B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 3 A
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. IR स्पेक्ट्रोस्कोपी के प्रमुख अनुप्रयोग बताइये।
IR (इन्फ्रारेड) स्पेक्ट्रोस्कोपी रासायनिक यौगिकों की पहचान और संरचना अध्ययन में उपयोगी है। इसका प्रमुख अनुप्रयोग कार्बनिक और अकार्बनिक यौगिकों में फंक्शनल समूहों की पहचान करना है। यह संरचना निर्धारण, मिश्रित यौगिकों का विश्लेषण, जैविक नमूनों और औषधियों की शुद्धता जांचने, और रासायनिक अभिक्रियाओं की निगरानी में काम आता है। इसके अलावा, IR स्पेक्ट्रोस्कोपी सतह विज्ञान, पॉलिमर, खाद्य और पर्यावरण विज्ञान में भी अनुप्रयुक्त होती है। यह तकनीक सरल, तेज और गैर-विनाशकारी है, जिससे नमूने को किसी नुकसान के बिना विश्लेषित किया जा सकता है।
2. निम्नलिखित की परिभाषा देते हुए परस्पर संबंध बताइए: (i) तरंगदैर्ध्य (ii) आवृत्ति (iii) तरंग संख्या। इनके मात्रक क्या हैं?
- तरंगदैर्ध्य (Wavelength, λ): किसी तरंग के दो समान बिंदुओं के बीच की दूरी। मात्रक: मीटर (m) या नैनोमीटर (nm)।
- आवृत्ति (Frequency, ν): प्रति सेकंड तरंग कितनी बार दोहरती है। मात्रक: हर्ट्ज़ (Hz)।
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तरंग संख्या (Wavenumber, ṽ): प्रति सेंटीमीटर कितनी तरंगें होती हैं। मात्रक: cm⁻¹।
संबंध: ν=c/λ और v~=1/λ, जहाँ c प्रकाश की गति है। ये सभी मापदंड तरंग की ऊर्जा और कंपन से संबंधित हैं।
3. IR स्पेक्ट्रोस्कोपी में फिंगर प्रिंट क्षेत्र (Finger print region) का महत्व समझाइये। मिश्रित समूहों की अभिलाक्षणिक आवृत्तियों को प्रदर्शित कीजिए।
फिंगर प्रिंट क्षेत्र लगभग 1500–500 cm⁻¹ में आता है। यह यौगिकों के लिए विशिष्ट होता है, जैसे मानव फिंगरप्रिंट। इसमें कार्बन-हाइड्रोजन बंधों, सी-सी, सी-एन और अन्य छोटे बंधों की कंपन विशिष्ट होती है। मिश्रित समूहों के अभिलाक्षणिक आवृत्तियाँ जैसे C–O (1000–1300 cm⁻¹), C–Cl (600–800 cm⁻¹), और C–N (1200–1350 cm⁻¹) फिंगर प्रिंट क्षेत्र में देखी जा सकती हैं। यह क्षेत्र किसी यौगिक की पहचान और शुद्धता जांचने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
4. IR स्पेक्ट्रा पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
IR स्पेक्ट्रा यौगिक में मौजूद फंक्शनल समूहों की कंपन आवृत्तियों को प्रदर्शित करता है। इसमें पीक (Peak) उच्च ऊर्जा और विशिष्ट बंध के अनुसार स्थानिक होते हैं। तीव्र और संकुचित पीक विशेष बंधों की पहचान में मदद करते हैं। स्पेक्ट्रा में बड़े क्षेत्र और तीव्रता के आधार पर यौगिक की संरचना और मिलान किया जा सकता है। यह तकनीक गुणात्मक विश्लेषण के लिए अत्यंत उपयोगी है।
5. कंपंन-घूर्णन स्पेक्ट्रा इंफ्रारेड (IR) क्षेत्र में प्राप्त की जाने वाली तकनीक का विस्तार से वर्णन करो।
कंपन-घूर्णन स्पेक्ट्रा (Vibrational-Rotational Spectra) IR क्षेत्र (4000–400 cm⁻¹) में मापा जाता है। इसमें अणु के कंपन और घूर्णन दोनों के परिणामस्वरूप स्पेक्ट्रा बनता है। मोनोएटमिक गैसों में केवल घूर्णन स्पेक्ट्रा होता है, लेकिन बहुअणुकीय गैसों में कंपन और घूर्णन संयुक्त रूप से स्पेक्ट्रा उत्पन्न करते हैं। यह तकनीक वातावरणीय गैसों की पहचान, अणु संरचना, बंध की ताकत और अणु में ऊर्जा स्तर का अध्ययन करने में मदद करती है।
6. घूर्णन कम्पन स्पेक्ट्रा को समझाइये।
घूर्णन-कंपन स्पेक्ट्रा में अणु एक समय में कंपन और घूर्णन करता है। यह संयुक्त स्पेक्ट्रा अणु की सटीक संरचना और बंध की लंबाई निर्धारित करने में उपयोगी है। जैसे, CO₂ या HCl जैसी गैसों में विभिन्न बंधों की कंपन और अणु की घूर्णन अवस्था अलग-अलग पिक्स उत्पन्न करती है। इससे अणु की ऊर्जा स्तरों और बंध की ताकत का अध्ययन संभव होता है। यह तकनीक उच्च-सटीक रासायनिक विश्लेषण और अणु संरचना निर्धारण के लिए महत्वपूर्ण है।
7. क्रोमोफोर व ऑक्सोक्रोम क्या है?
- क्रोमोफोर (Chromophore): यौगिक में वह समूह जो प्रकाश अवशोषण करता है और रंग उत्पन्न करता है। उदाहरण: –C=O, –N=N–।
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ऑक्सोक्रोम (Auxochrome): वह समूह जो क्रोमोफोर की रंग तीव्रता और अधिकतम अवशोषण तरंगदैर्ध्य बढ़ाता है। उदाहरण: –OH, –NH₂।
क्रोमोफोर रंग का मुख्य कारण है, जबकि ऑक्सोक्रोम इसे अधिक तीव्र और स्पष्ट बनाता है। दोनों की उपस्थिति यौगिक के रंग और अवशोषण गुणों को प्रभावित करती है।
8. एक कार्बनिक यौगिक (अणुसूत्र $C_7H_6O_2$) के अवरक्त स्पेक्ट्रा में $3500-3600 \text{ cm}^{-1}$ तथा $1710 \text{ cm}^{-1}$ पर प्रबल दो बैण्ड प्राप्त होते हैं। यौगिक की सम्भव संरचना दीजिए।
उत्तर: $C_7H_6O_2$ के IR स्पेक्ट्रा में $3500-3600 \text{ cm}^{-1}$ का शिखर –OH समूह की O–H स्ट्रेचिंग को दर्शाता है, जो आमतौर पर फेनोलिक या अल्कोहलिक समूह में देखा जाता है। वहीं $1710 \text{ cm}^{-1}$ का शिखर C=O कार्बोनिल समूह की स्ट्रेचिंग को सूचित करता है। $C_7H_6O_2$ का योगसूत्र देखते हुए और उपरोक्त स्पेक्ट्रा संकेतकों के आधार पर यौगिक संभवतः p-hydroxybenzaldehyde (पैराहाइड्रॉक्सिबेन्ज़ल्डिहाइड) हो सकता है। इसमें एक बेंज़ीन रिंग है, जिसमें पैरा स्थिति पर हाइड्रॉक्सिल (-OH) और कार्बोनिल (-CHO) समूह जुड़े होते हैं। यह संरचना IR डेटा के साथ पूरी तरह मेल खाती है और प्रबल बैंड्स का सही स्पष्टीकरण देती है।
9. ऐल्डिहाइड के तीन अवशोषण शिखर $160 \text{ nm}$, $180 \text{ nm}$ व $299 \text{ nm}$ हैं। ये किस प्रकार के संक्रमण के कारण हैं?
उत्तर: अल्डिहाइड के UV स्पेक्ट्रम में 160 nm और 180 nm शिखर σ → σ* और n → σ* संक्रमणों के कारण होते हैं। ये उच्च ऊर्जा वाले परावर्तनशील संक्रमण होते हैं। वहीं 299 nm का शिखर अपेक्षाकृत निम्न ऊर्जा वाला है और यह n → π* संक्रमण को दर्शाता है। इस प्रकार, अल्डिहाइड के इलेक्ट्रॉनिक संक्रमण में एकल बंधों (σ) और गैर-बंधी हुई युग्मक जोड़े (lone pairs, n) की भूमिका प्रमुख होती है। उच्चतम लंबी तरंगदैर्ध्य वाला शिखर (299 nm) अपेक्षाकृत कमजोर होता है क्योंकि n → π* संक्रमण कम संभाव्यता वाला (less allowed) होता है।
10. आई. आर. स्पेक्ट्रम की सहायता से $CH_3COCH_3$ एवं $CH_3CH_2OH$ में अंतर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर: $CH_3COCH_3$ (एसीटोन) में IR स्पेक्ट्रा में 1715-1725 cm⁻¹ पर प्रबल C=O स्ट्रेचिंग बैंड होता है। वहीं $CH_3CH_2OH$ (एथेनॉल) में C=O नहीं होता, बल्कि 3200-3550 cm⁻¹ पर –OH स्ट्रेचिंग दिखाई देती है। इसके अतिरिक्त, एथेनॉल में C–O स्ट्रेचिंग 1050-1150 cm⁻¹ पर होती है। इस प्रकार, IR स्पेक्ट्रम से –OH की उपस्थिति और C=O की उपस्थिति के आधार पर एसीटोन और एथेनॉल में स्पष्ट अंतर किया जा सकता है।
11. IR स्पेक्ट्रोस्कोपी के फिंगर प्रिन्ट क्षेत्र का संरचना निर्धारण में क्या उपयोग है?
उत्तर: IR स्पेक्ट्रोस्कोपी का फिंगर प्रिन्ट क्षेत्र आमतौर पर 1500–500 cm⁻¹ के बीच होता है। यह क्षेत्र विशेष यौगिकों के लिए अद्वितीय होता है, जैसे कि व्यक्ति के फिंगर प्रिन्ट। यौगिक की जटिल कंपन संरचनाएँ और अलग-अलग बंधों का समन्वय इस क्षेत्र में दिखाई देता है। इसका उपयोग यौगिक की पहचान और सत्यापन के लिए किया जाता है, खासकर जब ज्ञात संदर्भ स्पेक्ट्रा के साथ तुलना करनी हो। छोटे संरचनात्मक परिवर्तन भी इस क्षेत्र में स्पष्ट अंतर उत्पन्न करते हैं।
12. अवरक्त-लाल स्पेक्ट्रोस्कोपी में मूलभूत कंपन बैंड क्या होते हैं? $CO_2$ तथा $C_6H_6$ के लिए मूलभूत कंपनों की संख्या की गणना कीजिए।
उत्तर: मूलभूत कंपन बैंड वे कंपन होते हैं जो अणु में परमाणुओं के बीच प्राकृतिक कंपन आवृत्तियों के कारण उत्पन्न होते हैं। एक $N$ परमाणु वाले अणु में, यदि रेखीय है तो मूलभूत कंपन की संख्या 3N−5 होती है, और यदि गैर-रेखीय है तो 3N−6 होती है। $CO_2$ में $N=3$ है और यह रेखीय अणु है, इसलिए मूलभूत कंपन 3∗3−5=4 होती हैं। $C_6H_6$ (बेंज़ीन) में $N=12$ है और यह गैर-रेखीय है, इसलिए मूलभूत कंपन 3∗12−6=30 होती हैं।
13. वरण नियम (Selection rules) क्या है? यह कैसे कंपन और घूर्णी स्पेक्ट्रा पर लागू होता है?
उत्तर: वरण नियम बताता है कि किसी अणु में इलेक्ट्रॉनिक, कंपन या घूर्णी संक्रमण कब संभव है। IR स्पेक्ट्रा में, कंपन संक्रमण तब ही IR-सक्रिय होते हैं जब अणु का डाइपोल मोमेंट परिवर्तन होता है। घूर्णी स्पेक्ट्रा में, रोटेशन तभी IR या माइक्रोवेव सक्रिय होती है जब अणु का स्थायी डाइपोल मोमेंट हो। इसका मतलब यह है कि सभी कंपन या घूर्णन संभव नहीं हैं, केवल वही संक्रमण जो डाइपोल में परिवर्तन उत्पन्न करते हैं, ही अवलोकन योग्य होते हैं।
14. एसीटोन की कार्बोनिल तनन (Stretching) आवृत्ति क्या है?
उत्तर: एसीटोन ($CH_3COCH_3$) में C=O कार्बोनिल समूह की स्ट्रेचिंग आवृत्ति लगभग 1715-1725 cm⁻¹ होती है। यह अवरक्त स्पेक्ट्रम में सबसे प्रमुख और तीव्र बैंड होता है। अल्किल की उपस्थिति और इलेक्ट्रॉन देने वाले समूहों के प्रभाव से यह आवृत्ति थोड़ा ऊपर या नीचे स्थानांतरित हो सकती है, लेकिन सामान्यतया 1700 cm⁻¹ के आसपास रहती है। यह बैंड एसीटोन की पहचान में सबसे विश्वसनीय संकेत है।
उत्तर: IR स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग करके ऐसीटिक अम्ल ($CH_3COOH$) और मेथेनॉल ($CH_3OH$) के बीच स्पष्ट अंतर किया जा सकता है। ऐसीटिक अम्ल में –COOH समूह होता है, जिसमें कार्बोनिल (C=O) स्ट्रेचिंग 1700–1725 cm⁻¹ और O–H स्ट्रेचिंग 2500–3300 cm⁻¹ पर विस्तृत, ब्रॉड बैंड के रूप में दिखाई देती है। वहीं मेथेनॉल में केवल –OH समूह होता है, जिसकी O–H स्ट्रेचिंग 3200–3550 cm⁻¹ पर होती है और यह आमतौर पर शार्प या थोड़ी ब्रॉड होती है। ऐसीटिक अम्ल में C–O स्ट्रेचिंग 1210–1320 cm⁻¹ पर दिखाई देती है, जबकि मेथेनॉल में यह लगभग 1050 cm⁻¹ पर होती है। इस प्रकार, C=O बैंड की उपस्थिति और O–H की स्थिति देखकर इन दोनों यौगिकों में अंतर आसानी से निर्धारित किया जा सकता है।
16. अवरक्त स्पेक्ट्रोस्कोपी के अनुप्रयोगों का वर्णन कीजिए।
उत्तर: अवरक्त (IR) स्पेक्ट्रोस्कोपी रासायनिक विश्लेषण में बहुत महत्वपूर्ण तकनीक है। इसका प्रमुख उपयोग यौगिक की पहचान और संरचना निर्धारण में होता है। IR स्पेक्ट्रा से अणु में विभिन्न बंधों (जैसे C=O, O–H, N–H, C–H) की उपस्थिति और प्रकार पहचाना जा सकता है। इसके अलावा, यह मिश्रित यौगिकों में विशिष्ट कार्यात्मक समूहों की पुष्टि और गुणवत्ता नियंत्रण के लिए प्रयोग किया जाता है। फिंगर प्रिंट क्षेत्र के माध्यम से ज्ञात यौगिकों के साथ तुलना करके उनके पहचान की सटीकता बढ़ाई जा सकती है। औद्योगिक, जैविक और फार्मास्यूटिकल क्षेत्रों में IR स्पेक्ट्रोस्कोपी का उपयोग दवा विश्लेषण, पर्यावरणीय परीक्षण और रासायनिक अभिक्रियाओं की निगरानी में भी किया जाता है।
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