B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 6
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
प्रश्न:1
(अ) द्विपरमाणुक अणु की बंध दूरी घूर्णन स्पेक्ट्रम की सहायता से कैसे ज्ञात करेंगे?
(ब) दृढ़ रोटेटर के ऊर्जा स्तर के लिए व्यंजक व्युत्पन्न कीजिए तथा दिखाइये कि दो क्रमागत रेखाओं का अंतर 2B होता है।
(स) घूर्णन स्पेक्ट्रमिति के वरण नियम समझाइये।
(द) समस्थानिक प्रतिस्थापन के अनुप्रयोग लिखिये।
(इ) घूर्णन स्पेक्ट्रम की आवश्यक शर्तें व अनुप्रयोग लिखिये।
उत्तर:
घूर्णन स्पेक्ट्रोस्कोपी में द्विपरमाणुक अणु को दृढ़ रोटेटर (Rigid rotator) माना जाता है। ऐसे अणु का जड़त्व आघूर्ण I=μr2 होता है, जहाँ μ अपसारी द्रव्यमान तथा r बंध दूरी है। घूर्णन ऊर्जा स्तर का व्यंजक
होता है, जहाँ B=8π2Ich घूर्णन स्थिरांक है। चयन नियम ΔJ = +1 होने से स्पेक्ट्रम में रेखाएँ समान दूरी पर मिलती हैं और दो क्रमागत रेखाओं का अंतर 2B (cm⁻¹) होता है। स्पेक्ट्रम से B ज्ञात कर I तथा फिर r की गणना की जाती है, जिससे बंध दूरी मिलती है।
वरण नियम: घूर्णन संक्रमण के लिए आवश्यक है कि अणु में स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण हो तथा ΔJ = ±1 हो। इसलिए HCl जैसे अणु सक्रिय होते हैं जबकि N2 या O2 निष्क्रिय रहते हैं।
समस्थानिक प्रतिस्थापन: समस्थानिक बदलने से द्रव्यमान बदलता है पर बंध दूरी लगभग समान रहती है। इससे जड़त्व आघूर्ण का परिवर्तन मापकर बंध लंबाई का अधिक सटीक निर्धारण किया जाता है।
आवश्यक शर्तें: (i) अणु गैसीय अवस्था में हो, (ii) स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण हो।
अनुप्रयोग: बंध दूरी निर्धारण, अणु की संरचना ज्ञात करना, समस्थानिक पहचान तथा अंतरिक्ष रसायन में अणुओं की खोज में इसका व्यापक उपयोग होता है।
प्रश्न 2:
बल नियतांक क्या है? द्विपरमाणुक अणु के लिए इसका निर्धारण कैसे करते हैं?
उत्तर:
बल नियतांक (Force constant, k) अणु के बंध की कठोरता का माप है। यह बताता है कि बंध को खींचने या संपीड़ित करने पर कितना बल लगता है। कंपन स्पेक्ट्रोस्कोपी में अणु को सरल हार्मोनिक दोलक माना जाता है। इसकी आवृत्ति
ν=2π1μk
होती है। IR स्पेक्ट्रम से कंपन आवृत्ति ज्ञात कर k का मान निकाला जाता है। उच्च k का अर्थ मजबूत बंध है। उदाहरण: C≡C बंध का k, C–C से अधिक होता है।
प्रश्न 3:
घूर्णन स्पेक्ट्रोस्कोपी की उपयोगिता लिखिए।
उत्तर:
घूर्णन स्पेक्ट्रोस्कोपी अणुओं की संरचना जानने का सटीक तरीका है। इससे बंध दूरी, जड़त्व आघूर्ण तथा अणु की ज्यामिति ज्ञात होती है। समस्थानिकों की पहचान, द्विध्रुव आघूर्ण का निर्धारण तथा गैस अवस्था के अणुओं की संरचना का अध्ययन किया जाता है। यह अंतरिक्ष रसायन में भी उपयोगी है जहाँ दूरस्थ गैसों की पहचान की जाती है।
प्रश्न 4:
ध्रुवणता के आधार पर रमन प्रभाव समझाइये।
उत्तर:
रमन प्रभाव तब होता है जब प्रकाश अणु से टकराकर भिन्न आवृत्ति के साथ प्रकीर्णित होता है। यदि कंपन के दौरान अणु की ध्रुवणता बदलती है तो रमन सक्रियता होती है। रमन स्पेक्ट्रम में स्टोक्स और एंटी-स्टोक्स रेखाएँ मिलती हैं। यह सममित अणुओं के अध्ययन में उपयोगी है जहाँ IR स्पेक्ट्रा कमजोर होते हैं।
प्रश्न 5:
IR स्पेक्ट्रोस्कोपी का सिद्धान्त व विधि लिखिए।
उत्तर:
IR स्पेक्ट्रोस्कोपी अणुओं के कंपन संक्रमण पर आधारित है। जब IR विकिरण की आवृत्ति अणु की प्राकृतिक कंपन आवृत्ति से मेल खाती है तो अवशोषण होता है। उपकरण में स्रोत, मोनोक्रोमेटर, सैंपल सेल और डिटेक्टर होते हैं। यह बंध पहचान का प्रमुख साधन है।
प्रश्न 6:
IR उपकरण, विभेदन क्षमता व फ्रैंक-कॉण्डान सिद्धांत लिखिए।
उत्तर:
IR स्पेक्ट्रोमीटर में स्रोत (Nernst glower), मोनोक्रोमेटर, डिटेक्टर व रिकॉर्डर होते हैं। विभेदन क्षमता पास की रेखाओं को अलग पहचानने की क्षमता है। फ्रैंक-कॉण्डान सिद्धांत के अनुसार इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण बहुत तीव्र होते हैं, इसलिए नाभिक स्थिर रहते हैं।
प्रश्न 7:
IR स्पेक्ट्रोस्कोपी के अनुप्रयोग लिखिये।
उत्तर:
IR स्पेक्ट्रोस्कोपी से कार्यात्मक समूहों की पहचान, बंध शक्ति, हाइड्रोजन बंधन, औषधि व पॉलिमर विश्लेषण किया जाता है। यह कार्बनिक और अकार्बनिक दोनों यौगिकों की पहचान का महत्वपूर्ण साधन है।
प्रश्न 8:
(अ) रमन प्रभाव क्या है? स्टोक्स तथा प्रतिस्टोक्स रेखाओं की विवेचना कीजिए।
(ब) किसी द्विपरमाणुक अणु के शुद्ध घूर्णन रमन स्पेक्ट्रा व शुद्ध कम्पन रमन स्पेक्ट्रा में क्या अंतर है?
(स) घूर्णन ऊर्जा स्तरों के मध्य संक्रमण के लिए वरण नियमों का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रमन प्रभाव वह घटना है जिसमें एकरंगी प्रकाश जब किसी अणु पर डाला जाता है तो उसका अधिकांश भाग बिना ऊर्जा परिवर्तन के प्रकीर्णित होता है (रेले प्रकीर्णन), जबकि एक छोटा भाग भिन्न आवृत्ति के साथ प्रकीर्णित होता है जिसे रमन प्रकीर्णन कहते हैं। यदि प्रकीर्णित विकिरण की आवृत्ति आपतित प्रकाश से कम हो तो उसे स्टोक्स रेखाएँ कहते हैं; यह तब बनती हैं जब अणु ऊर्जा ग्रहण कर उच्च ऊर्जा अवस्था में चला जाता है। यदि प्रकीर्णित विकिरण की आवृत्ति अधिक हो तो उसे प्रतिस्टोक्स रेखाएँ कहते हैं; यह तब बनती हैं जब अणु पहले से उच्च ऊर्जा अवस्था में हो और ऊर्जा खो दे। सामान्य ताप पर स्टोक्स रेखाएँ अधिक तीव्र होती हैं क्योंकि अधिकांश अणु निम्न ऊर्जा अवस्था में होते हैं।
शुद्ध घूर्णन रमन स्पेक्ट्रा में केवल घूर्णन ऊर्जा स्तरों के बीच संक्रमण होते हैं, जबकि शुद्ध कम्पन रमन स्पेक्ट्रा में कम्पन ऊर्जा स्तरों के बीच संक्रमण होते हैं। घूर्णन रमन स्पेक्ट्रा माइक्रोवेव क्षेत्र से संबंधित होते हैं जबकि कम्पन रमन स्पेक्ट्रा अवरक्त क्षेत्र के निकट होते हैं।
घूर्णन ऊर्जा स्तरों के लिए रमन वरण नियम ΔJ = ±2 होता है। इसका कारण यह है कि रमन संक्रमण ध्रुवणता में परिवर्तन पर निर्भर करता है। इसलिए रमन स्पेक्ट्रा से अणु की सममिति, संरचना तथा बंध गुणों की महत्वपूर्ण जानकारी प्राप्त होती है।
प्रश्न:9
(अ) रमन रेखाओं के अभिलाक्षणिक गुण लिखकर रमन स्पेक्ट्रा और IR स्पेक्ट्रा की तुलना कीजिए।
(ब) द्विपरमाणुक अणु के विशुद्ध घूर्णन-रमन स्पेक्ट्रा का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
रमन रेखाएँ रमन प्रभाव के कारण उत्पन्न होती हैं और ये आपतित प्रकाश की तुलना में थोड़ी बदली हुई आवृत्ति पर मिलती हैं। रमन रेखाओं की मुख्य विशेषता यह है कि ये अणु की ध्रुवणता (Polarizability) में परिवर्तन पर निर्भर करती हैं, जबकि IR स्पेक्ट्रा द्विध्रुव आघूर्ण (Dipole moment) में परिवर्तन पर निर्भर होते हैं। इसी कारण सममित अणु जैसे H2,O2,N2 IR में निष्क्रिय लेकिन रमन में सक्रिय होते हैं। रमन रेखाएँ सामान्यतः कमजोर होती हैं, जबकि IR रेखाएँ अधिक तीव्र होती हैं। रमन स्पेक्ट्रा दृश्य या निकट IR क्षेत्र में प्राप्त किया जा सकता है और नमूने की तैयारी सरल होती है, जबकि IR में विशेष कोशिकाओं की आवश्यकता होती है। इसलिए दोनों स्पेक्ट्रा एक-दूसरे के पूरक माने जाते हैं।
द्विपरमाणुक अणु के विशुद्ध घूर्णन-रमन स्पेक्ट्रा में केवल घूर्णन ऊर्जा स्तरों के बीच संक्रमण होते हैं। रमन के लिए चयन नियम ΔJ = ±2 होता है। इसलिए रमन स्पेक्ट्रम में रेखाएँ Rayleigh रेखा के दोनों ओर समान दूरी पर मिलती हैं। स्टोक्स रेखाएँ निम्न आवृत्ति की ओर तथा प्रतिस्टोक्स रेखाएँ उच्च आवृत्ति की ओर दिखाई देती हैं। इन रेखाओं के बीच का अंतर 4B होता है। इस स्पेक्ट्रा की सहायता से अणु का जड़त्व आघूर्ण, बंध दूरी तथा संरचना का सटीक निर्धारण किया जाता है, इसलिए यह अणु संरचना अध्ययन में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न:10
(अ) कम्पन के मूल तरीकों (Modes of Vibration) को सुनिश्चित करने के सूत्र क्या हैं:
(i) अरैखिक अणु (जैसे H2O) के लिए।
(ii) रैखिक अणु (जैसे CO2) के लिए।
(ब) निम्नलिखित के लिए सहज कम्पन के तरीके ज्ञात कीजिए: HBr,SO2,BCl3।
(स) बल स्थिरांक की इकाई लिखिए।
(द) H2,O2,N2 रमन सक्रिय हैं, क्यों? टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
किसी अणु के कम्पन के मूल तरीके (Normal modes of vibration) अणु में उपस्थित परमाणुओं की संख्या N पर निर्भर करते हैं। किसी भी अणु की कुल स्वतंत्रता की कोटि 3N होती है, जिसमें से 3 अनुवाद तथा 3 (या रैखिक अणु के लिए 2) घूर्णन गतियों में चली जाती हैं। इसलिए शेष कम्पन विधाएँ प्राप्त होती हैं।
अरैखिक अणुओं के लिए कम्पन विधाओं का सूत्र 3N−6 होता है, जबकि रैखिक अणुओं के लिए यह 3N−5 होता है। उदाहरण: H2O (अरैखिक, N=3) ⇒ 3×3−6=3 कम्पन विधाएँ; CO2 (रैखिक, N=3) ⇒ 3×3−5=4 कम्पन विधाएँ।
अब दिए गए अणुओं के लिए:
HBr (द्विपरमाणुक, रैखिक) ⇒ 3×2−5=1 कम्पन विधा।
SO2 (अरैखिक, N=3) ⇒ 3 कम्पन विधाएँ।
BCl3 (त्रिकोणीय समतलीय, N=4) ⇒ 3×4−6=6 कम्पन विधाएँ।
बल स्थिरांक (Force constant) की SI इकाई N m⁻¹ (न्यूटन प्रति मीटर) होती है। यह बंध की कठोरता को दर्शाता है; अधिक मान का अर्थ मजबूत बंध है।
H2,O2,N2 सममित अणु हैं और इनका स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण शून्य होता है, इसलिए ये IR स्पेक्ट्रा नहीं देते। परन्तु इनके कम्पन के दौरान ध्रुवणता (Polarizability) में परिवर्तन होता है, जो रमन सक्रियता की शर्त है। इसलिए ये अणु रमन स्पेक्ट्रा में स्पष्ट रेखाएँ देते हैं और संरचना निर्धारण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
प्रश्न:11
(अ) किसी सरल आवर्ती दोलित्र (Simple Harmonic Oscillator) के ऊर्जा स्तर समझाइये।
(ब) कम्पन स्पेक्ट्रा में हॉट बैंड (Hot Bands) क्या हैं?
उत्तर:
सरल आवर्ती दोलित्र (SHO) मॉडल का उपयोग द्विपरमाणुक अणुओं के कम्पन को समझाने के लिए किया जाता है। इस मॉडल में यह माना जाता है कि दो परमाणु एक स्प्रिंग से जुड़े हैं और संतुलन स्थिति के आसपास दोलन करते हैं। क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार कम्पन ऊर्जा सतत न होकर विविक्त (quantized) होती है और ऊर्जा स्तर निम्न समीकरण से दिए जाते हैं:
Ev=(v+21)hν
जहाँ v=0,1,2,3… कम्पन क्वांटम संख्या है, h प्लांक नियतांक और ν कम्पन आवृत्ति है। इससे स्पष्ट है कि कम्पन ऊर्जा स्तर समान दूरी पर होते हैं तथा न्यूनतम ऊर्जा शून्य नहीं बल्कि 21hν होती है, जिसे शून्य बिंदु ऊर्जा कहते हैं। सामान्यतः संक्रमण नियम Δv = ±1 होता है, जिससे मूल कम्पन बैंड प्राप्त होता है।
कम्पन स्पेक्ट्रा में हॉट बैंड वे अतिरिक्त रेखाएँ होती हैं जो उच्च तापमान पर दिखाई देती हैं। सामान्यतः अधिकांश अणु निम्नतम कम्पन अवस्था (v=0) में रहते हैं, परन्तु ताप बढ़ने पर कुछ अणु पहले से उच्च अवस्था (v=1, v=2) में होते हैं। जब इन अवस्थाओं से संक्रमण होता है (जैसे v=1 → v=2), तो जो रेखाएँ बनती हैं उन्हें हॉट बैंड कहते हैं। ये मुख्य बैंड के पास दिखाई देती हैं और ताप के बढ़ने पर इनकी तीव्रता बढ़ जाती है।
प्रश्न12: कारण सहित समझाइए कि HCl, CO एवं CH4 अणु घूर्णन (Rotational) स्पेक्ट्रम देंगे या नहीं।
उत्तर:
घूर्णन स्पेक्ट्रम माइक्रोवेव क्षेत्र में प्राप्त होता है और किसी अणु के घूर्णन स्पेक्ट्रम देने की मुख्य शर्त यह है कि उस अणु में स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण (Permanent dipole moment) होना चाहिए। यदि अणु में द्विध्रुव आघूर्ण शून्य है, तो वह माइक्रोवेव विकिरण को अवशोषित नहीं करेगा और घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं देगा।
-
HCl अणु:
H और Cl की विद्युतऋणात्मकता में काफी अंतर होता है, जिससे अणु ध्रुवीय (polar) बनता है और स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण उपस्थित रहता है। इसलिए HCl माइक्रोवेव विकिरण को अवशोषित कर सकता है। अतः HCl घूर्णन स्पेक्ट्रम देगा। -
CO अणु:
CO एक विषम द्विपरमाणुक (heteronuclear diatomic) अणु है। इसमें भी थोड़ा लेकिन स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण मौजूद होता है। इसलिए यह भी माइक्रोवेव क्षेत्र में संक्रमण कर सकता है। अतः CO घूर्णन स्पेक्ट्रम देगा। -
CH₄ अणु:
CH4 का आकार चतुष्फलीय (tetrahedral) और पूर्णतः सममित होता है। इसके सभी C–H बंधों के द्विध्रुव आघूर्ण एक-दूसरे को निरस्त कर देते हैं, जिससे कुल द्विध्रुव आघूर्ण शून्य हो जाता है। इसलिए यह माइक्रोवेव विकिरण को अवशोषित नहीं करता। अतः CH₄ घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं देगा।
निष्कर्ष: HCl और CO घूर्णन स्पेक्ट्रम देते हैं, जबकि CH4 नहीं देता।
प्रश्न:13
(अ) CO2,CO और H2O में से कौन कम्पन (Vibrational) स्पेक्ट्रम देगा और क्यों?
(ब) वास्तविक अणुओं के लिए कम्पन ऊर्जा स्तरों को दर्शाइये।
उत्तर:
(अ) कम्पन स्पेक्ट्रम देने की शर्त
किसी अणु का IR (इन्फ्रारेड) कम्पन स्पेक्ट्रम तभी प्राप्त होता है जब कम्पन के दौरान अणु के द्विध्रुव आघूर्ण में परिवर्तन (change in dipole moment) हो।
अब तीनों अणुओं को देखें:
1. CO अणु
- यह विषम द्विपरमाणुक (heteronuclear diatomic) अणु है।
- इसमें स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण होता है।
-
कम्पन के दौरान बन्ध लंबाई बदलती है → द्विध्रुव आघूर्ण बदलता है।
👉 इसलिए CO कम्पन स्पेक्ट्रम देगा।
2. H₂O अणु
- यह मुड़ा हुआ (bent) ध्रुवीय अणु है।
-
इसके स्ट्रेचिंग और बेंडिंग कम्पन के दौरान द्विध्रुव आघूर्ण बदलता है।
👉 इसलिए H₂O कम्पन स्पेक्ट्रम देगा।
3. CO₂ अणु
- यह रैखिक (linear) और सममित अणु है।
-
इसके कम्पन प्रकार:
- Symmetric stretching → द्विध्रुव परिवर्तन नहीं → IR निष्क्रिय
- Asymmetric stretching → द्विध्रुव बदलता है → IR सक्रिय
- Bending vibration → द्विध्रुव बदलता है → IR सक्रिय
👉 इसलिए CO₂ भी कम्पन स्पेक्ट्रम देता है (लेकिन सभी कम्पन नहीं, केवल IR-active कम्पन)।
निष्कर्ष:
तीनों CO,H2O,CO2 कम्पन स्पेक्ट्रम देते हैं।
(ब) वास्तविक अणुओं के कम्पन ऊर्जा स्तर
आदर्श स्थिति में अणु को हार्मोनिक ऑस्सिलेटर माना जाता है, जिसमें ऊर्जा स्तर समान दूरी पर होते हैं।
लेकिन वास्तविक अणु एन्हार्मोनिक ऑस्सिलेटर होते हैं, इसलिए:
- ऊर्जा स्तर समान दूरी पर नहीं होते।
- उच्च ऊर्जा स्तरों के बीच दूरी कम होती जाती है।
- अन्त में अणु का विघटन (dissociation) हो जाता है।
ऊर्जा स्तरों का क्रम:
जहाँ
- v=0,1,2,3… कम्पन क्वांटम संख्या
- ऊर्जा स्तर ऊपर जाते-जाते पास आते जाते हैं।
चित्रात्मक व्याख्या (शब्दों में):
- नीचे का स्तर → v=0 (Ground state)
- ऊपर → v=1,2,3 (Excited states)
- दूरी धीरे-धीरे कम होती है
- सबसे ऊपर → Dissociation limit
निष्कर्ष:
वास्तविक अणुओं में कम्पन ऊर्जा स्तर असमान दूरी पर होते हैं और उच्च स्तरों पर जाकर अणु टूट सकता है।
प्रश्न:14
(अ) रमन स्पेक्ट्रा के कोई तीन अनुप्रयोग समझाइए।
(ब) इलेक्ट्रॉनिक वर्णक्रम के तीन मुख्य अनुप्रयोग समझाइए।
उत्तर:
(अ) रमन स्पेक्ट्रा के तीन अनुप्रयोग
रमन स्पेक्ट्रोस्कोपी प्रकाश के प्रकीर्णन पर आधारित एक अत्यन्त महत्वपूर्ण तकनीक है, जिससे अणुओं की संरचना तथा बन्धों की प्रकृति का अध्ययन किया जाता है। इसके प्रमुख अनुप्रयोग निम्न हैं:
1. अणुओं की संरचना ज्ञात करना
रमन स्पेक्ट्रा की सहायता से अणुओं के बन्धों की लंबाई, बन्ध कोण तथा सममिति के बारे में जानकारी मिलती है। विशेष रूप से सममित अणु, जो IR स्पेक्ट्रा में सक्रिय नहीं होते, वे रमन स्पेक्ट्रा में स्पष्ट दिखाई देते हैं। इसलिए यह संरचना निर्धारण में अत्यन्त उपयोगी है।
2. रासायनिक पहचान (Chemical Identification)
प्रत्येक पदार्थ का रमन स्पेक्ट्रा एक प्रकार का “फिंगरप्रिंट” होता है। किसी अज्ञात पदार्थ की पहचान उसके रमन स्पेक्ट्रा की तुलना ज्ञात स्पेक्ट्रा से करके की जा सकती है। दवाइयों, पॉलिमर और खनिजों की पहचान में इसका उपयोग होता है।
3. औद्योगिक एवं चिकित्सा क्षेत्र में उपयोग
रमन तकनीक का उपयोग प्लास्टिक, पेट्रोलियम उत्पाद, विस्फोटक पदार्थ तथा जैविक नमूनों के अध्ययन में किया जाता है। आधुनिक चिकित्सा में यह कैंसर कोशिकाओं की पहचान और जैविक ऊतकों के अध्ययन में भी सहायक है।
(ब) इलेक्ट्रॉनिक वर्णक्रम के तीन मुख्य अनुप्रयोग
इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रोस्कोपी (UV-Visible spectroscopy) अणुओं के इलेक्ट्रॉनिक ऊर्जा स्तरों के संक्रमण का अध्ययन करती है। इसके प्रमुख अनुप्रयोग निम्न हैं:
1. पदार्थ की सांद्रता ज्ञात करना
बीयर-लैम्बर्ट नियम के अनुसार अवशोषण (Absorbance) और सांद्रता में सीधा सम्बन्ध होता है। इसलिए किसी विलयन की सांद्रता बहुत सटीक रूप से ज्ञात की जा सकती है। यह तकनीक रसायन, फार्मेसी और पर्यावरण विज्ञान में बहुत उपयोगी है।
2. संयुग्मन और संरचना का अध्ययन
इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रा से यह पता लगाया जा सकता है कि अणु में संयुग्मित डबल बन्ध (conjugated double bonds) मौजूद हैं या नहीं। जितना अधिक संयुग्मन होगा, अवशोषण तरंगदैर्घ्य उतना अधिक होगा। इससे कार्बनिक यौगिकों की संरचना समझने में सहायता मिलती है।
3. अभिक्रिया की गति और प्रगति का अध्ययन
रासायनिक अभिक्रियाओं के दौरान रंग या अवशोषण में होने वाले परिवर्तन को मापकर अभिक्रिया की गति (reaction kinetics) का अध्ययन किया जाता है। इससे अभिक्रिया तंत्र और दर नियतांक ज्ञात किए जा सकते हैं।
निष्कर्ष:
रमन और इलेक्ट्रॉनिक दोनों स्पेक्ट्रोस्कोपी तकनीकें पदार्थ की पहचान, संरचना विश्लेषण और औद्योगिक/वैज्ञानिक अनुसंधान में अत्यन्त महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं।
प्रश्न:15
विशुद्ध कम्पन स्पेक्ट्रम समझाइए।
उत्तर:
विशुद्ध कम्पन स्पेक्ट्रम (Pure Vibrational Spectrum) वह स्पेक्ट्रम है जो अणु के केवल कम्पन (vibrational) ऊर्जा स्तरों के बीच होने वाले संक्रमण के कारण प्राप्त होता है। यह स्पेक्ट्रम सामान्यतः इन्फ्रारेड (IR) क्षेत्र में प्राप्त होता है और अणु के बन्धों के कंपन से संबंधित महत्वपूर्ण जानकारी देता है।
1. मूल सिद्धांत
अणु के परमाणु आपस में स्प्रिंग की तरह जुड़े रहते हैं और निरंतर कंपन करते रहते हैं। क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार ये कंपन निरंतर नहीं बल्कि निश्चित ऊर्जा स्तरों में होते हैं। जब अणु IR विकिरण को अवशोषित करता है, तब वह निम्न कम्पन स्तर से उच्च कम्पन स्तर में चला जाता है। यही संक्रमण विशुद्ध कम्पन स्पेक्ट्रम उत्पन्न करता है।
सरल आवर्ती दोलित्र के लिए कम्पन ऊर्जा स्तर:
जहाँ v=0,1,2,3... कम्पन क्वांटम संख्या है।
2. वरण नियम (Selection Rule)
विशुद्ध कम्पन संक्रमण के लिए मुख्य वरण नियम है:
अर्थात अणु केवल एक स्तर ऊपर या नीचे जा सकता है।
इसके अलावा अणु का डाइपोल मोमेंट बदलना आवश्यक होता है, तभी वह IR सक्रिय होगा।
3. स्पेक्ट्रम की विशेषताएँ
- इसमें केवल एक प्रमुख अवशोषण रेखा मिलती है जिसे मूल बैंड (Fundamental band) कहते हैं।
- यह सामान्यतः 2000–4000cm−1 क्षेत्र में मिलता है।
- यह बन्ध की मजबूती और परमाणुओं के द्रव्यमान पर निर्भर करता है।
4. महत्व
विशुद्ध कम्पन स्पेक्ट्रम से बन्ध की प्रकृति, बल स्थिरांक, तथा अणु की पहचान की जा सकती है। यह कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिकों के विश्लेषण में अत्यन्त उपयोगी है।
प्रश्न 16:
एक द्विपरमाण्विक अणु जो सरल आवर्ती दोलित्र है, के लिए घूर्णन-कम्पन स्पेक्ट्रम का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
द्विपरमाण्विक अणु में परमाणु केवल कम्पन ही नहीं करते बल्कि साथ-साथ घूर्णन (rotation) भी करते हैं। जब किसी अणु में कम्पन तथा घूर्णन दोनों ऊर्जा स्तरों में एक साथ परिवर्तन होता है, तब जो स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है उसे घूर्णन-कम्पन स्पेक्ट्रम (Rotational-Vibrational Spectrum) कहते हैं। यह स्पेक्ट्रम सामान्यतः इन्फ्रारेड क्षेत्र में देखा जाता है और अणु की संरचना के अध्ययन में अत्यन्त महत्वपूर्ण है।
1. ऊर्जा स्तरों का संयोजन
द्विपरमाण्विक अणु के लिए कुल ऊर्जा =
कम्पन ऊर्जा स्तर:
घूर्णन ऊर्जा स्तर:
जहाँ
- v = कम्पन क्वांटम संख्या
- J = घूर्णन क्वांटम संख्या
- B = घूर्णन नियतांक
जब अणु IR विकिरण को अवशोषित करता है तो दोनों स्तर बदलते हैं।
2. वरण नियम (Selection Rules)
घूर्णन-कम्पन संक्रमण के लिए वरण नियम:
Δv=+1(मूल कम्पन संक्रमण) ΔJ=±1इसका अर्थ है कि कम्पन स्तर एक बढ़ेगा और घूर्णन स्तर एक बढ़ेगा या घटेगा।
3. स्पेक्ट्रम की संरचना (P और R शाखाएँ)
इन नियमों के कारण स्पेक्ट्रम में दो शाखाएँ बनती हैं:
(1) P-Branch (ΔJ = −1)
- निम्न आवृत्ति (कम ऊर्जा) की ओर रेखाएँ
- केन्द्र से बाईं ओर दिखाई देती हैं
(2) R-Branch (ΔJ = +1)
- उच्च आवृत्ति (अधिक ऊर्जा) की ओर रेखाएँ
- केन्द्र से दाईं ओर दिखाई देती हैं
बीच में एक क्षेत्र होता है जहाँ कोई रेखा नहीं होती, इसे Band Gap कहते हैं।
4. रेखाओं का अंतर
दो क्रमागत रेखाओं के बीच का अंतर लगभग 2B होता है, इसलिए रेखाएँ समान दूरी पर दिखाई देती हैं।
5. महत्व
इस स्पेक्ट्रम से
- बन्ध दूरी
- अणु का जड़त्व आघूर्ण
-
घूर्णन नियतांक
ज्ञात किये जाते हैं।
इस प्रकार घूर्णन-कम्पन स्पेक्ट्रम अणुओं की संरचना समझने का एक अत्यन्त शक्तिशाली साधन है।
प्रश्न 17:
किस प्रकार के अणु घूर्णन स्पेक्ट्रम प्रदर्शित करते हैं? CO2,C6H6,NO,H2O,N2O में कौन-से अणु शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम दिखाते हैं?
उत्तर:
1. घूर्णन स्पेक्ट्रम प्रदर्शित करने की शर्त
कोई भी अणु शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम (Pure Rotational Spectrum) तभी प्रदर्शित करता है जब उसमें स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण (Permanent Dipole Moment) उपस्थित हो।
घूर्णन के समय अणु का विद्युत द्विध्रुव बदलना चाहिए ताकि वह माइक्रोवेव विकिरण को अवशोषित कर सके।
अतः आवश्यक शर्तें:
- अणु गैसीय अवस्था में हो।
- अणु में स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण हो।
- अणु असममित (Asymmetric) हो।
निष्कर्ष:
- ध्रुवीय अणु → घूर्णन स्पेक्ट्रम देते हैं
- अध्रुवीय अणु → घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं देते
2. दिए गए अणुओं का विश्लेषण
(i) CO2
- संरचना: रैखिक और सममित (O=C=O)
-
द्विध्रुव आघूर्ण = 0
➡️ घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं देगा
(ii) C6H6 (बेंजीन)
- अत्यधिक सममित संरचना
-
द्विध्रुव आघूर्ण = 0
➡️ घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं देगा
(iii) NO
- विषमपरमाणुक द्विपरमाणुक अणु
-
स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण मौजूद
➡️ घूर्णन स्पेक्ट्रम देगा
(iv) H2O
- कोणीय (Bent) संरचना
-
बहुत अधिक द्विध्रुव आघूर्ण
➡️ घूर्णन स्पेक्ट्रम देगा
(v) N2O
- रैखिक लेकिन असममित (N–N–O)
-
द्विध्रुव आघूर्ण ≠ 0
➡️ घूर्णन स्पेक्ट्रम देगा
3. अंतिम निष्कर्ष
घूर्णन स्पेक्ट्रम दिखाने वाले अणु:
घूर्णन स्पेक्ट्रम नहीं दिखाने वाले अणु:
इस प्रकार जिन अणुओं में स्थायी द्विध्रुव आघूर्ण होता है वही शुद्ध घूर्णन स्पेक्ट्रम प्रदर्शित करते हैं।
प्रश्न 18:
निम्नलिखित अणुओं के लिए कितने सहज कम्पन तरीके (Vibrational modes) सम्भव हैं: HCl,CO2,BCl3।
उत्तर:
किसी अणु के सहज कम्पन तरीकों (Normal modes of vibration) की संख्या अणु के परमाणुओं की संख्या और उसकी संरचना (रैखिक/अरैखिक) पर निर्भर करती है।
सामान्य सूत्र
यदि अणु में परमाणुओं की संख्या = N
- रैखिक अणु (Linear molecule)
कम्पन विधियाँ=3N−5
- अरैखिक अणु (Non-linear molecule)
कम्पन विधियाँ=3N−6
(1) HCl
यह एक द्विपरमाणुक (Diatomic) रैखिक अणु है।
यहाँ N=2
👉 निष्कर्ष:
HCl में 1 कम्पन विधि होती है (Stretching vibration)।
द्विपरमाणुक अणुओं में केवल एक ही कम्पन संभव होता है क्योंकि वे केवल खिंचाव (stretching) कर सकते हैं।
(2) CO2
यह रैखिक त्रिपरमाणुक अणु है।
यहाँ N=3
👉 निष्कर्ष:
CO2 में 4 कम्पन विधियाँ होती हैं।
ये हैं:
- सममित stretching
- असममित stretching
- bending (ऊपर की ओर)
-
bending (नीचे की ओर)
(दो bending मोड degenerate होते हैं)
(3) BCl3
यह त्रिकोणीय समतलीय (Trigonal planar) अणु है → अरैखिक
यहाँ N=4
👉 निष्कर्ष:
BCl3 में 6 कम्पन विधियाँ होती हैं।
इनमें stretching और bending दोनों प्रकार के कम्पन शामिल होते हैं।
अंतिम परिणाम सारणी
| अणु | संरचना | कम्पन विधियाँ |
|---|---|---|
| HCl | रैखिक | 1 |
| CO2 | रैखिक | 4 |
| BCl3 | अरैखिक | 6 |
इस प्रकार दिए गए अणुओं के लिए सहज कम्पन विधियों की संख्या निर्धारित की जाती है।
प्रश्न:19
अदृढ़ घूर्णक (Non-rigid rotator) के घूर्णन का गुणात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
घूर्णन स्पेक्ट्रोस्कोपी में किसी अणु को समझाने के लिए सबसे पहले दृढ़ घूर्णक (Rigid rotator) मॉडल लिया जाता है, जिसमें यह माना जाता है कि अणु की बंध दूरी (bond length) स्थिर रहती है। परंतु वास्तविक अणु इस आदर्श स्थिति का पालन नहीं करते। वास्तविक अणु घूर्णन के समय थोड़ा फैलते (stretch) हैं, इसलिए उन्हें अदृढ़ घूर्णक (Non-rigid rotator) कहा जाता है।
अदृढ़ घूर्णक की अवधारणा
जब कोई अणु घूमता है, तो उस पर केन्द्रापसारी बल (centrifugal force) लगता है। यह बल अणु के परमाणुओं को बाहर की ओर खींचता है, जिसके कारण
- बंध दूरी थोड़ी बढ़ जाती है
- आघूर्ण जड़त्व (Moment of inertia, I) बढ़ जाता है
चूँकि घूर्णन नियतांक B का मान
होता है, इसलिए I बढ़ने पर B का मान घट जाता है।
ऊर्जा स्तरों पर प्रभाव
दृढ़ घूर्णक के लिए ऊर्जा स्तर होते हैं:
लेकिन अदृढ़ घूर्णक में ऊर्जा स्तरों में एक सुधार पद (correction term) जोड़ना पड़ता है:
यहाँ
- D = केन्द्रापसारी विकृति नियतांक (Centrifugal distortion constant)
यह सुधार पद दर्शाता है कि उच्च घूर्णन स्तरों पर अणु अधिक फैलता है।
स्पेक्ट्रम पर प्रभाव
अदृढ़ घूर्णक का सबसे महत्वपूर्ण प्रभाव स्पेक्ट्रम रेखाओं की दूरी पर पड़ता है:
- दृढ़ घूर्णक में रेखाओं के बीच अंतर = समान (2B) होता है।
- अदृढ़ घूर्णक में रेखाओं के बीच अंतर धीरे-धीरे कम होता जाता है।
अर्थात उच्च ऊर्जा स्तरों पर रेखाएँ पास-पास आने लगती हैं।
महत्व
अदृढ़ घूर्णक मॉडल वास्तविक अणुओं के लिए अधिक यथार्थवादी है क्योंकि:
- यह बंध के लचीलेपन को दर्शाता है
- बंध शक्ति और संरचना की सही जानकारी देता है
- स्पेक्ट्रम की सटीक व्याख्या करता है
निष्कर्ष
अदृढ़ घूर्णक वह वास्तविक स्थिति है जिसमें घूर्णन के कारण अणु की बंध दूरी बढ़ जाती है। इससे आघूर्ण जड़त्व बढ़ता है, घूर्णन नियतांक घटता है तथा स्पेक्ट्रम की रेखाएँ समान दूरी पर न होकर क्रमशः पास आती जाती हैं। यही अदृढ़ घूर्णक का गुणात्मक वर्णन है।



0 टिप्पणियाँ