B.Sc. Chemistry (C.G.) Third Year – UNIT 1, Second Question Paper Long & Short Answer Questions












 B.Sc. Chemistry (C.G.)

Third Year – First Question Paper


बी.एससी. रसायन विज्ञान (सी.जी.)
तृतीय वर्ष – द्वितीय प्रश्न पत्र

इकाई 1

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न


1 (a) विषमचक्रीय यौगिक क्या है? इसकी परिभाषा लिखिये।
उत्तर:
विषमचक्रीय यौगिक (Heterocyclic compounds) वे कार्बनिक यौगिक होते हैं जिनकी चक्रीय संरचना (ring structure) में कार्बन के अतिरिक्त कोई अन्य परमाणु भी उपस्थित होता है। इस अतिरिक्त परमाणु को विषम परमाणु (hetero atom) कहा जाता है। सामान्यतः नाइट्रोजन (N), ऑक्सीजन (O) और सल्फर (S) जैसे परमाणु विषम परमाणु के रूप में पाए जाते हैं। ये यौगिक सुगंधित (aromatic) या असुगंधित (non-aromatic) दोनों प्रकार के हो सकते हैं। विषमचक्रीय यौगिक प्राकृतिक तथा औषधीय रसायन में अत्यन्त महत्वपूर्ण हैं क्योंकि अनेक विटामिन, एंटीबायोटिक, अल्कलॉइड और दवाएँ इसी वर्ग में आती हैं। उदाहरण के लिए पायरोल, फ्यूरान, थायोफीन, पाइरीडीन आदि प्रमुख विषमचक्रीय यौगिक हैं। इन यौगिकों के भौतिक और रासायनिक गुण उनकी रिंग में उपस्थित विषम परमाणु के कारण बदल जाते हैं। यही कारण है कि ये अभिक्रियाशीलता, ध्रुवीयता तथा जैविक क्रियाशीलता में साधारण कार्बोसाइक्लिक यौगिकों से भिन्न व्यवहार करते हैं।


1 (b) पायरोल (Pyrrole) बनाने की एक विधि को समझाइए।
उत्तर:
पायरोल तैयार करने की एक प्रमुख विधि पॉल-नोर अभिक्रिया (Paal-Knorr synthesis) है। इस विधि में 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक (जैसे 1,4-डाइकीटोन) को अमोनिया (NH₃) या प्राथमिक अमीन के साथ अभिक्रिया कराकर पायरोल का निर्माण किया जाता है। सबसे पहले 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक अमोनिया के साथ संक्षेपण (condensation) अभिक्रिया करता है जिससे इमीन जैसा मध्यवर्ती उत्पाद बनता है। इसके बाद अणु के भीतर चक्रीकरण (cyclization) होता है और पाँच सदस्यीय रिंग का निर्माण होता है। अंत में जल का अपसारण (dehydration) होकर पायरोल प्राप्त होता है। यह विधि सरल, प्रभावी तथा प्रयोगशाला और औद्योगिक स्तर पर बहुत उपयोगी मानी जाती है। पायरोल एक सुगंधित विषमचक्रीय यौगिक है जिसमें पाँच सदस्यीय रिंग में चार कार्बन और एक नाइट्रोजन परमाणु होता है तथा इसमें 6 π-इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह एरोमैटिक प्रकृति दर्शाता है।


2. विषमचक्रीय यौगिकों के वर्गीकरण को समझाइये।
उत्तर:

विषमचक्रीय यौगिकों का वर्गीकरण मुख्यतः रिंग के आकार, विषम परमाणु के प्रकार तथा रिंग की संख्या के आधार पर किया जाता है।

(1) रिंग के आकार के आधार पर:
विषमचक्रीय यौगिकों को तीन भागों में बाँटा जाता है—

  • तीन सदस्यीय रिंग: जैसे ऑक्सीरैन (O वाला)
  • पाँच सदस्यीय रिंग: जैसे पायरोल, फ्यूरान, थायोफीन
  • छः सदस्यीय रिंग: जैसे पाइरीडीन, पाइरीमिडीन
    रिंग का आकार बढ़ने पर यौगिकों के गुण और स्थिरता बदलती है।

(2) विषम परमाणु के प्रकार के आधार पर:

  • नाइट्रोजन युक्त यौगिक: जैसे पायरोल, पाइरीडीन
  • ऑक्सीजन युक्त यौगिक: जैसे फ्यूरान
  • सल्फर युक्त यौगिक: जैसे थायोफीन
    कभी-कभी एक ही रिंग में एक से अधिक प्रकार के विषम परमाणु भी हो सकते हैं।

(3) विषम परमाणुओं की संख्या के आधार पर:

  • एक विषम परमाणु वाले: पायरोल, पाइरीडीन
  • दो विषम परमाणु वाले: इमिडाज़ोल, पाइरीमिडीन
  • तीन या अधिक विषम परमाणु वाले: ट्रायज़ीन आदि

(4) रिंग की संख्या के आधार पर:

  • एकल रिंग (Monocyclic): केवल एक रिंग वाले यौगिक
  • संयुग्मित या बहु-रिंग (Fused/Polycyclic): दो या अधिक जुड़ी हुई रिंग जैसे इंडोल, क्विनोलिन

इस प्रकार विषमचक्रीय यौगिकों का वर्गीकरण उनकी संरचना और विषम परमाणु की प्रकृति के आधार पर किया जाता है, जिससे उनके गुण और उपयोग को समझना आसान हो जाता है।

3:- फ्यूरान (Furan) बनाने की विधि, उसके ऐरोमैटिक लक्षण व गुणों को समझाइये।

उत्तर:

(1) फ्यूरान बनाने की विधि (Preparation of Furan)

फ्यूरान तैयार करने की प्रमुख विधि Paal-Knorr संश्लेषण है। इसमें 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक (1,4-dicarbonyl compound) को अम्लीय माध्यम में गरम किया जाता है।

अभिक्रिया का सिद्धान्त:

  1. 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक पहले अम्ल की उपस्थिति में सक्रिय हो जाता है।
  2. इसके बाद अणु के भीतर चक्रीकरण (Cyclization) होता है और पाँच सदस्यीय रिंग बनती है।
  3. अंत में जल का अपसारण (Dehydration) होता है जिससे फ्यूरान प्राप्त होता है।

यह विधि सरल, उच्च उपज देने वाली तथा प्रयोगशाला में बहुत उपयोगी मानी जाती है।


(2) फ्यूरान के ऐरोमैटिक लक्षण (Aromatic Character)

फ्यूरान एक पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक है जिसमें चार कार्बन और एक ऑक्सीजन परमाणु होता है।

इसके ऐरोमैटिक होने के मुख्य कारण:

  1. समतलीय संरचना (Planar structure): फ्यूरान की रिंग समतल होती है जिससे π-इलेक्ट्रॉन का फैलाव सम्भव होता है।
  2. संयुग्मित π-इलेक्ट्रॉन प्रणाली: इसमें कुल 6 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं।
    • 4 इलेक्ट्रॉन दो डबल बॉन्ड से
    • 2 इलेक्ट्रॉन ऑक्सीजन के lone pair से
  3. यह ह्यूकेल नियम (4n+2) का पालन करता है (n = 1 → 6 π इलेक्ट्रॉन)।

इसी कारण फ्यूरान सुगंधित (aromatic) प्रकृति प्रदर्शित करता है, यद्यपि इसकी सुगंधिता बेंजीन से थोड़ी कम होती है।


(3) फ्यूरान के गुण (Properties of Furan)

(A) भौतिक गुण

  • रंगहीन तथा हल्की सुगंध वाला द्रव होता है।
  • पानी में कम घुलनशील परंतु कार्बनिक विलायकों में घुलनशील।
  • उबलनांक कम होता है क्योंकि अणुओं के बीच आकर्षण बल कम होते हैं।

(B) रासायनिक गुण

फ्यूरान इलेक्ट्रॉन-समृद्ध रिंग होने के कारण इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ आसानी से करता है।

मुख्य अभिक्रियाएँ:

  1. हैलोजनीकरण: क्लोरीन/ब्रोमीन से अभिक्रिया कर हैलो-फ्यूरान बनाता है।
  2. नाइट्रेशन: हल्की परिस्थितियों में नाइट्रो-फ्यूरान बनता है।
  3. सल्फोनेशन: सल्फोनिक अम्ल बनाता है।
  4. ऑक्सीकरण: प्रबल ऑक्सीकारक से रिंग टूट सकती है।

निष्कर्ष

फ्यूरान एक महत्वपूर्ण पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक है जो Paal-Knorr विधि से बनाया जाता है। इसमें 6 π-इलेक्ट्रॉन होने के कारण यह ऐरोमैटिक गुण प्रदर्शित करता है तथा इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाओं में अत्यन्त सक्रिय होता है। औषधि एवं कार्बनिक संश्लेषण में इसका विशेष महत्व है।

4 (a) कम ताप पर पिरीडिन (Pyridine) ब्रोमीन से किस प्रकार क्रिया करता है?
उत्तर:

पिरीडिन एक नाइट्रोजन युक्त विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक है जिसमें रिंग का नाइट्रोजन परमाणु इलेक्ट्रॉन को आकर्षित करता है। इस कारण पिरीडिन रिंग में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है और यह बेंजीन की तुलना में इलेक्ट्रोफिलिक अभिक्रियाओं के प्रति कम सक्रिय होता है।

कम ताप पर पिरीडिन ब्रोमीन के साथ सामान्य हैलोजनीकरण नहीं करता। इसके स्थान पर ब्रोमीन पहले नाइट्रोजन परमाणु पर आक्रमण करता है और पिरीडिनियम ब्रोमाइड (Pyridinium bromide) जैसा यौगिक बनता है।
अर्थात् इस अवस्था में संयोजन (addition) या लवण निर्माण होता है, न कि रिंग का प्रतिस्थापन।

उच्च ताप या कठोर परिस्थितियों में ही रिंग पर ब्रोमीन का प्रतिस्थापन संभव होता है।


4 (b) पिरीडिन में न्यूक्लियोफिलिक अथवा इलेक्ट्रॉनस्नेही प्रतिस्थापन क्रिया को उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:

पिरीडिन में नाइट्रोजन परमाणु की अधिक विद्युतऋणात्मकता के कारण रिंग में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम होता है। इसलिए इसमें

  • इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन कठिन
  • न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अपेक्षाकृत सरल होता है।

(1) न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन (Nucleophilic Substitution)

पिरीडिन में न्यूक्लियोफाइल मुख्यतः 2- और 4-स्थिति पर आक्रमण करते हैं, क्योंकि इन स्थानों पर बनने वाला मध्यवर्ती आयन अधिक स्थिर होता है।

उदाहरण – चिचिबाबिन अभिक्रिया (Chichibabin reaction):
जब पिरीडिन को सोडियम अमाइड (NaNH₂) के साथ गरम किया जाता है, तो 2-एमिनो पिरीडिन बनता है।
यह पिरीडिन की सबसे महत्वपूर्ण न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया है।

कारण:
नाइट्रोजन इलेक्ट्रॉन खींचता है जिससे रिंग में धन आवेश विकसित होता है और न्यूक्लियोफाइल आसानी से जुड़ सकता है।


(2) इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन (Electrophilic Substitution)

पिरीडिन में इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन कठिन होता है क्योंकि नाइट्रोजन इलेक्ट्रॉन खींचकर रिंग को निष्क्रिय कर देता है।
फिर भी कठोर परिस्थितियों में यह क्रिया होती है और इलेक्ट्रोफाइल मुख्यतः 3-स्थिति (meta position) पर आक्रमण करता है।

उदाहरण:

  1. नाइट्रेशन: तीव्र परिस्थितियों में 3-नाइट्रोपिरीडिन बनता है।
  2. सल्फोनेशन: 3-पिरीडिन सल्फोनिक अम्ल बनता है।

कारण:
3-स्थिति पर बनने वाला मध्यवर्ती आयन अधिक स्थिर होता है, इसलिए प्रतिस्थापन वहीं होता है।


निष्कर्ष:
पिरीडिन में नाइट्रोजन की उपस्थिति के कारण न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन आसानी से और इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन कठिन परिस्थितियों में होता है, तथा दोनों की दिशा (position) अलग-अलग होती है।

5. आइसोक्विनोलीन (Isoquinoline) की संश्लेषण विधि एवं उसके गुण समझाइये।

उत्तर:

(1) आइसोक्विनोलीन की संरचना

आइसोक्विनोलीन एक द्वि-चक्रीय (bicyclic) नाइट्रोजन युक्त विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक है। इसकी संरचना बेंजीन और पिरीडिन रिंग के संयोजन से बनी होती है। यह क्विनोलीन का समावयवी (isomer) है और औषधीय रसायन में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।


(2) आइसोक्विनोलीन की संश्लेषण विधि (Synthesis)

इसका प्रमुख संश्लेषण बिश्लर–नेपियराल्स्की अभिक्रिया (Bischler–Napieralski Reaction) द्वारा किया जाता है।

अभिक्रिया के चरण:

  1. β-फिनाइल एथाइल अमीन (β-phenylethylamine) को पहले किसी एसिल क्लोराइड या एसिड एनहाइड्राइड से अभिक्रिया कराकर एमाइड (amide) बनाया जाता है।
  2. इस एमाइड को P₂O₅ या POCl₃ जैसे निर्जलीकरण अभिकर्मकों की उपस्थिति में गरम किया जाता है।
  3. इस प्रक्रिया में चक्रीकरण (Cyclization) होता है और डायहाइड्रोआइसोक्विनोलीन बनता है।
  4. अंत में ऑक्सीकरण करके आइसोक्विनोलीन प्राप्त किया जाता है।

यह विधि प्रयोगशाला में सबसे अधिक प्रयुक्त और प्रभावी मानी जाती है।


(3) आइसोक्विनोलीन के गुण (Properties)

(A) भौतिक गुण

  • रंगहीन या हल्का पीला द्रव होता है।
  • विशिष्ट गंध होती है।
  • पानी में कम घुलनशील, परन्तु कार्बनिक विलायकों में घुलनशील।
  • इसका उबलनांक अपेक्षाकृत अधिक होता है।

(B) रासायनिक गुण

1. क्षारीय प्रकृति (Basic nature):
नाइट्रोजन परमाणु पर lone pair होने के कारण यह क्षारीय (basic) होता है और अम्लों के साथ लवण बनाता है।

2. इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया:
बेंजीन रिंग पर प्रतिस्थापन मुख्यतः 5 और 8 स्थिति पर होता है।
उदाहरण:

  • नाइट्रेशन
  • सल्फोनेशन
  • हैलोजनीकरण

3. न्यूक्लियोफिलिक अभिक्रिया:
पिरीडिन रिंग में न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन संभव होता है।

4. ऑक्सीकरण और अपचयन:

  • ऑक्सीकरण से विभिन्न अम्ल बनते हैं।
  • अपचयन से टेट्राहाइड्रोआइसोक्विनोलीन बनता है।

निष्कर्ष

आइसोक्विनोलीन एक महत्वपूर्ण द्वि-चक्रीय सुगंधित विषमचक्रीय यौगिक है, जिसका संश्लेषण मुख्यतः बिश्लर–नेपियराल्स्की विधि से किया जाता है। इसकी क्षारीय प्रकृति और विभिन्न प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ इसे औषधि तथा कार्बनिक संश्लेषण में अत्यंत उपयोगी बनाती हैं।

6. स्क्रॉप विधि (Skraup synthesis) से क्विनोलीन का संश्लेषण किस प्रकार किया जाता है? इसकी क्रियाविधि के प्रत्येक पद को स्पष्ट कीजिए।

उत्तर:

(1) स्क्रॉप संश्लेषण का परिचय

क्विनोलीन बनाने की सबसे प्रसिद्ध विधि स्क्रॉप संश्लेषण (Skraup synthesis) है। इसमें एनिलीन (Aniline) को ग्लिसरॉल (Glycerol), सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल तथा ऑक्सीकारक (जैसे नाइट्रोबेंजीन) की उपस्थिति में गरम किया जाता है। परिणामस्वरूप क्विनोलीन प्राप्त होता है।


(2) प्रयुक्त अभिकर्मक

  • एनिलीन (C₆H₅NH₂)
  • ग्लिसरॉल (C₃H₅(OH)₃)
  • सान्द्र H₂SO₄
  • ऑक्सीकारक → नाइट्रोबेंजीन / आर्सेनिक अम्ल

(3) अभिक्रिया की क्रियाविधि (Mechanism)

स्क्रॉप अभिक्रिया कई चरणों में पूर्ण होती है:

चरण 1: एक्रोलीन का निर्माण

ग्लिसरॉल सान्द्र H₂SO₄ की उपस्थिति में निर्जलीकरण (Dehydration) होकर एक्रोलीन (Acrolein) बनाता है।

GlycerolAcrolein+2H2OGlycerol \rightarrow Acrolein + 2H_2O

चरण 2: एनिलीन का संयोग (Addition)

एक्रोलीन, एनिलीन के साथ संयोग कर β-एनिलिनो प्रोपेनाल बनाता है।
यह चरण न्यूक्लियोफिलिक संयोग का उदाहरण है।

चरण 3: चक्रीकरण (Cyclization)

अणु के भीतर अभिक्रिया होकर रिंग का निर्माण होता है और डायहाइड्रो क्विनोलीन बनता है।

चरण 4: ऑक्सीकरण

डायहाइड्रो क्विनोलीन का ऑक्सीकरण (नाइट्रोबेंजीन द्वारा) होकर क्विनोलीन प्राप्त होता है।


(4) अभिक्रिया का समग्र सार

एनिलीन + ग्लिसरॉल + H₂SO₄ + ऑक्सीकारक → क्विनोलीन


(5) महत्व

  • यह क्विनोलीन बनाने की प्रमुख औद्योगिक विधि है।
  • औषधि, रंग (dyes) और रसायन उद्योग में उपयोगी।

निष्कर्ष

स्क्रॉप संश्लेषण में पहले ग्लिसरॉल से एक्रोलीन बनता है, फिर एनिलीन के साथ संयोग, चक्रीकरण और अंत में ऑक्सीकरण से क्विनोलीन प्राप्त होता है। यह बहु-चरणीय अभिक्रिया क्विनोलीन निर्माण की सबसे महत्वपूर्ण विधि मानी जाती है।

प्रश्न 8 : पायरोल से निम्नलिखित यौगिक कैसे प्राप्त करेंगे?
(i) मैलीनीमाइड (Maleimide)
(ii) पायरोल-2-कार्बोक्सिलिक अम्ल

उत्तर:

पायरोल एक इलेक्ट्रॉन-समृद्ध पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय यौगिक है जो आसानी से ऑक्सीकरण तथा प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ देता है।


(i) पायरोल से मैलीनीमाइड (Maleimide) की प्राप्ति

चरण 1 – प्रबल ऑक्सीकरण
पायरोल को शक्तिशाली ऑक्सीकारक (जैसे KMnO₄ या HNO₃) से ऑक्सीकरण करने पर रिंग टूट जाती है और मैलेक अम्ल (Maleic acid) बनता है।

PyrroleOxidationKMnO4Maleic acidPyrrole \xrightarrow[Oxidation]{KMnO_4} Maleic\ acid

चरण 2 – अमोनिया के साथ अभिक्रिया
मैलेक अम्ल को अमोनिया के साथ अभिक्रिया कराने पर मैलेक अमाइड (Maleamic acid) बनता है।

चरण 3 – निर्जलीकरण (Dehydration)
मैलेक अमाइड को गरम करने पर जल निकल जाता है और मैलीनीमाइड (Maleimide) प्राप्त होता है।

Maleamic acidHeatMaleimideMaleamic\ acid \xrightarrow{Heat} Maleimide

(ii) पायरोल से पायरोल-2-कार्बोक्सिलिक अम्ल की प्राप्ति

यह अभिक्रिया मुख्यतः कार्बोक्सीलेशन द्वारा की जाती है।

चरण 1 – ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक का निर्माण
पायरोल को पहले हैलोजनीकरण कर 2-हैलोपायरोल बनाया जाता है।
फिर Mg के साथ अभिक्रिया कराकर इसका ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक तैयार किया जाता है।

2-Halopyrrole+MgPyrrolyl MgX2\text{-Halopyrrole} + Mg \rightarrow Pyrrolyl\ MgX

चरण 2 – CO₂ के साथ अभिक्रिया
ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक को कार्बन डाइऑक्साइड (CO₂) से अभिक्रिया कराते हैं जिससे मैग्नीशियम कार्बोक्सिलेट बनता है।

चरण 3 – अम्लीकरण (Acid hydrolysis)
अम्लीकरण करने पर पायरोल-2-कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त होता है।

Pyrrolyl MgX+CO2Pyrrole-2-COOHPyrrolyl\ MgX + CO_2 \rightarrow Pyrrole\text{-}2\text{-}COOH

निष्कर्ष

  •  पायरोल के ऑक्सीकरण से मैलेक अम्ल बनाकर उससे मैलीनीमाइड प्राप्त किया जाता है।
  • पायरोल का ग्रिग्नार्ड अभिकर्मक बनाकर CO₂ से अभिक्रिया कराने पर पायरोल-2-कार्बोक्सिलिक अम्ल प्राप्त होता है।

9:-  . कोलतार से थायोफीन (Thiophene) कैसे प्राप्त करते हैं? इसके औद्योगिक निर्माण की एक विधि तथा अनुनाद संरचना दीजिये।

उत्तर:

(1) कोलतार से थायोफीन की प्राप्ति

कोलतार (Coal tar) में बेंजीन के साथ थोड़ी मात्रा में थायोफीन भी उपस्थित होता है। दोनों के क्वथनांक लगभग समान होने के कारण इन्हें अलग करना कठिन होता है।

अलग करने की विधि (Isatin Test / Sulphonation Method):

  1. कोलतार से प्राप्त बेंजीन–थायोफीन मिश्रण को सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल से उपचारित किया जाता है।
  2. थायोफीन, बेंजीन की तुलना में अधिक अभिक्रियाशील होने के कारण सल्फोनेशन होकर थायोफीन सल्फोनिक अम्ल बना लेता है, जबकि बेंजीन पर प्रभाव कम पड़ता है।
  3. जल से अपघटन (hydrolysis) करने पर पुनः थायोफीन प्राप्त हो जाता है।

इस प्रकार कोलतार से थायोफीन अलग किया जाता है।


(2) थायोफीन का औद्योगिक निर्माण

थायोफीन का औद्योगिक निर्माण ब्यूटेन या ब्यूटीन तथा सल्फर से किया जाता है।

अभिक्रिया:
ब्यूटेन/ब्यूटीन को सल्फर के साथ 500–600°C पर गरम करने पर चक्रीकरण होकर थायोफीन बनता है।

C4H10+SC4H4S+H2C_4H_{10} + S \rightarrow C_4H_4S + H_2

यह विधि उद्योग में बड़े पैमाने पर प्रयुक्त होती है क्योंकि कच्चा माल सस्ता और उपलब्ध होता है।


(3) थायोफीन की अनुनाद संरचनाएँ (Resonance Structures)

थायोफीन एक पाँच सदस्यीय सुगंधित विषमचक्रीय यौगिक है जिसमें चार कार्बन और एक सल्फर परमाणु होता है। इसमें कुल 6 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं:

  • 4 इलेक्ट्रॉन दो डबल बॉन्ड से
  • 2 इलेक्ट्रॉन सल्फर के lone pair से

इसमें निम्न प्रकार की अनुनाद संरचनाएँ होती हैं:

  1. सामान्य संरचना जिसमें दो डबल बॉन्ड रिंग में उपस्थित होते हैं।
  2. सल्फर का lone pair रिंग में भाग लेकर डबल बॉन्ड का स्थान परिवर्तन करता है।
  3. विभिन्न संरचनाओं में धनात्मक और ऋणात्मक आवेश रिंग में स्थान बदलते रहते हैं।

इन सभी संरचनाओं के कारण π-इलेक्ट्रॉन पूरे रिंग में फैल जाते हैं और थायोफीन सुगंधित (aromatic) तथा स्थिर हो जाता है।


निष्कर्ष

  • थायोफीन को कोलतार से सल्फोनेशन विधि द्वारा अलग किया जाता है।
  • उद्योग में ब्यूटेन/ब्यूटीन और सल्फर से इसका निर्माण किया जाता है।
  • अनुनाद के कारण इसमें 6 π-इलेक्ट्रॉन का डीलोकलाइज़ेशन होता है, जिससे यह सुगंधित और स्थिर बनता है।

10. पिरीडीन व पायरोल की क्षारीयता (Basicity) की तुलना कीजिये।

क्र.

गुण

पिरीडीन

पायरोल

1

क्षारीयता का स्तर

मध्यम क्षार

बहुत कमजोर क्षार

2

N का lone pair

रिंग के बाहर उपलब्ध

π-इलेक्ट्रॉन प्रणाली का भाग

3

Aromaticity पर प्रभाव

Protonation से aromaticity बनी रहती है

Protonation से aromaticity नष्ट होती है

4

Proton स्वीकार करने की क्षमता

आसानी से H⁺ ग्रहण करता है

H⁺ ग्रहण करना कठिन

5

Conjugate acid की स्थिरता

Pyridinium आयन स्थिर

Pyrrolium आयन अस्थिर

6

pKa (conjugate acid)

लगभग 5.2

लगभग −0.3

7

जल में व्यवहार

स्पष्ट क्षारीय

लगभग तटस्थ

8

अम्लों के साथ लवण निर्माण

आसानी से लवण बनाता है

कठिनाई से लवण बनाता है

9

Lone pair की भूमिका

Protonation के लिए उपलब्ध

Aromaticity बनाए रखने में प्रयुक्त

10

Electron density प्रभाव

रिंग से इलेक्ट्रॉन खींचता है

रिंग को इलेक्ट्रॉन देता है

11

अम्लों के साथ प्रतिक्रिया

Dilute acid से भी प्रतिक्रिया

Strong acid आवश्यक

12

इलेक्ट्रोफिलिक अभिक्रिया

कम सक्रिय

अधिक सक्रिय

13

समग्र क्षारीयता

अधिक

बहुत कम



11. ऐरोमैटिक श्रेणी के पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय यौगिकों के तीन उदाहरण दीजिए और बताइये कि इनमें ऐरोमैटिक गुण क्यों होता है?

उत्तर:

(1) उदाहरण (Examples)

ऐरोमैटिक पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय यौगिकों के प्रमुख उदाहरण:

  1. पायरोल (Pyrrole) – एक नाइट्रोजन परमाणु वाला
  2. फ्यूरान (Furan) – एक ऑक्सीजन परमाणु वाला
  3. थायोफीन (Thiophene) – एक सल्फर परमाणु वाला

(2) इनमें ऐरोमैटिक गुण क्यों होता है?

इन तीनों यौगिकों में ऐरोमैटिकता के लिए आवश्यक शर्तें पूरी होती हैं:

(i) समतलीय संरचना (Planar Structure)

इनकी पाँच सदस्यीय रिंग समतल होती है जिससे π-इलेक्ट्रॉन पूरे रिंग में फैल सकते हैं।

(ii) संयुग्मित π-इलेक्ट्रॉन प्रणाली (Conjugated system)

रिंग में लगातार p-ऑर्बिटल ओवरलैप होता है जिससे इलेक्ट्रॉन डीलोकलाइजेशन संभव होता है।

(iii) 6 π-इलेक्ट्रॉन (Hückel Rule)

इन सभी में कुल 6 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं:

  • 4 इलेक्ट्रॉन दो डबल बॉन्ड से
  • 2 इलेक्ट्रॉन विषम परमाणु (N/O/S) के lone pair से

यह Hückel नियम (4n + 2) का पालन करता है जहाँ n = 1 → 6 π इलेक्ट्रॉन।

(iv) अनुनाद (Resonance)

इन यौगिकों में कई अनुनाद संरचनाएँ संभव हैं जिससे रिंग अत्यधिक स्थिर हो जाती है।


निष्कर्ष

पायरोल, फ्यूरान और थायोफीन पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक हैं क्योंकि इनमें समतलीय संरचना, संयुग्मन और 6 π-इलेक्ट्रॉन होने के कारण Hückel नियम का पालन होता है।

12. अस्थि तेल (Bone oil) से पायरोल बनाने की विधि बताइये।

उत्तर:

अस्थि तेल (Bone oil) पशुओं की हड्डियों के विनाशकारी आसवन (destructive distillation) से प्राप्त एक जटिल मिश्रण होता है। इसमें कई नाइट्रोजन युक्त विषमचक्रीय यौगिक पाए जाते हैं, जिनमें पायरोल भी उपस्थित रहता है।

पायरोल प्राप्त करने की विधि

चरण 1 – अस्थि तेल का आसवन (Fractional Distillation)
अस्थि तेल को पहले अंश आसवन (fractional distillation) द्वारा अलग-अलग भागों में विभाजित किया जाता है।
लगभग 130–150°C के बीच प्राप्त अंश में पायरोल उपस्थित रहता है।

चरण 2 – अम्ल के साथ अभिक्रिया
इस अंश को पतले सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄) से उपचारित किया जाता है।

  • अम्ल अन्य अशुद्ध नाइट्रोजन यौगिकों को लवण के रूप में अलग कर देता है।
  • पायरोल अपेक्षाकृत कम अभिक्रियाशील होने के कारण अलग रह जाता है।

चरण 3 – क्षार से उपचार (Alkaline treatment)
अब मिश्रण को क्षार (NaOH/KOH) से उपचारित किया जाता है जिससे अम्लीय अशुद्धियाँ हट जाती हैं।

चरण 4 – पुनः आसवन (Redistillation)
अंत में पुनः आसवन करने पर शुद्ध पायरोल प्राप्त होता है।

निष्कर्ष

अस्थि तेल से पायरोल को अंश आसवन, अम्ल-क्षार उपचार और पुनः आसवन द्वारा शुद्ध रूप में प्राप्त किया जाता है। यह पायरोल प्राप्त करने की पारंपरिक विधि है।

13. पिरिडीन के प्रतिस्थापी में समावयवता को समझाइये।

उत्तर:

पिरिडीन एक छह सदस्यीय सुगंधित विषमचक्रीय यौगिक है जिसमें एक नाइट्रोजन परमाणु उपस्थित होता है। इसकी रिंग में प्रतिस्थापन होने पर विभिन्न स्थिति समावयव (position isomers) बनते हैं। इसे ही पिरिडीन के प्रतिस्थापी में समावयवता कहा जाता है।

(1) पिरिडीन रिंग की स्थिति संख्या

पिरिडीन में नाइट्रोजन को स्थिति-1 माना जाता है और आगे क्रमशः 2, 3, 4, 5, 6 स्थान होते हैं।
लेकिन संरचना की सममिति के कारण:

  • 2 और 6 समान होते हैं
  • 3 और 5 समान होते हैं

इसलिए वास्तव में केवल तीन भिन्न स्थितियाँ महत्वपूर्ण होती हैं:

  • 2-स्थिति (α-स्थिति)
  • 3-स्थिति (β-स्थिति)
  • 4-स्थिति (γ-स्थिति)

(2) मोनो-प्रतिस्थापित पिरिडीन में समावयवता

यदि पिरिडीन में एक प्रतिस्थापी (X) लगाया जाए, तो तीन समावयव बन सकते हैं:

  1. 2-प्रतिस्थापित पिरिडीन (α-isomer)
    प्रतिस्थापन नाइट्रोजन के पास (2-स्थिति) पर होता है।
  2. 3-प्रतिस्थापित पिरिडीन (β-isomer)
    प्रतिस्थापन 3-स्थिति पर होता है।
  3. 4-प्रतिस्थापित पिरिडीन (γ-isomer)
    प्रतिस्थापन नाइट्रोजन के सामने (4-स्थिति) पर होता है।

उदाहरण:
क्लोरोपिरिडीन → 2-क्लोरो, 3-क्लोरो और 4-क्लोरो पिरिडीन


(3) डाय-प्रतिस्थापित पिरिडीन में समावयवता

यदि दो प्रतिस्थापी उपस्थित हों, तो विभिन्न संयोजन संभव होते हैं जैसे:
2,3- ; 2,4- ; 2,5- ; 2,6- ; 3,4- ; 3,5- आदि।
इस प्रकार समावयवों की संख्या और अधिक बढ़ जाती है।


निष्कर्ष

पिरिडीन में नाइट्रोजन की स्थिति के कारण प्रतिस्थापन तीन मुख्य स्थानों (2, 3, 4) पर होता है, जिससे मोनो-प्रतिस्थापित पिरिडीन के तीन समावयव बनते हैं। यही पिरिडीन के प्रतिस्थापी में समावयवता कहलाती है।

14 (a) कारण सहित समझाइए: पिरिडीन में न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन α-पोजिशन में होता है।

उत्तर:

पिरिडीन में नाइट्रोजन परमाणु अत्यधिक विद्युतऋणात्मक होता है और रिंग से इलेक्ट्रॉन खींचता है। इस कारण पिरिडीन रिंग इलेक्ट्रॉन-अल्प (electron deficient) हो जाती है और न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन के लिए उपयुक्त बनती है।

α-पोजिशन (2-स्थिति) पर प्रतिस्थापन होने के कारण

1. प्रेरण प्रभाव (–I effect):
नाइट्रोजन रिंग से इलेक्ट्रॉन खींचता है, जिससे 2 और 4 स्थिति पर धनात्मक आंशिक आवेश विकसित होता है।
इससे न्यूक्लियोफाइल के लिए α-स्थिति अधिक आकर्षक बनती है।

2. अनुनाद द्वारा मध्यवर्ती आयन की स्थिरता:
जब न्यूक्लियोफाइल 2-स्थिति पर आक्रमण करता है, तो बनने वाला कार्बऋणायन (carbanion intermediate) कई अनुनाद संरचनाओं द्वारा स्थिर होता है।
इस अनुनाद में ऋण आवेश नाइट्रोजन परमाणु तक फैल सकता है, जिससे स्थिरता बढ़ जाती है।

3. अधिक अनुनाद संरचनाएँ:
α-स्थिति पर बनने वाला मध्यवर्ती आयन β-स्थिति की तुलना में अधिक अनुनाद संरचनाएँ देता है, इसलिए यह अधिक स्थिर होता है।

4. ऊर्जा की दृष्टि से अनुकूलता:
अधिक स्थिर मध्यवर्ती बनने के कारण सक्रियण ऊर्जा कम हो जाती है और अभिक्रिया आसानी से हो जाती है।

निष्कर्ष

नाइट्रोजन के –I प्रभाव और अनुनाद द्वारा मध्यवर्ती आयन की अधिक स्थिरता के कारण पिरिडीन में न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन मुख्यतः α-स्थिति (2-पोजिशन) पर होता है।

15. फिशर इण्डोल संश्लेषण तथा उसकी क्रियाविधि को समझाइये।

उत्तर:

(1) फिशर इण्डोल संश्लेषण (Fischer Indole Synthesis)

यह इण्डोल बनाने की महत्वपूर्ण विधि है। इसमें फिनाइलहाइड्राज़ीन (Phenylhydrazine) को एल्डिहाइड या कीटोन के साथ अम्लीय माध्यम में गरम करने पर इण्डोल प्राप्त होता है।

सामान्य अभिक्रिया:
Phenylhydrazine + Aldehyde/Ketone → Indole

यह विधि औषधि और रंग उद्योग में बहुत महत्वपूर्ण है।


(2) क्रियाविधि (Mechanism)

यह अभिक्रिया कई चरणों में पूर्ण होती है:

चरण 1 – हाइड्राज़ोन का निर्माण

एल्डिहाइड/कीटोन और फिनाइलहाइड्राज़ीन अभिक्रिया करके फिनाइलहाइड्राज़ोन (Phenylhydrazone) बनाते हैं।

चरण 2 – टॉटोमेरीकरण (Tautomerisation)

हाइड्राज़ोन अम्लीय माध्यम में एनामीन रूप (ene-hydrazine) में परिवर्तित हो जाता है।

चरण 3 – चक्रीकरण (Cyclization)

अणु के भीतर इलेक्ट्रोफिलिक आक्रमण से बेंजीन रिंग पर हमला होता है और रिंग बंद होकर साइक्लिक इंटरमीडिएट बनता है।

चरण 4 – अमोनिया का अपसारण

चक्रीय मध्यवर्ती से NH₃ निकलता है और इण्डोल रिंग बन जाती है।

चरण 5 – पुनर्व्यवस्था और स्थिरीकरण

अंत में पुनर्व्यवस्था होकर स्थिर इण्डोल प्राप्त होता है।


(3) महत्व

  • इण्डोल औषधियों, रंगों और सुगंधित यौगिकों में उपयोगी है।
  • यह इण्डोल बनाने की सबसे प्रसिद्ध प्रयोगशाला विधि है।

निष्कर्ष

फिशर इण्डोल संश्लेषण में फिनाइलहाइड्राज़ीन और एल्डिहाइड/कीटोन से हाइड्राज़ोन बनता है, फिर टॉटोमेरीकरण, चक्रीकरण और NH₃ के निष्कासन द्वारा इण्डोल प्राप्त होता है।


16. क्या होता है, जब निम्न अभिक्रियाएँ की जाती हैं?


(i) क्विनोलीन + सोडामाइड (NaNH₂)

यह चिचिबाबिन अभिक्रिया (Chichibabin reaction) जैसी न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन क्रिया है।
सोडामाइड क्विनोलीन की 2-स्थिति (α-position) पर आक्रमण करता है और
👉 2-एमिनोक्विनोलीन बनता है।

QuinolineNaNH22-AminoquinolineQuinoline \xrightarrow{NaNH_2} 2\text{-Aminoquinoline}

(ii) क्विनोलीन + ठोस KOH (Fusion with KOH)

ठोस KOH के साथ गरम करने पर न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन होता है।
👉 OH समूह 2-स्थिति पर जुड़ता है और
2-हाइड्रॉक्सी क्विनोलीन बनता है।


(iii) क्विनोलीन + सान्द्र सल्फ्यूरिक अम्ल (H₂SO₄)

यह सल्फोनेशन (Electrophilic substitution) है।
सल्फोनिक अम्ल समूह बेंजीन रिंग पर जुड़ता है।
👉 मुख्य उत्पाद: क्विनोलीन-8-सल्फोनिक अम्ल


(iv) फ्यूरान + HCN/HCl

यह गैटरमैन अभिक्रिया (Gattermann reaction) है।
फॉर्मिल समूह (–CHO) रिंग पर जुड़ता है।
👉 उत्पाद: फ्यूरान-2-कार्बैल्डिहाइड (Furfural)


(v) एसीटिलीन + अमोनिया

एसीटिलीन को अमोनिया के साथ गरम करने पर चक्रीकरण होता है।
👉 पायरोल (Pyrrole) बनता है।

2C2H2+NH3Pyrrole2C_2H_2 + NH_3 \rightarrow Pyrrole

संक्षेप में:

  • NaNH₂ → 2-Aminoquinoline
  • KOH → 2-Hydroxyquinoline
  • H₂SO₄ → 8-Sulphonic acid derivative
  • Furan + HCN/HCl → Furfural
  • Acetylene + NH₃ → Pyrrole

17. आइसोक्विनोलीन की संरचना को विस्तार से समझाइये।

उत्तर:

आइसोक्विनोलीन एक महत्वपूर्ण द्वि-चक्रीय (bicyclic) नाइट्रोजन युक्त विषमचक्रीय सुगंधित यौगिक है। इसकी संरचना बेंजीन और पिरीडिन रिंग के संयोजन से बनी होती है, परन्तु इसमें नाइट्रोजन का स्थान क्विनोलीन से अलग होता है।


(1) मूल संरचना (Basic Structure)

  • इसमें कुल 10 परमाणु होते हैं → 9 कार्बन + 1 नाइट्रोजन।
  • यह दो रिंगों से बना होता है:
    1. बेंजीन रिंग
    2. पिरीडिन जैसी रिंग (जिसमें N उपस्थित होता है)
  • दोनों रिंग फ्यूज्ड (fused) अवस्था में होती हैं यानी एक किनारा साझा करती हैं।

(2) क्विनोलीन से अंतर

  • क्विनोलीन में नाइट्रोजन 1-स्थिति पर होता है।
  • आइसोक्विनोलीन में नाइट्रोजन 2-स्थिति पर होता है।
    इसी कारण इसे क्विनोलीन का समावयवी (isomer) कहा जाता है।

(3) समतलीय (Planar) संरचना

आइसोक्विनोलीन के सभी परमाणु sp² hybridized होते हैं।
इस कारण पूरा अणु समतल होता है और p-ऑर्बिटल्स का अच्छा ओवरलैप होता है।


(4) π-इलेक्ट्रॉन प्रणाली

इसमें कुल 10 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं:

  • 8 इलेक्ट्रॉन चार डबल बॉन्ड से
  • 2 इलेक्ट्रॉन नाइट्रोजन के lone pair से (π-सिस्टम में भाग नहीं लेते, लेकिन रिंग की सुगंधिता बनी रहती है)

यह Hückel नियम (4n+2) का पालन करता है (n=2 → 10 π इलेक्ट्रॉन)।


(5) अनुनाद (Resonance)

आइसोक्विनोलीन में कई अनुनाद संरचनाएँ संभव हैं।

  • π-इलेक्ट्रॉन पूरे अणु में फैल जाते हैं।
  • इससे अणु अत्यधिक स्थिर और सुगंधित बन जाता है।

(6) क्षारीय प्रकृति

नाइट्रोजन का lone pair π-सिस्टम में भाग नहीं लेता, इसलिए यह

  • H⁺ ग्रहण कर सकता है
  • लवण बना सकता है

निष्कर्ष

आइसोक्विनोलीन एक समतलीय, 10 π-इलेक्ट्रॉन युक्त, फ्यूज्ड रिंग वाला सुगंधित विषमचक्रीय यौगिक है जिसमें नाइट्रोजन की स्थिति इसे क्विनोलीन से अलग बनाती है और इसकी संरचना अत्यधिक स्थिर होती है।


18. संश्लेषण एवं क्रियाविधि:
(i) पॉल-नॉर संश्लेषण (Paal–Knorr synthesis)
(ii) Knorr पायरोल संश्लेषण (Knorr Pyrrole synthesis)
(iii) Skraup (नॉर) क्विनोलीन संश्लेषण


(i) पॉल–नॉर संश्लेषण (Paal–Knorr Synthesis)

परिचय

यह विधि 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक से पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय यौगिक (पायरोल, फ्यूरान, थायोफीन) बनाने की प्रमुख विधि है।

पायरोल बनने की अभिक्रिया

1,4-Diketone+NH3Pyrrole1,4\text{-Diketone} + NH_3 \rightarrow Pyrrole

क्रियाविधि

  1. अमोनिया का संयोग
    1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक के एक कार्बोनिल पर अमोनिया जुड़कर इमाइन बनाता है।
  2. इंट्रामॉलिक्युलर चक्रीकरण
    दूसरा कार्बोनिल समूह आंतरिक अभिक्रिया करके पाँच सदस्यीय रिंग बनाता है।
  3. निर्जलीकरण
    जल के निकलने से पायरोल प्राप्त होता है।

(ii) Knorr पायरोल संश्लेषण (Knorr Pyrrole Synthesis)

परिचय

इस विधि में α-एमिनो कीटोन और β-डाइकार्बोनिल यौगिक से पायरोल बनता है।

सामान्य अभिक्रिया

α-Amino ketone+β-dicarbonylPyrrole\alpha\text{-Amino ketone} + \beta\text{-dicarbonyl} \rightarrow Pyrrole

क्रियाविधि

  1. संघनन (Condensation)
    दोनों यौगिक मिलकर इमाइन बनाते हैं।
  2. चक्रीकरण (Cyclization)
    अणु के भीतर अभिक्रिया से पाँच सदस्यीय रिंग बनती है।
  3. जल का अपसारण
    निर्जलीकरण से पायरोल प्राप्त होता है।

(iii) Skraup (क्विनोलीन) संश्लेषण

परिचय

एनिलीन से क्विनोलीन बनाने की प्रसिद्ध विधि है।
अभिकर्मक: एनिलीन + ग्लिसरॉल + सान्द्र H₂SO₄ + ऑक्सीकारक।

क्रियाविधि

चरण 1 – एक्रोलीन का निर्माण
ग्लिसरॉल → निर्जलीकरण → एक्रोलीन

चरण 2 – संयोग
एक्रोलीन + एनिलीन → β-एनिलिनो एल्डिहाइड

चरण 3 – चक्रीकरण
आंतरिक अभिक्रिया → डायहाइड्रो क्विनोलीन

चरण 4 – ऑक्सीकरण
डायहाइड्रो क्विनोलीन → क्विनोलीन


निष्कर्ष

  • Paal–Knorr → 1,4-डाइकार्बोनिल से पायरोल
  • Knorr → α-एमिनो कीटोन + β-डाइकार्बोनिल से पायरोल
  • Skraup → एनिलीन से क्विनोलीन

ये तीनों विषमचक्रीय यौगिकों के महत्वपूर्ण औद्योगिक संश्लेषण हैं।

19:-- पाइरोल के क्षारकीय स्वभाव को समझाइए।
पाइरोल के क्षारकीय स्वभाव (Basic character of Pyrrole)

1️⃣ पाइरोल की संरचना का आधार

पाइरोल एक पाँच सदस्यीय ऐरोमैटिक विषमचक्रीय यौगिक है जिसमें

  • 4 π-इलेक्ट्रॉन → दो डबल बॉन्ड से
  • 2 π-इलेक्ट्रॉन → नाइट्रोजन के lone pair से

इस प्रकार कुल 6 π-इलेक्ट्रॉन → Aromatic (Hückel rule)


2️⃣ पाइरोल क्षार क्यों नहीं होता? (बहुत कमजोर base)

सामान्यतः नाइट्रोजन युक्त यौगिक (जैसे अमीन) क्षारीय होते हैं क्योंकि उनके पास lone pair होता है।
लेकिन पाइरोल में स्थिति अलग है।

मुख्य कारण

(i) Lone pair aromaticity में भाग लेता है

  • पाइरोल के N का lone pair π-सिस्टम में delocalize होता है।
  • यह lone pair aromaticity बनाए रखने के लिए जरूरी है।

👉 यदि पाइरोल proton स्वीकार करे (H⁺ ले ले)
तो lone pair aromatic system से बाहर हो जाएगा।

Pyrrole+H+Pyrrolinium ionPyrrole + H^+ \rightarrow Pyrrolinium\ ion

इससे aromaticity नष्ट हो जाती है → अणु अस्थिर हो जाता है।

इसलिए पाइरोल proton लेना पसंद नहीं करता → weak base.


(ii) Resonance द्वारा lone pair स्थिर

पाइरोल में lone pair पूरी रिंग में फैल जाता है (delocalization)
इससे उसकी उपलब्धता कम हो जाती है।

👉 कम उपलब्ध lone pair = कम basicity


(iii) तुलना (Basicity order)

यौगिकBasicity
Aliphatic amineसबसे अधिक
Pyridineमध्यम
Pyrroleबहुत कम (weak base)

कारण:

  • Pyridine → lone pair aromaticity में भाग नहीं लेता
  • Pyrrole → lone pair aromaticity का हिस्सा है 

प्रश्न 20:— थायोफीन के ऐरोमैटिक गुण को समझाइए।

उत्तर:
थायोफीन (Thiophene) एक पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय (heterocyclic) यौगिक है, जिसका सूत्र C4H4SC_4H_4S होता है। इसकी संरचना बेंजीन के समान समतलीय (planar) एवं चक्रीय होती है, इसलिए यह ऐरोमैटिक गुण प्रदर्शित करता है। थायोफीन की ऐरोमैटिसिटी को निम्न बिंदुओं से समझा जा सकता है—

1) चक्रीय तथा समतलीय संरचना

थायोफीन एक बंद चक्र (cyclic ring) बनाता है और इसके सभी परमाणु एक ही समतल (plane) में स्थित होते हैं। समतलीय संरचना ऐरोमैटिसिटी के लिए आवश्यक शर्त है।

2) सतत संयुग्मन (Continuous Conjugation)

थायोफीन में सभी परमाणु sp2sp^2 संकरण अवस्था में होते हैं।
कार्बन–कार्बन के बीच दो द्वि-बन्ध तथा सल्फर का एक lone pair π-इलेक्ट्रॉन प्रणाली में भाग लेता है। इससे पूरे रिंग में सतत p-ऑर्बिटल ओवरलैप बनता है।

3) ह्यूकिल नियम (Hückel’s Rule) का पालन

किसी यौगिक के ऐरोमैटिक होने के लिए उसमें (4n+2)(4n+2) π-इलेक्ट्रॉन होने चाहिए।

थायोफीन में π-इलेक्ट्रॉन की संख्या:

  • दो द्वि-बन्ध → 4 π-इलेक्ट्रॉन
  • सल्फर का एक lone pair → 2 π-इलेक्ट्रॉन

कुल π-इलेक्ट्रॉन = 6 π-इलेक्ट्रॉन
यह 4n+24n+2 नियम (जहाँ n = 1) को संतुष्ट करता है। इसलिए थायोफीन ऐरोमैटिक है।

4) अनुनाद (Resonance Stabilization)

थायोफीन कई अनुनादी संरचनाएँ बनाता है, जिनमें इलेक्ट्रॉन पूरे रिंग में डीलोकलाइज़ रहते हैं। इस डीलोकलाइजेशन से अणु की ऊर्जा कम होती है और स्थिरता बढ़ती है।

5) रासायनिक अभिक्रियाएँ

थायोफीन बेंजीन की तरह इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ देता है (जैसे नाइट्रेशन, हैलोजनेशन, सल्फोनेशन)। यह भी ऐरोमैटिसिटी का प्रमाण है।


21) हॅश संश्लेषण द्वारा पाइरोल तथा पिरिडीन बनाने की विधि समझाइए

हॅश (Hantzsch) संश्लेषण विषमचक्रीय यौगिकों के निर्माण की एक महत्वपूर्ण विधि है।

पाइरोल निर्माण:
इस विधि में α-हैलोकीटोन तथा β-कीटोएस्टर की अमोनिया या अमीन के साथ अभिक्रिया कराई जाती है। पहले न्यूक्लियोफिलिक आक्रमण द्वारा एनीमिनो यौगिक बनता है, फिर चक्रीकरण और जल निष्कासन से पाइरोल रिंग बन जाती है। यह विधि प्रतिस्थापित पाइरोल बनाने में बहुत उपयोगी है।

पिरिडीन निर्माण (Hantzsch Pyridine synthesis):
इसमें दो अणु β-कीटोएस्टर, एक अणु एल्डिहाइड तथा अमोनिया का संघनन कराया जाता है। पहले डाइहाइड्रोपिरिडीन बनता है, जिसे ऑक्सीकरण करने पर पिरिडीन प्राप्त होता है। यह विधि औषधीय पिरिडीन व्युत्पन्नों के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


22) टिप्पणी लिखिए

(a) मेडलंग संश्लेषण (Madelung synthesis)

यह विधि इंडोल निर्माण की एक प्रसिद्ध प्रक्रिया है। इसमें N-एसिल-ओ-टोल्यूडीन को मजबूत क्षार (जैसे सोडियम अमाइड) के साथ उच्च ताप पर गरम किया जाता है। इसमें आंतरिक चक्रीकरण होता है और अंत में इंडोल प्राप्त होता है। यह विधि विशेष रूप से प्रतिस्थापित इंडोल तैयार करने के लिए प्रयोग की जाती है और औषधीय रसायन में इसका बहुत महत्व है।

(b) फ्रीडलैंडर संश्लेषण (Friedländer synthesis)

इस विधि से क्विनोलीन तैयार किया जाता है। इसमें ओ-अमीनोबेंज़एल्डिहाइड या ओ-अमीनोकीटोन को कार्बोनिल यौगिक के साथ संघनित किया जाता है। इसके बाद चक्रीकरण और निर्जलीकरण से क्विनोलीन बनता है। यह सरल और प्रभावी विधि है जो क्विनोलीन दवाओं के निर्माण में उपयोगी है।


23) डोबनर–मिलर संश्लेषण क्या है? क्रियाविधि समझाइए

डोबनर–मिलर संश्लेषण क्विनोलीन बनाने की महत्वपूर्ण विधि है। इसमें एनीलिन और α,β-असंतृप्त एल्डिहाइड (जैसे एक्रोलिन) को अम्लीय माध्यम में गरम किया जाता है।

क्रियाविधि:

  1. पहले एनीलिन और एल्डिहाइड का संघनन होकर इमीन बनता है।
  2. फिर आंतरिक चक्रीकरण होता है।
  3. अंत में ऑक्सीकरण से क्विनोलीन प्राप्त होता है।
    यह विधि औद्योगिक स्तर पर क्विनोलीन बनाने में प्रयोग होती है।

24) क्या होता है जब

(a) एल्डिहाइड + एरिल एथिल एमीन

दोनों का संघनन होकर पहले इमीन (Schiff base) बनता है। इसके बाद चक्रीकरण तथा ऑक्सीकरण होने पर क्विनोलीन व्युत्पन्न बनते हैं।

(b) ऐरोमैटिक एल्डिहाइड + एमीनो एसीटिल का संघनन

इस अभिक्रिया से पहले इमीन बनता है, फिर चक्रीकरण द्वारा इंडोल या संबंधित विषमचक्रीय यौगिक प्राप्त होते हैं। यह औषधीय यौगिकों के निर्माण में महत्वपूर्ण है।


25) पिरिडीन की आण्विक ऑर्बिटल संरचना समझाइए

पिरिडीन एक समतलीय ऐरोमैटिक अणु है जिसमें सभी परमाणु sp2sp^2 संकरण अवस्था में होते हैं। छह p-ऑर्बिटल मिलकर π-मॉलिक्यूलर ऑर्बिटल बनाते हैं। कुल 6 π-इलेक्ट्रॉन होने से यह ह्यूकिल नियम का पालन करता है। नाइट्रोजन का एक lone pair σ-ऑर्बिटल में रहता है और π-प्रणाली में भाग नहीं लेता, इसलिए पिरिडीन क्षारकीय होता है। π-इलेक्ट्रॉन रिंग में डीलोकलाइज्ड रहते हैं, जिससे अणु स्थिर और ऐरोमैटिक बनता है।


26) थायोफीन, फ्यूरॉन की अपेक्षा अधिक ऐरोमैटिक है — क्यों?

थायोफीन और फ्यूरॉन दोनों पाँच सदस्यीय ऐरोमैटिक यौगिक हैं, परंतु थायोफीन अधिक स्थिर है। इसका कारण है कि सल्फर का आकार ऑक्सीजन से बड़ा होता है, जिससे उसके p-ऑर्बिटल बेहतर ओवरलैप करते हैं। सल्फर के इलेक्ट्रॉन कम विद्युतऋणात्मक होने से π-इलेक्ट्रॉन अधिक आसानी से डीलोकलाइज हो जाते हैं। परिणामस्वरूप थायोफीन की अनुनाद ऊर्जा अधिक होती है। इसलिए यह फ्यूरॉन की तुलना में अधिक ऐरोमैटिक तथा अधिक स्थिर माना जाता है।

27) क्या होता है जब इन्डोल की अभिक्रिया सोडियम एथॉक्साइड और एथिल नाइट्रेट के साथ कराई जाती है?

इन्डोल में N–H समूह उपस्थित होता है, जो हल्का अम्लीय स्वभाव रखता है। जब इसकी अभिक्रिया सोडियम एथॉक्साइड (NaOEt) से कराई जाती है, तब यह पहले डिप्रोटोनेशन होकर सोडियम इन्डोलाइड बनाता है। यह एक शक्तिशाली न्यूक्लियोफाइल होता है। इसके बाद जब एथिल नाइट्रेट (EtONO₂) मिलाया जाता है, तब न्यूक्लियोफिलिक प्रतिस्थापन होता है और N-नाइट्रोसो या N-नाइट्रो व्युत्पन्न बनते हैं। यह अभिक्रिया इन्डोल के नाइट्रोजन पर प्रतिस्थापन को दर्शाती है और यह सिद्ध करती है कि इन्डोल का N–H समूह अभिक्रियाशील है तथा यह क्षारीय माध्यम में सक्रिय न्यूक्लियोफाइल बन सकता है।


28) क्विनोलीन की इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ 5 एवं 8 स्थिति में क्यों होती हैं?

क्विनोलीन में एक बेंजीन रिंग तथा एक पिरिडीन रिंग जुड़ी होती हैं। पिरिडीन भाग में नाइट्रोजन इलेक्ट्रॉन आकर्षित करता है, जिससे उस भाग में इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो जाता है और इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन कठिन हो जाता है। इसके विपरीत बेंजीन भाग में इलेक्ट्रॉन घनत्व अपेक्षाकृत अधिक रहता है। अनुनाद संरचनाएँ दर्शाती हैं कि 5 एवं 8 स्थानों पर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है और मध्यवर्ती कार्बोकैटायन अधिक स्थिर बनता है। इसलिए इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन मुख्यतः 5 और 8 स्थिति पर होता है।


29) थायोफीन, पिरोल व फ्यूरॉन की अपेक्षा अधिक ऐरोमैटिक क्यों है?

तीनों पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय यौगिक हैं और 6 π-इलेक्ट्रॉन होने से ऐरोमैटिक हैं। परन्तु सल्फर का आकार ऑक्सीजन और नाइट्रोजन से बड़ा होता है तथा उसके p-ऑर्बिटल अधिक फैलाव वाले होते हैं। इससे π-इलेक्ट्रॉनों का ओवरलैप बेहतर होता है और अनुनाद अधिक प्रभावी बनता है। सल्फर की विद्युतऋणात्मकता भी कम होती है, जिससे इलेक्ट्रॉन अधिक आसानी से डीलोकलाइज हो जाते हैं। परिणामस्वरूप थायोफीन की अनुनाद ऊर्जा अधिक होती है, इसलिए यह पिरोल और फ्यूरॉन की तुलना में अधिक ऐरोमैटिक और स्थिर होता है।


30) पिरोल एरोमैटिक एमीन तथा फिनॉल दोनों की तरह व्यवहार क्यों करता है?

पिरोल में N–H समूह उपस्थित होता है, इसलिए यह अमीन की तरह क्षारकीय अभिक्रियाएँ कर सकता है। लेकिन इसका lone pair π-प्रणाली में भाग लेता है, इसलिए यह सामान्य अमीन की तरह प्रबल क्षार नहीं होता। दूसरी ओर, N–H बंध हल्का अम्लीय होता है, जिससे यह फिनॉल की तरह क्षारों के साथ लवण बना सकता है। साथ ही, इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रियाएँ भी आसानी से होती हैं, जैसे फिनॉल में होती हैं। इसलिए पिरोल में अमीन और फिनॉल दोनों के गुण दिखाई देते हैं।


31) फ्यूरॉन डील्स–एल्डर अभिक्रिया दर्शाता है, समझाइए

फ्यूरॉन एक ऐरोमैटिक यौगिक है, परन्तु इसकी ऐरोमैटिकता कम होती है। इसलिए यह आसानी से अपनी ऐरोमैटिकता खोकर डीन (diene) की तरह व्यवहार कर सकता है। जब फ्यूरॉन किसी डीनोफाइल (जैसे मेलिक एनहाइड्राइड) के साथ अभिक्रिया करता है, तब [4+2] साइक्लोएडिशन होकर डील्स–एल्डर उत्पाद बनता है। यह अभिक्रिया दर्शाती है कि फ्यूरॉन की ऐरोमैटिकता कमजोर है और वह साइक्लोएडिशन के लिए आसानी से सक्रिय हो जाता है।


32) अभिक्रिया पूर्ण कीजिए: Pyridine + Conc. HNO₃ / H₂SO₄

पिरिडीन में नाइट्रेशन बहुत कठिन होता है क्योंकि नाइट्रोजन इलेक्ट्रॉन आकर्षित करता है। कठोर परिस्थितियों (उच्च ताप) पर नाइट्रेशन होता है और मुख्य उत्पाद 3-नाइट्रोपिरिडीन बनता है। यह इसलिए क्योंकि 2 और 4 स्थानों पर बनने वाला मध्यवर्ती आयन अस्थिर होता है, जबकि 3 स्थिति पर बनने वाला मध्यवर्ती अधिक स्थिर होता है। इसलिए नाइट्रेशन मुख्यतः 3-पोजीशन पर होता है।

👉 3-Nitropyridine (मेटा-नाइट्रो पायरिडीन)

PyridineConc. H2SO4Conc. HNO3  3-Nitropyridine+H2O\text{Pyridine} \xrightarrow[\text{Conc. }H_2SO_4]{\text{Conc. }HNO_3} \; 3\text{-Nitropyridine} + H_2O


33. 2-ब्रोमो थायोफीन कैसे प्राप्त करेंगे?
2-ब्रोमोथायोफीन प्राप्त करने के लिए थायोफीन का इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन (Electrophilic substitution) कराया जाता है। थायोफीन एक अत्यधिक सक्रिय ऐरोमैटिक विषमचक्रीय यौगिक है, इसलिए यह बेंजीन की तुलना में बहुत आसानी से हैलोजन अभिक्रिया देता है। जब थायोफीन को ब्रोमीन (Br₂) की उपस्थिति में कार्बन टेट्राक्लोराइड या क्लोरोफॉर्म जैसे निष्क्रिय विलायक में अभिक्रिया कराते हैं, तो ब्रोमीन इलेक्ट्रोफाइल की तरह व्यवहार करता है। थायोफीन में इलेक्ट्रॉन घनत्व α-स्थिति (2-position) पर अधिक होता है क्योंकि वहाँ बनने वाला σ-कॉम्प्लेक्स अधिक स्थिर होता है। इसलिए ब्रोमीन 2-स्थिति पर जुड़ता है और मुख्य उत्पाद 2-ब्रोमोथायोफीन बनता है। यह अभिक्रिया हल्के ताप पर नियंत्रित परिस्थितियों में कराई जाती है ताकि बहु-ब्रोमिनेशन न हो।


34. आप 4,4′-डाइपिरिडीन कैसे प्राप्त करेंगे?
4,4′-डाइपिरिडीन को प्राप्त करने के लिए पिरिडीन का ऑक्सीडेटिव कपलिंग कराया जाता है। सामान्यतः पिरिडीन को पहले 4-ब्रोमो पिरिडीन में परिवर्तित किया जाता है। इसके बाद इस यौगिक पर कॉपर पाउडर या पैलेडियम उत्प्रेरक की उपस्थिति में उल्मान कपलिंग अभिक्रिया कराई जाती है। इस प्रक्रिया में दो पिरिडीन रिंग 4-स्थिति पर जुड़ जाती हैं और 4,4′-डाइपिरिडीन बनता है। यह यौगिक जैव रसायन और समन्वय रसायन में बहुत महत्वपूर्ण है क्योंकि यह धातु आयनों के साथ समन्वय यौगिक बनाने में सक्षम होता है। इस प्रकार, हैलोजन प्रतिस्थापन और कपलिंग अभिक्रिया के संयोजन से 4,4′-डाइपिरिडीन का संश्लेषण किया जाता है।


35. क्विनोलीन से ऑक्जेलिक अम्ल कैसे बनायेंगे?
क्विनोलीन को प्रबल ऑक्सीकारकों जैसे पोटैशियम परमैंगनेट (KMnO₄) या नाइट्रिक अम्ल से ऑक्सीकरण करने पर रिंग का विघटन होता है। यह अभिक्रिया कठोर परिस्थितियों में कराई जाती है जिससे क्विनोलीन की बेंजीन रिंग टूट जाती है। क्रमिक ऑक्सीकरण के दौरान कार्बन-कार्बन बंध टूटते हैं और अंततः छोटे कार्बोक्सिलिक अम्ल बनते हैं। इस प्रक्रिया के अंतिम उत्पादों में से एक ऑक्जेलिक अम्ल (Oxalic acid) होता है। यह उदाहरण दर्शाता है कि शक्तिशाली ऑक्सीकारक विषमचक्रीय यौगिकों को पूर्णतः विघटित कर छोटे अणुओं में परिवर्तित कर सकते हैं।


36. आइसोक्विनोलीन से डेकाहाइड्रो आइसोक्विनोलीन कैसे प्राप्त करेंगे?
आइसोक्विनोलीन का उत्प्रेरक हाइड्रोजनीकरण (Catalytic hydrogenation) कराने पर डेकाहाइड्रो आइसोक्विनोलीन प्राप्त होता है। इसके लिए आइसोक्विनोलीन को उच्च दाब पर हाइड्रोजन गैस की उपस्थिति में निकेल, प्लेटिनम या पैलेडियम उत्प्रेरक के साथ गर्म किया जाता है। इस प्रक्रिया में रिंग के सभी डबल बंध टूट जाते हैं और पूरा अणु संतृप्त हो जाता है। इस प्रकार 10 हाइड्रोजन जुड़ने से डेकाहाइड्रो आइसोक्विनोलीन बनता है। यह अभिक्रिया दर्शाती है कि ऐरोमैटिक विषमचक्रीय यौगिक भी कठोर परिस्थितियों में पूर्णतः संतृप्त किए जा सकते हैं।


37. क्या होता है जब सक्सिनिक डाइएल्डीहाइड को P2O5P_2O_5 के साथ गर्म करते हैं?
सक्सिनिक डाइएल्डीहाइड को जब P2O5P_2O_5 के साथ गर्म किया जाता है तो निर्जलीकरण (dehydration) और चक्रीकरण होता है। P2O5P_2O_5 एक शक्तिशाली निर्जलीकारक है जो दो एल्डीहाइड समूहों के बीच जल अणु हटाकर चक्र निर्माण को प्रोत्साहित करता है। इस अभिक्रिया में पाँच सदस्यीय विषमचक्रीय रिंग बनती है और अंतिम उत्पाद फ्यूरान प्राप्त होता है। यह विधि फ्यूरान के संश्लेषण की महत्वपूर्ण प्रयोगशाला विधि मानी जाती है।


38. पिरिडीन में अपचयन अभिक्रिया को समझाइए।
पिरिडीन का अपचयन सामान्यतः हाइड्रोजनीकरण द्वारा किया जाता है। जब पिरिडीन को हाइड्रोजन गैस के साथ निकेल या प्लेटिनम उत्प्रेरक की उपस्थिति में उच्च ताप और दाब पर अभिक्रिया कराते हैं, तो रिंग के डबल बंध टूट जाते हैं। परिणामस्वरूप पिरिडीन का संतृप्त रूप पाइपेरिडीन बनता है। यह अभिक्रिया दर्शाती है कि पिरिडीन यद्यपि ऐरोमैटिक है, फिर भी कठोर परिस्थितियों में हाइड्रोजनीकरण संभव है। पाइपेरिडीन दवा उद्योग में महत्वपूर्ण मध्यवर्ती यौगिक है।


39. पिरोल के अम्लीय स्वभाव को समझाइए।
पिरोल हल्का अम्लीय होता है क्योंकि इसके N-H बंध का प्रोटॉन आसानी से हट सकता है। पिरोल की ऐरोमैटिसिटी 6π इलेक्ट्रॉनों पर आधारित है जिसमें नाइट्रोजन का lone pair भी शामिल होता है। जब पिरोल से प्रोटॉन हटता है, तो बनने वाला पिरोलाइड आयन अनुनाद द्वारा स्थिर हो जाता है और नकारात्मक आवेश पूरे रिंग में फैल जाता है। यही कारण है कि पिरोल कमजोर अम्ल की तरह व्यवहार करता है और सोडियम या पोटैशियम के साथ लवण बना सकता है।


40. पिरिडीन की अनुनादी संरचना बनाइए।
पिरिडीन एक ऐरोमैटिक यौगिक है जिसमें छह π-इलेक्ट्रॉन होते हैं। इसकी अनुनादी संरचनाओं में डबल बंध रिंग में स्थान बदलते रहते हैं और नाइट्रोजन पर lone pair रिंग के π-सिस्टम से बाहर रहता है। अनुनाद के कारण इलेक्ट्रॉन घनत्व रिंग में समान रूप से वितरित होता है और अणु स्थिर बनता है। नाइट्रोजन का −I प्रभाव रिंग को इलेक्ट्रॉन-घटित बनाता है, जिससे पिरिडीन इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन के प्रति कम सक्रिय होता है। अनुनाद पिरिडीन की स्थिरता और रासायनिक व्यवहार को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।


41. क्या होता है जब ब्यूटाडाईन को सल्फर के साथ गर्म किया जाता है?
जब ब्यूटाडाईन को सल्फर के साथ उच्च ताप पर गर्म किया जाता है, तब चक्रीकरण और डिहाइड्रोजनेशन की अभिक्रिया होती है। इस प्रक्रिया में सल्फर एक विषम परमाणु के रूप में चक्र निर्माण में भाग लेता है और पाँच सदस्यीय ऐरोमैटिक रिंग बनती है। परिणामस्वरूप मुख्य उत्पाद थायोफीन प्राप्त होता है। यह अभिक्रिया औद्योगिक रूप से थायोफीन के निर्माण की महत्वपूर्ण विधि मानी जाती है। इस अभिक्रिया में पहले सल्फर ब्यूटाडाईन की श्रृंखला से जुड़ता है, फिर चक्रीकरण होता है और अंत में हाइड्रोजन हटकर ऐरोमैटिक स्थिरता प्राप्त होती है।


42. थायोफीन, पायरोल से अधिक स्थायी होता है, क्यों?
थायोफीन पायरोल से अधिक स्थायी होता है क्योंकि सल्फर का आकार नाइट्रोजन की तुलना में बड़ा होता है और उसके 3p ऑर्बिटल π-सिस्टम के साथ बेहतर ओवरलैप कर सकते हैं। इससे इलेक्ट्रॉन का डीलोकलाइजेशन अधिक प्रभावी होता है। सल्फर की इलेक्ट्रोनिगेटिविटी भी कम होती है, जिससे वह इलेक्ट्रॉन दान आसानी से कर पाता है। परिणामस्वरूप थायोफीन में ऐरोमैटिसिटी अधिक मजबूत होती है और यह पायरोल की तुलना में कम प्रतिक्रियाशील तथा अधिक स्थिर होता है।


43. पिरोल की अणु कक्षक संरचना बताइए।
पिरोल एक समतलीय पाँच सदस्यीय ऐरोमैटिक यौगिक है जिसमें सभी परमाणु sp² संकरण अवस्था में होते हैं। प्रत्येक परमाणु का एक p-ऑर्बिटल रिंग के ऊपर और नीचे स्थित रहता है, जिससे सतत π-इलेक्ट्रॉन बादल बनता है। नाइट्रोजन का lone pair भी p-ऑर्बिटल में स्थित होकर π-सिस्टम में शामिल होता है। इस प्रकार कुल 6π इलेक्ट्रॉन बनते हैं, जो ह्यूकेल नियम का पालन करते हैं। यही कारण है कि पिरोल अत्यधिक ऐरोमैटिक और स्थिर होता है।


44. आइसोक्वीनोलीन की इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन अभिक्रिया समझाइए।
आइसोक्वीनोलीन में इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन मुख्यतः बेंजीन रिंग पर होता है, क्योंकि नाइट्रोजन परमाणु रिंग को इलेक्ट्रॉन-घटित बना देता है। इलेक्ट्रोफाइल का आक्रमण प्रायः 5 और 8 स्थिति पर होता है। ऐसा इसलिए होता है क्योंकि इन स्थानों पर बनने वाला σ-कॉम्प्लेक्स अधिक स्थिर होता है और अनुनाद द्वारा आवेश का बेहतर वितरण संभव होता है। इसलिए नाइट्रेशन, सल्फोनेशन और हैलोजनेशन जैसी अभिक्रियाएँ इन्हीं स्थानों पर होती हैं।


45. क्विनोलीन क्षारीय पोटैशियम परमँगनेट से ऑक्सीकृत होता है, क्यों?
क्विनोलीन की बेंजीन रिंग अपेक्षाकृत इलेक्ट्रॉन समृद्ध होती है, जबकि नाइट्रोजन की उपस्थिति से पायरिडीन रिंग इलेक्ट्रॉन-घटित हो जाती है। क्षारीय KMnO₄ एक शक्तिशाली ऑक्सीकारक है, जो विशेष रूप से बेंजीन भाग को ऑक्सीकृत करता है। परिणामस्वरूप रिंग विघटन होता है और अंततः कार्बोक्सिलिक अम्ल जैसे छोटे अणु बनते हैं। यह अभिक्रिया दर्शाती है कि क्विनोलीन में दो अलग-अलग रिंगों की प्रतिक्रियाशीलता भिन्न होती है।


46. क्या होता है जब:
(a) पिरोल + सोडियम मेथॉक्साइड + मेथिलीन आयोडाइड

इस अभिक्रिया में पहले पिरोल का N–H प्रोटॉन हटता है और पिरोलाइड आयन बनता है। यह आयन मेथिलीन आयोडाइड के साथ अभिक्रिया कर N-मेथिल पिरोल बनाता है।

(b) ऐसीटिलीन + H₂S को ऐल्युमिना पर प्रवाहित करना
जब ऐसीटिलीन और हाइड्रोजन सल्फाइड को गरम ऐल्युमिना पर प्रवाहित करते हैं, तो चक्रीकरण होता है और अंतिम उत्पाद थायोफीन प्राप्त होता है। यह थायोफीन संश्लेषण की औद्योगिक विधि है।


47. पाइरॉल में इलेक्ट्रोफिलिक प्रतिस्थापन को समझाइए।
पाइरॉल अत्यधिक सक्रिय ऐरोमैटिक यौगिक है क्योंकि नाइट्रोजन का lone pair π-सिस्टम में शामिल होकर रिंग को इलेक्ट्रॉन-समृद्ध बनाता है। इसलिए इलेक्ट्रोफाइल का आक्रमण मुख्यतः α-स्थिति (2-position) पर होता है। इसका कारण यह है कि 2-स्थिति पर बनने वाला σ-कॉम्प्लेक्स अधिक अनुनाद संरचनाएँ बनाता है, जिससे स्थिरता बढ़ती है। परिणामस्वरूप नाइट्रेशन, हैलोजनेशन और सल्फोनेशन जैसी अभिक्रियाएँ आसानी से होती हैं।


48. बेंजेल्डिहाइड से आइसोक्विनोलीन कैसे प्राप्त करेंगे?
बेंजेल्डिहाइड से आइसोक्विनोलीन का निर्माण पॉमरांज–फ्रिट्श संश्लेषण द्वारा किया जाता है। इस प्रक्रिया में बेंजेल्डिहाइड को अमीनो एसीटल के साथ अभिक्रिया कराते हैं जिससे इमीन बनता है। इसके बाद अम्लीय माध्यम में चक्रीकरण और निर्जलीकरण होता है। अंत में ऑक्सीकरण द्वारा आइसोक्विनोलीन प्राप्त होता है। यह विधि आइसोक्विनोलीन के निर्माण की प्रसिद्ध प्रयोगशाला विधि है।


49. टिप्पणी लिखिए: क्विनोलीन का अपचयन।
क्विनोलीन का अपचयन सामान्यतः उत्प्रेरक हाइड्रोजनीकरण द्वारा किया जाता है। जब क्विनोलीन को हाइड्रोजन गैस के साथ निकल, प्लेटिनम या पैलेडियम उत्प्रेरक की उपस्थिति में उच्च ताप व दाब पर अभिक्रिया कराते हैं, तो पहले पायरिडीन भाग का अपचयन होता है और बाद में बेंजीन भाग का। आंशिक अपचयन से टेट्राहाइड्रोक्विनोलीन बनता है, जबकि पूर्ण अपचयन से डेकाहाइड्रोक्विनोलीन प्राप्त होता है। यह अभिक्रिया दर्शाती है कि बहु-रिंग ऐरोमैटिक विषमचक्रीय यौगिक भी कठोर परिस्थितियों में संतृप्त यौगिकों में परिवर्तित हो सकते हैं।


50. संरचना सूत्र लिखिए:
(i) इण्डोल यह एक द्विचक्रीय यौगिक है जिसमें बेंजीन रिंग और पिरोल रिंग आपस में जुड़ी होती हैं। इसमें 10 π-इलेक्ट्रॉन होते हैं, जिससे यह अत्यधिक ऐरोमैटिक और स्थिर होता है।

(ii) क्विनोलिक अम्ल यह क्विनोलीन का कार्बोक्सिलिक अम्ल व्युत्पन्न है जिसमें पायरिडीन रिंग पर –COOH समूह उपस्थित रहता है।

(iii) फ्यूरोइक अम्ल यह फ्यूरान का कार्बोक्सिलिक अम्ल व्युत्पन्न है जिसमें पाँच सदस्यीय ऑक्सीजन युक्त रिंग से –COOH समूह जुड़ा रहता है।


51. संश्लेषण: फरफ्यूरल से फ्यूरान।
फरफ्यूरल को जब डिकार्बोनाइलेशन (CO हटाना) की अभिक्रिया में गर्म किया जाता है, विशेष रूप से पैलेडियम या निकल उत्प्रेरक की उपस्थिति में, तब –CHO समूह हट जाता है और अंतिम उत्पाद फ्यूरान बनता है। यह अभिक्रिया औद्योगिक स्तर पर महत्वपूर्ण है क्योंकि फरफ्यूरल कृषि अपशिष्ट से आसानी से प्राप्त होता है।


52. 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक किसे कहते हैं? इसे किस प्रकार बनाया जाता है?
ऐसे यौगिक जिनमें दो कार्बोनिल समूह (C=O) एक ही अणु में 1 और 4 स्थिति पर स्थित हों, उन्हें 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक कहते हैं। इन्हें एल्डोल संघनन, माइकल अभिक्रिया या डाइकार्बोनिल यौगिकों के ऑक्सीकरण से बनाया जाता है। ये यौगिक विषमचक्रीय रिंगों के निर्माण में अत्यंत महत्वपूर्ण मध्यवर्ती होते हैं।


53. पॉल–नॉर संश्लेषण लिखिए।
पॉल–नॉर संश्लेषण विषमचक्रीय रसायन की महत्वपूर्ण अभिक्रिया है जिसमें 1,4-डाइकार्बोनिल यौगिक को अमोनिया या प्राथमिक अमीन के साथ अभिक्रिया कराकर पायरोल बनाया जाता है। इस अभिक्रिया में पहले इमीन बनता है, फिर चक्रीकरण और निर्जलीकरण होता है जिससे अंत में ऐरोमैटिक पायरोल प्राप्त होता है।


54. पाइरोल, पिरीडीन एवं पिपरीडीन में क्षारीयता को समझाइए।
तीनों यौगिकों की क्षारीयता नाइट्रोजन के lone pair की उपलब्धता पर निर्भर करती है। पिरोल में lone pair π-सिस्टम में शामिल होता है, इसलिए यह प्रोटॉन स्वीकार नहीं कर पाता और बहुत कमजोर क्षार होता है। पिरिडीन में lone pair π-सिस्टम से बाहर रहता है, इसलिए यह मध्यम क्षार है। पिपरीडीन एक संतृप्त अमीन है जिसमें lone pair पूर्णतः उपलब्ध होता है, इसलिए यह सबसे अधिक क्षारीय है। अतः क्षारीयता का क्रम है:
पिपरीडीन > पिरिडीन > पिरोल




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