)
वितरण → t₂g⁴ e_g⁰
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 2
👉 कम Paramagnetic
2️⃣ d⁵ विन्यास
(A) High Spin
t₂g³ e_g²
अयुग्मित = 5
👉 सबसे अधिक Paramagnetic
(B) Low Spin
t₂g⁵ e_g⁰
अयुग्मित = 1
👉 कमजोर Paramagnetic
3️⃣ d⁶ विन्यास
(A) High Spin
t₂g⁴ e_g²
अयुग्मित = 4
👉 Paramagnetic
(B) Low Spin
t₂g⁶ e_g⁰
अयुग्मित = 0
👉 Diamagnetic
4️⃣ d⁷ विन्यास
(A) High Spin
t₂g⁵ e_g²
अयुग्मित = 3
👉 Paramagnetic
(B) Low Spin
t₂g⁶ e_g¹
अयुग्मित = 1
👉 कमजोर Paramagnetic
🔷 सारणी
| d विन्यास | High Spin (Unpaired e⁻) | Low Spin (Unpaired e⁻) |
|---|---|---|
| d⁴ | 4 | 2 |
| d⁵ | 5 | 1 |
| d⁶ | 4 | 0 |
| d⁷ | 3 | 1 |
✨ निष्कर्ष
कमजोर लिगैण्ड → High spin → अधिक अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → अधिक Paramagnetic
मजबूत लिगैण्ड → Low spin → कम अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → कम Paramagnetic / Diamagnetic
प्रश्न 11
(A) क्रिस्टल क्षेत्र मापकों (Crystal Field Splitting, Δ) को प्रभावित करने वाले कारक
क्रिस्टल क्षेत्र मापक (Δ) वह ऊर्जा है जिससे d-कक्षक विभाजित होते हैं। इसका मान कई कारकों पर निर्भर करता है:
1️⃣ धातु आयन का आवेश (Charge of metal ion)
धातु आयन पर अधिक धन आवेश होने से लिगैण्ड-धातु आकर्षण बढ़ता है, जिससे d-कक्षकों का विभाजन अधिक होता है।
क्रम:
M³⁺ > M²⁺ > M⁺2️⃣ धातु आयन का आकार (Size of metal ion)
छोटा धातु आयन → लिगैण्ड पास आते हैं → आकर्षण बढ़ता है → Δ बढ़ता है।
3️⃣ धातु की श्रेणी (3d, 4d, 5d)
4d और 5d धातुओं में d-कक्षक अधिक फैलाव वाले होते हैं, इसलिए लिगैण्ड से ओवरलैप अधिक होता है और Δ बड़ा होता है।
क्रम:
5d > 4d > 3d4️⃣ लिगैण्ड की प्रकृति (Spectrochemical Series)
लिगैण्ड की शक्ति सबसे महत्वपूर्ण कारक है।
कमजोर लिगैण्ड → छोटा Δ
I⁻ < Br⁻ < Cl⁻ < F⁻ < H₂O < NH₃ < CN⁻ < COमजबूत लिगैण्ड → बड़ा Δ
5️⃣ संकुल की ज्यामिति (Geometry)
अष्टफलकीय में विभाजन अधिक होता है।
क्रम:
Δ₀ (Octahedral) > Δt (Tetrahedral)
और
Δt ≈ 4/9 Δ₀(B)}-- [Co(H₂O)₆]²⁺ और [Co(H₂O)₆]³⁺ में किसकी CFSE अधिक है?
दोनों में लिगैण्ड (H₂O) समान है, इसलिए मुख्य अंतर धातु आयन का आवेश है।
Co³⁺ का आवेश Co²⁺ से अधिक है → आकर्षण अधिक → Δ₀ अधिक → CFSE अधिक।
अतः:
CFSE([Co(H₂O)₆]³⁺) > CFSE([Co(H₂O)₆]²⁺)✨ निष्कर्ष
क्रिस्टल क्षेत्र मापक Δ धातु आयन, लिगैण्ड और ज्यामिति पर निर्भर करता है।
Co³⁺ वाले संकुल में Δ और CFSE दोनों अधिक होते हैं।
प्रश्न 12
(अ) अष्टफलकीय संकुल में विकृति (Octahedral Distortion)
आदर्श अष्टफलकीय संकुल में 6 लिगैण्ड धातु आयन के चारों ओर समान दूरी पर होते हैं, लेकिन कई बार यह संरचना विकृत (distorted) हो जाती है। इसका मुख्य कारण Jahn–Teller प्रभाव है।
🔹 Jahn–Teller प्रभाव
यदि किसी संकुल में उच्च ऊर्जा e_g कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का असमान वितरण हो, तो संकुल अपनी ऊर्जा कम करने के लिए विकृत हो जाता है।
अर्थ:
समान ऊर्जा वाले कक्षकों में असमान इलेक्ट्रॉन होने पर संरचना स्थिर नहीं रहती।🔹 विकृति के प्रकार
1️⃣ Z-अक्ष के साथ लंबन (Elongation)
दो लिगैण्ड दूर चले जाते हैं और चार पास आ जाते हैं।
2️⃣ Z-अक्ष के साथ संकुचन (Compression)
दो लिगैण्ड पास आ जाते हैं और चार दूर चले जाते हैं।
🔹 किन विन्यासों में विकृति अधिक होती है?
विशेष रूप से:
d⁹ (Cu²⁺)
High spin d⁴ (Mn³⁺)
Low spin d⁷
उदाहरण:
[Cu(H₂O)₆]²⁺ में Jahn–Teller विकृति पाई जाती है।(ब) चतुष्फलकीय क्षेत्र में d-कक्षकों का विपाटन अष्टफलकीय से उल्टा क्यों?
यह लिगैण्डों की दिशा पर निर्भर करता है।
🔷 अष्टफलकीय क्षेत्र
लिगैण्ड x, y, z अक्षों पर होते हैं।
इसलिए जिन d-कक्षकों की दिशा अक्षों पर होती है वे अधिक प्रतिकर्षण अनुभव करते हैं।👉 e_g (dz², dx²–y²)
अधिक ऊर्जा (अस्थिर)👉 t₂g (dxy, dyz, dxz)
कम ऊर्जा (स्थिर)🔷 चतुष्फलकीय क्षेत्र
लिगैण्ड अक्षों के बीच (diagonal) दिशा में होते हैं।
इसलिए अब स्थिति उलट जाती है:
👉 t₂ कक्षक लिगैण्ड के ज्यादा पास → अधिक प्रतिकर्षण → उच्च ऊर्जा
👉 e कक्षक लिगैण्ड से दूर → कम प्रतिकर्षण → निम्न ऊर्जा
इसलिए चतुष्फलकीय में विभाजन उल्टा होता है।
✨ निष्कर्ष
अष्टफलकीय विकृति Jahn–Teller प्रभाव के कारण होती है।
चतुष्फलकीय में लिगैण्ड अक्षों के बीच होने से d-कक्षकों का विभाजन अष्टफलकीय से उल्टा होता है।
प्रश्न 13 (अ): सिद्ध कीजिये कि Δt = 4/9 Δo ≈ 0.45 Δo
सिद्धान्त
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के अनुसार d-कक्षकों का विभाजन लिगैण्ड-धातु प्रतिकर्षण पर निर्भर करता है।
अष्टफलकीय संकुल में → 6 लिगैण्ड
चतुष्फलकीय संकुल में → 4 लिगैण्डस्प्लिटिंग ऊर्जा लिगैण्डों की संख्या और उनकी दिशा पर निर्भर करती है।
चरण 1: लिगैण्डों की संख्या का प्रभाव
चतुष्फलकीय में लिगैण्ड कम होते हैं:
Ligand factor=4/9=2/3चरण 2: दिशा (Orientation factor)
अष्टफलकीय में लिगैण्ड सीधे अक्षों पर होते हैं → अधिक प्रतिकर्षण
चतुष्फलकीय में अक्षों के बीच → प्रतिकर्षण कमदिशात्मक प्रभाव = 2/3
चरण 3: कुल प्रभाव
Δt=(2/3)(2/3)Δo Δt=4/9Δo Δt≈0.45Δo
✔ सिद्ध हुआ।
प्रश्न 13 (ब): सिद्ध कीजिये कि Δsp = 1.3 Δo
यह square planar complexes के लिए है।
Square planar संरचना को अष्टफलकीय संकुल से दो axial लिगैण्ड हटाकर बनाया जाता है।
चरण 1: अक्षीय लिगैण्ड हटाने का प्रभाव
जब z-अक्ष के लिगैण्ड हटते हैं:
dx²−y² कक्षक पर प्रतिकर्षण बहुत बढ़ जाता है
dz² की ऊर्जा घटती है
अन्य कक्षकों में पुनर्व्यवस्था होती है
चरण 2: ऊर्जा क्रम (Square planar)
ऊर्जा क्रम:
dx2−y2>dxy>dz2>dxz,dyz
यह विभाजन अष्टफलकीय से अधिक होता है।
चरण 3: अनुभवजन्य परिणाम
प्रयोगों से पाया गया:
Δsp≈1.3Δo
अर्थात square planar संकुलों में स्प्लिटिंग सबसे अधिक होती है।
✔ सिद्ध हुआ।
✨ निष्कर्ष
Δt=0.45Δo Δsp=1.3Δo
स्प्लिटिंग का क्रम:
Δsp>Δo>Δt
प्रश्न 14
(अ) क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त के आधार पर संकुल यौगिकों में रंग
अधिकांश संक्रमण धातु संकुल रंगीन होते हैं। इसे क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त से समझाया जाता है।
🔹 d–कक्षक विभाजन
जब लिगैण्ड धातु आयन के पास आते हैं, तो d-कक्षकों का विभाजन हो जाता है:
अष्टफलकीय संकुल में:
t₂g → निम्न ऊर्जा
e_g → उच्च ऊर्जा
दोनों के बीच ऊर्जा अंतर = Δ₀
🔹 प्रकाश का अवशोषण (d–d transition)
जब श्वेत प्रकाश संकुल पर पड़ता है, तो धातु आयन Δ₀ के बराबर ऊर्जा वाली किरणों को अवशोषित कर लेता है।
इलेक्ट्रॉन:
[
t_{2g} \rightarrow e_g
]
इस प्रक्रिया को d–d संक्रमण कहते हैं।
अवशोषित रंग हट जाता है और जो रंग दिखाई देता है वह उसका पूरक (complementary) रंग होता है।
🔹 उदाहरण
[Ti(H₂O)₆]³⁺ लाल प्रकाश अवशोषित करता है → बैंगनी दिखाई देता है।
🔹 रंग को प्रभावित करने वाले कारक
धातु आयन का प्रकार
धातु का ऑक्सीकरण अवस्था
लिगैण्ड की शक्ति (Spectrochemical series)
संकुल की ज्यामिति
मजबूत लिगैण्ड → Δ बड़ा → अधिक ऊर्जा का प्रकाश अवशोषित → रंग बदल जाता है।
(ब) CFT की कमियाँ (Limitations)
क्रिस्टल क्षेत्र सिद्धान्त एक सरल वैद्युतस्थैतिक मॉडल है, इसलिए इसकी कुछ सीमाएँ हैं।
1️⃣ सहसंयोजक बन्ध नहीं समझाता
CFT मानता है कि धातु–लिगैण्ड बन्ध केवल आयनिक है, जबकि वास्तव में उनमें सहसंयोजक प्रकृति भी होती है।
2️⃣ स्पेक्ट्रोकेमिकल श्रृंखला का कारण नहीं बताता
क्यों CO मजबूत और H₂O कमजोर लिगैण्ड है — इसका कारण CFT स्पष्ट नहीं करता।
3️⃣ π-बन्धन को नहीं समझाता
धातु और लिगैण्ड के बीच π-बैक बॉन्डिंग को नहीं समझा पाता।
4️⃣ रंग की तीव्रता नहीं बताता
CFT केवल रंग का कारण बताता है, पर रंग की तीव्रता (intensity) नहीं समझाता।
5️⃣ कुछ चुंबकीय गुणों की सही व्याख्या नहीं
कुछ संकुलों के चुंबकीय गुण CFT से पूरी तरह नहीं समझाए जा सकते।
✨ निष्कर्ष
d–d संक्रमण के कारण संकुल रंगीन होते हैं।
CFT उपयोगी है लेकिन बन्ध की वास्तविक प्रकृति को पूरी तरह नहीं समझा पाता।
प्रश्न 15: निम्न संकुल आयनों के लिए Δ₀ (octahedral splitting) के मान की व्याख्या कीजिए।
दिए गए संकुल:
- [Fe(CN)₆]⁴⁻
- [Fe(CN)₆]³⁻
- [Co(CN)₆]³⁻
- [Ru(NH₃)₆]³⁺
Δ₀ किन पर निर्भर करता है
Δ₀ बढ़ता है यदि:
- धातु का आवेश अधिक हो
- धातु 3d → 4d → 5d की ओर जाए
- लिगैण्ड मजबूत हो (CN⁻ > NH₃)
(i) [Fe(CN)₆]⁴⁻
यहाँ:
- Fe का ऑक्सीकरण अवस्था = +2
- लिगैण्ड = CN⁻ (बहुत मजबूत)
मजबूत लिगैण्ड होने से Δ₀ बड़ा होगा।
(ii) [Fe(CN)₆]³⁻
यहाँ:
- Fe का ऑक्सीकरण अवस्था = +3 (पहले से अधिक)
अधिक आवेश → लिगैण्ड आकर्षण अधिक → Δ₀ बढ़ेगा
अतः:
Δo([Fe(CN)6]3−)>Δo([Fe(CN)6]4−)(iii) [Co(CN)₆]³⁻
यहाँ:
- Co³⁺ (3d धातु)
- CN⁻ (मजबूत लिगैण्ड)
Co³⁺ का आवेश Fe³⁺ के समान है, लेकिन Co का नाभिकीय आकर्षण अधिक प्रभावी होता है → d-कक्षक अधिक सिकुड़े → Δ₀ और बढ़ता है।
अतः:
Δo([Co(CN)6]3−)>Δo([Fe(CN)6]3−)(iv) [Ru(NH₃)₆]³⁺
यहाँ:
- Ru³⁺ = 4d धातु
- NH₃ = मजबूत लिगैण्ड (लेकिन CN⁻ से कमजोर)
4d धातुओं में d-कक्षक अधिक फैलाव वाले होते हैं → ओवरलैप अधिक → Δ₀ बहुत बड़ा।
इसलिए:
Δo([Ru(NH3)6]3+) सबसे अधिक🔷 अंतिम क्रम (Increasing Δ₀)
[Fe(CN)6]4−<[Fe(CN)6]3−<[Co(CN)6]3−<[Ru(NH3)6]3+✨ निष्कर्ष
Δ₀ का मान धातु के आवेश, धातु की श्रेणी और लिगैण्ड की शक्ति पर निर्भर करता है।
इसलिए Ru³⁺ (4d) वाले संकुल में Δ₀ सबसे अधिक होता है।
प्रश्न 16: धातु आयन g-कारक (g-factor) क्या है?
परिभाषा
g-कारक (Landé g-factor) एक महत्त्वपूर्ण मात्रा है जो यह बताती है कि धातु आयन बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में कितना प्रतिक्रिया करता है।
इसे प्रायः इलेक्ट्रॉन स्पिन रेज़ोनेंस (ESR/EPR) में मापा जाता है।
यह धातु आयन के स्पिन और कक्षीय (orbital) कोणीय संवेग दोनों पर निर्भर करता है।
g-कारक का सूत्र
g=1+2J(J+1)J(J+1)+S(S+1)−L(L+1)जहाँ
- L = कक्षीय कोणीय संवेग
- S = स्पिन कोणीय संवेग
- J = कुल कोणीय संवेग (J = L + S)
(Spin only) g-factor
अधिकांश संक्रमण धातु आयनों में कक्षीय योगदान बहुत कम होता है, इसलिए:
g≈2.0023≈2इसे spin-only g value कहते हैं।
g-कारक का महत्व
g-कारक से हमें जानकारी मिलती है:
- धातु आयन के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास की
- कक्षीय योगदान की उपस्थिति की
- संकुल की संरचना और बन्ध प्रकृति की
g-कारक के मान का अर्थ
- g ≈ 2 → केवल स्पिन योगदान
- g > 2 या g < 2 → कक्षीय योगदान मौजूद
✨ निष्कर्ष
g-कारक धातु आयन के चुंबकीय व्यवहार को दर्शाने वाली महत्वपूर्ण मात्रा है, जो स्पिन और कक्षीय कोणीय संवेग दोनों पर निर्भर करती है।
प्रश्न 17: क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा ($\Delta$) एवं क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) में अन्तर बताइए।
उत्तर:
यद्यपि ये दोनों शब्द सुनने में समान लगते हैं, लेकिन इनके अर्थ अलग हैं:
| अंतर का आधार | क्रिस्टल क्षेत्र विपाटन ऊर्जा (Δ) | क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) |
| मूल अवधारणा | यह $d$-कक्षकों के दो समूहों ($t_{2g}$ और $e_g$) के बीच का शुद्ध ऊर्जा अंतर है। | यह वह ऊर्जा में कमी है जो इलेक्ट्रॉनों के निम्न ऊर्जा कक्षकों में व्यवस्थित होने से प्राप्त होती है। |
| प्रतीक | इसे $\Delta_o$, $\Delta_t$ या $10Dq$ से दर्शाते हैं। | इसे गणना द्वारा निकाला जाता है (जैसे: $-0.4\Delta_o$)। |
| निर्धारण | यह लिगैण्ड की शक्ति और धातु की प्रकृति पर निर्भर करता है। | यह विपाटन के साथ-साथ इलेक्ट्रॉनों की संख्या और उनके युग्मन (Pairing) पर निर्भर करता है। |
| प्रभाव | यह केवल कक्षकों के अलगाव को बताता है। | यह संकुल के वास्तविक स्थायित्व (Stability) को निर्धारित करता है। |
प्रश्न 18: जान–टेलर (Jahn–Teller) विकृति क्या है? समझाइए।
परिभाषा
जब किसी संकुल में समान ऊर्जा (degenerate) कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का असमान वितरण होता है, तो संकुल अपनी ऊर्जा कम करने के लिए अपनी ज्यामिति बदल लेता है।
इस संरचनात्मक परिवर्तन को Jahn–Teller विकृति कहते हैं।
👉 सरल शब्दों में:
असमान इलेक्ट्रॉन वितरण → अस्थिरता → संरचना में विकृति → ऊर्जा कम → स्थिरता अधिक
यह क्यों होती है?
अष्टफलकीय संकुल में e_g कक्षक (dz² और dx²–y²) सीधे लिगैण्ड की दिशा में होते हैं।
यदि इन कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का असमान वितरण हो जाए, तो लिगैण्ड–धातु प्रतिकर्षण असमान हो जाता है।
इस असमानता को कम करने के लिए संकुल विकृत हो जाता है।
विकृति के प्रकार
1️⃣ Z-अक्ष के साथ लंबन (Elongation)
दो लिगैण्ड दूर चले जाते हैं और चार पास आ जाते हैं।
2️⃣ Z-अक्ष के साथ संकुचन (Compression)
दो लिगैण्ड पास आ जाते हैं और चार दूर चले जाते हैं।
किन विन्यासों में अधिक प्रभाव?
जिनमें e_g कक्षकों में असमान इलेक्ट्रॉन हों:
d⁹ → बहुत प्रबल प्रभाव
High spin d⁴
Low spin d⁷
उदाहरण
Cu²⁺ (d⁹) के अष्टफलकीय संकुलों में Jahn–Teller विकृति बहुत स्पष्ट होती है।
✨ निष्कर्ष
असमान इलेक्ट्रॉन वितरण → Jahn–Teller प्रभाव
यह संकुल की ऊर्जा घटाकर उसे अधिक स्थिर बनाता है।
प्रश्न 19: संकुलों का त्रिविम (Stereo) रसायन ज्ञात करने में क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) के उपयोग लिखिए।
भूमिका
क्रिस्टल क्षेत्र स्थायीकरण ऊर्जा (CFSE) से यह पता लगाया जा सकता है कि कोई संकुल किस ज्यामिति (geometry) में अधिक स्थिर होगा।
अर्थात CFSE हमें संकुल की त्रिविम संरचना (3-D structure) का अनुमान लगाने में मदद करती है।
1️⃣ ज्यामिति का निर्धारण (Octahedral vs Tetrahedral)
यदि किसी धातु आयन के लिए अष्टफलकीय ज्यामिति में CFSE अधिक हो → वह अष्टफलकीय संकुल बनाएगा।
यदि चतुष्फलकीय में अधिक स्थिरता मिले → वह चतुष्फलकीय संकुल बनाएगा।
👉 क्योंकि अष्टफलकीय में Δ₀ > Δt होता है, इसलिए अधिकांश संकुल अष्टफलकीय होते हैं।
2️⃣ Square Planar संकुलों का निर्माण (विशेषकर d⁸)
d⁸ धातु आयनों में (Ni²⁺, Pd²⁺, Pt²⁺) CFSE की गणना से पता चलता है कि Square planar संरचना अधिक स्थिर होती है।
इसलिए ये प्रायः square planar संकुल बनाते हैं।
3️⃣ High spin या Low spin का निर्धारण
CFSE से यह तय किया जा सकता है कि संकुल:
- High spin होगा या
- Low spin
यह संरचना और बन्धन को प्रभावित करता है।
4️⃣ संकुल की स्थिरता का अनुमान
जिस संकुल की CFSE अधिक होगी, वह अधिक स्थिर होगा।
इससे संकुल की संभावित संरचना का अनुमान लगाया जाता है।
5️⃣ जलयोजन ऊर्जा (Hydration energy) की व्याख्या
CFSE की सहायता से धातु आयनों की hydration energy और आयनिक त्रिज्या के रुझानों को समझाया जाता है, जिससे उनकी संरचना का ज्ञान मिलता है।
✨ निष्कर्ष
CFSE का उपयोग करके:
- संकुल की ज्यामिति का अनुमान
- Square planar संरचना की भविष्यवाणी
- High/Low spin का निर्धारण
- संकुल की स्थिरता का अध्ययन
इस प्रकार CFSE संकुलों की त्रिविम रसायन समझने में अत्यंत उपयोगी है।
प्रश्न 20: जॉन–टेलर प्रभाव से वर्ग तलीय (Square Planar) संरचना की विवेचना
अष्टफलकीय संकुल से दो axial लिगैण्ड हटाने पर square planar संरचना बनती है।
यह परिवर्तन जॉन–टेलर विकृति के कारण होता है।
कारण
अष्टफलकीय d⁸ संकुल में e_g कक्षकों में इलेक्ट्रॉनों का असमान वितरण होता है → Jahn–Teller विकृति होती है।
परिणाम:
- z-अक्ष के लिगैण्ड दूर चले जाते हैं
- अंततः हट जाते हैं
- केवल xy तल में 4 लिगैण्ड बचते हैं
👉 इसलिए square planar geometry बनती है।
विशेषतः: d⁸ धातु आयन (Ni²⁺, Pd²⁺, Pt²⁺)
प्रश्न 21: MO सिद्धान्त के आधार पर लिगैण्ड क्षेत्र सिद्धान्त (LFT)
लिगैण्ड क्षेत्र सिद्धान्त =
Crystal Field Theory + Molecular Orbital Theory
यह धातु–लिगैण्ड बन्ध को सहसंयोजक मानता है।
मुख्य बिंदु
- धातु के s, p, d कक्षक और लिगैण्ड के कक्षक मिलकर MO बनाते हैं।
-
दो प्रकार के बन्ध बनते हैं:
- σ बन्ध
- π बन्ध
MO का निर्माण
- Bonding MO → कम ऊर्जा → स्थिर
- Antibonding MO → अधिक ऊर्जा → अस्थिर
👉 इससे CFT की सीमाएँ दूर होती हैं।
प्रश्न 22 (अ): [CoF₆]²⁻ का MO ऊर्जा स्तर
चरण 1: ऑक्सीकरण अवस्था
F⁻ = −1 × 6 = −6
कुल आवेश = −2
Co = +4
👉 Co⁴⁺ → d⁵
चरण 2: F⁻ = कमजोर लिगैण्ड → High spin complex
ऊर्जा क्रम (Octahedral MO)
निम्न → उच्च
σ bonding → t₂g → e_g → σ* antibonding
इलेक्ट्रॉन भराव
d⁵ → High spin
t2g3eg2👉 5 अयुग्मित इलेक्ट्रॉन → Paramagnetic
प्रश्न 22 (ब): π-ग्राही और π-दाता लिगैण्ड
π-दाता लिगैण्ड
ये धातु को इलेक्ट्रॉन देते हैं।
उदाहरण:
Cl⁻ , Br⁻ , F⁻ , OH⁻
👉 Δ कम करते हैं → High spin बनाते हैं।
π-ग्राही लिगैण्ड
ये धातु से इलेक्ट्रॉन स्वीकार करते हैं (π back bonding)।
उदाहरण:
CO , CN⁻ , NO⁺
👉 Δ बढ़ाते हैं → Low spin बनाते हैं।
प्रश्न 23: चुंबकीय आघूर्ण की गणना
सूत्र:
जहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन
(i) [Fe(H₂O)₆]³⁺
Fe³⁺ → d⁵
H₂O = कमजोर लिगैण्ड → High spin
n=5
(ii) [Fe(CN)₆]³⁻
Fe³⁺ → d⁵
CN⁻ = मजबूत लिगैण्ड → Low spin
t2g5
n=1
✨ अंतिम निष्कर्ष
| संकुल | Spin | n | μ (BM) |
|---|---|---|---|
| [Fe(H₂O)₆]³⁺ | High spin | 5 | 5.92 |
| [Fe(CN)₆]³⁻ | Low spin | 1 | 1.73 |





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