B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 4
NMR एवं द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कोपी
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिये: (i) सिग्नलों की स्थिति तथा रासायनिक विस्थापन, या नाभिकीय परिरक्षण एवं अपरिरक्षण।
उत्तर:
NMR स्पेक्ट्रोस्कोपी में किसी प्रोटॉन या नाभिक के सिग्नल की स्थिति उसके आसपास के इलेक्ट्रॉनिक वातावरण पर निर्भर करती है। जब किसी नाभिक के चारों ओर इलेक्ट्रॉन घनत्व अधिक होता है तो वह बाहरी चुंबकीय क्षेत्र से आंशिक रूप से सुरक्षित रहता है, इसे परिरक्षण (Shielding) कहते हैं। ऐसे प्रोटॉन उच्च क्षेत्र (upfield) में दिखाई देते हैं और उनका रासायनिक विस्थापन (chemical shift, δ) कम होता है।
इसके विपरीत यदि इलेक्ट्रॉन घनत्व कम हो, जैसे इलेक्ट्रॉन आकर्षित करने वाले समूहों के पास, तो नाभिक बाहरी क्षेत्र से अधिक प्रभावित होता है। इसे अपरिरक्षण (Deshielding) कहते हैं और ऐसे सिग्नल निम्न क्षेत्र (downfield) में उच्च δ मान पर दिखाई देते हैं। रासायनिक विस्थापन ppm (parts per million) में मापा जाता है और यह अणु की संरचना पहचानने में अत्यंत महत्वपूर्ण है।
(ii) सिग्नलों का विपाटन तथा स्पिन-स्पिन युग्मन।
उत्तर:
NMR में किसी प्रोटॉन का सिग्नल अक्सर एकल रेखा न होकर कई रेखाओं में विभाजित होता है, जिसे सिग्नल विपाटन (Splitting) कहते हैं। यह घटना पास-पास स्थित प्रोटॉनों के पारस्परिक चुंबकीय प्रभाव के कारण होती है जिसे स्पिन-स्पिन युग्मन (Spin-Spin Coupling) कहते हैं।
यदि किसी प्रोटॉन के पास n समतुल्य पड़ोसी प्रोटॉन हों तो उसका सिग्नल (n+1) रेखाओं में विभाजित होता है (n+1 नियम)। उदाहरण: CH₃ समूह के पास 2 प्रोटॉन हों तो सिग्नल ट्रिपलेट बनेगा। यह विपाटन अणु में प्रोटॉनों की व्यवस्था व पड़ोसी समूहों की पहचान करने में मदद करता है।
(iii) युग्मन स्थिरांक।
उत्तर:
स्पिन-स्पिन युग्मन की तीव्रता को युग्मन स्थिरांक (Coupling constant, J) द्वारा व्यक्त किया जाता है। इसे Hz (हर्ट्ज) में मापा जाता है। यह विभाजित रेखाओं के बीच की दूरी को दर्शाता है। J का मान पड़ोसी नाभिकों की दूरी, बंध प्रकार और कोण पर निर्भर करता है।
उदाहरण के लिए, vicinal प्रोटॉनों के लिए J लगभग 7 Hz होता है। युग्मन स्थिरांक संरचनात्मक जानकारी देता है और stereochemistry निर्धारित करने में सहायक होता है।
2. NMR में TMS (Tetramethylsilane) को संदर्भ यौगिक के रूप में क्यों उपयोग किया जाता है?
उत्तर:
TMS को NMR में आंतरिक संदर्भ (reference standard) के रूप में प्रयोग किया जाता है क्योंकि इसके कई लाभ हैं। इसमें 12 समतुल्य प्रोटॉन होते हैं, जिससे एक तीक्ष्ण एवं एकल सिग्नल मिलता है। यह रासायनिक रूप से निष्क्रिय है और अधिकांश कार्बनिक विलायकों में घुल जाता है।
TMS का सिग्नल स्पेक्ट्रम के अत्यधिक अपफील्ड भाग में आता है और इसे δ = 0 ppm पर परिभाषित किया गया है। इसका क्वथनांक कम होने के कारण प्रयोग के बाद आसानी से हटाया जा सकता है। इसलिए यह आदर्श मानक माना जाता है।
3. NMR स्पेक्ट्रोस्कोपी में सिग्नलों के विपाटन को नियंत्रित करने वाले नियम समझाइये।
उत्तर:
सिग्नल विपाटन मुख्यतः n+1 नियम का पालन करता है। यदि किसी प्रोटॉन के पास n समतुल्य पड़ोसी प्रोटॉन हों तो उसका सिग्नल (n+1) पीक में विभाजित होता है।
दूसरा नियम यह है कि समतुल्य प्रोटॉन एक-दूसरे को विभाजित नहीं करते। तीसरा नियम Pascal त्रिभुज के अनुसार तीव्रता अनुपात का है—डबलट (1:1), ट्रिपलेट (1:2:1), क्वार्टेट (1:3:3:1)। ये नियम संरचना निर्धारण में अत्यंत सहायक हैं।
4. PMR स्पेक्ट्रम क्या है? इसके विभिन्न अभिमुख समझाइये।
उत्तर:
PMR (Proton Magnetic Resonance) स्पेक्ट्रम प्रोटॉनों के NMR का अध्ययन है। इसमें मुख्य तीन अभिमुख होते हैं:
- सिग्नलों की स्थिति (Chemical shift)
- सिग्नल विपाटन (Splitting pattern)
-
सिग्नल क्षेत्रफल (Integration)
इन तीनों के आधार पर अणु में प्रोटॉनों की संख्या, प्रकार और उनकी स्थिति का निर्धारण किया जाता है।
5. तुल्य तथा अतुल्य प्रोटॉन क्या है? उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
जो प्रोटॉन समान रासायनिक वातावरण में हों उन्हें तुल्य (Equivalent) कहते हैं और वे एक ही सिग्नल देते हैं। जो भिन्न वातावरण में हों उन्हें अतुल्य (Non-equivalent) कहते हैं।
उदाहरण: CH₄ में सभी प्रोटॉन तुल्य हैं, इसलिए एक ही सिग्नल मिलता है। CH₃CH₂OH में तीन प्रकार के प्रोटॉन हैं—CH₃, CH₂ और OH—इसलिए तीन सिग्नल मिलते हैं।
6. δ तथा τ स्केल में संबंध बताइये।
उत्तर:
NMR में पहले τ स्केल उपयोग होता था, अब δ स्केल उपयोग होता है। दोनों का संबंध:
यदि δ = 2 ppm हो तो τ = 8 होगा। आधुनिक NMR में δ स्केल अधिक प्रचलित है।
7. शिखर क्षेत्रफल तथा प्रोटॉन की गणना उदाहरण सहित समझाइये।
उत्तर:
NMR में सिग्नल का क्षेत्रफल (integration) उस प्रकार के प्रोटॉनों की संख्या के अनुपात में होता है।
उदाहरण: CH₃CH₂OH में सिग्नल अनुपात 3:2:1 होगा। इससे अणु में प्रोटॉनों की संख्या निर्धारित की जाती है।
8. NMR स्पेक्ट्रोस्कोपी के सिद्धान्त व अनुप्रयोग लिखिये।
उत्तर:
सिद्धान्त: नाभिक बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में ऊर्जा स्तरों में विभाजित हो जाते हैं। रेडियो तरंगों द्वारा अनुनाद उत्पन्न होता है।
अनुप्रयोग:
• संरचना निर्धारण
• समावयव पहचान
• दवाओं का विश्लेषण
• जैव अणुओं का अध्ययन
9. NMR स्पेक्ट्रम के यंत्रीकरण को संक्षिप्त में समझाइये।
उत्तर:
NMR उपकरण के मुख्य भाग:
- शक्तिशाली चुंबक
- रेडियोफ्रीक्वेंसी स्रोत
- सैंपल होल्डर
- डिटेक्टर
-
कंप्यूटर रिकॉर्डिंग सिस्टम
यह सभी मिलकर स्पेक्ट्रम रिकॉर्ड करते हैं और डेटा विश्लेषण में सहायता करते हैं।
10. (अ) ¹³C-NMR क्या है? इसके सिद्धान्त एवं अनुप्रयोग लिखिए।
उत्तर:
¹³C-NMR वह तकनीक है जिसमें कार्बन-13 समस्थानिक के नाभिकीय चुम्बकीय अनुनाद का अध्ययन किया जाता है। ¹³C का स्पिन (I = 1/2) होने के कारण यह NMR सक्रिय होता है। जब ¹³C नाभिक को शक्तिशाली चुंबकीय क्षेत्र में रखा जाता है और रेडियोफ्रीक्वेंसी विकिरण दिया जाता है तो यह अनुनाद अवशोषित करता है। इससे विभिन्न कार्बन परमाणुओं के अलग-अलग रासायनिक वातावरण की पहचान होती है।
अनुप्रयोग:
• कार्बनिक यौगिकों की संरचना निर्धारण
• कार्बन कंकाल की पहचान
• समावयवों में भेद
• औषधि, पॉलिमर व जैव अणुओं का अध्ययन
(ब) ¹³C-NMR सक्रिय है जबकि ¹²C नहीं, समझाइए।
उत्तर:
NMR सक्रियता नाभिकीय स्पिन पर निर्भर करती है। ¹³C का स्पिन 1/2 है इसलिए यह चुंबकीय क्षेत्र में दो ऊर्जा स्तर बनाता है और अनुनाद दिखाता है। जबकि ¹²C का स्पिन 0 होता है, इसलिए यह चुंबकीय क्षेत्र से प्रभावित नहीं होता और NMR स्पेक्ट्रम नहीं देता।
11. निम्न यौगिकों के PMR स्पेक्ट्रम की व्याख्या कीजिए।
(1) एथिल ऐल्कोहॉल (CH₃CH₂OH)
तीन प्रकार के प्रोटॉन मिलते हैं: CH₃, CH₂ और OH।
• CH₃ → ट्रिपलेट (2 पड़ोसी H)
• CH₂ → क्वार्टेट (3 पड़ोसी H)
• OH → सिंग्लेट (आदान-प्रदान के कारण)
इंटीग्रेशन अनुपात 3:2:1।
(2) एथिल ब्रोमाइड (CH₃CH₂Br)
दो प्रकार के प्रोटॉन: CH₃ और CH₂Br।
• CH₃ → ट्रिपलेट
• CH₂Br → क्वार्टेट (Br के कारण डाउनफील्ड)
अनुपात 3:2।
(3) 1,1,2-ट्राइब्रोमोएथेन (CHBr₂CH₂Br)
दो प्रकार के प्रोटॉन:
• CH → ट्रिपलेट (2 पड़ोसी H)
• CH₂ → डबलट
इलेक्ट्रॉन आकर्षण के कारण सिग्नल डाउनफील्ड आते हैं।
(4) ऐसीटैल्डिहाइड (CH₃CHO)
दो प्रकार के प्रोटॉन:
• CH₃ → डबलट
• CHO → क्वार्टेट (अल्डिहाइड H ~9–10 ppm)
12. IR द्वारा विभेदन
(i) एथिल एल्कोहॉल व डाईएथिल ईथर
एल्कोहॉल → चौड़ा O–H स्ट्रेच (3200–3600 cm⁻¹)
ईथर → O–H अनुपस्थित, केवल C–O स्ट्रेच।
(ii) ऐसीटिक अम्ल व एथिल ऐसीटेट
अम्ल → बहुत चौड़ा O–H बैंड (2500–3300 cm⁻¹) + C=O
एस्टर → O–H अनुपस्थित, तीव्र C=O (1735 cm⁻¹)
(iii) ऐसीटैल्डिहाइड व ऐसीटोन
अल्डिहाइड → C–H स्ट्रेच 2720–2820 cm⁻¹
कीटोन → यह बैंड अनुपस्थित।
13. (अ) एसीटोफिनोन एवं टॉलुईन के PMR स्पेक्ट्रम समझाइये।
उत्तर:
एसीटोफिनोन:
• एरोमैटिक प्रोटॉन: मल्टीपलेट (7–8 ppm)
• CH₃CO: सिंग्लेट (~2.5 ppm)
टॉलुईन:
• एरोमैटिक H: मल्टीपलेट (7–7.5 ppm)
• CH₃: सिंग्लेट (~2.3 ppm)
(ब) C₉H₁₂ यौगिक की संरचना दीजिये।
उत्तर:
9H सिंग्लेट → t-butyl समूह
5H सिंग्लेट → मोनोसब्स्टीट्यूटेड बेंजीन रिंग
संरचना: tert-Butyl benzene
14. निम्न यौगिक NMR में कितने सिग्नल देंगे
(i) CH₃CHOHC₂H₅ (2-ब्यूटानॉल)
चार प्रकार के प्रोटॉन → 4 सिग्नल
(ii) ClCH₂CH₂CH₂Cl
सममिति के कारण → 2 सिग्नल
(iii) C₆H₅CH₂COOH
तीन प्रकार के प्रोटॉन →
• एरोमैटिक (1 सिग्नल)
• CH₂ (1 सिग्नल)
• COOH (1 सिग्नल)
कुल → 3 सिग्नल
15. निम्न संरचनात्मक डाटा द्वारा यौगिक की संरचना दीजिए।
(i) अणुसूत्र: C₉H₁₂, NMR: δ 6–8 और δ 2–5, दोनों सिंग्लेट, अनुपात 1:3
उत्तर:
C₉H₁₂ में असंतृप्ति सूचकांक 4 आता है, जो बेंजीन रिंग की उपस्थिति दर्शाता है। δ 6–8 ppm का सिंग्लेट एरोमैटिक प्रोटॉनों का संकेत देता है। दूसरा सिंग्लेट δ 2–5 ppm पर 3 गुना अधिक तीव्र है, जो 9 प्रोटॉनों वाले एल्किल समूह का संकेत है। यह tert-butyl समूह की विशेषता है। इसलिए संरचना tert-Butyl benzene है।
16. निम्न यौगिक ¹H-NMR में कितने सिग्नल देंगे
(i) Br-CH₂-CH₂-CH(CH₃)₂ → 4 सिग्नल
चार अलग वातावरण: CH₂Br, मध्य CH₂, CH, CH₃।
(ii) N-मेथिल एथिल एमीन → 3 सिग्नल
CH₃ (N-मेथिल), CH₂, CH₃ (एथिल)।
(iii) CH₃-CH₂-CH(Cl)-CH₃ → 4 सिग्नल
दो अलग CH₃, एक CH₂, एक CH।
(iv) HC≡C-CH₂-CH₃ → 3 सिग्नल
अल्काइन H, CH₂, CH₃।
(v) CH₃CHCl-CH₃ → 2 सिग्नल
दो CH₃ तुल्य, एक CH।
(vi) CH₃CH₂OH → 3 सिग्नल
CH₃, CH₂, OH।
(vii) टॉलुईन → 2 सिग्नल
एरोमैटिक H और CH₃।
17. PMR द्वारा p-जायलीन और मेसीटिलीन की पहचान
उत्तर:
p-जायलीन में दो CH₃ समूह और चार एरोमैटिक H होते हैं।
• CH₃ → सिंग्लेट
• एरोमैटिक → सिंग्लेट (4H)
मेसीटिलीन (1,3,5-ट्राइमेथिल बेंजीन) में तीन CH₃ (9H) और तीन एरोमैटिक H होते हैं।
• CH₃ → बड़ा सिंग्लेट (9H)
• एरोमैटिक → सिंग्लेट (3H)
इंटीग्रेशन से पहचान आसान है।
18. निम्न यौगिक ¹H-NMR में कितने सिग्नल देंगे
(i) CH₃-CCl₂-CH₃ → 1 सिग्नल
दोनों CH₃ तुल्य।
(ii) CH₃-CO-CH₂-COOH → 3 सिग्नल
CH₃, CH₂, COOH।
19. न्यूजॉल (Nujol) क्या है? IR में उपयोग क्यों?
उत्तर:
Nujol तरल पैराफिन (खनिज तेल) है। ठोस नमूनों को मल्ल (mull) बनाकर IR में उपयोग किया जाता है। यह IR क्षेत्र में कम अवशोषण करता है और नमूने को फैलाकर मापन आसान बनाता है।
20. एथिल एसीटेट के ¹H-NMR संकेत व विपाटन
उत्तर:
संरचना: CH₃COOCH₂CH₃
• COCH₃ → सिंग्लेट (3H)
• OCH₂ → क्वार्टेट (2H)
• CH₃ → ट्रिपलेट (3H)
अनुपात 3:2:3।
21. PMR सिग्नल की संख्या
(i) CH₃COOCH₂CH₃ → 3 सिग्नल
(ii) एथिल बेंजीन → 3 सिग्नल (एरोमैटिक, CH₂, CH₃)
(iii) CH₃-CH(Cl)-CH₂-OH → 4 सिग्नल
22. एरोमैटिक यौगिकों का केमिकल शिफ्ट अधिक क्यों?
उत्तर:
बेंजीन रिंग में π-इलेक्ट्रॉन बाहरी चुंबकीय क्षेत्र में घूर्णन धारा (ring current) बनाते हैं। इससे एरोमैटिक प्रोटॉन अपरिरक्षित (deshielded) हो जाते हैं और उनका सिग्नल डाउनफील्ड (δ 6–8 ppm) पर दिखाई देता है। यही कारण है कि एरोमैटिक प्रोटॉनों का केमिकल शिफ्ट अधिक होता है।
23. द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कोपी (Mass Spectroscopy) के सिद्धांत की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कोपी एक अत्यंत महत्वपूर्ण विश्लेषणात्मक तकनीक है जिसका उपयोग अणुओं के द्रव्यमान, संरचना और समस्थानिक संरचना ज्ञात करने के लिए किया जाता है। इसका मूल सिद्धांत यह है कि किसी यौगिक को पहले गैसीय अवस्था में परिवर्तित कर उसे आयनित किया जाता है, जिससे धनायन (positive ions) बनते हैं। इन आयनों को विद्युत एवं चुंबकीय क्षेत्र की सहायता से उनके द्रव्यमान-से-आवेश अनुपात (m/z) के आधार पर अलग किया जाता है।
जब आयन डिटेक्टर तक पहुँचते हैं तो उनकी तीव्रता रिकॉर्ड की जाती है और एक स्पेक्ट्रम प्राप्त होता है जिसमें x-अक्ष पर m/z और y-अक्ष पर तीव्रता होती है। स्पेक्ट्रम का सबसे तीव्र शिखर बेस पीक कहलाता है। इस तकनीक का उपयोग औषधि, पर्यावरण, जैव-अणु और फॉरेंसिक विश्लेषण में व्यापक रूप से किया जाता है।
24. आयनन (Ionization) की विभिन्न विधियों को संक्षेप में समझाइए।
उत्तर:
द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कोपी में आयनन सबसे महत्वपूर्ण चरण है क्योंकि बिना आयन बने विश्लेषण संभव नहीं होता। प्रमुख आयनन विधियाँ निम्न हैं—
- इलेक्ट्रॉन आयनन (EI): उच्च ऊर्जा इलेक्ट्रॉनों द्वारा अणु से इलेक्ट्रॉन निकालकर धनायन बनते हैं।
- रासायनिक आयनन (CI): अभिकर्मक गैस की सहायता से कोमल आयनन होता है।
- इलेक्ट्रोस्प्रे आयनन (ESI): बड़े जैव-अणुओं के लिए उपयुक्त।
-
मैट्रिक्स असिस्टेड लेजर डीसॉर्प्शन आयनन (MALDI): पॉलिमर व प्रोटीन विश्लेषण में उपयोगी।
इन विधियों का चयन नमूने के प्रकार और स्थिरता के आधार पर किया जाता है।
25. द्रव्यमान स्पेक्ट्रोस्कोपी में अणु आयन के खंडन (Fragmentation) को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
आयन बनने के बाद अणु आयन (M⁺) अक्सर अस्थिर होते हैं और छोटे-छोटे आयनों में टूट जाते हैं, जिसे खंडन (fragmentation) कहते हैं। यह प्रक्रिया विशिष्ट पैटर्न में होती है और अणु की संरचना की जानकारी देती है।
उदाहरण: अल्कोहॉल में –OH समूह के पास बंध टूटता है, जिससे विशिष्ट m/z शिखर मिलते हैं। McLafferty rearrangement भी एक महत्वपूर्ण प्रक्रिया है जिसमें हाइड्रोजन स्थानांतरण के साथ खंडन होता है। इस प्रकार खंडन पैटर्न अणु की पहचान में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
26. क्वाडुपोल द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर को विस्तारपूर्वक समझाइए।
उत्तर:
क्वाडुपोल द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर में चार समानांतर धातु छड़ें होती हैं जिन पर DC और RF वोल्टेज लगाया जाता है। यह विद्युत क्षेत्र आयनों की गति को नियंत्रित करता है। केवल वही आयन जिनका m/z उपयुक्त होता है, स्थिर पथ पर चलते हुए डिटेक्टर तक पहुँचते हैं।
इस उपकरण का लाभ यह है कि यह तेज, सटीक और कम लागत वाला होता है। गैस क्रोमैटोग्राफी के साथ इसका व्यापक उपयोग होता है।
27. क्वाडुपोल द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर से समस्थानिक प्रभाव समझाइए।
उत्तर:
समस्थानिकों के द्रव्यमान अलग होते हैं, इसलिए उनके m/z भी अलग होते हैं। उदाहरण: Cl के ³⁵Cl और ³⁷Cl समस्थानिक। क्वाडुपोल स्पेक्ट्रोमीटर इन्हें अलग-अलग शिखरों के रूप में दिखाता है।
इससे यौगिक में उपस्थित समस्थानिकों की पहचान और अनुपात ज्ञात किया जा सकता है। यह कार्बनिक यौगिकों की पुष्टि में सहायक है।
28. द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर का सिद्धांत एवं यंत्रीकरण आरेख सहित समझाइए।
उत्तर:
द्रव्यमान स्पेक्ट्रोमीटर के मुख्य भाग हैं—
- नमूना प्रवेश प्रणाली
- आयनन स्रोत
- द्रव्यमान विश्लेषक
- डिटेक्टर
- रिकॉर्डिंग प्रणाली
प्रक्रिया: नमूना → आयनन → आयन पृथक्करण → डिटेक्शन → स्पेक्ट्रम रिकॉर्ड।
यह तकनीक यौगिक की संरचना, द्रव्यमान और समस्थानिक संरचना निर्धारित करने में अत्यंत उपयोगी है।



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