B.Sc. Zoology (C.G.) Third Year – UNIT 1, Second Question Paper Long & Short Answer Questions

                     


                                                             B.Sc. ZOOLOGY  (C.G.)

Third Year – Second Question Paper


बी.एससी. (सी.जी.)
तृतीय वर्ष 

इकाई 1

सूक्ष्मजैविकी एवं परजीवी विज्ञान
Microbiology and Parasitology

दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न


1. बैक्टीरिया पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
बैक्टीरिया (Bacteria) सूक्ष्म, एककोशिकीय जीव होते हैं जिन्हें नंगी आँखों से नहीं देखा जा सकता। ये पृथ्वी पर लगभग हर स्थान पर पाए जाते हैं—मिट्टी, पानी, हवा, भोजन और यहाँ तक कि मानव शरीर के अंदर भी। इनका आकार सामान्यतः गोल (coccus), दंडाकार (bacillus) या सर्पिल (spirillum) होता है। बैक्टीरिया की कोशिका संरचना सरल होती है क्योंकि इनमें स्पष्ट केंद्रक (nucleus) नहीं होता, इसलिए इन्हें प्रोकैरियोटिक जीव कहा जाता है।
कुछ बैक्टीरिया लाभदायक होते हैं, जैसे दही बनाना, नाइट्रोजन स्थिरीकरण और पाचन में मदद करना। वहीं कुछ हानिकारक बैक्टीरिया रोग उत्पन्न करते हैं। बैक्टीरिया तीव्र गति से द्विखंडन (binary fission) द्वारा प्रजनन करते हैं, जिससे इनकी संख्या बहुत जल्दी बढ़ती है। चिकित्सा क्षेत्र में एंटीबायोटिक दवाओं का उपयोग बैक्टीरिया से होने वाले संक्रमण को रोकने के लिए किया जाता है।


2. जीवाणुओं (Bacteria) से मनुष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में विस्तार से लिखिए।
उत्तर:
मनुष्य में कई गंभीर बीमारियाँ जीवाणुओं के कारण होती हैं। ये बैक्टीरिया शरीर में प्रवेश कर विषैले पदार्थ (toxins) उत्पन्न करते हैं, जिससे शरीर के ऊतकों को नुकसान होता है। तपेदिक (टीबी) एक प्रमुख जीवाणु रोग है जो फेफड़ों को प्रभावित करता है और खाँसी, बुखार व कमजोरी का कारण बनता है। टाइफाइड दूषित भोजन और पानी से फैलता है तथा तेज बुखार, पेट दर्द और कमजोरी उत्पन्न करता है।
हैजा भी बैक्टीरिया से होने वाली बीमारी है जो दूषित जल से फैलती है और तीव्र दस्त व निर्जलीकरण का कारण बनती है। प्लेग, निमोनिया और डिप्थीरिया भी जीवाणुजनित रोग हैं। इन रोगों से बचाव के लिए स्वच्छता, टीकाकरण, सुरक्षित पानी और संतुलित आहार बहुत जरूरी है। समय पर एंटीबायोटिक उपचार से अधिकांश बैक्टीरियल रोगों का इलाज संभव है।


3. विषाणु (Virus) क्या है? विषाणु की संरचना पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
विषाणु (Virus) अत्यंत सूक्ष्म संक्रामक कण होते हैं जो जीवित और निर्जीव के बीच की कड़ी माने जाते हैं। ये केवल जीवित कोशिका के अंदर ही बढ़ और गुणा कर सकते हैं, इसलिए इन्हें अनिवार्य परजीवी कहा जाता है। वायरस की संरचना बहुत सरल होती है। इसमें मुख्यतः दो भाग होते हैं—आनुवंशिक पदार्थ (DNA या RNA) और प्रोटीन आवरण (capsid)। कुछ वायरस में बाहरी लिपिड आवरण भी होता है जिसे एनवेलप कहते हैं।
वायरस स्वयं ऊर्जा उत्पन्न नहीं कर सकते, इसलिए ये मेजबान कोशिका की मशीनरी का उपयोग कर अपनी प्रतिकृति बनाते हैं। आकार और आकृति में ये गोल, दंडाकार या जटिल हो सकते हैं। वायरस अत्यंत तेजी से फैलते हैं और कई गंभीर बीमारियों के लिए जिम्मेदार होते हैं।


4. विषाणुओं द्वारा मनुष्य में होने वाली बीमारियों के बारे में एक लेख लिखिए।
उत्तर:
विषाणुजनित रोग मानव स्वास्थ्य के लिए गंभीर चुनौती हैं क्योंकि ये तेजी से फैलते हैं और कई बार घातक भी हो सकते हैं। सामान्य सर्दी-जुकाम, फ्लू, खसरा, चिकनपॉक्स और डेंगू वायरस से होने वाली बीमारियाँ हैं। एड्स एक गंभीर विषाणुजनित रोग है जो प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर देता है। कोविड-19 भी वायरस से होने वाली महामारी का उदाहरण है।
वायरस शरीर में प्रवेश कर कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं और उनकी कार्यप्रणाली को प्रभावित करते हैं। कई वायरस हवा, पानी, भोजन, रक्त या मच्छरों के माध्यम से फैलते हैं। टीकाकरण वायरस से बचाव का सबसे प्रभावी तरीका है। साफ-सफाई, मास्क का उपयोग और संक्रमित व्यक्ति से दूरी बनाए रखना भी महत्वपूर्ण है।


5. रोगजनक प्रोटोजोआ (Pathogenic Protozoa) पर एक लेख लिखिए।
उत्तर:
प्रोटोजोआ एककोशिकीय यूकैरियोटिक जीव हैं जो जल और नम स्थानों में पाए जाते हैं। कुछ प्रोटोजोआ मानव शरीर में रोग उत्पन्न करते हैं, इसलिए इन्हें रोगजनक प्रोटोजोआ कहा जाता है। ये आमतौर पर दूषित पानी, भोजन या कीट वाहकों के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं।
मलेरिया, अमीबायसिस और लीशमैनियासिस प्रमुख प्रोटोजोआ जनित रोग हैं। मलेरिया मच्छरों के माध्यम से फैलता है और तेज बुखार व ठंड लगने का कारण बनता है। अमीबा आंतों को प्रभावित कर पेचिश उत्पन्न करता है। रोगजनक प्रोटोजोआ शरीर की कोशिकाओं को नष्ट कर रोग पैदा करते हैं। साफ पानी पीना, स्वच्छता बनाए रखना और मच्छर नियंत्रण इन रोगों से बचाव के महत्वपूर्ण उपाय हैं।


6. ट्रिपैनोसोमा (Trypanosoma) के जीवन-चक्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ट्रिपैनोसोमा एक परजीवी प्रोटोजोआ है जो स्लीपिंग सिकनेस नामक रोग का कारण बनता है। इसका जीवन-चक्र दो मेजबानों—मनुष्य और त्से-त्से मक्खी—में पूरा होता है। जब संक्रमित मक्खी मनुष्य को काटती है, तब परजीवी रक्त में प्रवेश कर जाता है और तेजी से बढ़ता है। यह रक्त और लसीका तंत्र में फैलकर अंततः मस्तिष्क को प्रभावित करता है।
जब त्से-त्से मक्खी संक्रमित व्यक्ति का रक्त चूसती है, तो परजीवी मक्खी के शरीर में प्रवेश कर विकसित होते हैं और फिर लार ग्रंथियों तक पहुँच जाते हैं। अगली बार मक्खी किसी स्वस्थ व्यक्ति को काटती है, तो संक्रमण फैल जाता है। इस प्रकार ट्रिपैनोसोमा का जीवन-चक्र निरंतर चलता रहता है। नियंत्रण के लिए मक्खियों का नियंत्रण और समय पर उपचार आवश्यक है।


7. निमैटोड्स (Nematodes) द्वारा मनुष्य में होने वाली बीमारियों का संक्षेप में वर्णन कीजिए।
उत्तर:
निमैटोड्स गोल कृमि (roundworms) होते हैं जो मानव शरीर में परजीवी के रूप में रहकर अनेक बीमारियाँ उत्पन्न करते हैं। ये आमतौर पर दूषित भोजन, पानी, मिट्टी या त्वचा के संपर्क से शरीर में प्रवेश करते हैं। प्रमुख निमैटोड रोगों में एस्केरियासिस (Ascaris), हुकवर्म संक्रमण, पिनवर्म और फाइलेरिया शामिल हैं।
एस्केरियासिस में पेट दर्द, कुपोषण और आंतों में रुकावट हो सकती है। हुकवर्म त्वचा के माध्यम से प्रवेश कर रक्त की कमी और कमजोरी उत्पन्न करते हैं। पिनवर्म बच्चों में गुदा के आसपास खुजली पैदा करते हैं। निमैटोड संक्रमण से बचाव के लिए स्वच्छता, साफ पानी और नियमित कृमिनाशक दवाओं का सेवन आवश्यक है।


8. ब्लड फ्लूक (सिस्टोसोमा) की संरचना तथा जीवन चक्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
ब्लड फ्लूक जिसे सिस्टोसोमा कहा जाता है, एक चपटा परजीवी कृमि है जो मनुष्य की रक्त वाहिकाओं में रहता है और सिस्टोसोमियासिस रोग उत्पन्न करता है। इसका शरीर लंबा और चपटा होता है तथा इसमें मुख और उदर चूषक (suckers) होते हैं जो इसे रक्त वाहिकाओं से चिपकने में मदद करते हैं।
इसका जीवन चक्र दो मेजबानों—मनुष्य और घोंघा—में पूरा होता है। संक्रमित व्यक्ति के मल या मूत्र के माध्यम से अंडे पानी में पहुँचते हैं और उनसे लार्वा निकलकर घोंघे में प्रवेश करते हैं। घोंघे में विकसित होकर ये पुनः पानी में निकलते हैं और त्वचा के माध्यम से मनुष्य के शरीर में प्रवेश कर रक्त में पहुँच जाते हैं। साफ पानी और स्वच्छता से इस रोग की रोकथाम संभव है।


9. फाइलेरिया रोग क्या है? इसके परजीवी और वाहक के जीवन चक्र को समझाइए तथा इसे कैसे उपचारित किया जा सकता है, विस्तृत वर्णन कीजिए।
उत्तर:
फाइलेरिया एक परजीवी रोग है जिसे हाथीपाँव (Elephantiasis) भी कहा जाता है। यह सूक्ष्म धागेनुमा कृमियों (Wuchereria bancrofti) के कारण होता है और मच्छर इसके वाहक होते हैं। संक्रमित मच्छर जब मनुष्य को काटता है, तब लार्वा शरीर में प्रवेश कर लसीका तंत्र में पहुँचते हैं और वहीं विकसित होकर वयस्क कृमि बन जाते हैं।
ये कृमि लसीका वाहिकाओं को अवरुद्ध कर देते हैं जिससे सूजन और अंगों का असामान्य बढ़ना होता है। उपचार के लिए डायएथाइलकार्बामाज़ीन (DEC) और अन्य एंटी-पैरासाइटिक दवाओं का उपयोग किया जाता है। मच्छर नियंत्रण, स्वच्छता और नियमित दवा सेवन से इस रोग को रोका जा सकता है।


10. अमीबा की संरचना, जीवन चक्र, रोगजनकता तथा रोकथाम की व्याख्या कीजिए।
उत्तर:
अमीबा एक एककोशिकीय प्रोटोजोआ है जो पेचिश (Amoebiasis) रोग उत्पन्न करता है। इसकी संरचना अनियमित होती है और यह स्यूडोपोडिया (false feet) की सहायता से गति करता है। अमीबा के जीवन चक्र में दो अवस्थाएँ होती हैं—ट्रॉफोजोइट और सिस्ट।
संक्रमित भोजन या पानी से सिस्ट शरीर में प्रवेश करते हैं और आंतों में ट्रॉफोजोइट में बदल जाते हैं। ये आंतों की दीवार को नुकसान पहुँचाकर दस्त और पेट दर्द उत्पन्न करते हैं। रोकथाम के लिए साफ पानी पीना, हाथ धोना और भोजन को ढककर रखना आवश्यक है।


11. एस्करिस (Ascaris) का जीवन चक्र, रोगजनकता एवं उपचार का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
एस्करिस एक बड़ा गोल कृमि है जो मानव आंतों में रहता है और एस्केरियासिस रोग उत्पन्न करता है। इसके अंडे दूषित भोजन और पानी के माध्यम से शरीर में प्रवेश करते हैं। अंडों से निकले लार्वा आंतों से होकर रक्त और फेफड़ों तक पहुँचते हैं, फिर पुनः आंतों में लौटकर वयस्क बन जाते हैं।
संक्रमण से पेट दर्द, उल्टी, कुपोषण और आंतों में रुकावट हो सकती है। उपचार के लिए एल्बेंडाजोल और मेबेंडाजोल जैसी कृमिनाशक दवाएँ दी जाती हैं। स्वच्छता और साफ भोजन इस रोग की रोकथाम के लिए आवश्यक हैं।


12. मलेरिया और फाइलेरिया का तुलनात्मक वर्णन कीजिए।
उत्तर:
मलेरिया और फाइलेरिया दोनों मच्छरों द्वारा फैलने वाले परजीवी रोग हैं, लेकिन इनके कारण और प्रभाव अलग होते हैं। मलेरिया प्लास्मोडियम परजीवी से होता है जो लाल रक्त कोशिकाओं को प्रभावित करता है और तेज बुखार, ठंड और कमजोरी उत्पन्न करता है। दूसरी ओर, फाइलेरिया धागेनुमा कृमियों के कारण होता है जो लसीका तंत्र को प्रभावित कर सूजन और हाथीपाँव जैसी स्थिति पैदा करते हैं।
मलेरिया का उपचार एंटी-मलेरियल दवाओं से किया जाता है, जबकि फाइलेरिया के लिए एंटी-पैरासाइटिक दवाओं का उपयोग होता है। दोनों रोगों से बचाव के लिए मच्छर नियंत्रण, मच्छरदानी का उपयोग और स्वच्छता अत्यंत महत्वपूर्ण है।

13. एड्स (AIDS) क्या है? इसके लक्षण, फैलने के तरीके एवं रोकथाम के उपायों को समझाइये।
उत्तर:
एड्स (Acquired Immuno Deficiency Syndrome) एक गंभीर विषाणुजनित रोग है जो मानव प्रतिरक्षा तंत्र को कमजोर कर देता है। यह रोग HIV वायरस के कारण होता है, जो शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को धीरे-धीरे नष्ट करता है। इसके प्रमुख लक्षणों में लंबे समय तक बुखार, वजन कम होना, कमजोरी, बार-बार संक्रमण, त्वचा रोग और लिम्फ नोड्स की सूजन शामिल हैं।
यह रोग असुरक्षित यौन संबंध, संक्रमित रक्त चढ़ाने, संक्रमित सुई या सिरिंज के उपयोग तथा संक्रमित माँ से शिशु में फैल सकता है। एड्स का पूर्ण इलाज अभी उपलब्ध नहीं है, लेकिन एंटीरेट्रोवायरल थेरेपी (ART) से रोग को नियंत्रित किया जा सकता है। रोकथाम के लिए सुरक्षित यौन व्यवहार, रक्त की जांच, एक बार उपयोग होने वाली सुई का प्रयोग और जागरूकता अत्यंत आवश्यक है।


14. टाइफाइड पर लेख लिखिए।
उत्तर:
टाइफाइड एक जीवाणुजनित रोग है जो Salmonella typhi बैक्टीरिया के कारण होता है। यह रोग दूषित भोजन और पानी के माध्यम से फैलता है, इसलिए इसे जलजनित रोग भी कहा जाता है। टाइफाइड के प्रमुख लक्षणों में लगातार तेज बुखार, सिरदर्द, पेट दर्द, भूख कम लगना, कब्ज या दस्त और कमजोरी शामिल हैं।
यदि समय पर उपचार न मिले तो यह गंभीर जटिलताएँ उत्पन्न कर सकता है। इसका निदान रक्त जांच से किया जाता है और उपचार के लिए एंटीबायोटिक दवाएँ दी जाती हैं। रोकथाम के लिए साफ पानी पीना, भोजन को ढककर रखना, हाथ धोना और टीकाकरण करना आवश्यक है। स्वच्छता और स्वास्थ्य शिक्षा इस रोग को नियंत्रित करने के महत्वपूर्ण उपाय हैं।


15. प्लाज्मोडियम (Plasmodium) के जीवन चक्र को समझाइये।
उत्तर:
प्लाज्मोडियम एक परजीवी प्रोटोजोआ है जो मलेरिया रोग का कारण बनता है। इसका जीवन चक्र दो मेजबानों—मनुष्य और मादा एनोफिलीज मच्छर—में पूरा होता है। जब संक्रमित मच्छर मनुष्य को काटता है, तब स्पोरोजोइट रक्त में प्रवेश कर यकृत (लिवर) की कोशिकाओं में पहुँच जाते हैं। वहाँ वे वृद्धि कर मेरोजोइट बनाते हैं जो लाल रक्त कोशिकाओं को संक्रमित करते हैं।
लाल रक्त कोशिकाओं के टूटने से मलेरिया के लक्षण जैसे बुखार और ठंड लगना उत्पन्न होते हैं। कुछ परजीवी गैमेटोसाइट बन जाते हैं, जिन्हें मच्छर रक्त के साथ ग्रहण करता है और उसके शरीर में यौन प्रजनन होता है। इस प्रकार जीवन चक्र पूरा होता है।


16. लीशमेनियासिस क्या है? इस रोग के कारक या पैथोजन का जीवन चक्र का वर्णन कीजिए।
उत्तर:
लीशमेनियासिस एक परजीवी रोग है जो Leishmania प्रोटोजोआ के कारण होता है। यह रोग सैंडफ्लाई नामक कीट के काटने से फैलता है। जब संक्रमित सैंडफ्लाई मनुष्य को काटती है, तो परजीवी त्वचा में प्रवेश कर कोशिकाओं में बढ़ने लगता है।
परजीवी दो अवस्थाओं—प्रोमास्टिगोट और अमास्टिगोट—में पाया जाता है। सैंडफ्लाई में प्रोमास्टिगोट अवस्था होती है, जबकि मनुष्य के शरीर में अमास्टिगोट अवस्था विकसित होती है। यह त्वचा, श्लेष्म झिल्ली और आंतरिक अंगों को प्रभावित कर सकता है। नियंत्रण के लिए कीट नियंत्रण और समय पर उपचार आवश्यक है।


17. टेनियासिस रोग को उसके जीवन चक्र सहित समझाइए।
उत्तर:
टेनियासिस एक परजीवी रोग है जो टेपवर्म (Taenia) के कारण होता है। यह रोग अधपका या संक्रमित मांस खाने से फैलता है। इसके प्रमुख प्रकार Taenia solium और Taenia saginata हैं।
जीवन चक्र में मनुष्य अंतिम मेजबान होता है, जबकि सूअर या गाय मध्यवर्ती मेजबान होते हैं। संक्रमित मांस खाने पर लार्वा आंतों में पहुँचकर वयस्क कृमि बन जाते हैं। ये अंडे उत्पन्न करते हैं जो मल के माध्यम से बाहर निकलते हैं और पशुओं में पहुँचकर पुनः लार्वा बनते हैं। संक्रमण से पेट दर्द, कमजोरी और पाचन समस्याएँ हो सकती हैं। अच्छी तरह पका हुआ मांस खाना और स्वच्छता इस रोग की रोकथाम के लिए आवश्यक है।


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