B.Sc. Chemistry (C.G.) Third Year – UNIT 5A, First Question Paper Long & Short Answer Questions

 





  B.Sc. Chemistry (C.G.)

Third Year – First Question Paper


बी.एससी. रसायन विज्ञान (सी.जी.)
तृतीय वर्ष – प्रथम प्रश्न पत्र

इकाई 5 (अ) 

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न



Q1. अवशोषण एवं उत्सर्जन स्पेक्ट्रम किसे कहते हैं? दोनों में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर:
जब कोई पदार्थ विद्युतचुम्बकीय विकिरण को अवशोषित करता है और निम्न ऊर्जा अवस्था से उच्च ऊर्जा अवस्था में जाता है, तब प्राप्त स्पेक्ट्रम को अवशोषण स्पेक्ट्रम (Absorption spectrum) कहते हैं। इसमें सामान्यतः अंधेरी रेखाएँ या बैंड दिखाई देते हैं क्योंकि कुछ विशिष्ट तरंगदैर्ध्य पदार्थ द्वारा अवशोषित कर लिए जाते हैं।

इसके विपरीत, जब कोई उत्तेजित परमाणु या अणु उच्च ऊर्जा अवस्था से निम्न ऊर्जा अवस्था में वापस आता है, तो वह ऊर्जा विकिरण के रूप में उत्सर्जित करता है। इस प्रकार प्राप्त स्पेक्ट्रम को उत्सर्जन स्पेक्ट्रम (Emission spectrum) कहते हैं, जिसमें चमकीली रेखाएँ दिखाई देती हैं।

अंतर: अवशोषण में ऊर्जा ग्रहण होती है, उत्सर्जन में ऊर्जा निकलती है। अवशोषण स्पेक्ट्रम में अंधेरी रेखाएँ और उत्सर्जन स्पेक्ट्रम में चमकीली रेखाएँ मिलती हैं। दोनों पदार्थ की ऊर्जा स्तर संरचना की जानकारी देते हैं।


Q2. (अ) चुम्बकीय विकिरण क्या है? (ब) परमाणु स्पेक्ट्रा पर टिप्पणी लिखिए।

उत्तर:
(अ) विद्युतचुम्बकीय विकिरण वह ऊर्जा है जो तरंग के रूप में अंतरिक्ष में चलती है और जिसमें विद्युत तथा चुम्बकीय क्षेत्र एक-दूसरे के लंबवत दोलन करते हैं। उदाहरण: दृश्य प्रकाश, UV, IR, X-ray। इसकी मुख्य विशेषता यह है कि यह शून्य में भी यात्रा कर सकता है और तरंगदैर्ध्य तथा आवृत्ति से वर्णित होता है।

(ब) परमाणु स्पेक्ट्रा:
परमाणुओं में इलेक्ट्रॉन निश्चित ऊर्जा स्तरों में होते हैं। जब इलेक्ट्रॉन ऊर्जा स्तर बदलते हैं तो विशिष्ट तरंगदैर्ध्य का विकिरण उत्सर्जित या अवशोषित होता है। इससे रेखीय स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है। प्रत्येक तत्व का स्पेक्ट्रम अद्वितीय होता है, इसलिए इसका उपयोग तत्वों की पहचान में किया जाता है।


Q3. बैंड स्पेक्ट्रम पर टिप्पणी लिखिये।

उत्तर:
बैंड स्पेक्ट्रम अणुओं द्वारा उत्पन्न होता है। अणुओं में इलेक्ट्रॉनिक, कंपन तथा घूर्णन ऊर्जा स्तर होते हैं। जब इन तीनों प्रकार के ऊर्जा स्तरों में परिवर्तन एक साथ होता है तो कई निकटस्थ रेखाएँ मिलकर एक बैंड बनाती हैं। इसलिए यह रेखीय न होकर चौड़े बैंड के रूप में दिखाई देता है।

बैंड स्पेक्ट्रम मुख्यतः गैसीय अणुओं में देखा जाता है। यह रासायनिक संरचना, बन्ध और कंपन की जानकारी देता है।


Q4. रेखीय तथा बैंड स्पेक्ट्रम में अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर:

रेखीय स्पेक्ट्रमबैंड स्पेक्ट्रम
परमाणुओं से प्राप्तअणुओं से प्राप्त
अलग-अलग रेखाएँचौड़े बैंड
सरल ऊर्जा स्तरकंपन+घूर्णन स्तर शामिल
उदाहरण: H, Naउदाहरण: CO, N₂

रेखीय स्पेक्ट्रम सरल होता है जबकि बैंड स्पेक्ट्रम जटिल होता है।


Q5. स्वतंत्रता की कोटि किसे कहते हैं?

उत्तर:
किसी अणु के पास जितने स्वतंत्र तरीके से गति करने के तरीके होते हैं, उन्हें उसकी स्वतंत्रता की कोटि (Degrees of freedom) कहते हैं।

अणु तीन प्रकार की गति कर सकता है:

  1. अनुवाद (Translation) – स्थान परिवर्तन
  2. घूर्णन (Rotation)
  3. कंपन (Vibration)

गैस अवस्था में किसी अणु की कुल स्वतंत्रता की कोटि = 3N, जहाँ N परमाणुओं की संख्या है।


Q6. (अ) σ, π, n आर्बिटल और संक्रमण (ब) फ्रैंक–कॉन्डन सिद्धांत।

उत्तर:
σ → σ* संक्रमण: उच्च ऊर्जा, UV क्षेत्र
π → π* संक्रमण: मध्यम ऊर्जा, UV/Visible
n → π* संक्रमण: कम ऊर्जा, Visible क्षेत्र

फ्रैंक–कॉन्डन सिद्धांत:
इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण बहुत तेजी से होता है इसलिए संक्रमण के समय नाभिक की स्थिति नहीं बदलती। इस कारण स्पेक्ट्रा में कंपन संरचना दिखाई देती है।


Q7. ऐल्केन, ऐल्कीन, ऐल्काइन और कार्बोनिल में संक्रमण।

उत्तर:
ऐल्केन: σ → σ*
ऐल्कीन/ऐल्काइन: π → π*
कार्बोनिल: n → π* और π → π*

कार्बोनिल यौगिक visible क्षेत्र में अवशोषण दिखाते हैं।


प्रश्न 8

ऊष्मीय एवं प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाओं को उदाहरण सहित समझाइये तथा इनमें अंतर स्पष्ट कीजिये।

उत्तर

ऊष्मीय (Thermal) अभिक्रियाएँ वे रासायनिक अभिक्रियाएँ हैं जो ऊष्मा (heat) देने पर प्रारम्भ होती हैं। इन अभिक्रियाओं में अभिकारकों को सक्रियण ऊर्जा गर्म करके दी जाती है। उदाहरण के लिए मीथेन का दहन या कैल्शियम कार्बोनेट का अपघटन (CaCO₃ → CaO + CO₂) ऊष्मीय अभिक्रियाएँ हैं।

प्रकाश-रासायनिक (Photochemical) अभिक्रियाएँ वे हैं जो प्रकाश ऊर्जा के कारण होती हैं। इसमें अणु पहले प्रकाश अवशोषित करके उत्तेजित अवस्था में जाता है और फिर अभिक्रिया करता है। जैसे—फोटोसिंथेसिस, H₂ + Cl₂ → 2HCl (प्रकाश में)।

अंतर

  • ऊष्मीय अभिक्रिया ताप पर निर्भर करती है, प्रकाश-रासायनिक प्रकाश पर।
  • प्रकाश अभिक्रियाएँ कम ताप पर भी हो सकती हैं।
  • प्रकाश अभिक्रियाओं में पहले उत्तेजित अवस्था बनती है, जबकि ऊष्मीय में नहीं।
  • प्रकाश अभिक्रियाएँ अक्सर श्रृंखला अभिक्रिया होती हैं।

प्रश्न 9

आइन्स्टीन द्वारा प्रतिपादित प्रकाश-रासायनिक तुल्यता नियम को स्पष्ट कर सिद्ध कीजिए कि प्रति ग्राम अणु अवशोषित ऊर्जा तरंगदैर्ध्य के व्युत्क्रमानुपाती होती है।

उत्तर

आइन्स्टीन का प्रकाश-रासायनिक तुल्यता नियम कहता है कि
एक अणु केवल एक फोटोन ही अवशोषित करता है।

फोटोन की ऊर्जा का सूत्र है:
E = hν = hc/λ

जहाँ
h = प्लांक नियतांक
c = प्रकाश की गति
λ = तरंगदैर्ध्य

यदि एक ग्राम अणु (1 mole) फोटोन अवशोषित करे, तो कुल ऊर्जा = N × hc/λ
(N = एवोगाद्रो संख्या)

स्पष्ट है कि
ऊर्जा ∝ 1/λ

अर्थात तरंगदैर्ध्य जितनी कम होगी, ऊर्जा उतनी अधिक होगी। इसलिए UV प्रकाश अधिक ऊर्जा वाला होता है और IR कम ऊर्जा वाला।


प्रश्न 10

निम्नलिखित पर टिप्पणी लिखिये—
(i) फोटो सेल
(ii) थर्मोपाइल
(iii) यूरेनाइल ऑक्सेलेट ऐक्टीनोमीटर

उत्तर

(i) फोटो सेल
यह प्रकाश को विद्युत धारा में बदलने वाला उपकरण है। जब प्रकाश धातु सतह पर गिरता है तो इलेक्ट्रॉन निकलते हैं (फोटोइलेक्ट्रिक प्रभाव)। इसका उपयोग कैमरा, स्ट्रीट लाइट और ऑटोमैटिक डोर में होता है।

(ii) थर्मोपाइल
यह उपकरण ताप ऊर्जा को विद्युत ऊर्जा में बदलता है। कई थर्मोकपल मिलकर थर्मोपाइल बनाते हैं। इसका उपयोग विकिरण की तीव्रता मापने में किया जाता है।

(iii) यूरेनाइल ऑक्सेलेट एक्टीनोमीटर
यह प्रकाश की तीव्रता मापने का रासायनिक उपकरण है। प्रकाश के प्रभाव से यूरेनाइल ऑक्सेलेट विघटित होता है। इसकी मात्रा मापकर प्रकाश की तीव्रता ज्ञात करते हैं।


प्रश्न 11

क्वाण्टम दक्षता धारणा के आधार पर स्टार्क-आइन्स्टीन नियम से विचलन को स्पष्ट कीजिये।

उत्तर

स्टार्क-आइन्स्टीन नियम कहता है कि एक फोटोन एक अणु को सक्रिय करता है
लेकिन प्रयोगों में पाया गया कि कई अभिक्रियाओं में एक फोटोन से कई अणु प्रतिक्रिया करते हैं।

क्वांटम दक्षता (Quantum Yield, φ) = प्रतिक्रिया करने वाले अणुओं की संख्या / अवशोषित फोटोन की संख्या

यदि φ > 1 → श्रृंखला अभिक्रिया (जैसे H₂ + Cl₂)
यदि φ < 1 → ऊर्जा नष्ट हो जाती है

इसलिए वास्तविक अभिक्रियाएँ इस नियम से विचलित होती हैं क्योंकि मध्यवर्ती श्रृंखला अभिक्रियाएँ चलती रहती हैं।


प्रश्न 12

क्वाण्टम दक्षता ज्ञात करने की विधि का वर्णन कीजिए।

उत्तर

क्वांटम दक्षता ज्ञात करने के लिए दो चीजें मापी जाती हैं:

  1. अवशोषित प्रकाश की मात्रा
  2. प्रतिक्रिया करने वाले अणुओं की मात्रा

पहले एक्टीनोमीटर से प्रकाश की तीव्रता ज्ञात करते हैं।
फिर अभिक्रिया के बाद उत्पाद की मात्रा टाइट्रेशन से मापते हैं।

सूत्र:
φ = reacted molecules / absorbed photons

यदि φ = 1 → एक फोटोन से एक अणु प्रतिक्रिया करता है।
यदि φ > 1 → श्रृंखला अभिक्रिया हो रही है।


प्रश्न 13

H₂-Cl₂, H₂-Br₂ तथा H₂-I₂ प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाओं की तुलना कीजिए।

उत्तर

तीनों अभिक्रियाएँ प्रकाश में हाइड्रोजन हैलाइड बनाती हैं।

H₂ + Cl₂ → 2HCl
यह बहुत तेज श्रृंखला अभिक्रिया है। इसकी क्वांटम दक्षता बहुत अधिक (~10⁶)।

H₂ + Br₂ → 2HBr
यह धीमी श्रृंखला अभिक्रिया है। क्वांटम दक्षता कम (~10²)।

H₂ + I₂ → 2HI
यह लगभग श्रृंखला अभिक्रिया नहीं है। यह संतुलन अभिक्रिया है।

क्रम:
H₂-Cl₂ > H₂-Br₂ > H₂-I₂

कारण: Cl₂ का बंध कमजोर और अत्यधिक प्रतिक्रियाशील होता है।


प्रश्न 14

लैम्बर्ट नियम क्या है? बीयर ने इसे किस प्रकार विकसित किया?

उत्तर

लैम्बर्ट नियम कहता है कि जब प्रकाश किसी विलयन से गुजरता है तो उसकी तीव्रता दूरी के साथ घटती जाती है।

I = I₀ e⁻ᵏˡ

जहाँ l = पथ लंबाई

बीयर नियम ने इसमें सांद्रता (concentration) जोड़ी।
A = εcl

जहाँ
A = अवशोषण
c = सांद्रता
l = पथ लंबाई

इस संयुक्त नियम को लैम्बर्ट-बीयर नियम कहते हैं।
इसका उपयोग स्पेक्ट्रोफोटोमीटर में सांद्रता मापने के लिए किया जाता है।


प्रश्न 15

किसी अणु की उत्तेजित अवस्था में घटित होने वाले विभिन्न प्रक्रमों को जेबलोन्स्की आरेख द्वारा किस प्रकार से दर्शाया जाता है?

उत्तर:
जेबलोन्स्की आरेख (Jablonski diagram) किसी अणु की विभिन्न ऊर्जा अवस्थाओं तथा उनमें होने वाले संक्रमणों को दर्शाने वाला चित्रात्मक आरेख है। इसमें अणु की आधार अवस्था (Ground state S₀), प्रथम उत्तेजित एकल अवस्था (S₁), द्वितीय उत्तेजित अवस्था (S₂) तथा त्रिक अवस्था (T₁) को ऊर्जा स्तरों के रूप में दिखाया जाता है। जब अणु प्रकाश अवशोषित करता है तो इलेक्ट्रॉन S₀ से S₁ या S₂ में चला जाता है, जिसे अवशोषण कहते हैं। इसके बाद अणु विभिन्न प्रक्रियाओं से पुनः आधार अवस्था में लौटता है। इनमें फ्लोरेसेंस (S₁→S₀), फॉस्फोरेसेंस (T₁→S₀), आंतरिक रूपांतरण (Internal conversion) तथा इंटरसिस्टम क्रॉसिंग शामिल हैं। यह आरेख बताता है कि प्रकाश ऊर्जा अवशोषण के बाद अणु किस प्रकार ऊर्जा का उत्सर्जन या अपव्यय करता है।


प्रश्न 16

विकिरण रहित संक्रमण (Non-radiative transition) क्या है?

उत्तर:
जब कोई अणु अपनी उत्तेजित अवस्था से बिना प्रकाश उत्सर्जित किए आधार अवस्था में लौट आता है, तो इस प्रक्रिया को विकिरण रहित संक्रमण कहते हैं। इस प्रक्रिया में ऊर्जा प्रकाश के रूप में नहीं निकलती बल्कि ऊष्मा (heat) के रूप में परिवर्तित हो जाती है। यह दो प्रमुख प्रकार की होती है—आंतरिक रूपांतरण (Internal conversion) और इंटरसिस्टम क्रॉसिंग (Intersystem crossing)। आंतरिक रूपांतरण में इलेक्ट्रॉन एक ही स्पिन अवस्था के भीतर उच्च ऊर्जा स्तर से निम्न ऊर्जा स्तर में जाता है। इंटरसिस्टम क्रॉसिंग में इलेक्ट्रॉन सिंगलेट अवस्था से ट्रिपलेट अवस्था में चला जाता है। यह प्रक्रिया विशेष रूप से कार्बनिक यौगिकों में महत्वपूर्ण है और प्रकाश-रासायनिक अभिक्रियाओं की दक्षता को प्रभावित करती है।


प्रश्न 17

रेडिएटिव संक्रमण (Radiative transition) पर टिप्पणी लिखिये।

उत्तर:
रेडिएटिव संक्रमण वह प्रक्रिया है जिसमें उत्तेजित अवस्था का अणु आधार अवस्था में लौटते समय ऊर्जा को प्रकाश के रूप में उत्सर्जित करता है। इसके दो मुख्य प्रकार हैं—फ्लोरेसेंस और फॉस्फोरेसेंस। फ्लोरेसेंस में इलेक्ट्रॉन सिंगलेट उत्तेजित अवस्था (S₁) से आधार अवस्था (S₀) में आता है और यह प्रक्रिया बहुत तेज (10⁻⁸ सेकंड) होती है। फॉस्फोरेसेंस में इलेक्ट्रॉन ट्रिपलेट अवस्था (T₁) से आधार अवस्था में आता है और इसमें अधिक समय लगता है। यह संक्रमण पदार्थों की चमक, रंग तथा प्रकाशीय गुणों को समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है और LED, फ्लोरोसेंट लैम्प तथा जैविक इमेजिंग में उपयोगी है।


प्रश्न 18

प्रकाश सुग्राहीकरण (Photosensitization) पर टिप्पणी लिखिये।

उत्तर:
प्रकाश सुग्राहीकरण वह प्रक्रिया है जिसमें कोई पदार्थ स्वयं प्रकाश अवशोषित कर दूसरे पदार्थ में रासायनिक अभिक्रिया प्रारम्भ कर देता है। इस प्रक्रिया में संवेदक (sensitizer) पहले प्रकाश अवशोषित करता है और उत्तेजित अवस्था में पहुँच जाता है। इसके बाद यह ऊर्जा दूसरे अणु को स्थानांतरित कर देता है जिससे वह अणु सक्रिय होकर अभिक्रिया करता है। उदाहरण के लिए क्लोरोफिल प्रकाश को अवशोषित कर प्रकाश संश्लेषण को प्रारम्भ करता है। यह प्रक्रिया फोटोग्राफी, सौर ऊर्जा रूपांतरण तथा चिकित्सा (Photodynamic therapy) में अत्यंत महत्वपूर्ण है।


प्रश्न 19

इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण द्वारा >C=O एवं >C=C< यौगिकों की पहचान कैसे की जा सकती है?

उत्तर:
UV-Visible स्पेक्ट्रोस्कोपी में इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण के आधार पर विभिन्न क्रियात्मक समूहों की पहचान की जा सकती है। >C=C< यौगिकों में मुख्यतः π → π* संक्रमण होता है, जो लगभग 170–190 nm क्षेत्र में दिखाई देता है। जबकि >C=O (कार्बोनिल) यौगिकों में n → π* तथा π → π* दोनों संक्रमण होते हैं। n → π* संक्रमण लगभग 270–300 nm क्षेत्र में मिलता है और यह कार्बोनिल समूह की पहचान का प्रमुख संकेत है। इसलिए यदि स्पेक्ट्रम में लंबी तरंगदैर्ध्य पर अवशोषण दिखाई दे तो वह कार्बोनिल समूह का संकेत देता है, जबकि छोटी तरंगदैर्ध्य का अवशोषण डबल बॉन्ड की उपस्थिति दर्शाता है।


प्रश्न 20

इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण क्या है? π → π संक्रमण किन यौगिकों में पाया जाता है?*

उत्तर:
जब अणु प्रकाश ऊर्जा अवशोषित करता है और इलेक्ट्रॉन निम्न ऊर्जा कक्ष से उच्च ऊर्जा कक्ष में चला जाता है, तो इसे इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण कहते हैं। π → π* संक्रमण वह प्रक्रिया है जिसमें π-बंधन के इलेक्ट्रॉन π* प्रतिरोधी कक्ष में चले जाते हैं। यह संक्रमण असंतृप्त यौगिकों जैसे ऐल्कीन, ऐल्काइन, एरोमैटिक यौगिकों तथा संयुग्मित प्रणालियों में पाया जाता है। संयुग्मन बढ़ने पर यह संक्रमण लंबी तरंगदैर्ध्य की ओर खिसक जाता है, जिससे रंग उत्पन्न होता है।


प्रश्न 21

निम्न इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों के लिए विकिरण क्षेत्र एवं तरंगदैर्ध्य बताइये।

उत्तर:
(i) σ → σ* : यह सबसे अधिक ऊर्जा वाला संक्रमण है और लगभग 120–150 nm क्षेत्र (वैक्यूम UV) में होता है। यह संतृप्त यौगिकों में पाया जाता है।
(ii) π → π* : यह मध्यम ऊर्जा संक्रमण है और लगभग 170–200 nm क्षेत्र में होता है। संयुग्मन होने पर यह 200–400 nm तक जा सकता है।
(iii) n → π* : यह कम ऊर्जा संक्रमण है और लगभग 250–350 nm क्षेत्र में होता है। यह कार्बोनिल तथा नाइट्रो यौगिकों में पाया जाता है।


प्रश्न 22

निम्न अणुओं में सम्भव इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण बताइये—CH₄, CH₂=CH₂, CH₃COCH₃, CH₃OH, HCHO

उत्तर:
CH₄ (मीथेन): इसमें केवल σ बंध होते हैं, इसलिए σ → σ* संक्रमण होता है।
CH₂=CH₂ (एथीन): इसमें डबल बॉन्ड है, इसलिए π → π* संक्रमण होता है।
CH₃COCH₃ (एसीटोन): इसमें कार्बोनिल समूह है, इसलिए n → π* तथा π → π* दोनों संक्रमण होते हैं।
CH₃OH (मेथेनॉल): इसमें ऑक्सीजन के lone pair होते हैं, इसलिए n → σ* संक्रमण संभव है।
HCHO (फॉर्मल्डिहाइड): इसमें कार्बोनिल समूह होने से n → π* तथा π → π* संक्रमण दोनों पाए जाते हैं।

प्रश्न 23

निम्न में संभावित इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों का वर्णन कीजिये:
(i) कार्बोनिल यौगिक, (ii) ऐल्कीन एवं ऐल्काइन, (iii) नाइट्रोजन युक्त यौगिक, (iv) हैलोजन युक्त यौगिक।

उत्तर:
UV-Visible स्पेक्ट्रोस्कोपी में विभिन्न यौगिकों में उपस्थित बंधों और lone pair इलेक्ट्रॉनों के कारण अलग-अलग प्रकार के इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण होते हैं।

(i) कार्बोनिल यौगिक (>C=O):
इनमें दो प्रकार के संक्रमण होते हैं—π→π* तथा n→π*। π→π* संक्रमण उच्च ऊर्जा का होता है और लगभग 180 nm के आसपास दिखाई देता है, जबकि n→π* संक्रमण कम ऊर्जा का होता है और लगभग 270–300 nm पर मिलता है। यह कार्बोनिल समूह की पहचान का प्रमुख संकेत है।

(ii) ऐल्कीन एवं ऐल्काइन:
इनमें π बंध उपस्थित होते हैं, इसलिए मुख्यतः π→π* संक्रमण होता है। साधारण ऐल्कीन में यह लगभग 170–190 nm क्षेत्र में होता है, लेकिन संयुग्मन बढ़ने पर तरंगदैर्ध्य बढ़कर दृश्य क्षेत्र तक पहुँच सकता है। इसी कारण कई संयुग्मित यौगिक रंगीन होते हैं।

(iii) नाइट्रोजन युक्त यौगिक:
अमीन, नाइट्रो और नाइट्राइल यौगिकों में lone pair इलेक्ट्रॉन होते हैं। अतः इनमें n→σ* तथा n→π* संक्रमण पाए जाते हैं। नाइट्रो यौगिकों में π→π* संक्रमण भी होता है।

(iv) हैलोजन युक्त यौगिक:
हैलोजन परमाणुओं में lone pair इलेक्ट्रॉन होते हैं, इसलिए इनमें n→σ* संक्रमण प्रमुख होता है। यह संक्रमण सामान्यतः UV क्षेत्र में पाया जाता है और इसकी ऊर्जा हैलोजन के प्रकार पर निर्भर करती है।


प्रश्न 24

निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए—
(i) इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम, (ii) शून्य बिंदु ऊर्जा, (iii) समस्थानिक प्रभाव।

उत्तर:

(i) इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम:
जब कोई अणु UV या दृश्य प्रकाश अवशोषित करता है और उसके इलेक्ट्रॉन उच्च ऊर्जा स्तर पर चले जाते हैं, तब जो स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है उसे इलेक्ट्रॉनिक स्पेक्ट्रम कहते हैं। इसमें अवशोषण बैंड दिखाई देते हैं, जो अणु के इलेक्ट्रॉनिक संक्रमणों का परिणाम होते हैं। यह स्पेक्ट्रम यौगिक की संरचना, संयुग्मन तथा क्रियात्मक समूहों की पहचान में बहुत उपयोगी है।

(ii) शून्य बिंदु ऊर्जा (Zero Point Energy):
क्वांटम यांत्रिकी के अनुसार कोई भी अणु पूर्णतः स्थिर नहीं रह सकता। आधार अवस्था में भी उसमें न्यूनतम कंपन ऊर्जा होती है जिसे शून्य बिंदु ऊर्जा कहते हैं। इसका अर्थ है कि तापमान 0 K होने पर भी अणु में कुछ ऊर्जा बनी रहती है।

(iii) समस्थानिक प्रभाव (Isotope Effect):
जब किसी अणु में उपस्थित परमाणु का समस्थानिक बदल दिया जाता है, तो उसके कंपन आवृत्ति और प्रतिक्रिया की गति बदल जाती है। भारी समस्थानिक वाले अणु में कंपन आवृत्ति कम होती है। यह प्रभाव रासायनिक अभिक्रियाओं की क्रियाविधि समझने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।




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