B.Sc. ZOOLOGY (C.G.)
Third Year – Second Question Paper
इकाई 3
Aquaculture
दीर्घ एवं लघु उत्तरीय प्रश्न
1. प्रश्न: जल संवर्धन की परिभाषा, इतिहास और भारतीय पारंपरिक ज्ञान पर प्रकाश डालिये।
उत्तर:
जल संवर्धन (Aquaculture) वह प्रक्रिया है जिसमें मनुष्य द्वारा नियंत्रित परिस्थितियों में जलीय जीवों जैसे मछलियाँ, झींगा, शैवाल आदि का पालन-पोषण और उत्पादन किया जाता है। इसका उद्देश्य भोजन, रोजगार और आर्थिक लाभ प्राप्त करना है। जल संवर्धन का इतिहास बहुत प्राचीन है। लगभग 4000 वर्ष पहले चीन में मछली पालन की शुरुआत हुई थी। भारत में भी प्राचीन काल से तालाबों, कुओं और जलाशयों में मछली पालन किया जाता रहा है। भारतीय पारंपरिक ज्ञान में “तालाब संस्कृति” बहुत प्रसिद्ध रही है, जहाँ वर्षा जल संग्रह करके उसमें मछलियाँ पाली जाती थीं। ग्रामीण क्षेत्रों में मंदिर तालाब, बावड़ी और पोखर जल संवर्धन के उत्कृष्ट उदाहरण हैं। आज आधुनिक तकनीक के साथ यह क्षेत्र तेजी से विकसित हो रहा है और खाद्य सुरक्षा तथा पोषण में महत्वपूर्ण योगदान दे रहा है।
2. प्रश्न: भारत में जल संवर्धन के क्या स्रोत हैं?
उत्तर:
भारत जल संसाधनों से समृद्ध देश है, इसलिए जल संवर्धन के अनेक स्रोत उपलब्ध हैं। प्रमुख स्रोतों में नदियाँ, झीलें, तालाब, बाँध, जलाशय, नहरें, दलदली क्षेत्र और समुद्री तटीय क्षेत्र शामिल हैं। देश में लाखों हेक्टेयर क्षेत्र में फैले तालाब और जलाशय मछली पालन के लिए उपयोग किए जाते हैं। समुद्री तटों पर समुद्री मत्स्य पालन और झींगा पालन का भी बड़ा महत्व है। इसके अलावा, कृत्रिम टैंक और रिसर्कुलेटिंग एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS) जैसे आधुनिक स्रोत भी विकसित हो रहे हैं। वर्षा जल संचयन से बने छोटे तालाब ग्रामीण जल संवर्धन के लिए महत्वपूर्ण हैं। इन सभी स्रोतों के कारण भारत विश्व के प्रमुख मत्स्य उत्पादक देशों में शामिल है।
3. प्रश्न: जल संवर्धन की समस्याओं पर टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
जल संवर्धन के विकास के बावजूद कई समस्याएँ सामने आती हैं। जल प्रदूषण सबसे बड़ी समस्या है, क्योंकि औद्योगिक अपशिष्ट और रासायनिक उर्वरक जल की गुणवत्ता को खराब करते हैं। जलवायु परिवर्तन भी उत्पादन को प्रभावित करता है, जिससे तापमान और वर्षा में असंतुलन पैदा होता है। रोगों का प्रकोप मछलियों और झींगों की मृत्यु दर बढ़ाता है। गुणवत्तापूर्ण बीज और संतुलित आहार की कमी भी उत्पादन को प्रभावित करती है। किसानों को तकनीकी ज्ञान और वित्तीय सहायता का अभाव होता है। बाजार में उचित मूल्य न मिलने से भी समस्याएँ बढ़ती हैं। इन चुनौतियों के समाधान के लिए वैज्ञानिक तकनीकों और सरकारी योजनाओं की आवश्यकता है।
4. प्रश्न: जल संवर्धन की उच्चतर उत्पादकता की योजना पर एक टिप्पणी लिखिए।
उत्तर:
उच्च उत्पादकता के लिए वैज्ञानिक प्रबंधन आवश्यक है। सबसे पहले उचित जल गुणवत्ता बनाए रखना चाहिए, जिसमें तापमान, pH और ऑक्सीजन स्तर का संतुलन जरूरी है। उच्च गुणवत्ता वाले बीज का चयन उत्पादन बढ़ाने में मदद करता है। संतुलित आहार और नियमित स्वास्थ्य परीक्षण रोगों को रोकते हैं। बहु-स्तरीय मत्स्य पालन (Polyculture) से उत्पादन कई गुना बढ़ सकता है, क्योंकि विभिन्न प्रजातियाँ अलग-अलग स्तरों पर भोजन ग्रहण करती हैं। आधुनिक तकनीक जैसे बायोफ्लॉक और RAS प्रणाली जल की बचत और अधिक उत्पादन सुनिश्चित करती है। प्रशिक्षण और बाजार प्रबंधन भी महत्वपूर्ण हैं। इन उपायों से जल संवर्धन को अधिक लाभकारी बनाया जा सकता है।
5. प्रश्न: जलीय खरपतवार (Aquatic Weeds) क्या है? एवं उनका वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
जलीय खरपतवार वे अवांछित पौधे हैं जो जलाशयों में अत्यधिक मात्रा में उगकर जल की गुणवत्ता और जलीय जीवन को प्रभावित करते हैं। ये पौधे सूर्य प्रकाश और पोषक तत्वों का अत्यधिक उपयोग करते हैं, जिससे मछलियों के लिए ऑक्सीजन की कमी हो जाती है। जलीय खरपतवार का वर्गीकरण मुख्यतः तीन प्रकारों में किया जाता है: (1) तैरने वाले खरपतवार – जैसे जलकुंभी, (2) डूबे हुए खरपतवार – जैसे हाइड्रिला, (3) किनारे उगने वाले खरपतवार – जैसे टाइफा। ये जल संवर्धन में बाधा उत्पन्न करते हैं और उत्पादन घटाते हैं, इसलिए इनका नियंत्रण आवश्यक है।
6. प्रश्न: जलीय खरपतवार को नियंत्रित करने की विधियों को विस्तार से समझाइये।
उत्तर:
जलीय खरपतवार नियंत्रण के लिए तीन मुख्य विधियाँ अपनाई जाती हैं। यांत्रिक विधि में खरपतवारों को हाथ या मशीन से हटाया जाता है। जैविक विधि में कुछ विशेष मछलियाँ जैसे घास कार्प का उपयोग किया जाता है, जो खरपतवार खाकर उन्हें नियंत्रित करती हैं। रासायनिक विधि में शाकनाशी दवाओं का सीमित उपयोग किया जाता है, लेकिन इसका प्रयोग सावधानी से करना चाहिए। इसके अलावा जल स्तर नियंत्रण और पोषक तत्वों की मात्रा कम करके भी खरपतवार की वृद्धि रोकी जा सकती है। इन सभी विधियों के संयोजन से बेहतर परिणाम प्राप्त होते हैं।
7. प्रश्न: जलीय खरपतवार को परिभाषित करते हुए उनका वर्गीकरण कीजिए।
उत्तर:
जलीय खरपतवार वे पौधे हैं जो जल में अनियंत्रित रूप से बढ़कर जलाशयों की उपयोगिता को कम करते हैं। ये जल के प्रवाह को रोकते हैं, मछलियों के लिए ऑक्सीजन कम करते हैं और रोगों का कारण बनते हैं। वर्गीकरण के अनुसार इन्हें चार श्रेणियों में बाँटा जा सकता है: तैरने वाले (Floating), डूबे हुए (Submerged), उभरे हुए (Emergent) और जड़ित तैरने वाले (Rooted floating)। प्रत्येक प्रकार जल पर्यावरण को अलग-अलग तरीके से प्रभावित करता है। जल संवर्धन में इनके नियंत्रण और प्रबंधन से उत्पादन और जल गुणवत्ता दोनों बेहतर बनती हैं।
प्रश्न 8: जलीय खरपतवार के नियंत्रण विधियों का वर्णन कीजिए।
जलीय खरपतवार (Aquatic weeds) वे अवांछित पौधे हैं जो तालाब, झील, नहर और जलाशयों में अत्यधिक वृद्धि करके जलीय कृषि, जल परिवहन तथा जल की गुणवत्ता को प्रभावित करते हैं। इनके नियंत्रण के लिए विभिन्न विधियाँ अपनाई जाती हैं।
सबसे पहले यांत्रिक नियंत्रण में हाथ से निकालना, कटाई (harvesting), ड्रेजिंग और मशीनों की सहायता से खरपतवार हटाना शामिल है। यह विधि सुरक्षित है परंतु बड़े जलाशयों में महँगी और समय लेने वाली होती है।
जैविक नियंत्रण में खरपतवार खाने वाले जीवों का उपयोग किया जाता है, जैसे घास कार्प (Grass carp) मछली जलकुंभी जैसी खरपतवार खाकर उन्हें नियंत्रित करती है। कुछ कीट जैसे weevils भी जैविक नियंत्रण में उपयोगी हैं।
रासायनिक नियंत्रण में शाकनाशकों (herbicides) जैसे 2,4-D, glyphosate आदि का सीमित और सावधानीपूर्वक प्रयोग किया जाता है। यह तेजी से प्रभावी है, परंतु अत्यधिक प्रयोग जल प्रदूषण का कारण बन सकता है।
निवारक उपाय जैसे पोषक तत्वों की अधिकता रोकना, जल प्रवाह बनाए रखना और नियमित निगरानी करना भी महत्वपूर्ण है। संयुक्त रूप से इन विधियों का उपयोग सबसे प्रभावी माना जाता है।
प्रश्न 9: जल-कृषि (Aquaculture) के महत्व पर टिप्पणी लिखिए।
जल-कृषि वह प्रक्रिया है जिसमें मछली, झींगा, शैवाल और अन्य जलीय जीवों का नियंत्रित वातावरण में पालन-पोषण किया जाता है। वर्तमान समय में इसकी उपयोगिता अत्यधिक बढ़ गई है।
सबसे बड़ा महत्व खाद्य सुरक्षा में है। विश्व की बढ़ती जनसंख्या के लिए प्रोटीन का सस्ता और पौष्टिक स्रोत उपलब्ध कराना जल-कृषि का प्रमुख योगदान है। मछली में उच्च गुणवत्ता का प्रोटीन, ओमेगा-3 फैटी एसिड, विटामिन और खनिज पाए जाते हैं।
यह रोजगार सृजन का महत्वपूर्ण माध्यम है, विशेषकर ग्रामीण और तटीय क्षेत्रों में। भारत में लाखों लोग मत्स्य पालन से अपनी आजीविका चलाते हैं।
जल-कृषि विदेशी मुद्रा अर्जन में भी योगदान देती है। झींगा और मछली का निर्यात भारत की अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।
इसके अतिरिक्त, यह पर्यावरणीय संतुलन बनाए रखने में भी सहायक है। एकीकृत कृषि-प्रणाली (Integrated farming) में मछली पालन को कृषि और पशुपालन के साथ जोड़कर अधिक उत्पादन प्राप्त किया जा सकता है।
इस प्रकार जल-कृषि खाद्य, आर्थिक और सामाजिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 10: झींगा संवर्धन (Prawn Culture) के इतिहास पर प्रकाश डालिए।
झींगा संवर्धन का इतिहास प्राचीन काल से जुड़ा हुआ है। चीन, जापान और दक्षिण-पूर्व एशिया में हजारों वर्षों पहले से प्राकृतिक जलाशयों में झींगा पालन किया जाता था। प्रारंभिक समय में किसान प्राकृतिक बीज (seed) पर निर्भर थे और पारंपरिक तालाबों में झींगा पालन करते थे।
20वीं शताब्दी में वैज्ञानिक तकनीकों के विकास के साथ झींगा संवर्धन ने आधुनिक रूप लिया। हैचरी तकनीक विकसित होने से कृत्रिम रूप से झींगा के बीज तैयार करना संभव हुआ। इससे उत्पादन में स्थिरता और वृद्धि हुई।
भारत में 1980 के दशक के बाद झींगा पालन का तेजी से विकास हुआ। तटीय राज्यों जैसे आंध्र प्रदेश, तमिलनाडु और ओडिशा में व्यावसायिक झींगा पालन शुरू हुआ।
आज झींगा संवर्धन एक उच्च लाभकारी उद्योग बन चुका है। आधुनिक तकनीकों जैसे एरेशन, कृत्रिम आहार, रोग प्रबंधन और जैव-सुरक्षा उपायों ने उत्पादन क्षमता को कई गुना बढ़ा दिया है।
प्रश्न 11: व्यावसायिक महत्व के झींगों पर एक संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
विश्व में कई झींगा प्रजातियाँ व्यावसायिक दृष्टि से महत्वपूर्ण हैं। इनमें समुद्री और मीठे पानी दोनों प्रकार के झींगे शामिल हैं।
सबसे प्रमुख प्रजाति टाइगर प्रॉन (Penaeus monodon) है, जो आकार में बड़ा और उच्च बाजार मूल्य वाला होता है। इसके अलावा व्हाइट लेग श्रिम्प (Litopenaeus vannamei) भी अत्यधिक लोकप्रिय है, क्योंकि यह तेजी से बढ़ता है और रोगों के प्रति अपेक्षाकृत सहनशील है।
मीठे पानी में Macrobrachium rosenbergii (Giant freshwater prawn) अत्यंत महत्वपूर्ण है। इसका पालन तालाबों में आसानी से किया जा सकता है।
इन झींगों का महत्व मुख्यतः उनके निर्यात मूल्य के कारण है। भारत विश्व के प्रमुख झींगा निर्यातक देशों में शामिल है। इनके पालन से किसानों की आय में वृद्धि होती है और रोजगार के अवसर बढ़ते हैं।
प्रश्न 12: तीव्रतम गति से वृद्धि करने वाले स्वच्छ जलीय झींगा की प्रजाति की जैविकी पर प्रकाश डालिए।
मीठे पानी में तेजी से बढ़ने वाली प्रमुख प्रजाति Macrobrachium rosenbergii है, जिसे Giant freshwater prawn कहा जाता है।
इसकी जैविकी में शरीर का विभाजन सिर-वक्ष (cephalothorax) और उदर (abdomen) में होता है। यह सर्वाहारी होता है और शैवाल, कीट लार्वा तथा कृत्रिम आहार खाता है।
इसका जीवन चक्र रोचक है। वयस्क झींगा मीठे पानी में रहता है, लेकिन इसके लार्वा को प्रारंभिक विकास के लिए खारे पानी की आवश्यकता होती है। यही कारण है कि हैचरी में नियंत्रित खारे पानी का उपयोग किया जाता है।
यह प्रजाति तेजी से वृद्धि करती है और 5–6 महीनों में बाजार योग्य आकार प्राप्त कर लेती है। इसकी रोग प्रतिरोधक क्षमता अच्छी होती है, इसलिए यह किसानों के लिए लाभकारी है।
प्रश्न 13: झींगा मछली के संवर्धन तकनीकी को विस्तार से समझाइये।
झींगा संवर्धन एक वैज्ञानिक प्रक्रिया है जिसमें उचित तालाब प्रबंधन, बीज चयन और पोषण का विशेष ध्यान रखा जाता है।
पहला चरण तालाब तैयारी है, जिसमें सुखाना, चूना डालना और खाद डालना शामिल है। इसके बाद गुणवत्तापूर्ण बीज (seed) का चयन कर उचित घनत्व पर तालाब में छोड़ा जाता है।
खुराक प्रबंधन महत्वपूर्ण है। संतुलित आहार देने से वृद्धि तेज होती है और रोगों का खतरा कम होता है।
जल गुणवत्ता प्रबंधन में घुलित ऑक्सीजन, pH और तापमान का नियमित निरीक्षण किया जाता है। आवश्यकता पड़ने पर एरेशन (aeration) किया जाता है।
रोग नियंत्रण हेतु जैव-सुरक्षा उपाय अपनाए जाते हैं, जैसे तालाब में बाहरी जीवों का प्रवेश रोकना और नियमित निगरानी करना। उचित देखभाल से 4–6 महीनों में झींगा तैयार हो जाता है।
प्रश्न 14: झींगा संवर्धन/पकड़ने की विभिन्न विधियों के बारे में लिखिए।
झींगा पकड़ने की कई विधियाँ प्रचलित हैं, जिन्हें पारंपरिक और आधुनिक तकनीकों में बाँटा जा सकता है।
पारंपरिक विधियाँ में जाल (nets), जाल फंदे (traps) और हाथ से पकड़ना शामिल है। ग्रामीण क्षेत्रों में इनका उपयोग अधिक होता है।
आधुनिक विधियाँ में ट्रॉलिंग (trawling), ड्रेजिंग और विशेष झींगा जाल का उपयोग किया जाता है। समुद्र में बड़े पैमाने पर ट्रॉलिंग से झींगा पकड़ा जाता है।
झींगा पालन में आंशिक और पूर्ण कटाई (harvesting) तकनीक अपनाई जाती है। आंशिक कटाई में बड़े झींगों को पहले निकाल लिया जाता है, जबकि छोटे झींगे आगे बढ़ते रहते हैं।
कटाई के बाद झींगों को तुरंत बर्फ में रखकर गुणवत्ता बनाए रखी जाती है। सही तकनीक से उत्पादन और लाभ दोनों बढ़ते हैं।
प्रश्न 15: झींगों के परिरक्षण एवं प्रसंस्करण पर टिप्पणी लिखिए।
झींगा अत्यंत नाशवान समुद्री खाद्य पदार्थ है, इसलिए इसकी गुणवत्ता बनाए रखने के लिए उचित परिरक्षण (Preservation) और प्रसंस्करण (Processing) आवश्यक है। झींगा पकड़े जाने के तुरंत बाद उसमें सूक्ष्मजीवों की वृद्धि शुरू हो जाती है, जिससे खराब होने का खतरा बढ़ता है। इसलिए कटाई के बाद तुरंत बर्फ में रखना (icing) पहला और सबसे महत्वपूर्ण कदम है।
परिरक्षण की प्रमुख विधियों में शीत भंडारण (Refrigeration) और जमाना (Freezing) शामिल हैं। फ्रीजिंग –18°C या उससे कम तापमान पर की जाती है, जिससे झींगे लंबे समय तक सुरक्षित रहते हैं। इसके अतिरिक्त ब्लास्ट फ्रीजिंग और IQF (Individually Quick Frozen) तकनीक का उपयोग निर्यात उद्योग में किया जाता है।
प्रसंस्करण में सफाई, छिलका हटाना (peeling), शिरा निकालना (deveining), ग्रेडिंग और पैकिंग शामिल है। कुछ झींगों को कैनिंग, सुखाने, धूम्र-संरक्षण (smoking) और पिकलिंग द्वारा भी सुरक्षित किया जाता है। आधुनिक प्रसंस्करण इकाइयों में गुणवत्ता नियंत्रण, स्वच्छता और HACCP मानकों का पालन किया जाता है। सही परिरक्षण और प्रसंस्करण से झींगा उद्योग में निर्यात गुणवत्ता बनाए रखना संभव होता है।
प्रश्न 16: झींगा मछली के परजीवी बीमारियों और उनके नियंत्रण पर टिप्पणी लिखिए।
झींगा पालन में परजीवी रोग उत्पादन और आर्थिक लाभ को गंभीर रूप से प्रभावित करते हैं। प्रमुख परजीवी रोगों में प्रोटोजोआ, हेल्मिन्थ और क्रस्टेशियन परजीवी शामिल हैं।
प्रोटोजोआ जैसे Zoothamnium और Epistylis झींगे के गिल्स और शरीर पर चिपक जाते हैं, जिससे श्वसन में बाधा आती है। हेल्मिन्थ परजीवी झींगे के पाचन तंत्र को प्रभावित करते हैं। इसके अलावा कुछ परजीवी झींगे की त्वचा और खोल को क्षतिग्रस्त करते हैं।
रोग के लक्षणों में धीमी वृद्धि, रंग बदलना, सुस्ती और मृत्यु दर में वृद्धि शामिल है। नियंत्रण के लिए जैव-सुरक्षा (Biosecurity) उपाय अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।
तालाब की तैयारी, स्वच्छ पानी, उचित घनत्व और संतुलित आहार रोग रोकथाम में सहायक हैं। संक्रमित झींगों को अलग करना और समय-समय पर जल की गुणवत्ता की जांच करना भी आवश्यक है। कुछ मामलों में रासायनिक उपचार और प्रोबायोटिक्स का उपयोग किया जाता है। सही प्रबंधन से इन रोगों को काफी हद तक नियंत्रित किया जा सकता है।
प्रश्न 17: मोती संवर्धन (Pearl Culture) के इतिहास पर एक टिप्पणी लिखिए।
मोती संवर्धन का इतिहास प्राचीन सभ्यताओं से जुड़ा हुआ है। प्राचीन काल में मोती प्राकृतिक रूप से समुद्र से प्राप्त किए जाते थे। भारत, श्रीलंका और फारस की खाड़ी प्राचीन काल के प्रसिद्ध मोती केंद्र थे।
आधुनिक मोती संवर्धन की शुरुआत 19वीं शताब्दी के अंत में जापान में हुई। वैज्ञानिकों ने कृत्रिम रूप से मोती बनाने की तकनीक विकसित की। इसके बाद यह उद्योग विश्वभर में फैल गया।
भारत में मोती संवर्धन का विकास 20वीं शताब्दी में हुआ। समुद्री और मीठे पानी दोनों में मोती उत्पादन की तकनीक विकसित की गई। आज मोती संवर्धन एक लाभकारी उद्योग बन चुका है।
प्रश्न 18: निम्नलिखित पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
(a) मोती उत्पादक स्थल
मोती मुख्यतः उष्णकटिबंधीय समुद्री क्षेत्रों में पाए जाते हैं। भारत में प्रमुख स्थल तमिलनाडु का तटीय क्षेत्र, लक्षद्वीप और अंडमान-निकोबार द्वीप हैं। मीठे पानी में झील और तालाब भी उपयुक्त होते हैं।
(b) मोती उत्पादक जन्तु
मोती मुख्यतः पर्ल ऑयस्टर (Pearl oyster) द्वारा बनाए जाते हैं। इसके अलावा कुछ मीठे पानी की मसल्स (Freshwater mussels) भी मोती उत्पादन करती हैं। ये जीव अपने शरीर में प्रवेश करने वाले बाहरी कणों के चारों ओर मोती बनाते हैं।
प्रश्न 19: मोती शुक्ति (Pearl Oyster) की जैविकी पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए।
मोती शुक्ति एक द्विपटली मोलस्क (Bivalve mollusc) है, जिसका शरीर दो कठोर खोलों से ढका होता है। यह समुद्र के तल पर स्थिर रहकर जीवन व्यतीत करती है और फिल्टर फीडर होती है।
इसका शरीर मैन्टल, गिल्स और मांसल पैर से बना होता है। मैन्टल ही मोती निर्माण में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
इनका प्रजनन बाह्य निषेचन द्वारा होता है। अंडे और शुक्राणु पानी में छोड़े जाते हैं और लार्वा विकसित होकर समुद्र तल पर स्थिर हो जाते हैं।
प्रश्न 20: मोती निर्माण (Pearl formation) पर एक टिप्पणी लिखिए।
जब कोई बाहरी कण जैसे रेत या परजीवी मोती शुक्ति के शरीर में प्रवेश करता है, तो वह उसे एक रक्षा प्रतिक्रिया के रूप में ढकने लगता है। मैन्टल ऊतक उस कण के चारों ओर नैकर (Nacre) नामक पदार्थ की परतें जमा करता है।
यह प्रक्रिया कई महीनों या वर्षों तक चलती रहती है। धीरे-धीरे परतें जमा होकर मोती का निर्माण करती हैं। मोती की चमक और गुणवत्ता नैकर की परतों की संख्या और गुणवत्ता पर निर्भर करती है।
प्रश्न 21: मोती क्या है? भारत में मोती संवर्धन का वर्णन कीजिए।
मोती एक प्राकृतिक रत्न है जो कुछ मोलस्क जीवों द्वारा बनाया जाता है। यह मुख्यतः कैल्शियम कार्बोनेट की परतों से बना होता है और आभूषणों में उपयोग किया जाता है।
भारत में मोती संवर्धन समुद्री और मीठे पानी दोनों में किया जाता है। वैज्ञानिक तकनीकों द्वारा मोती शुक्ति में कृत्रिम रूप से न्यूक्लियस डालकर मोती बनाया जाता है।
तमिलनाडु, केरल, अंडमान-निकोबार और लक्षद्वीप प्रमुख समुद्री क्षेत्र हैं, जबकि मीठे पानी में तालाबों और झीलों में मोती संवर्धन किया जाता है। यह उद्योग रोजगार और निर्यात दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 22: निम्न पर संक्षिप्त टिप्पणी लिखिए – (a) मोती का संगठन (b) मोती के प्रकार (c) मोती उद्योग के दुश्मन जन्तु
मोती एक जैविक रत्न है जिसका निर्माण मोलस्क जीवों द्वारा किया जाता है।
(a) मोती का संगठन:
मोती मुख्यतः तीन परतों से बना होता है। सबसे बाहरी परत पतली जैविक परत होती है, जिसे कोंकिओलिन (Conchiolin) कहा जाता है। इसके अंदर कैल्शियम कार्बोनेट की क्रिस्टलीय परतें होती हैं, जिन्हें नैकर (Nacre) कहते हैं। यही परत मोती को चमक और मजबूती प्रदान करती है। केंद्र में वह विदेशी कण या न्यूक्लियस होता है जिसके चारों ओर परतें जमा होती हैं। मोती की गुणवत्ता उसकी परतों की मोटाई, चमक और गोलाई पर निर्भर करती है।
(b) मोती के प्रकार:
मोती मुख्यतः प्राकृतिक मोती और संवर्धित (Cultured) मोती दो प्रकार के होते हैं। प्राकृतिक मोती स्वतः बनते हैं जबकि संवर्धित मोती मानव द्वारा न्यूक्लियस डालकर बनाए जाते हैं। इसके अलावा मीठे पानी के मोती और समुद्री मोती भी पाए जाते हैं। रंग के आधार पर सफेद, गुलाबी, काले और सुनहरे मोती मिलते हैं।
(c) मोती उद्योग के दुश्मन जन्तु:
स्टारफिश, केकड़े, ऑक्टोपस और कुछ परजीवी जीव मोती शुक्ति को नुकसान पहुँचाते हैं। ये खोल को नुकसान पहुँचाकर मृत्यु का कारण बनते हैं, जिससे उत्पादन घटता है।
प्रश्न 23: स्वच्छ जल और समुद्री जल में मोती संवर्धन की तकनीक के बारे में विस्तार से समझाइए।
मोती संवर्धन समुद्री और मीठे पानी दोनों में किया जाता है, पर दोनों की तकनीक में कुछ अंतर होता है।
समुद्री मोती संवर्धन:
समुद्र में पर्ल ऑयस्टर को जाल या राफ्ट में लटकाकर रखा जाता है। परिपक्व शुक्ति में सर्जरी द्वारा न्यूक्लियस और मैन्टल ऊतक डाला जाता है। इसके बाद उन्हें साफ समुद्री जल में 1–2 वर्ष तक रखा जाता है। नियमित सफाई और निगरानी आवश्यक होती है।
मीठे पानी का मोती संवर्धन:
तालाबों और झीलों में मीठे पानी की मसल्स का उपयोग किया जाता है। इसमें छोटे-छोटे ऊतक प्रत्यारोपण (tissue grafting) तकनीक अपनाई जाती है। यह प्रक्रिया सस्ती और अधिक उत्पादन देने वाली होती है।
दोनों तकनीकों में जल गुणवत्ता, भोजन और रोग नियंत्रण महत्वपूर्ण होते हैं।
प्रश्न 24: मछली पालन (Fish culture) के बारे में संक्षिप्त टिप्पणी दीजिए।
मछली पालन एक महत्वपूर्ण जलीय कृषि गतिविधि है जिसमें नियंत्रित परिस्थितियों में मछलियों का पालन किया जाता है। यह प्रोटीन का सस्ता स्रोत प्रदान करता है और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाता है।
मछली पालन में तालाब की तैयारी, गुणवत्तापूर्ण बीज चयन, संतुलित आहार और जल गुणवत्ता का प्रबंधन आवश्यक है। आधुनिक तकनीकों से उत्पादन कई गुना बढ़ गया है।
भारत में कार्प मछलियाँ जैसे रोहू, कतला और मृगल प्रमुख हैं। मछली पालन रोजगार और निर्यात दोनों के लिए महत्वपूर्ण है।
प्रश्न 25: स्वच्छ जलीय मत्स्य फार्म और प्रजनन समायोजन के बारे में समझाइए।
स्वच्छ जल मत्स्य फार्म की सफलता उचित प्रबंधन पर निर्भर करती है। तालाब की तैयारी में सुखाना, चूना डालना और खाद देना शामिल है। इससे जल की गुणवत्ता सुधरती है।
प्रजनन के लिए चयनित मछलियों को ब्रूड स्टॉक कहा जाता है। हार्मोन इंजेक्शन द्वारा कृत्रिम प्रजनन (induced breeding) कराया जाता है।
अंडों से लार्वा निकलने के बाद उन्हें नर्सरी तालाब में पाला जाता है। उचित भोजन और ऑक्सीजन स्तर बनाए रखना आवश्यक है।
प्रश्न 26: मिश्रित मछली पालन (Composite fish farming) के बारे में संक्षिप्त में समझाइए।
मिश्रित मछली पालन में विभिन्न प्रजातियों की मछलियों को एक ही तालाब में पाला जाता है। यह सिद्धांत भोजन प्रतिस्पर्धा कम करने पर आधारित है।
उदाहरण के लिए रोहू सतह के पास, कतला मध्य स्तर पर और मृगल तल पर भोजन करती है। इस प्रकार तालाब के सभी स्तरों का उपयोग होता है।
इस विधि से उत्पादन अधिक होता है और संसाधनों का बेहतर उपयोग होता है। यह भारत में बहुत लोकप्रिय और लाभकारी तकनीक है।



0 टिप्पणियाँ