B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 2 A
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. कार्बोहाइड्रेट क्या हैं? उनका वर्गीकरण उदाहरण सहित कीजिए।
कार्बोहाइड्रेट ऐसे कार्बनिक यौगिक हैं जो मुख्यतः कार्बन, हाइड्रोजन और ऑक्सीजन से बने होते हैं तथा सामान्य सूत्र Cx(H2O)y का पालन करते हैं। ये पॉलीहाइड्रॉक्सी एल्डीहाइड या कीटोन होते हैं।
वर्गीकरण:
- मोनोसैकराइड – एकल शर्करा इकाई, जैसे ग्लूकोज, फ्रक्टोज।
- डाइसैकराइड – दो मोनोसैकराइड इकाइयाँ, जैसे सुक्रोज, माल्टोज।
- ओलिगोसैकराइड – 3–10 इकाइयाँ, जैसे रैफिनोज।
-
पॉलीसैकराइड – अनेक इकाइयाँ, जैसे स्टार्च, सेल्यूलोज, ग्लाइकोजन।
ये ऊर्जा के प्रमुख स्रोत हैं और संरचनात्मक भूमिका भी निभाते हैं।
2. किलियानी संश्लेषण (Kiliani Synthesis) पर टिप्पणी लिखिये।
किलियानी संश्लेषण मोनोसैकराइड की कार्बन श्रृंखला बढ़ाने की विधि है। इसमें एल्डोज शर्करा को HCN से अभिक्रिया कराकर सायनोहाइड्रिन बनाया जाता है। इसके बाद हाइड्रोलिसिस द्वारा लैक्टोन बनता है और अंत में अपचयन से एक कार्बन अधिक वाला एल्डोज प्राप्त होता है। यह विधि शर्करा की संरचना और समावयवों के अध्ययन में बहुत महत्वपूर्ण है।
3(a). ग्लूकोज का परिवर्तन ऐबिनोस में कैसे करेंगे?
ग्लूकोज से ऐबिनोस प्राप्त करने के लिए रफ अपघटन (Ruff degradation) का उपयोग किया जाता है। इसमें पहले ग्लूकोज को ग्लूकोनिक अम्ल में ऑक्सीकरण किया जाता है, फिर Fe³⁺ और H₂O₂ की उपस्थिति में एक कार्बन कम हो जाता है। परिणामस्वरूप पाँच कार्बन वाला ऐबिनोस प्राप्त होता है।
3(b). सुक्रोज के जलीय अपघटन की अभिक्रिया लिखिए।
सुक्रोज का हाइड्रोलिसिस अम्ल या एंजाइम इनवर्टेज की उपस्थिति में होता है।
इस मिश्रण को इनवर्ट शुगर कहते हैं।
4. कार्बोहाइड्रेट के जैविक महत्व को विस्तार से समझाइए।
कार्बोहाइड्रेट जीवों के लिए ऊर्जा का मुख्य स्रोत हैं। ग्लूकोज कोशिकीय श्वसन में ATP उत्पन्न करता है। स्टार्च और ग्लाइकोजन ऊर्जा भंडारण करते हैं। सेल्यूलोज पौधों की कोशिका भित्ति का निर्माण करता है। DNA और RNA में राइबोज व डिऑक्सीराइबोज शर्करा पाई जाती है। ये कोशिका पहचान, प्रतिरक्षा तथा हार्मोनल नियंत्रण में भी भूमिका निभाते हैं।
5(a). एपीमरीकरण (Epimerization) क्या है? समझाइये।
एपीमर वे समावयवी होते हैं जिनमें केवल एक चिरल कार्बन पर विन्यास भिन्न होता है। एक एपीमर का दूसरे में परिवर्तन एपीमरीकरण कहलाता है। उदाहरण: ग्लूकोज और मैनोज C-2 एपीमर हैं।
5(b). ‘D’ एवं ‘L’ विन्यास पर टिप्पणी लिखिए।
D और L विन्यास ग्लिसराल्डिहाइड के संदर्भ पर आधारित होते हैं। यदि अंतिम चिरल कार्बन पर –OH दाईं ओर हो तो D-श्रृंखला, बाईं ओर हो तो L-श्रृंखला कहलाती है। यह प्रकाशीय घूर्णन से संबंधित नहीं बल्कि संरचनात्मक विन्यास को दर्शाता है।
6. परिवर्ती ध्रुवण घूर्णन (Mutarotation) क्या है?
जब किसी शर्करा के ताजा विलयन का विशिष्ट घूर्णन समय के साथ बदलकर एक स्थिर मान प्राप्त करता है, तो इस घटना को म्यूटारोटेशन कहते हैं। यह α और β एनोमर के बीच संतुलन बनने के कारण होता है। उदाहरण के लिए, α-D-ग्लूकोज का विशिष्ट घूर्णन +112° से घटकर लगभग +52.7° हो जाता है क्योंकि यह घोल में α और β रूपों के मिश्रण में परिवर्तित हो जाता है। यह प्रक्रिया खुली श्रृंखला और चक्रीय संरचना के बीच संतुलन बनने से संबंधित है।
7. एनोमर (Anomers) क्या होते हैं? उदाहरण सहित समझाइए।
एनोमर वे समावयवी होते हैं जो केवल एनोमेरिक कार्बन (C-1) पर विन्यास में भिन्न होते हैं। उदाहरण के रूप में ग्लूकोज के दो रूप – α-D-ग्लूकोज और β-D-ग्लूकोज। α-रूप में C-1 पर –OH समूह नीचे तथा β-रूप में ऊपर स्थित होता है। एनोमर म्यूटारोटेशन द्वारा एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं।
8. शर्कराओं के वलय आकार निर्धारण में मेथिलीकरण का उपयोग
मेथिलीकरण विधि द्वारा शर्करा के सभी मुक्त –OH समूहों को मेथॉक्सी (–OCH₃) में बदल दिया जाता है। इसके बाद हाइड्रोलिसिस और ऑक्सीकरण करके यह पता लगाया जाता है कि कौन-सा –OH समूह वलय निर्माण में भाग ले रहा था। इससे यह निष्कर्ष निकलता है कि शर्करा पाँच सदस्यीय (फ्यूरानोज) या छह सदस्यीय (पाइरानोज) वलय बनाती है।
9. एल्डोस का कीटोस तथा कीटोस का एल्डोस में परिवर्तन
यह परिवर्तन एनोलाइजेशन द्वारा क्षारीय माध्यम में होता है। एल्डोस और कीटोस एनोल रूप के माध्यम से एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं। उदाहरण: ग्लूकोज क्षारीय माध्यम में फ्रक्टोज और मैनोज में परिवर्तित हो सकता है। इसे लोब्री-डी-ब्रुइन-वैन एकेनस्टीन परिवर्तन कहते हैं।
10. ग्लूकोज की वलय आकार ज्ञात करने में HIO4 का महत्व
पिरियोडिक अम्ल (HIO₄) पड़ोसी –OH समूहों को तोड़ देता है। ग्लूकोज के ऑक्सीकरण से प्राप्त उत्पादों की संख्या और प्रकार से यह निष्कर्ष निकाला जाता है कि ग्लूकोज मुख्यतः छह सदस्यीय पाइरानोज रिंग बनाता है।
11. ग्लूकोज की चक्रीय संरचना के साक्ष्य
- ग्लूकोज एल्डिहाइड के सभी सामान्य अभिक्रियाएँ नहीं देता।
- म्यूटारोटेशन की घटना।
- एसीटैल निर्माण।
-
पेंटाऐसिटेट बनने पर एल्डिहाइड गुण समाप्त हो जाते हैं।
ये तथ्य बताते हैं कि ग्लूकोज खुली श्रृंखला के बजाय चक्रीय संरचना में रहता है।
12. एल्डोस तथा कीटोस का विन्यास निर्धारण
विन्यास निर्धारण ऑक्सीकरण, अपचयन और श्रृंखला बढ़ाने/घटाने की अभिक्रियाओं द्वारा किया जाता है। ग्लिसराल्डिहाइड को मानक मानकर तुलना की जाती है। विभिन्न अभिक्रियाओं के उत्पादों की तुलना से चिरल कार्बनों का विन्यास निर्धारित किया जाता है।
13. इरिथ्रो तथा थ्रियो-डाइस्टीरियो आइसोमर को समझाइये।
जब किसी अणु में दो सन्निकट (adjacent) चिरल कार्बन होते हैं और उनके –OH समूह फिशर प्रोजेक्शन में एक ही दिशा में हों, तो उसे इरिथ्रो (Erythro) कहते हैं। यदि –OH समूह विपरीत दिशाओं में हों, तो उसे थ्रियो (Threo) कहते हैं। ये डाइस्टीरियो आइसोमर होते हैं क्योंकि ये दर्पण प्रतिबिम्ब नहीं होते। उदाहरण के लिए 2,3-ब्यूटेनडायोल में दोनों प्रकार के समावयव पाए जाते हैं। यह वर्गीकरण शर्कराओं के विन्यास अध्ययन में बहुत महत्वपूर्ण है।
14. निरपेक्ष विन्यास (Absolute Configuration) कैसे निर्धारित किया जाता है?
निरपेक्ष विन्यास का निर्धारण एक्स-रे क्रिस्टलोग्राफी तथा रासायनिक संबंध विधि से किया जाता है। शर्कराओं में ग्लिसराल्डिहाइड को मानक माना गया है। यदि किसी शर्करा का संबंध D-ग्लिसराल्डिहाइड से हो तो उसका विन्यास D माना जाता है। आधुनिक समय में एक्स-रे विवर्तन तकनीक से अणु की त्रि-आयामी संरचना सीधे ज्ञात की जाती है, जिससे R/S विन्यास निर्धारित किया जा सकता है।
15. निम्नलिखित के संरचना सूत्र लिखिये
(1) राइबोस और डी-ऑक्सीराइबोस: ये पाँच कार्बन वाली एल्डोपेंटोज शर्कराएँ हैं; डी-ऑक्सीराइबोस में एक –OH कम होता है।
(2) सुक्रोज: ग्लूकोज + फ्रक्टोज का डाइसैकराइड, α-1→β-2 ग्लाइकोसिडिक बंध।
(3) माल्टोज: दो ग्लूकोज इकाइयाँ, α-1→4 बंध।
(4) लैक्टोज: ग्लूकोज + गैलेक्टोज, β-1→4 बंध।
(5) सेल्युलोज व स्टार्च: दोनों ग्लूकोज के पॉलीमर हैं; सेल्युलोज में β-1→4 बंध, स्टार्च में α-1→4 व α-1→6 बंध होते हैं।
16. निम्नलिखित परिवर्तन कैसे करेंगे?
(i) ग्लूकोज → सैकरिक अम्ल: सघन नाइट्रिक अम्ल से ऑक्सीकरण करने पर दोनों सिरों के –CHO व –CH₂OH समूह –COOH में बदल जाते हैं और सैकरिक अम्ल बनता है।
(ii) ग्लूकोज → ओसाजोन: फिनाइलहाइड्राजीन के साथ गर्म करने पर ओसाजोन बनता है।
(iii) ग्लूकोज → ग्लूकोज पेंटाएसीटेट: एसीटिक एनहाइड्राइड से अभिक्रिया कराने पर सभी –OH समूह एसीटिलेट हो जाते हैं।
17. फ्रक्टोज फेहलिंग व टॉलेन अभिकर्मक को अपचयित करता है, क्यों?
फ्रक्टोज कीटोस होने के बावजूद क्षारीय माध्यम में एनोलाइजेशन द्वारा ग्लूकोज और मैनोज (एल्डोस) में परिवर्तित हो जाता है। ये एल्डोस फेहलिंग और टॉलेन अभिकर्मकों को अपचयित कर देते हैं। इसलिए फ्रक्टोज भी अपचायक शर्करा की तरह व्यवहार करता है।
18. सुक्रोज फेहलिंग विलयन को अपचयित नहीं करता है, क्यों?
सुक्रोज में दोनों मोनोसैकराइड इकाइयाँ ग्लाइकोसिडिक बंध से जुड़ी होती हैं और कोई मुक्त एल्डिहाइड या कीटोन समूह उपलब्ध नहीं होता। इसलिए यह नॉन-रिड्यूसिंग शुगर है और फेहलिंग विलयन को अपचयित नहीं करता।
19. सुक्रोज का विलयन दक्षिण घूर्णक होता है पर जल-अपघटन के बाद वामघूर्णक क्यों? (Inversion of Sugar)
सुक्रोज एक डाइसैकराइड है जो जल-अपघटन से ग्लूकोज और फ्रक्टोज देता है। शुद्ध सुक्रोज का विशिष्ट घूर्णन लगभग +66.5° होता है, इसलिए इसका विलयन दक्षिण घूर्णक (dextrorotatory) होता है। जब अम्ल या एंजाइम इनवर्टेज की उपस्थिति में इसका हाइड्रोलिसिस किया जाता है, तो समान मात्रा में D-ग्लूकोज (+52.7°) और D-फ्रक्टोज (−92°) बनते हैं। फ्रक्टोज का ऋणात्मक घूर्णन अधिक प्रबल होने के कारण मिश्रण का कुल घूर्णन ऋणात्मक हो जाता है। इस प्रकार दाहिने घूर्णन से बाएँ घूर्णन में परिवर्तन होता है, जिसे इनवर्शन ऑफ शुगर कहा जाता है और उत्पाद मिश्रण को इनवर्ट शुगर कहते हैं।
20. एनोमर तथा एपीमर को उदाहरण सहित समझाइए।
एनोमर वे समावयवी होते हैं जो केवल एनोमेरिक कार्बन (ग्लूकोज में C-1) पर भिन्न होते हैं, जैसे α-D-ग्लूकोज और β-D-ग्लूकोज। इनका अंतर चक्रीय संरचना बनने पर –OH समूह की दिशा से होता है।
एपीमर वे समावयवी होते हैं जो केवल एक चिरल कार्बन पर भिन्न हों (एनोमेरिक कार्बन को छोड़कर)। उदाहरण: D-ग्लूकोज और D-मैनोज C-2 एपीमर हैं। एनोमर म्यूटारोटेशन द्वारा एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं, जबकि एपीमर विशेष रासायनिक अभिक्रियाओं से परिवर्तित होते हैं।
21. फ्रक्टोज की हावर्थ प्रोजेक्शन संरचना
फ्रक्टोज मुख्यतः फ्यूरानोज (पाँच सदस्यीय) वलय बनाता है। इसमें C-2 एनोमेरिक कार्बन होता है और α तथा β दोनों रूप संभव होते हैं। हावर्थ संरचना में CH₂OH समूह ऊपर की ओर तथा एनोमेरिक –OH की दिशा के आधार पर α या β रूप बनते हैं। यह संरचना फ्रक्टोज की चक्रीय प्रकृति और एनोमर बनने की क्षमता को दर्शाती है।
22. डाइसैकराइड की संरचना व IUPAC नाम
डाइसैकराइड दो मोनोसैकराइड इकाइयों के बीच ग्लाइकोसिडिक बंध से बनते हैं। उदाहरण:
• माल्टोज: α-D-Glucopyranosyl-(1→4)-D-glucose
• लैक्टोज: β-D-Galactopyranosyl-(1→4)-D-glucose
• सुक्रोज: α-D-Glucopyranosyl-(1→2)-β-D-fructofuranoside
इनके IUPAC नाम ग्लाइकोसिडिक बंध और कार्बन स्थिति पर आधारित होते हैं।
23. सेल्युलोज का निर्माण तथा नाइट्रेट/रेयॉन बनाना
सेल्युलोज β-D-ग्लूकोज इकाइयों का लंबा पॉलीमर है जिसमें β-1→4 ग्लाइकोसिडिक बंध होते हैं। इसे नाइट्रिक अम्ल से अभिक्रिया कराकर सेल्युलोज नाइट्रेट (गन-कॉटन) बनाया जाता है। रेयॉन बनाने के लिए सेल्युलोज को NaOH और CS₂ से अभिक्रिया कराकर विस्कोस घोल बनाया जाता है, जिसे फाइबर के रूप में जमाकर कृत्रिम रेशा तैयार किया जाता है।
24. α एवं β ग्लाइकोसिडिक बंध क्या है?
यदि एनोमेरिक कार्बन का –O– बंध रिंग के नीचे दिशा में हो तो α-ग्लाइकोसिडिक बंध और ऊपर दिशा में हो तो β-ग्लाइकोसिडिक बंध कहलाता है। यह अंतर डाइसैकराइड और पॉलीसैकराइड की संरचना और गुणों को प्रभावित करता है।
25. D-मैनोज से D-ग्लूकोज कैसे प्राप्त करेंगे?
D-मैनोज और D-ग्लूकोज C-2 एपीमर हैं। क्षारीय माध्यम में एनोलाइजेशन के द्वारा दोनों एक-दूसरे में परिवर्तित हो सकते हैं। इसे लोब्री-डी-ब्रुइन-वैन एकेनस्टीन परिवर्तन कहते हैं।
26. अमाडोरी पुनर्विन्यास पर टिप्पणी
जब एल्डोज अमीन के साथ अभिक्रिया कर शिफ बेस बनाता है और फिर पुनर्विन्यास होकर कीटोएमीन बनता है, तो इसे अमाडोरी पुनर्विन्यास कहते हैं। यह अभिक्रिया भोजन में ब्राउनिंग (Maillard reaction) तथा जैव रसायन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है।
यह लैक्टोज का अम्लीय जल-अपघटन (acid hydrolysis) है।
लैक्टोज एक डाइसैकराइड है जो β-1→4 ग्लाइकोसिडिक बंध से जुड़ी दो मोनोसैकराइड इकाइयों से बना होता है —
👉 D-ग्लूकोज + D-गैलेक्टोज
अम्लीय माध्यम में पानी की उपस्थिति में यह ग्लाइकोसिडिक बंध टूट जाता है।
Final Answer
A = D-Glucose
B = D-Galactose
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