B.Sc. Chemistry (C.G.) Third Year – UNIT 2A, First Question Paper Long & Short Answer Questions




 B.Sc. Chemistry (C.G.)

Third Year – First Question Paper


बी.एससी. रसायन विज्ञान (सी.जी.)
तृतीय वर्ष – प्रथम प्रश्न पत्र

इकाई 2 (अ ) 

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न

प्रश्न 1 :- चुम्बकीय व्यवहार से क्या समझते हैं? चुम्बकीय व्यवहार कितने प्रकार के होते हैं?
उत्तर :
जब किसी पदार्थ को बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र (Magnetic field) में रखा जाता है, तो वह पदार्थ उस क्षेत्र के प्रति जो प्रतिक्रिया देता है उसे चुम्बकीय व्यवहार (Magnetic behaviour) कहते हैं।

यह पदार्थ में उपस्थित अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों (Unpaired electrons) पर निर्भर करता है।

चुम्बकीय व्यवहार के प्रकार :
मुख्यतः 5 प्रकार के होते हैं —

  1. प्रतिचुम्बकत्व (Diamagnetism)
  2. अनुचुम्बकत्व (Paramagnetism)
  3. लौहचुम्बकत्व (Ferromagnetism)
  4. प्रतिलौह चुम्बकत्व (Antiferromagnetism)
  5. फेरिमैग्नेटिज्म (Ferrimagnetism)

प्रश्न 2 :- प्रतिचुम्बकत्व एवं प्रतिचुम्बकीय पदार्थ को समझाइये।
उत्तर :
वे पदार्थ जिनमें कोई भी अयुग्मित इलेक्ट्रॉन नहीं होता, वे बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र को कमजोर रूप से प्रतिकर्षित (repel) करते हैं। इस गुण को प्रतिचुम्बकत्व (Diamagnetism) कहते हैं।

विशेषताएँ :

  • सभी इलेक्ट्रॉन युग्मित होते हैं।
  • चुम्बकीय क्षेत्र से दूर हटते हैं।
  • तापमान का प्रभाव नहीं पड़ता।

उदाहरण :
Cu, Zn, H₂O, NaCl, Benzene आदि।


प्रश्न 3 (अ) :- अनुचुम्बकत्व एवं अनुचुम्बकीय व्यवहार की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
जिन पदार्थों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन उपस्थित होते हैं, वे बाहरी चुम्बकीय क्षेत्र की ओर कमजोर रूप से आकर्षित होते हैं। इस गुण को अनुचुम्बकत्व (Paramagnetism) कहते हैं।

विशेषताएँ :

  • अयुग्मित इलेक्ट्रॉन होते हैं।
  • चुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित होते हैं।
  • तापमान बढ़ने पर चुम्बकत्व कम हो जाता है।

उदाहरण :
O₂, Fe³⁺, Mn²⁺, Cr³⁺ आदि।


प्रश्न 3 (ब) :- प्रतिचुम्बकीय तथा अनुचुम्बकीय पदार्थों में अंतर लिखिए।

आधारप्रतिचुम्बकीयअनुचुम्बकीय
इलेक्ट्रॉनसभी युग्मितअयुग्मित उपस्थित
व्यवहारचुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षितचुम्बकीय क्षेत्र की ओर आकर्षित
ताप का प्रभावकोई प्रभाव नहींताप बढ़ने पर कम
उदाहरणCu, ZnFe³⁺, O₂

प्रश्न 4 :- लौह चुम्बकत्व एवं लौहचुम्बकीय पदार्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
वे पदार्थ जो चुम्बकीय क्षेत्र में बहुत अधिक आकर्षित होते हैं और स्वयं स्थायी चुम्बक बन सकते हैं, उन्हें लौहचुम्बकीय पदार्थ (Ferromagnetic substances) कहते हैं।

इस गुण को लौह चुम्बकत्व (Ferromagnetism) कहते हैं।

विशेषताएँ :

  • बहुत अधिक आकर्षण।
  • स्थायी चुम्बक बन सकते हैं।
  • इनमें डोमेन (Domains) बनते हैं।

उदाहरण :
Fe, Co, Ni


प्रश्न 5 :- प्रतिलौह-चुम्बकत्व एवं प्रतिलौह-चुम्बकीय पदार्थ की व्याख्या कीजिए।
उत्तर :
कुछ पदार्थों में अयुग्मित इलेक्ट्रॉन तो होते हैं लेकिन उनके स्पिन विपरीत दिशा में समान संख्या में होते हैं, जिससे कुल चुम्बकत्व शून्य हो जाता है।

इस गुण को प्रतिलौह चुम्बकत्व (Antiferromagnetism) कहते हैं।

विशेषताएँ :

  • स्पिन विपरीत दिशा में व्यवस्थित।
  • कुल चुम्बकीय आघूर्ण = 0
  • ताप बढ़ने पर यह गुण समाप्त हो जाता है (Néel temperature)।

उदाहरण :
MnO, NiO, FeO


प्रश्न 6 :- फेरो-चुम्बकत्व या लघु-लौह चुम्बकत्व किसे कहते हैं?
उत्तर :
फेरिमैग्नेटिज्म (Ferrimagnetism) को ही लघु-लौह चुम्बकत्व कहा जाता है।

जब किसी पदार्थ में इलेक्ट्रॉनों के स्पिन विपरीत दिशा में तो होते हैं, परन्तु उनकी संख्या समान नहीं होती, तब कुल चुम्बकीय आघूर्ण शून्य नहीं होता बल्कि कुछ चुम्बकत्व बच जाता है। यही फेरो-चुम्बकत्व कहलाता है।

विशेषताएँ :

  • स्पिन विपरीत दिशा में लेकिन असमान संख्या में
  • शुद्ध चुम्बकत्व शून्य नहीं होता
  • लौहचुम्बकीय पदार्थों से कम परंतु अनुचुम्बकीय से अधिक

उदाहरण : Fe₃O₄ (मैग्नेटाइट), फेराइट्स।


प्रश्न 7 :- चुम्बकीय सुग्राहिता क्या है? चुम्बकीय सुग्राहिता ज्ञात करने की विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
जब किसी पदार्थ को चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उसमें उत्पन्न चुम्बकीयकरण (Magnetization) और लगाए गए चुम्बकीय क्षेत्र के अनुपात को चुम्बकीय सुग्राहिता (Magnetic Susceptibility, χ) कहते हैं।

χ=MH​

जहाँ,
M = चुम्बकीयकरण
H = चुम्बकीय क्षेत्र

सुग्राहिता मापन की मुख्य विधियाँ :

  1. गॉस विधि (Gouy Method)
  2. क्विके विधि (Quincke Method)
  3. भटनागर-माथुर विधि

प्रश्न 8 :- चुम्बकीय सुग्राहिता मापन की गॉस (Gouy) विधि का वर्णन कीजिये।
उत्तर :

यह विधि ठोस पदार्थों की चुम्बकीय सुग्राहिता मापने के लिए प्रयोग होती है।

सिद्धान्त :
जब किसी पदार्थ को असमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है, तो उस पर एक बल लगता है —

  • अनुचुम्बकीय → चुम्बक की ओर आकर्षित
  • प्रतिचुम्बकीय → चुम्बक से दूर

प्रयोग व्यवस्था :

  • पदार्थ को कांच की नली में भरकर बैलेंस से लटकाया जाता है।
  • नली का निचला भाग चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है।
  • चुम्बक चालू करने पर भार में परिवर्तन होता है।

सूत्र :

χ=2ΔWAH2ρ​

जहाँ ΔW = भार परिवर्तन


प्रश्न 9 :- चुम्बकीय सुग्राहिता मापन की भटनागर-माथुर विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :

यह विधि गॉस विधि का संशोधित रूप है।

मुख्य विशेषता :

  • इसमें इलेक्ट्रोमैग्नेट और टॉर्शन बैलेंस का प्रयोग होता है।
  • अत्यधिक सूक्ष्म बल भी मापा जा सकता है।

सिद्धान्त :
असमान चुम्बकीय क्षेत्र में पदार्थ पर लगने वाले बल को मापकर सुग्राहिता निकाली जाती है।

लाभ :

  • अधिक शुद्ध परिणाम
  • छोटे नमूनों के लिए उपयोगी

प्रश्न 10 :- क्विके विधि से किस प्रकार के पदार्थों की चुम्बकीय सुग्राहिता का मापन किया जाता है? सिद्धान्त समझाइये।
उत्तर :

क्विके विधि (Quincke Method) का उपयोग
👉 द्रव पदार्थों (Liquids) की चुम्बकीय सुग्राहिता मापने के लिए किया जाता है।

सिद्धान्त :
जब किसी द्रव को असमान चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है —

  • अनुचुम्बकीय द्रव → स्तर ऊपर उठता है
  • प्रतिचुम्बकीय द्रव → स्तर नीचे गिरता है

यह परिवर्तन दाब (Pressure) के कारण होता है।

प्रयोग व्यवस्था :

  • U-ट्यूब में द्रव भरा जाता है।
  • एक भाग चुम्बकीय क्षेत्र में रखा जाता है।
  • द्रव स्तम्भ की ऊँचाई में परिवर्तन मापा जाता है।

निष्कर्ष :
स्तम्भ की ऊँचाई परिवर्तन से चुम्बकीय सुग्राहिता ज्ञात की जाती है।

प्रश्न 11 (अ) :- चुम्बकीय सुग्राहिता से क्या समझते हैं? क्यूरी विधि का वर्णन कीजिए।
उत्तर :
चुम्बकीय क्षेत्र में पदार्थ के चुम्बकीयकरण और लगाए गए क्षेत्र के अनुपात को चुम्बकीय सुग्राहिता (χ) कहते हैं।

χ=MH\chi=\frac{M}{H}

क्यूरी विधि (Curie Method)

यह विधि ताप पर निर्भरता के आधार पर अनुचुम्बकीय पदार्थों की सुग्राहिता ज्ञात करती है।

क्यूरी नियम :

χ=CT\chi = \frac{C}{T}

जहाँ
C = क्यूरी नियतांक
T = परम ताप

सिद्धान्त :
ताप बढ़ने पर अनुचुम्बकीयता घटती है क्योंकि तापीय गति इलेक्ट्रॉनों के अभिमुखीकरण को बाधित करती है।


प्रश्न 11 (ब) :- केवल चक्रण सूत्र क्या है? व्युत्पत्ति एवं उपयोग बताइये।
उत्तर :

अनुचुम्बकीय पदार्थों में यदि कक्षक योगदान नगण्य हो तो चुम्बकीय आघूर्ण केवल स्पिन से प्राप्त होता है। इसे केवल चक्रण सूत्र (Spin only formula) कहते हैं।

μs=n(n+2) B.M.

जहाँ n = अयुग्मित इलेक्ट्रॉन

उपयोग :

  • अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात करना
  • संकुल की ज्यामिति व संकरण पहचानना

प्रश्न 12 (अ) :- S-S युग्मन तथा L-S युग्मन स्पष्ट कीजिए।

उत्तर :

S-S युग्मन :
सभी इलेक्ट्रॉनों के स्पिन पहले जुड़ते हैं → कुल स्पिन (S)

L-L युग्मन :
सभी इलेक्ट्रॉनों के कक्षक कोणीय संवेग जुड़ते हैं → कुल L

इसके बाद S और L मिलकर J बनाते हैं।


प्रश्न 12 (ब) :- ²D₃/₂ एवं ³F₂ पद संकेत समझाइये।

Term Symbol = ²S+1 L J

²D₃/₂

  • Multiplicity = 2 → S=1/2
  • L = D = 2
  • J = 3/2

³F₂

  • Multiplicity = 3 → S=1
  • L = F = 3
  • J = 2

प्रश्न 12 (स) :- Mn²⁺, Fe²⁺, Cr³⁺ के मूल अवस्था पद संकेत

आयनइलेक्ट्रॉन विन्यासपद संकेत
Mn²⁺ (3d⁵)5 unpaired⁶S₅/₂
Fe²⁺ (3d⁶)4 unpaired⁵D₄
Cr³⁺ (3d³)3 unpaired⁴F₃/₂

प्रश्न 13 :- μs तथा μeff में संबंध स्थापित कीजिये।

μeff=4S(S+1)+L(L+1)

यदि L≈0 →

μeffμs​

अर्थात μeff में स्पिन + कक्षक दोनों योगदान देते हैं।


प्रश्न 14 :- चुम्बकीय आघूर्ण में कक्षक योगदान का महत्व

  • भारी धातुओं में कक्षक योगदान अधिक होता है।
  • सटीक μeff ज्ञात करने में आवश्यक।
  • स्पेक्ट्रोस्कोपी व संरचना निर्धारण में सहायक।

प्रश्न 15 (अ) :- 3d संकुलों में चुम्बकीय आँकड़ों की उपयोगिता

  1. अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात
  2. ज्यामिति निर्धारण
  3. हाई स्पिन / लो स्पिन पहचान
  4. संकरण निर्धारण

प्रश्न 15 (ब) :- [Fe(CN)₆]⁴⁻ में संकरण

Fe²⁺ → 3d⁶
CN⁻ = मजबूत क्षेत्र लिगैंड → लो स्पिन

अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 0

μ=0 B.M.\mu =0 \text{ B.M.}

अतः संकरण = d²sp³ (आंतरिक कक्षक संकरण)
और संकुल ऑक्टाहेड्रल होता है।




प्रश्न 16 :- चुंबकीय आघूर्ण के आँकड़े 3d-संक्रमण धातुओं के संकुलों के लिए महत्वपूर्ण हैं। यह परमाणुओं, आयनों एवं अणुओं में अनुचुम्बकत्व ज्ञात करने में कैसे सहायक हैं?
उत्तर :
चुम्बकीय आघूर्ण (Magnetic moment) के आँकड़े संक्रमण धातु संकुलों की संरचना समझने में बहुत उपयोगी होते हैं।

महत्व :

  1. अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात होती है।
  2. संकुल अनुचुम्बकीय या प्रतिचुम्बकीय है यह पता चलता है।
  3. ज्यामिति निर्धारण (Octahedral / Tetrahedral / Square planar)।
  4. हाई स्पिन या लो स्पिन स्थिति पता चलती है।
  5. संकरण (Hybridisation) की पहचान होती है।

इस प्रकार चुम्बकीय आघूर्ण परमाणु, आयन व अणुओं के इलेक्ट्रॉनिक विन्यास को समझने में सहायक है।


प्रश्न 17 :- [CoF₆]³⁻ अनुचुम्बकीय जबकि [Co(CN)₆]³⁻ प्रतिचुम्बकीय क्यों? (CFT से)

उत्तर :

Co³⁺ = 3d⁶

(i) [CoF₆]³⁻

F⁻ = कमजोर क्षेत्र लिगैंड → हाई स्पिन

इलेक्ट्रॉन विन्यास :
t₂g⁴ eg²
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 4
अनुचुम्बकीय

(ii) [Co(CN)₆]³⁻

CN⁻ = मजबूत क्षेत्र लिगैंड → लो स्पिन

इलेक्ट्रॉन विन्यास :
t₂g⁶ eg⁰
अयुग्मित इलेक्ट्रॉन = 0
प्रतिचुम्बकीय


प्रश्न 18 :- टिप्पणी लिखिये

(i) चुम्बकीय प्रेरण (Magnetic induction)
बाहरी क्षेत्र में पदार्थ के अंदर उत्पन्न कुल चुम्बकीय क्षेत्र को चुम्बकीय प्रेरण कहते हैं।

B=μH

(ii) चुम्बकीय सुग्राहिता (Magnetic susceptibility)

χ=MH​

पदार्थ कितनी आसानी से चुम्बकित होता है।

(iii) प्रतिचुम्बकत्व (Diamagnetism)
युग्मित इलेक्ट्रॉन वाले पदार्थ चुम्बकीय क्षेत्र से प्रतिकर्षित होते हैं।

(iv) L–S कपलिंग
पहले कुल स्पिन (S) और कुल कक्षक संवेग (L) जुड़ते हैं, फिर J बनता है।


प्रश्न 19 :- ³F₂ के लिए L, S, J ज्ञात करें

Term symbol = ²S+1 L J

³F₂ में
2S+1 = 3 ⇒ S = 1
F ⇒ L = 3
J = 2


प्रश्न 20 :- ताप के साथ चुम्बकीय सुग्राहिता में परिवर्तन

अनुचुम्बकीय पदार्थ :
क्यूरी नियम

χ=CT\chi=\frac{C}{T}

ताप बढ़ने पर सुग्राहिता घटती है।

लौहचुम्बकीय पदार्थ :
क्यूरी ताप तक चुम्बकत्व रहता है।
उसके बाद अनुचुम्बकीय बन जाते हैं।

प्रतिलौह चुम्बकीय पदार्थ :
नील ताप (Néel temperature) के ऊपर अनुचुम्बकीय बन जाते हैं।



प्रश्न 21 :- चुम्बकीय आघूर्ण आँकड़ों के कोई दो अनुप्रयोग दीजिए।
उत्तर :

चुम्बकीय आघूर्ण (Magnetic moment) के आँकड़ों के मुख्य अनुप्रयोग —

1️⃣ अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या ज्ञात करना
केवल चक्रण सूत्र μ=n(n+2)\mu = \sqrt{n(n+2)}से अयुग्मित इलेक्ट्रॉनों की संख्या पता चलती है, जिससे यह तय होता है कि पदार्थ अनुचुम्बकीय है या प्रतिचुम्बकीय।

2️⃣ संकुल की संरचना एवं संकरण निर्धारण
चुम्बकीय आघूर्ण के मान से यह पता लगाया जाता है कि संकुल हाई-स्पिन है या लो-स्पिन, तथा उसका संकरण (जैसे d²sp³ या sp³d²) क्या है।




प्रश्न 22 :- क्यूरी ताप किसे कहते हैं?
उत्तर :

वह निश्चित ताप जिस पर कोई लौहचुम्बकीय पदार्थ अपना स्थायी चुम्बकत्व खो देता है और अनुचुम्बकीय बन जाता है, उसे क्यूरी ताप (Curie Temperature) कहते हैं।

क्यूरी ताप से ऊपर डोमेन संरचना नष्ट हो जाती है और पदार्थ सामान्य अनुचुम्बकीय व्यवहार दिखाता है।

उदाहरण:
लोहे (Fe) का क्यूरी ताप लगभग 770°C होता है।





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