B.Sc. Chemistry (C.G.)
Third Year – First Question Paper
इकाई 5
क्वाण्टम यांत्रिकी-II
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. (A) आण्विक कक्षक सिद्धांत के प्रमुख सिद्धांतों या अवधारणाओं का वर्णन कीजिए। (B) H2 की बंध वियोजन ऊर्जा H2+ से लगभग दुगुनी क्यों होती है? (C) MOT की सहायता से N2, O2 एवं F2 की संरचना और क्रियाशीलता समझाइए।
उत्तर:
आण्विक कक्षक सिद्धांत (MOT) के अनुसार परमाणु कक्षक मिलकर आण्विक कक्षक बनाते हैं जो पूरे अणु में फैले होते हैं। ये बंधनकारी (bonding) और प्रतिरोधी (antibonding) कक्षक बनाते हैं। इलेक्ट्रॉन पाउली अपवर्जन और हुंड नियम के अनुसार भरते हैं।
(B) H2 में 2 इलेक्ट्रॉन बंधनकारी कक्षक में होते हैं जबकि H2+ में केवल 1 इलेक्ट्रॉन होता है, इसलिए H2 का बंध क्रम अधिक (1) और ऊर्जा अधिक होती है, अतः इसकी बंध वियोजन ऊर्जा लगभग दुगुनी होती है।
(C) N2 का बंध क्रम 3 होने से अत्यंत स्थिर है, O2 का बंध क्रम 2 है तथा इसमें अप्रयुग्मित इलेक्ट्रॉन होने से यह पैरामैग्नेटिक है, जबकि F2 का बंध क्रम 1 होने से यह अधिक क्रियाशील है।
2. संयोजकता बंध सिद्धांत की सीमाएँ लिखिए।
उत्तर:
संयोजकता बंध सिद्धांत (VBT) सहसंयोजक बंध को समझाता है पर इसकी कुछ सीमाएँ हैं। यह ऑक्सीजन की पैरामैग्नेटिक प्रकृति नहीं समझा सकता, बंध ऊर्जा और स्पेक्ट्रा की सही भविष्यवाणी नहीं करता तथा बहु-परमाणु अणुओं की संरचना का पूर्ण विवरण नहीं दे पाता। इन सीमाओं के कारण MOT विकसित किया गया।
3. संकरण क्या है? कार्बन परमाणु का उदाहरण देकर स्पष्ट कीजिए।
उत्तर:
संकरण वह प्रक्रिया है जिसमें समान ऊर्जा वाले नए संकर कक्षक बनते हैं। कार्बन में sp³ संकरण से चार समान बंध बनते हैं जैसे मीथेन में, sp² से एथीन तथा sp से एथाइन में रैखिक संरचना बनती है। इससे अणुओं की ज्यामिति स्पष्ट होती है।
4. संयोजकता बंध विधि (VBT) तथा आण्विक कक्षक विधि (MOT) की तुलना कीजिए।
उत्तर:
VBT स्थानीय बंधों पर आधारित है जबकि MOT पूरे अणु में फैले कक्षकों पर आधारित है। MOT चुंबकीय गुण और स्पेक्ट्रा को बेहतर समझाती है जबकि VBT संरचना और ज्यामिति समझाने में सरल है।
5. परमाण्विक कक्षकों के रेखीय संयोजन (LCAO) विधि को समझाइए।
उत्तर:
LCAO में दो परमाणु कक्षक मिलकर बंधनकारी और प्रतिरोधी कक्षक बनाते हैं। समान चरण में जुड़ने से बंधनकारी और विपरीत चरण में जुड़ने से प्रतिरोधी कक्षक बनते हैं। यह MOT का आधार है।
6. (A) आण्विक कक्षक बनने की शर्तें लिखिए। (B) संकर आर्बिटल बनने के नियम बताइए।
उत्तर:
(A) समान ऊर्जा, उचित सममिति और अधिक ओवरलैप आवश्यक है।
(B) संकर कक्षक समान ऊर्जा, निश्चित ज्यामिति और अधिक स्थिर बंध बनाते हैं।
7. परमाण्विक तथा आण्विक कक्षकों में अंतर स्पष्ट कीजिए। (100+ शब्द)
परमाण्विक कक्षक (Atomic Orbitals, AO) वे क्षेत्र होते हैं जहाँ किसी एक परमाणु के चारों ओर इलेक्ट्रॉन मिलने की अधिकतम संभावना होती है, जबकि आण्विक कक्षक (Molecular Orbitals, MO) पूरे अणु में फैले होते हैं और दो या अधिक परमाणुओं के संयुक्त प्रभाव से बनते हैं। परमाण्विक कक्षक केवल एक नाभिक से जुड़े होते हैं, जैसे 1s, 2p आदि, जबकि आण्विक कक्षक पूरे अणु के लिए सामान्य होते हैं और सभी नाभिकों को प्रभावित करते हैं। AO की ऊर्जा केवल एक परमाणु पर निर्भर करती है, जबकि MO की ऊर्जा अणु की स्थिरता पर निर्भर करती है। AO स्थानीय (localized) होते हैं जबकि MO विस्थापित (delocalized) होते हैं। आण्विक कक्षक सिद्धान्त के अनुसार इलेक्ट्रॉन किसी एक परमाणु के नहीं बल्कि पूरे अणु के होते हैं। यही कारण है कि MO सिद्धान्त रासायनिक बंधन और अणुओं की स्थिरता को अधिक सही ढंग से समझाता है।
8. आबन्धी (Bonding) एवं विपरीत बन्धी (Anti-bonding) आण्विक कक्षकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (100+ शब्द)
जब दो परमाण्विक कक्षक आपस में संयोजित होते हैं, तब दो प्रकार के आण्विक कक्षक बनते हैं — आबन्धी (Bonding) और विपरीत बन्धी (Anti-bonding)। आबन्धी कक्षक समान फेज (same sign) के संयोजन से बनते हैं। इसमें नाभिकों के बीच इलेक्ट्रॉन घनत्व बढ़ जाता है जिससे आकर्षण बल बढ़ता है और अणु स्थिर बनता है। इनकी ऊर्जा मूल कक्षकों से कम होती है। दूसरी ओर विपरीत बन्धी कक्षक विपरीत फेज के संयोजन से बनते हैं। इसमें नाभिकों के बीच इलेक्ट्रॉन घनत्व घटता है और नाभिकों के बीच प्रतिकर्षण बढ़ता है, जिससे अणु अस्थिर होता है। इनकी ऊर्जा अधिक होती है। आबन्धी कक्षक को σ या π से तथा विपरीत बन्धी को σ* या π* से दर्शाया जाता है। अणु की स्थिरता इस बात पर निर्भर करती है कि कितने इलेक्ट्रॉन आबन्धी और कितने विपरीत बन्धी कक्षकों में उपस्थित हैं।
9(A). LCAO विधि से H2+ का बनना समझाइए। (100+ शब्द)
LCAO (Linear Combination of Atomic Orbitals) विधि के अनुसार जब दो हाइड्रोजन परमाणु पास आते हैं, तो उनके 1s परमाण्विक कक्षक मिलकर दो नए आण्विक कक्षक बनाते हैं। एक इलेक्ट्रॉन वाले H2+ आयन में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है।
दो 1s कक्षक जुड़कर बनाते हैं:
- आबन्धी कक्षक (σ1s)
- विपरीत बन्धी कक्षक (σ1s*)
क्योंकि आयन में केवल एक इलेक्ट्रॉन होता है, वह कम ऊर्जा वाले आबन्धी कक्षक में जाता है। इससे नाभिकों के बीच आकर्षण बढ़ता है और बंध बन जाता है।
बंध क्रम (Bond order) = (Nb − Na)/2
= (1 − 0)/2 = 0.5
इसलिए H2+ एक कमजोर लेकिन स्थिर बंध वाला अणु आयन है।
9(B). H2+ का MO ऊर्जा स्तर चित्र (वर्णन)। (100+ शब्द)
ऊर्जा स्तर चित्र में दो हाइड्रोजन के 1s कक्षक समान ऊर्जा पर होते हैं। इनके संयोजन से दो MO बनते हैं:
ऊपर — σ1s* (Anti-bonding)
नीचे — σ1s (Bonding)
केवल एक इलेक्ट्रॉन नीचे वाले σ1s में भरता है। इसलिए अणु स्थिर होता है। इस चित्र से स्पष्ट होता है कि कम ऊर्जा वाले कक्षक में इलेक्ट्रॉन जाने से अणु बनता है।
10. इलेक्ट्रॉन घनत्व आरेख से Bonding एवं Anti-bonding कक्षक समझाइए। (100+ शब्द)
Bonding कक्षक में इलेक्ट्रॉन घनत्व नाभिकों के बीच अधिक होता है। इसे electron density map में बीच में गहरे क्षेत्र के रूप में दिखाया जाता है। यह नाभिकों को पास खींचता है और बंध बनाता है। Anti-bonding कक्षक में बीच में node (शून्य घनत्व क्षेत्र) होता है। यहाँ इलेक्ट्रॉन नहीं मिलते और नाभिक दूर धकेलते हैं। यही कारण है कि anti-bonding कक्षक अणु को अस्थिर करते हैं।
11. विभिन्न परमाण्विक कक्षकों के संयोग से बनने वाले MO को समझाइए। (100+ शब्द)
s-s संयोजन से σ कक्षक बनते हैं।
s-p संयोजन से भी σ कक्षक बन सकते हैं यदि अक्षीय दिशा में overlap हो।
p-p संयोजन दो प्रकार से होता है:
- अक्षीय overlap → σ कक्षक
- पार्श्व overlap → π कक्षक
हर स्थिति में एक bonding और एक anti-bonding कक्षक बनता है। σ कक्षक अक्ष के साथ सममित होते हैं जबकि π कक्षक में अक्ष के दोनों ओर इलेक्ट्रॉन घनत्व होता है। यह सिद्धान्त बताता है कि अणुओं के विभिन्न प्रकार के बंध कैसे बनते हैं और उनकी मजबूती किस पर निर्भर करती है।
12. $\sigma$, $\sigma^{}$ एवं $\pi$, $\pi^{}$ आण्विक कक्षक कैसे बनते हैं? इनके अभिलक्षण लिखिए। (100+ शब्द)
जब दो परमाण्विक कक्षक आपस में संयोजित होते हैं तो दो प्रकार के आण्विक कक्षक बनते हैं — आबन्धी (Bonding) और प्रतिबन्धी (Anti-bonding)। यदि संयोजन समान फेज (same sign) में होता है तो आबन्धी कक्षक बनते हैं और विपरीत फेज में संयोजन से प्रतिबन्धी कक्षक बनते हैं।
σ (सिग्मा) कक्षक अक्षीय (head-on) overlap से बनते हैं जैसे s-s, s-p या p-p overlap।
σ* उसी का anti-bonding रूप है जिसमें नाभिकों के बीच node बनता है।
π (पाई) कक्षक पार्श्व (sidewise) overlap से बनते हैं, जैसे p-p overlap।
π* इसका anti-bonding रूप है जिसमें बीच में nodal plane होता है।
अभिलक्षण: σ कक्षक अधिक मजबूत होते हैं, π कक्षक अपेक्षाकृत कमजोर। Bonding कक्षक की ऊर्जा कम और Anti-bonding की ऊर्जा अधिक होती है।
13(A). σ एवं π आण्विक कक्षकों में अन्तर स्पष्ट कीजिए। (100+ शब्द)
σ कक्षक अक्ष के साथ head-on overlap से बनते हैं जबकि π कक्षक sidewise overlap से बनते हैं। σ कक्षक में इलेक्ट्रॉन घनत्व नाभिकों के बीच सीधा स्थित होता है, इसलिए ये अधिक मजबूत बंध बनाते हैं। π कक्षक में इलेक्ट्रॉन घनत्व अक्ष के ऊपर-नीचे स्थित होता है, इसलिए ये कमजोर होते हैं। σ कक्षक में घूर्णन (rotation) संभव है लेकिन π बंध में घूर्णन बाधित होता है।
13(B). σ तथा π बंध उदाहरण सहित।
H₂ में σ बंध (s-s overlap) होता है।
Ethene में एक σ (C–C) और एक π (C=C) बंध होता है।
13(C). σ और π कक्षकों में विभेद
σ → मजबूत, अक्षीय, स्वतंत्र घूर्णन
π → कमजोर, पार्श्व, घूर्णन नहीं
14. $sp$ संकरित कक्षक के गुणांकों की गणना। (100+ शब्द)
sp संकरण में एक s और एक p कक्षक मिलते हैं।
मान लें:
Normalization शर्त:
sp संकरण में दोनों का योगदान समान होता है, इसलिए
इस प्रकार sp संकरित कक्षक = 50% s + 50% p चरित्र।
यह रैखिक (linear) संरचना बनाता है और बंध कोण 180° होता है (जैसे BeCl₂)।
15(A). $sp^{2}$ संकरण में गुणांक की गणना। (100+ शब्द)
sp² में 1s + 2p कक्षक मिलते हैं।
Normalization:
हल करने पर
अर्थात 33% s और 67% p चरित्र।
त्रिकोणीय समतलीय संरचना और 120° बंध कोण (जैसे BF₃)।
15(B). $sp^{3}$ में गुणांक तुलना
sp³ में 1s + 3p मिलते हैं।
25% s और 75% p चरित्र।
चतुष्फलकीय संरचना (109.5°), जैसे CH₄।
16(A). VBT में योगदान देने वाले वैज्ञानिक। (100+ शब्द)
संयोजकता बंध सिद्धान्त के विकास में प्रमुख वैज्ञानिक हैं:
Heitler और London (1927), Slater और Pauling। Pauling ने संकरण की अवधारणा दी और VBT को लोकप्रिय बनाया।
16(B). VBT के प्रमुख अभिगृहित
• बंध कक्षकों के overlap से बनता है
• विपरीत स्पिन इलेक्ट्रॉन बंध बनाते हैं
• अधिक overlap → मजबूत बंध
• दिशा और संकरण महत्वपूर्ण
16(C). VBT से $H_{2}$ का बनना
दो H परमाणु पास आते हैं। दोनों के 1s कक्षक overlap करते हैं। विपरीत स्पिन वाले इलेक्ट्रॉन साझा होकर σ बंध बनाते हैं। इससे ऊर्जा घटती है और स्थिर H₂ अणु बनता है।
17. तरंग फलनों से ऊर्जा स्तरों का परिकलन आप कैसे करेंगे? स्पष्ट कीजिए। (100+ शब्द)
क्वाण्टम यांत्रिकी के अनुसार किसी कण की ऊर्जा ज्ञात करने के लिए श्रोडिन्जर तरंग समीकरण का उपयोग किया जाता है। सामान्य रूप से समय-स्वतंत्र समीकरण इस प्रकार लिखा जाता है:
यहाँ H^ हैमिल्टोनियन ऑपरेटर है, ψ तरंग फलन तथा E ऊर्जा है। किसी भौतिक प्रणाली के लिए पहले हैमिल्टोनियन ऑपरेटर निर्धारित किया जाता है जिसमें गतिज तथा स्थितिज ऊर्जा पद शामिल होते हैं। इसके बाद उपयुक्त सीमा शर्तों (boundary conditions) के साथ समीकरण का हल किया जाता है। जो हल मिलते हैं वे केवल कुछ विशिष्ट ऊर्जा मानों के लिए संभव होते हैं, जिन्हें क्वाण्टित ऊर्जा स्तर कहा जाता है।
तरंग फलन का वर्ग ψ2 कण के मिलने की प्रायिकता देता है, इसलिए केवल वे हल स्वीकार्य होते हैं जो सीमित, एकमान (single valued) और निरंतर हों। इस प्रकार श्रोडिन्जर समीकरण के स्वीकृत हलों से ऊर्जा स्तरों की गणना की जाती है।
18. हुकल का आण्विक कक्षक सिद्धांत पर टिप्पणी लिखिए। (100+ शब्द)
हुकल का आण्विक कक्षक सिद्धांत (Hückel Molecular Orbital Theory – HMO) विशेष रूप से समतलीय संयुग्मित (conjugated) एवं एरोमैटिक यौगिकों के π-इलेक्ट्रॉनों के अध्ययन के लिए विकसित किया गया है। इसमें केवल π-इलेक्ट्रॉनों को ध्यान में रखा जाता है और σ-ढाँचे को स्थिर माना जाता है। इस सिद्धांत के मुख्य अनुमानों में शामिल है कि π-इलेक्ट्रॉन p-कक्षकों में स्थित होते हैं तथा केवल निकटतम पड़ोसी परमाणुओं के साथ ही अंतःक्रिया करते हैं।
हुकल सिद्धांत में दो महत्वपूर्ण पैरामीटर उपयोग होते हैं — α (कूलॉम्ब समाकलन) और β (रेजोनेंस समाकलन)। इनकी सहायता से मैट्रिक्स समीकरण बनाकर ऊर्जा स्तरों और आण्विक कक्षकों का निर्धारण किया जाता है। यह सिद्धांत एरोमैटिसिटी की व्याख्या, स्थिरता का आकलन तथा इलेक्ट्रॉन वितरण समझाने में अत्यंत उपयोगी है।
19. हुकल सिद्धांत से एथीन के π-आण्विक कक्षक तरंग फलन एवं ऊर्जा स्तर प्राप्त कीजिए। (100+ शब्द)
एथीन (C2H4) में दो कार्बन परमाणुओं के p-कक्षक मिलकर π-आण्विक कक्षक बनाते हैं। हुकल समीकरण लिखने पर डिटरमिनेंट मिलता है:
हल करने पर:
अतः दो ऊर्जा स्तर प्राप्त होते हैं:
• E1=α+β → आबन्धी π कक्षक
• E2=α−β → प्रतिबन्धी π* कक्षक
तरंग फलन:
दो π-इलेक्ट्रॉन निचले (bonding) कक्षक में भरते हैं, जिससे C=C डबल बंध बनता है और अणु स्थिर होता है।


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